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उपेक्षित और प्रताड़ित - दुख

जिंदगी यूं भी झाड़ू चीज़ है। इससे आप किसी के दुखों को बुहार सकते हैं। इसे आप तिनका-तिनका करके गंवा भी सकते हैं। एक रोज़ आपके हाथ में टुंडीया रह जाएगा। जिसे या तो 'मोरा' करके जला दिया जाएगा या फिर कूड़े में दफन कर दिया जाएगा।

दो बरस पहले नानी लू लगा बैठी। भरी गर्मी के दिन थे। माँ और मौसी ने उनको अस्पताल दिखाया। दवा दिलाई। मैं घर आया तब वे चारपाई पर लेटी हुई थी। मैंने उनकी कलाई पकड़ी और छूकर देखा कि कितना ताप है। नानी ने आँख खोल दी। मैंने इशारा किया क्या हाल नानी? नानी ने कहा- "पड़या हों" मैंने कहा- "पड़या रो। पण जाण री हर मत करियो" नानी के पास इस दुनिया से कूच करने के जुड़े सभी सवालों का एक पक्का जवाब होता। "मने आगे ठौड़ कित बेटा"

नानी से दवा, खाने-पानी का पूछ कर मैं रसोई में गया। अपने लिए खाने की प्लेट बनाई और नानी की चारपाई के पास कुर्सी लगाकर बैठ गया। "नोनी एक मूरियो लो?" नानी ने सर हिलाते हुए ना कहा- "तेरे सीरो कराऊँ। मूरिए हूँ काला के होई?" नानी ने मुझे कहा कि मैं चली जाऊँगी और मेरे पीछे तुझे हलुआ खाने को मिलेगा। मैंने नानी की ठोड़ी को अपने हाथों से छुआ और कहा- "माँ ए ! म्हे नैना टाबर हों। म्होरे सोमे झाक। एड़ी लू में बल जैहों। कोई दूजे टैम देखी माँ"

नानी को थोड़ी सरधा हुई। उन्होने अपनी नासका खोजी। थोड़ी वे उठ बैठी। मैं खाना खाता रहा।

मेरे दो मामा थे। पहले बड़े चल बसे। उसके बाद नाना जाते रहे। अचानक से छोटी मामी चल बसी। उसके बाद मेरे पापा गुज़र गए। फिर साल भर बाद मेरे छोटे मामा भी न रहे। नानी अपनों को खोने के दुख उठाती रही। तीन चार साल किसी एक प्रिय को भूलें तो दूजा दुख उनको तैयार मिला। संसार दुखों की खान है। बुद्ध ने ये कहा और नानी ने इस बात को सलीके से जीया।

मैंने खाना खाते हुए नानी से कहा। "नोनी सियालों तोई ठीक है। गुदड़ा ओढ़ न पड़या रों। हमके सियाले मोरत काढ़ लों।" अगली सर्दी में नानी सचमुच फिर से जाम होकर आ गयी। मौसी और माँ ने फिर उनको डॉक्टर को दिखाया। मैं आया तब तक वे काफी ठीक थी। मैंने कहा- "नोनी टिकट ली री?" नानी हँसने लगी। "ना रे बीनों भाड़े" मैंने उनसे कहा था कि क्या नानी आपने इस बार जाने की टिकट पक्की करा ली है? उनका कहना था नहीं बेटिकट ही तैयारी की है। सचमुच ऐसा ही हुआ। उनको जीवन से दूर ले जाने वाली गाड़ी से उतार दिया गया।

उसके साल भर बाद एक शाम मैं दफ्तर से आया। नानी चारपाई पर बैठी थी। मैंने कहा- "चलो दिलदार चलो, चाँद के पार चलो।" नानी ने कहा- "लरड़िया घेटिया बधार दिया, हालो भाई जित हालनों है" नानी ने उन्हीं दिनों अपने मेढ़े और भेड़ें बेची थी। उनके दिल में गहरा दुख था कि प्रिय जानवर बेचने पड़े। वे उनके संगी साथी थे। नानी उनसे अपने दुख कहती थी। उनको डांटती थीं। उनकी रक्षा करती थी। इससे अधिक प्रिय क्या होता। ऐसे प्रिय का त्याग कितना बड़ा दुख होता है। कौन जाने?

खैर आठ महीने नानी चारपाई पर रही। नानी ने जिस बच्चे के परिवार के लिए जीवन सौंपा उन्होने मुंह फेर लिया। जिस बहू को नज़र में दूसरे दर्जे पर रखा, उनके बच्चों ने कष्ट भरे दिनों में उनके दुख अपने समझ कर उठाए। माँ ने कहा कि नानी कह रही है मुझे अपने पास ले जा। मैंने कहा- "माँ ले आओ। जैसा होगा वैसा करेंगे।" तीन दिन पहले माँ ये तय करके गयी की नानी को ले आएंगी। मैं दिल्ली गया हुआ था। मेरे भीतर एक ऐब है कि यात्रा के समय केवल ज़रूरी बात कर सकता हूँ। किसी को फोन नहीं करता। किसी को बताता नहीं कि कहाँ हूँ। माँ जानती है। वे कभी फोन नहीं करती। लेकिन परसों उनका फोन आया। "तू कद आई?" मैंने पूछा- "हें माँ हमके घणि गड़बड़ है?" माँ ने कहा- "अजी धके है" मैं समझ गया कि अब नानी कूच करने को है। मैंने माँ से कहा- "नोनी ने कईयो दो दिन जैपर पार्टी करन आऊँ, तकड़ मत करियो।"

मैं कल सुबह दिल्ली जयपुर की यात्रा से आया। शाम को पौधों से प्यार करते हुए अचानक मौसी का रुदन सुनाई दिया। मैं समझ गया कि मेरी नानी चल बसी है। मैंने कार को पौंछना शुरू किया। आभा आई और बोली- "शायद?" मैंने कहा हाँ यही लगता है। कार साफ हुई तब तक चाचा जी ने आवाज़ दे दी। "भाई किशोर तेरी नोनी गी परी" मैंने कहा- "हाँ अभी चलते हैं"

हमारे यहाँ मृत्यु दुख से अधिक सीख का विषय है। रोने वालों के पास असंख्य उपहासक बैठे रहते हैं। दुख के अवसर पर आने वाली औरतें सौ दो सौ गज दूर से गला फाड़ कर रोती हैं। "माउ ए, बाबा ए" घर में घुसने के दो मिनट बाद सबसे कुशल क्षेम पूछने लगती हैं। पाँच मिनट बाद मुस्कुराने लगती हैं। दस मिनट बाद मसखरी करने लगती हैं। जैसे मृत्यु एक प्रहसन है। ऐसा ही हाल आदमियों का भी होता है। वे सस्ते अनुभव बांटते हैं। वे अपने आस-पास के लोगों की खिल्ली उड़ाते हैं। दुख बेचारा उपेक्षित और प्रताड़ित किसी कोने में खड़ा रहता है।

आप आइये कभी। गला फाड़ फाड़ कर माँ-माँ करने वाली थोड़ी देर में पूछ रही होती है- "मरग्या रे बे तो आया कोनी। खूटुड़ा।" फिर शहरी रिश्तेदारों की खीली निकालने लग जाएंगी। आ कैड़ी है बा कैड़ी है। मृत्यु को लगता है कि वह अपने आप पर रोने के लिए है। मुझे रेगिस्तान के लोगों की यही खूबी बहुत अच्छी लगती है। वे दुख को उपहास में शून्य कर देते हैं। आपको अचानक अहसास होता है आप नानी-नाना, दादी-दादा को रोने आए थे या किसी और काम से?

आज सुबह से मेरा फोन ऑफ था। मैं रानीगांव था। तेज़ सुसू लगी तो दुख के डेरे से उठकर बाहर सड़क पर चला आया। सोचा फोन ऑन कर लूँ। जैसे ही ऑन किया। धमकियाँ डिलीवर हो गई। आप कल शाम से गायब हैं। जवाब भी नहीं दे रहे। धमकियाँ देने वाली ये क़ौम एक नए जमाने की क़ौम है। जिनको अपने साथ रहने से अधिक दूजे के साथ रहने में सुकून हैं। मैंने उनको जवाब दिया। "भाई नानी चें बोल गयी हैं। उनको ठिकाने लगा कर आते हैं। फिर बात करेंगे।"

उन्होने कहा- "आपकी भाषा कितनी हल्की है। ऐसे कोई बोलता है? " मैं उनसे कहना चाहता था कि कभी दुख और जीवन को समझना। कभी सोचना कि तुम झाड़ू हो या झाड़ू के तिनके हो गए हो। मगर मुझे एक बात पता है कि ईसा, बुद्ध और महावीर से लेकर नानी तक न कोई समझा है न समझेगा कि जीवन क्या है? इसका अंत कैसा हो? और मैं क्या कर रहा हूँ। इसलिए कुछ न कहा।

ये तस्वीर एक ऐसी शाम की है जब नानी की चारपाई पर लेट गया।

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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

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कभी-कभी हम इस चाहना से शीघ्र मुक्त हो जाते हैं और कभी हम सोचने लगते हैं कि किस तरह उसे बुला लिया जाए और साथ ही ये भी न लगे कि हमने बुलाया ह…

सपने में गश्त पर प्रेम

होता तो कितना अच्छा होता कि हम रेगिस्तान को बुगची में भरकर अपने साथ बड़े शहर तक ले जा पाते पर ये भी अच्छा है कि ऐसा नहीं हुआ वरना घर लौटने की चाह खत्म हो जाती. 
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* * *

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कैसे उग आई उस पर शाखाएं
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* * *

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कि मैं एक प्रेम का बिरवा हूँ
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कभी लगता है
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कि मैं एक वनबिलाव हूँ
और पाँव लटकाए, पेड़ की शाख पर सो रहा हूँ.
* * *

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* * *

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तब एक बड़े पेड़ की कल्पना करते हैं.

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* * *

प्रेम
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घनी पत्तियों से लदा, चुप खड़ा हुआ.

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