Skip to main content

मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यों.

क़ैद ए हयात ओ बंद ए ग़म असल में दोनों एक है
मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यों.

अमित को लगता होगा कि ये शेर मिर्ज़ा असद उल्लाह खां ग़ालिब साहब ने शायद उसी के लिए लिख छोड़ा होगा कि शादी करना या ज़िंदगी भर ग़म उठाते जाने असल में दोनों एक ही चीज़ है, किसी भी आदमी को मौत से पहले ग़म से आज़ादी क्यों मिले.

बोम्बे में अमित के पास महानगर अखबार की नौकरी थी. वह अपनी प्रिय बीट सिनेमा के लिए लिखने से हट कर साहित्यिक विधाओं पर भी लेख लिखने लगा था. उसने सम सामायिक विषयों पर कई गंभीर टिप्पणियां लिखने की ओर रुख किया था. कुछ समकालीन साहित्यिक पत्रिकाओं में अमित की लिखी हुई टिप्पणियां छप रही थी. वह स्क्रिप्ट लेखन के लिए सामग्री का अध्ययन कर रहा था. हुनर के कत्लखाने बोम्बे में वह कितना कामयाब होता ये नहीं मालूम मगर वह अपनी पसंद का जीवन जीते हुए आधे सच्चे आधे बाकी ख्वाबों के साथ अंतिम साँस ले सकता था. बोम्बे में जाकर घर खरीदना एक आसान नहीं वरन बड़ा मुश्किल काम है. इस रेगिस्तान में एक आम आदमी का खर्च जितने में चलता है बोम्बे उसका दस गुना वसूलता है. मैं जब सरकारी नौकरी में आया तब मुझे मिलने वाली तनख्वाह से दस गुना ज्यादा तनख्वाह पा रहा एक केमस्ट्री पढ़ा हुआ मित्र बोम्बे में मुझसे दस गुना ज्यादा तनख्वाह पा रहा था और रोता रहता था कि घर का खर्च नहीं चलता. जबकि वह रहता किराये पर ही था. अमित के लिए बोम्बे में खुद का घर होना और नौकरी में लगातार बना रहा ज़रूर कठिन कार्य ही होते.

साल इकानवे से लेकर छियानवे तक अपने सपनों के लिए भाग रहे नौजवान को अब एक न खत्म होने पतझड़ से गुज़रना था. जिस समझौते से उसने अपने लिए एक रास्ता चुना था वह वास्तव में गहराई की ओर जाती अँधेरी सुरंग निकली.

अब इस कथा की कुछ रीलें आपको गायब मिलेंगी. इसलिए कि मेरी स्मृति खूब अच्छी नहीं है और यहाँ तक आते आते हम दोनों की हालत अलग अलग हो गए थे. जब अमित बोम्बे विश्व विद्यालय पढ़ने गया तब मैं जोधपुर विश्व विद्यालय चला गया था. जोधपुर विश्व विद्यालय में एम ए हिंदी में प्रवेश लेकर मैं नवभारत टाइम्स के ब्यूरो चीफ नारायण बारेठ का सहयोगी हो गया. वहाँ मैं खबरें लिखना सीख रहा था किन्तु जो चीज़ सबसे अच्छी पाई वह थी फीचर लिखना. बारेठ जी पत्रिका के कोटा संस्करण में थे तब उन्होंने खूब फीचर लिखे थे. वे फीचर मुझे पढ़ने को मिलते थे. वे खुद कोई फ़ाइल घर से खोज कर लाते और कहते किशोर इनको पढ़ो. उन फीचर को पढते हुए मुझे एक लक्ष्य मिल गया कि मैं एक दिन ज़रूर अच्छा फीचर लिखूंगा. मैं शाम को नव भारत टाइम्स में होता था और दिन में विश्व विद्यालय की सड़कों पर घूमता रहता था. इस दूरी में भी हम लोग विश्व विद्यालयों के छात्र छात्राओं की साहित्यिक पत्रिका निकाला करते थे. इसका नाम था प्रतिबद्ध. इसकी सब प्रतियाँ फोटो स्टेट हुआ करती थी. इस पत्रिका में शामिल होने वाले रचयिता, संपादक और प्रकाशक सब छात्र छात्राएं ही थे. इस पत्रिका को हौसला अमित से भी मिलता था. इसे कोई चार अंक आए. इनके संपादक रज़िया बेगम, राकेश शर्मा और मनोज चौधरी थे. एक अकं का संपदन मैंने किया था. अमित हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा था.

कोई दो साल जोधपुर में बिताने के बाद मैं आकाशवाणी चूरू में उद्घोषक होकर इस संसार से दूर चला गया. जब बाड़मेर ट्रांसफर हुआ तब अमित आया ही था. वह पत्रिका में काम करना चाहता था मगर बकौल अमित धर्म सिंह भाटी के लोग उसे वहाँ काम नहीं करने दे रहे थे. भाटी मेरे मित्र हैं करीबी सखा हैं इसलिए ये मैंने बाद में जाना कि अमित को कुछ आभासी मुश्किलें भी रही होंगी. मैंने कहा कि तुम एक होशियार लड़के हो. तुम्हारी काबिलियत अलग तरह की है. तुम जो चाहो बन सकते हो. मगर जो रूठा हुआ हो उसे कोई कैसे बना सकता है. फिर भी उसने एक परीक्षा दी और ग्राम सेवक बन गया. इस सरकारी सेवा में आते ही अमित के सामने एक नई दुनिया खुली.

जिस लड़की से वह भागता फिर रहा था वह बेहद अच्छी थी जितना कि अमित खुद न था. वह मुझे घर बुलाता था मगर बड़ा अजीब लगता था कि कैसे उस जोड़े का समय चुराया जाये. लेकिन फिर भी मैं जाता था. अमित की पत्नी दो हाथ लंबा घूंघट खींचे हुए कभी कभी चाय ले आती थी. वह किसी सामंत की तरह मुस्कुराता था. सीढ़ियों के नीचे बने हुए लकड़ी के पार्टीशन में उसने दडबा बना रखा था. उसी में कुछ किताबें और म्यूजिक प्लेयर था. वह उसकी गुफा थी. जिसमें उसने अपनी निजी दुनिया बसाई थी. एक छोटी सी चारपाई पर वह सिकुड़ा हुआ पड़ा रहता था. हम दो दोस्त उसके अंदर बैठ जाते तो तीसरे के लिए कोई जगह न बचती. इस तरह अट्टालिकाओं के ख्वाब देखने वाला आदमी एक चार गुणा छः की जगह में स्वेच्छा से खुद को कैद कर चुका था.

अचानक मेरा तबादला सूरतगढ हो गया. हमारे बीच फिर दो साल का अंतराल आया.

अमित ने ग्राम सेवक के रूप में जो ग्रामीण जीवन अपनाया था वह उसी ग्राम्य जीवन की चालबाजियों का शिकार हो गया. जिस गाँव में उसकी पोस्टिंग थी वहाँ के सरपंच ने अमित को अफीम की लत लगा दी. अमेरिका की मशहूर गायिका बेल्ली होलीडे ने जिस नशे की ज़द में दो सिपाहियों के पहरे में आखिरी साँसे ली थी, वैसा ही हाल अमित का भी हो गया. वह सारे दिन नशे की तलाश में घूमता था. उसने कोई साल भर तक इस दुःख को उठाया और आखिर एक दिन ठोकर मार दी. उसने इस नशे को मेडिकेटेड ड्रग्स से रिप्लेस कर दिया. अब वह सारे दिन कॉफी में कोई पाउडर घोल कर पीता था. अमित के चहरे पर अजब ढंग की सूजन आ गयी थी. वह हर एक से नज़रें चुरा कर बात करता था.

ऐसे हाल में एक दिन मैं उसके घर गया. पापा और माँ घर पर नहीं थे. दोनों भाई काम पर गए हुए थे. अमित की पत्नी ने दरवाज़ा खोला. उन्होंने कहा कि वे अंदर सो रहे हैं. मैं उसके कमरे तक गया जहाँ कभी हम दस साल पहले किशोर कुमार के गाने सुना करते थे. वक्त बहुत गुज़र गया था लेकिन कमरे से कुछ न बदला था. वह आधी नशे भरी नींद से जागा और इस तरह मिला जैसे कोई दो राजनैतिक दल किसी एक बात पर सहमत होकर गले मिलते हैं. वह अपना मुंह धोकर आया. उने अपनी पत्नी से कहा किशोर के लिए चाय बनाओ. उन दोनों का वार्तालाप बेहद आत्मीय था. ऐसा कि जैसे जन्म जन्म के संगी हो. उस दिन शादी के दस साल बाद पहली बार अमित की पत्नी ने मुझसे कहा- “इनको समझाओ, हमें कुछ नहीं चाहिए. बस ये रहें और बच्चे बड़े होते जाएँ.” मैं खूब भावुक हो गया कि वे मुझे अपना समझकर कह रही थी. मैंने अमित को कहा कि सुनो तो भाभी क्या कहती है. इनका कहा मानो. ये ज़िन्दगी खूब कीमती है. अमित ने सब बातों को हंस कर टाल दिया. हमने चाय पी और सोचते रहे बचपन के दिनों के बारे में. पहली बार वे मियां बीवी मेरे पास बैठे थे. बीच में मैं था.

कल मैं उसकी लिखावट में पढ़ रहा था जो ठीक उन्हीं दिनों अमित ने लिखा था कि मैं अपने बच्चों और बीवी से खूब प्यार करता हूँ. अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरी बीवी को एक चपरासी की तरह काम करना पड़ेगा.

मिर्ज़ा ग़ालिब ने वह शेर अपने लिए ही कहा था.

* * *

Popular posts from this blog

पतनशील पत्नियों के नोट्स

फरवरी का पहला सप्ताह जा चुका है मगर कुछ रोज़ पहले फिर से पहाड़ों पर बर्फ गिरी तो रेगिस्तान में भी ठण्ड बनी हुई है. रातें बेहिसाब ठंडी हैं. दिन बेहद सख्त हैं. कमरों में बैठे रहो रजाई-स्वेटर सब चाहिए. खुली धूप के लिए बाहर आ बैठो तो इस तरह की चुभन कि सबकुछ उतार कर फेंक दो. रेगिस्तान की फितरत ने ऐसा बना दिया है कि ज्यादा कपड़े अच्छे नहीं लगते. इसी के चलते पिछले एक महीने से जुकाम जा नहीं रहा. मैं बाहर वार्मर या स्वेटर के ऊपर कोट पहनता हूँ और घर में आते ही सबको उतार फेंकता हूँ. एक टी और बैगी पतलून में फिरता रहता हूँ. याद रहता है कि ठण्ड है मगर इस याद पर ज़ोर नहीं चलता. नतीजा बदन दर्द और कुत्ता खांसी. 
कल दोपहर छत पर घनी धूप थी. चारपाई को आधी छाया, आधी धूप में डाले हुए किताब पढने लगा. शादियों का एक मुहूर्त जा चुका है. संस्कारी लोगों ने अपनी छतों से डैक उतार लिए हैं. सस्ते फ़िल्मी और मारवाड़ी गीतों की कर्कश आवाज़ हाईबर्नेशन में चली गयी है. मैं इस शांति में पीले रंग के कवर वाली किताब अपने साथ लिए था. नीलिमा चौहान के नोट्स का संग्रह है. पतनशील पत्नियों के नोट्स. 
तेज़ धूप में पैरों पर सुइयां सी चुभती …

तुम्हारे सिवा कोई अपना नहीं है

वे अलसाई नन्हीं आँखों के हैरत से जागने के दिन थे. बीएसएफ स्कूल जाने के लिए वर्दी पहने हुए संतरियों को पार करना होता था. उन संतरियों को नर्सरी के बच्चों पर बहुत प्यार आता था. वे अपने गाँव से बहुत दूर इस रेगिस्तान में रह रहे होते थे. वे हरपल अपने बच्चों और परिवार से मिल लेने का ख़्वाब देखते रहे होंगे. वे कभी कभी झुक कर मेरे गालों को छू लेते थे. उन अजनबियों ने ये अहसास दिया कि छुअन की एक भाषा होती है. जिससे भी प्यार करोगे, वह आपका हो जायेगा. लेकिन जिनको गुरु कहा जाता रहा है, उन्होंने मुझे सिखाया कि किस तरह आदमी को अपने ही जैसों को पछाड़ कर आगे निकल जाना है. 
मुझे आज सुबह से फुर्सत है. मैं अपने बिस्तर पर पड़ा हुआ सूफी संगीत सुन रहा हूँ. इससे पहले एक दोस्त का शेयर किया हुआ गीत सुन रहा था. क्यूँ ये जुनूं है, क्या आरज़ू है... इसे सुनते हुए, मुझे बहुत सारे चेहरे याद आ रहे हैं. तर्क ए ताअल्लुक के तज़करे भी याद आ रहे हैं. मैं अपनी ज़िंदगी से किसी को मगर भुलाना नहीं चाहता हूँ. उनको तो हरगिज़ नहीं जिन्होंने मुझे रास्ते के सबब समझाये. नौवीं कक्षा के सर्दियों वाले दिन थे. शाम हुई ही थी कि एक तनहा द…

एक लड़की की कहानी

कहानी कहना एक अच्छा काम है. मैं कुछ सालों तक लगातार ड्राफ्ट तैयार करता रहा फिर अचानक से सिलसिला रुक गया और मैं अपने जाती मामलों में उलझ कर कुछ बेवजह की बातें लिखने लगा. मुझे यकीन है कि मैं एक दिन अच्छी कहानी लिखने लगूंगा... मेरा समय लौट आएगा.

कुछ एक मित्रों के अनुरोध पर अपनी आवाज़ में एक कहानी यहाँ टांग रहा हूँ. इस कहानी को रिकार्ड करने के दौरान किसी भी इफेक्ट का उपयोग नहीं किया है कि आवाज़ अपने आप में एक इफेक्ट होती है... खैर किसी भी तरह का बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं है, सिर्फ आवाज़...

बिना कोई और बात किये, लीजिए सुनिए.