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मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यों.

क़ैद ए हयात ओ बंद ए ग़म असल में दोनों एक है 
मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यों.

अमित को लगता होगा कि ये शेर मिर्ज़ा असद उल्लाह खां ग़ालिब साहब ने शायद उसी के लिए लिख छोड़ा होगा कि शादी करना या ज़िंदगी भर ग़म उठाते जाने असल में दोनों एक ही चीज़ है, किसी भी आदमी को मौत से पहले ग़म से आज़ादी क्यों मिले.

बोम्बे में अमित के पास महानगर अखबार की नौकरी थी. वह अपनी प्रिय बीट सिनेमा के लिए लिखने से हट कर साहित्यिक विधाओं पर भी लेख लिखने लगा था. उसने सम सामायिक विषयों पर कई गंभीर टिप्पणियां लिखने की ओर रुख किया था. कुछ समकालीन साहित्यिक पत्रिकाओं में अमित की लिखी हुई टिप्पणियां छप रही थी. वह स्क्रिप्ट लेखन के लिए सामग्री का अध्ययन कर रहा था. वह कितना कामयाब होता ये नहीं मालूम मगर वह अपनी पसंद का जीवन जीते हुए आधे सच्चे आधे बाकी ख्वाबों के साथ अंतिम साँस ले सकता था.

साल इकानवे से लेकर छियानवे तक अपने सपनों के लिए भाग रहे नौजवान को अब एक न खत्म होने पतझड़ से गुज़रना था. जिस समझौते से उसने अपने लिए एक रास्ता चुना था वह वास्तव में गहराई की ओर जाती अँधेरी सुरंग निकली.

अब इस कथा की कुछ रीलें आपको गायब मिलेंगी. इसलिए कि मेरी स्मृति खूब अच्छी नहीं है और यहाँ तक आते आते हम दोनों के हालत अलग अलग हो गए थे. जब अमित बम्बई विश्व विद्यालय पढ़ने गया तब मैं जोधपुर विश्व विद्यालय चला गया था. जोधपुर विश्व विद्यालय में एम ए हिंदी में प्रवेश लेकर मैं नवभारत टाइम्स के ब्यूरो चीफ नारायण बारेठ का सहयोगी हो गया. वहाँ मैं खबरें लिखना सीख रहा था किन्तु जो चीज़ सबसे अच्छी पाई वह थी फीचर लिखना. बारेठ जी पत्रिका के कोटा संस्करण में थे तब उन्होंने खूब फीचर लिखे थे. वे फीचर मुझे पढ़ने को मिलते थे. वे खुद कोई फ़ाइल घर से खोज कर लाते और कहते किशोर इनको पढ़ो. मैं शाम को नव भारत टाइम्स में होता था और दिन में विश्व विद्यालय की सड़कों पर घूमता रहता था.

कोई दो साल जोधपुर में बिताने के बाद मैं आकाशवाणी चूरू में उद्घोषक होकर इस संसार से दूर चला गया. जब बाड़मेर ट्रांसफर हुआ तब अमित आया ही था. उसने एक परीक्षा दी और ग्राम सेवक बन गया. इस सरकारी सेवा में आते ही अमित के सामने एक नई दुनिया खुली.

जिस लड़की से वह भागता फिर रहा था वह बेहद अच्छी थी जितना कि अमित खुद न था. मैं बेहद कम मगर चार-छः महीने में एक दो बार अमित के घर चला जाता था. अमित की पत्नी घूंघट खींचे हुए कभी-कभी चाय ले आती थी. एक बार जब घर गया तब वह एक गुप्त जगह पर आराम कर रहा था. सीढ़ियों के नीचे बने हुए लकड़ी के पार्टीशन में उसने दडबा बना रखा था. उसी में कुछ किताबें और म्यूजिक प्लेयर था. वह उसकी गुफा थी. जिसमें उसने अपनी निजी दुनिया बसाई थी. एक छोटी सी चारपाई पर वह सिकुड़ा हुआ पड़ा रहता था. हम दो दोस्त उसके अंदर बैठ जाते तो तीसरे के लिए कोई जगह न बचती. इस तरह अट्टालिकाओं के ख्वाब देखने वाला आदमी एक चार गुणा छः की जगह में सिमट गया था. उसके पास बड़े कमरे थे मगर जाने क्यों उसे वाही एक अँधेरा कोना रास आया.

अचानक मेरा तबादला सूरतगढ हो गया. हमारे बीच फिर दो साल का अंतराल आया.

अमित ने ग्राम सेवक के रूप में जो ग्रामीण जीवन अपनाया था वह उसी ग्राम्य जीवन की चालबाजियों का शिकार हो गया. जिस गाँव में उसकी पोस्टिंग थी वहाँ के सरपंच ने अमित को अफीम की लत लगा दी. अमेरिका की मशहूर गायिका बेल्ली होलीडे ने जिस नशे की ज़द में दो सिपाहियों के पहरे में आखिरी साँसे ली थी, वैसा ही हाल अमित का भी हो गया. उसने कोई साल भर तक इस दुःख को उठाया और आखिर एक दिन ठोकर मार दी. उसने इस नशे को एलोपेथी की ड्रग्स से रिप्लेस कर दिया. अब वह सारे दिन कॉफी में कोई पाउडर घोल कर पीता था. अमित के चहरे पर अजब ढंग की सूजन आ गयी थी. वह हर एक से नज़रें चुरा कर बात करता था.

ऐसे हाल में एक दिन मैं उसके घर गया. पापा और माँ घर पर नहीं थे. दोनों भाई काम पर गए हुए थे. अमित की पत्नी ने दरवाज़ा खोला. उन्होंने कहा कि वे अंदर सो रहे हैं. मैं उसके कमरे तक गया जहाँ कभी हम दस साल पहले किशोर कुमार के गाने सुना करते थे. वक्त बहुत गुज़र गया था लेकिन कमरे से कुछ न बदला था. वह आधी नशे भरी नींद से जागा और इस तरह मिला जैसे कोई दो राजनैतिक दल किसी एक बात पर सहमत होकर गले मिलते हैं.

वह अपना मुंह धोकर आया. उने अपनी पत्नी से कहा किशोर के लिए चाय बनाओ. उन दोनों का वार्तालाप बेहद आत्मीय था. ऐसा कि जैसे जन्म जन्म के संगी हो. उस दिन शादी के दस साल बाद पहली बार अमित की पत्नी ने मुझसे कहा- “इनको समझाओ, हमें कुछ नहीं चाहिए. बस ये रहें और बच्चे बड़े होते जाएँ.” मैं खूब भावुक हो गया कि वे मुझे अपना समझकर कह रही थी. मैंने अमित को कहा कि सुनो तो भाभी क्या कहती है. इनका कहा मानो. ये ज़िन्दगी खूब कीमती है. अमित ने सब बातों को हंस कर टाल दिया. हमने चाय पी और सोचते रहे बचपन के दिनों के बारे में. पहली बार वे मियां बीवी मेरे पास बैठे थे. बीच में मैं था.

कल मैं उसकी लिखावट में पढ़ रहा था जो ठीक उन्हीं दिनों अमित ने लिखा था कि मैं अपने बच्चों और बीवी से खूब प्यार करता हूँ. अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरी बीवी को एक चपरासी की तरह काम करना पड़ेगा. वह बेहद हताशा में अपनी डायरी लिख रहा था. उस डायरी में एक पत्र भी रखा था पत्र में लिखा था कि मुझे बचा लो. मेरी मदद करो. वह किसे संबोधित था मैं नहीं समझ पाया. लेकिन उसी डायरी में बच्चों का ज़िक्र था.

ज़िन्दगी में चाहे जैसे अंधे मोड़ आये हों मगर अमित की डायरी पढ़ते हुए मुझे लगता कि मिर्ज़ा ग़ालिब ने वह शेर अपने लिए ही कहा था. 
* * *

बात जारी है 

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यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

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भूल जाओ
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* * *

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* * *
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