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रेगिस्तान से किताबों के मेले तक

रेगिस्तान का ये हिस्सा जहाँ मैं रहता हूँ दिल्ली से बहुत दूर है. हालाँकि कई और जगहें इससे भी दोगुनी दूरी पर हैं. हम सब फिर भी किसी न किसी बहाने दिल्ली शहर पहुँच ही जाते हैं. यात्राओं को लेकर मेरे भीतर का यात्री हमेशा उनके स्थगित और निरस्त होने की दुआएं करता रहता है. मन होता ही नहीं कहीं जाया जाये. इसी रेत में उगता और डूबता हुआ सूरज, चाँद की ठंडी रौशनी, मौसमों कि गरम ठण्डी हवाएं इस तरह पसंद है कि इससे आगे कहीं जाना सुहाता नहीं. बावजूद इसके जाना ही होता है. कभी सरकारी काम से, नहीं तो फिर अपनी ज़रूरत के काम निकल आते हैं. इस बार मैं विश्व पुस्तक मेला में भाग लेने के लिए जा रहा था. रेल के डिब्बे में साइड बर्थ पर बैठे हुए मैंने देखा कि मेरे सामने वाली दो शायिकाओं पर बैठे हुए सज्जन किताबें पढ़ तरहे हैं. एक के पास प्रेमचंद का कथा संग्रह था और दूसरे वाले चैन मार्केटिंग या जल्दी पैसा कैसे बनाये जैसी कोई किताब लिए हुए थे. खिड़की के पास बैठी महिला एक मासिक पत्रिका पढ़ रही थी. वह दृश्य इतना सुन्दर था कि मैं अभिभूत हो गया. मैंने अपनी खुशी के हक़ में दुआ की इस बार पुस्तक मेले की यात्रा अच्छी रहेगी. रेलगाड़ी की छुक छुक को मैं सुबह त्याग देता हूँ. मैं जयपुर उतर कर आगे कार से दिल्ली निकल पड़ता हूँ.

प्रगति मैदान पर बने हुए विशाल प्रदर्शनी भवनों के गुम्बद दीखते ही मुझे खूब खुशी होती है. मैं नये दोस्तों और पुराने मित्रों से मिल लेने की खुशी से भर उठता हूँ. दिल्ली के पहाडगंज में चलती हुई बेतरतीब दुनिया और नई दिल्ली के इन राजपथों पर आए हुए लोग कितने अलग दीखते हैं. पढ़ा लिखा तबका जिसे किताबों से प्रेम है, जो ज्ञान का मोल समझता है वह सभ्य दीखता है. जो किताब मेले में नहीं आते वे असभ्य हैं ऐसी कोई बात नहीं है. लेकिन हिंदुस्तान के अलग अलग हिस्सों और जगहों पर जीवन जीने में कितन फर्क है. एक ही देश में लोगों की सोच और व्यवहार एक दूजे के विपरीत हैं. हम कभी जान नहीं पाते हैं कि इसकी वजह क्या है. देश में एक शिक्षा तंत्र है. विद्यालय है. शिक्षा आधारित रोज़गार है. फिर भी इतनी दूरी कि जिसे कभी सोचा न जा सके. क्या हम कभी ऐसे बन सकते हैं कि हर जगह किताबें हमारे आस पास हों और वैसी ही सस्ती और सुलभ हों जैसी रुसी प्रकाशन रादुगा से आया करती थीं. अब दो तीन सैंकड़ा में एक आधी किताब आती है. प्रकाशक फिर भी परेशान. लेखक को फिर भी रोयल्टी नहीं. यानी सब कुछ गडबड है.

मेला पन्द्रह फरवरी से आरम्भ हुआ और तेईस फरवरी तक चला. इस बीच असंख्य लोगों ने किताबों को छुआ, खरीदा और अपने साथ ले गए. स्टाल्स पर खूब भीड़ थी. लोग इतने बड़े मैदान में दूर दूर बने हुए हाल्स का चक्कर काटते. कुछ लोग बसों में बैठकर एक हाल से दूसरे हाल तक आते जाते. वे बसें इस मैदान की दूरी को कम करने के लिए लगायी जाती हैं. यहीं लगभग हर जगह पर खाने और चाय कॉफी के स्टाल थे. वहाँ चर्चा प्रेमी भी खड़े रहते. वहीँ पर लेखकों और उनके मित्रों में संवाद होता. वहीँ प्रियजनों के साथ मिलन का सुख बांटा जाता.
मेले में रहने के दौरान मैंने कई स्टाल पर अपनी पसन्द की किताबें चुनी. अक्सर ऐसी जगहों पर किताब चुनना तभी आसान हो सकता है जब आप पहले से तय करके आयें कि आपको क्या चाहिए. मेरे पास किताबों की सूची थी. अपने प्रिय लेखकों के नाम थे. किस विधा की किताब लेनी है ये भी तय था. इसलिए मुझे किताबें खरीदते समय कुछ परेशानी न हुई. मैंने लगभग सभी किताबें हिंदी भाषा कि ही ली. इनमें से कुछ रूसी से और कुछ आंग्ल भाषा के अनुवाद भी शामिल हैं. प्रकाशक के स्टाल पर एक दिन मुझे अपने पाठकों से मिलना था. उस दिन एक ही जगह पर सुबह से शाम हो गयी. रेगिस्तान में रहने वाले एक लेखक के खूब सारे पाठक जमा हुए. एक कॉलेज का विद्यार्थी आया हुआ था जिसके पास मेरी दोनों किताबें पहले से ही थी लेकिन उसने फिर से खरीदी ताकि वह मेरे हस्ताक्षर ले सके. इस तरह के प्रेम को देखकर मैं भीग गया था. मेरे पाठकों और चाहने वालों की उम्र का पैमाना खूब चौड़ा था. वरिष्ठ नागरिकों से लेकर सत्रह साल के बच्चे. सब सामान रूप से प्रेम करने वाले. ये सब इंटरनेट तकनीक के कारण ही संभव हुआ कि सीमा पर रहते हुए हम देश के दिल में जगह बना सकें.

जिस दिन मुझे लौट आना था उसी दिन मैंने हाल नंबर बारह के पास पीली टोपी लगाये हुए नौजवानों के एक समूह को नुक्कड़ नाटक करते हुए देखा. नुक्कड़ नाटक मुझे खूब प्रिय हैं. इसलिए मैं उनके पास पहुँच गया. ये नुक्कड़ नाटक एक सन्देश दे रहा था कि आसाराम बापू ईश्वर के अवतार हैं. उनको जानबूझकर फंसाया गया है. अभिनय करने वालों के आस पास कोई बीस तीस लोग जमा थे और यकीनन या तो वे मेरी तरह रहगुज़र थे या फिर कथित संत या ईश्वर आसाराम के चेले. नुक्कड़ नाटक बुद्धिजीवियों का प्रिय कार्य है. इसलिए आसाराम के समर्थन में नुक्कड़ नाटक होता देखते ही मैं चौंककर चारों तरफ देखने लगा. मेरी नज़रे एक और ऐसे ही आयोजन के बारे में सोचने लगी जो तरुण तेजपाल के बारे में हो रहा हो. आखिर तरुण तेजपाल भी सिर्फ आरोपी ही है और कहा जाता है कि उनको भी फंसाया गया है. ये कैसा दुर्भग्य है कि अंधभक्ति हमें कुछ विचारने नहीं देती. तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर न्याय न्यायप्रणाली में चल रहे मुकदमों को हम इस तरह प्रभावित करना चाहते हैं. हालाँकि ऐसा सिर्फ मेले के मैदान में ही नहीं वरन मेले के भीतर भी कुछ एक स्टाल पर चल रहा था. मुफ्त में धार्मिक किताबें बांटी जा रही थी और संप्रदाय विशेष के स्टाल अपना राग आलाप रहे थे. हम रेगिस्तान से चलकर कहीं भी जाएँ भारत एक अद्भुत देश है. इसका रंग भले ही लग हो इसकी आत्मा में वही सब बसा हुआ है जो हर गाँव गली में देखने को मिलता है.

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…