कि मैं और तूँ रह गए हम नहीं

श्री चिड़ीमार कथा के बाद मैं आपको अपने कस्बे के स्कूल का ज़रा सा मौसम दिखा देता हूँ.

स्कूल दो पारियों में लगता था. दोपहर की स्कूल के पूरा होने से आधा घंटा पहले फ़ुटबाल खेलने वाले लड़के आ जाते. एक बार लड़कियों ने वाइस प्रिंसिपल साहब को शिकायत की. सर लड़के हमारे फ़ुटबाल मारते हैं. उन्होंने कहा- बेटा आपके नहीं मालेंगे तो क्या मेले मालेंगे. एक माडसाब थे मघ सिंह जी. हंसोड़ नहीं थे मगर चुटकियाँ लेने के माहिर थे और छात्रों में खूब लोकप्रिय थे. राजस्थानी घाघरे की निचली कोर से थोड़ा ऊपर एक अलग रंग की बेहद पतली तार जैसी कपड़े की लकीर लगायी जाती है. ये गोल घेर को सुन्दर बनाती है. इसे मगजी कहते हैं. कोई लड़का हिम्मत करके उनसे पूछता कि माडसाब आपका नाम क्या है. वे कहते- थारी बाई घाघरे हेटे लगावे जीको. ये बेहद श्लील प्रहसन खूब प्रसिद्द था. मुझे नहीं मालूम कि किसी लड़के ने ऐसा पूछा था या नहीं या माडसाब ऐसा कहते थे या नहीं. मगजी माडसाब को प्रिंसिपल साहब ने किसी बात पर कहा कि मिठाई खिलाओ. वे बाहर आए और महिला चपड़ासी को कहा कि बाई जी आपको प्रिंसिपल साहब बुला रहे हैं. बाई जी अंदर गयी. प्रिंसिपल साहब ने कहा कि मैंने तो नहीं बुलाया है. वास्तव में उन बाई जी का नाम था इमरती देवी. लेकिन मगजी इमारती देवी को प्रिंसिपल साहब को और बच्चों को खूब प्रिय थे. सभी लोकप्रिय मास्टर अपनी कक्षाएं बड़ के पेड़ के नीचे लगाया करते थे. स्कूल में विद्यार्थी बहुत ज्यादा थे. उनके संख्या बल के आगे सभी कमरों का नाप छोटा पड़ चुका था. इसलिए सौ सौ विद्यार्थी बाड़े की भेड़ों की तरह बैठे रहते थे. ज़मीन में छुपे हुए बारीक परजीवी लड़कों लड़कियों की टांगों से खून चूसते जाते थे. आखिर दो हज़ार से अधिक बच्चों और ए से पी सेक्शन तक पहुँच चुकी क्लासों को इसी तरह ही मेनेज किया जा सकता था.

स्कूल के वे दिन सरल थे. जटिलताएं हमें छू भी नहीं पाती थी.

अब मैं स्कूल के दिनों से बाहर तीन लंबे सालों का लीप लेते हुए सीधा उस दिन पर आ जाता हूँ जब अमित खूब चिंतित था. मैं ये लीप इसलिए ले रहा हूँ कि मुझे अमित के बारे में ज्यादा बात करने का मन है. उसकी चिंता थी कि वह मुम्बई विश्व विद्यालय से हिंदी में एम ए करना चाहता था मगर घरवाले तैयार न थे. अमित का प्लान था कि वह वहाँ एम ए करने के दौरान फिल्मों में स्क्रिप्ट लेखन में अपने हाथ आजमाएगा. दो साल वहाँ रहने के दौरान पढाई भी हो सकेगी और काम के लिए तलाश भी. अमित को मुम्बई जाने की स्वीकृति नहीं मिली. घरवाले चाहते थे कि वह शादी कर ले और घर संसार को आगे बढ़ाये.

इस मंथन में अमित ने एक ऐसा समझौता किया जिसने उसके जीवन की दिशा को बदल दिया. उस दिन अमित मेरे पास बैठा था. वह शायद संजय के पास भी जाकर आया होगा. उसने मुझे कहा कि मैंने एक समझौता सोचा है. मैं पिताजी का कहना मान कर शादी कर लेता हूँ. इस पर वे मुझे बोम्बे जाने देंगे. मैंने कहा- तुम पागल हो क्या? इसका मतलब जानते हो? उसने किसी फिल्म के संवाद की तरह कुछ ऐसी बात कही जिसका अर्थ था कि अगर ज़िंदगी हमारे साथ दांव खेलना चाहती है तो हमें उसका स्वागत करना चाहिए. उस दिन हमने दो पैकेट सिगरेट पी. उसने रेड एंड व्हाईट और मैंने विल्स नेवी कट. हमारे स्वाद अलग थे.

कुछ दिन बाद अमित दूल्हा बना हुआ था. मैं और संजय बारात की किसी जीप में बैठे हुए इन्द्रोई गाँव की तरफ जा रहे थे. शाम होते ही वह फेरे खाने चला गया और मैंने वहाँ मेहमानों के लिए लाई हुई कच्ची शराब पीनी शुरू की. एक कप शराब पीते ही मुझे उल्टियां होने लगी और फिर जाने कब सो गया. सुबह तक अमित विवाहित जीवन जीने के फेरे ले चुका था. घरवाले खुश थे. उसके पिताजी के चहरे पर संतोष और गर्व का भाव था. ये सामाजिक होने का दर्प था. इसके कुछ ही दिन बाद अमित ने कहा- बंधू कल की शाम बाड़मेर की आखिरी शाम होगी. मैं मालगोदाम रोड पर खड़ी एक बस के पास खड़ा था. वह बस बोम्बे जाती थी. अमित के लिए ये सपने के सच होने की शुरुआत थी. हम गले मिले. उसने बस के रवाना होने से पहले मेरे हाथ में एक पर्ची रखी. जब बस चली गयी और मैं घर आया तब मैंने उसे पढ़ा. उसमें लिखा था- क़यामत से कम यार ये ग़म नहीं/ कि मैं और तूँ रह गए हम नहीं.

अम्बर टाकीज में जब फिल्म के क्रेडिट दिखाई देते थे तब लोग उन क्रेडिट्स को नज़र अंदाज किये हुए फ़िल्म के शुरू होने का इंतज़ार करते थे या एक्जिट से बाहर जा रहे होते थे लेकिन अमित की नज़रें उन क्रेडिट्स को पढ़ रही होती थी. मोहन जी के सिनेमा के जिस दरवाज़े को मैं नरक का द्वार समझता था वह उसके सपनों का सुनहला आईना था. वही आईना उसे रेगिस्तान से उस समंदर के किनारे ले गया जहाँ मायावी संसार बसा हुआ था. बोम्बे.

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