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कविता चाहे जैसी करें जगह का ध्यान रखें

मित्रो अभिवादन। 
कार्यक्रम के मुख्यअतिथि का काम होता है कि वह अतिथि की तरह आए। मुख्यता से आयोजन में उपस्थित रहे। अंत में चाय भोजन आदि ग्रहण करके चला जाए। लेकिन मुझे कहा गया है कि मैं इस कवि सम्मेलन के अध्यक्ष महोदय के कविता पाठ और उद्बोधन से पूर्व बोलूँ।

डॉ तातेड़ सर ने अभी कहा कि आजकल सब लाइव हो जाता है। मुझे इस बात की गहरी चिंता रहती है। कोई भी व्यक्ति आपके कहे को, बातचीत को और आपकी उपस्थिती को अपने फोन में रेकॉर्ड कर सकता है वह उसे लाइव भी कर सकता है। हम किसी भी कार्यक्रम मे अपनी तैयारी और अध्ययन के बिना जाने के अभ्यस्त हैं। इसका एक कारण है कि अधिसंख्य आयोजन और बुलावे तात्कालिक होते हैं। आमंत्रण निजी सम्बन्धों के आधार पर दिये जाते हैं। ऐसे प्रेम भरे आमंत्रणों और आयोजनों में अक्सर मैं अनियोजित और असंगत बातें बोल जाता हूँ। मुझे अभी तक ये सीखना है कि संतुलित, सारगर्भित और विषय से संबन्धित बात कैसे कही जाये।

आज का विषय कवि सम्मेलन है तो इसके बार में कोई पूर्व तैयारी नहीं की जा सकती थी कि किस तरह कम शब्दों में अच्छी बात कही जा सके। लेकिन मुझे इस महविद्यालय में आना सदैव रोमांचित करता है। इसलिए कि मैंने अपनी पढ़ाई यहीं से की है। मैं एक उदण्ड छात्र माना जाता रहा था। शिक्षा के प्रति अरुचि मेरे नाम के साथ जोड़ दी जाती थी। इससे भी बड़ी बात की मेरी गिनती साधारण छात्रों में हुआ करती थी। आज मैंने दो और साधारण लोगों को पुनः देखा है। एक हैं प्रोफेसर कवि डॉ बंशीधर तातेड़ और दूजे प्रोफेसर, हिन्दी साहित्य के आलोचक और सैन्य अधिकारी डॉ आदर्श किशोर। ये दोनों इसलिए साधारण है कि इनसे कोई भी मिल सकता है। ये किसी का भी साथ देने, राह दिखाने, मदद करने और अपने प्रयासों से छात्रहित में जुटे रहते हैं। इन दोनों का इतना साधारण होना मुझे भाता है। इसलिए कि साधारण होना इस दुनिया में एक असाधारण बात है।

मैं किंडर गार्टन के लिए बीएसएफ़ स्कूल गया। प्राथमिक शिक्षा रेलवे स्कूल से हुई और माध्यमिक शिक्षा हाई स्कूल से। इसलिए जीवन में ये चारों जगहें मेरी अब तक सबसे प्रिय जगहे हैं। यहाँ आकर मुझे अच्छा तो लगता है लेकिन जब हम कविता के रूप में राजनीतिक चुटकले, स्त्रियॉं का जाने-अजाने किया जाने वाला उपहास और सामाजिक रिश्तों का मखौल बनाते हैं तो मुझे अच्छा नहीं लगता। शायर राजेश चड्ढा की दो पंक्तियाँ जो मुझे ठीक से याद नहीं हैं मगर जैसी याद है उस हिसाब से वे कहती है।

शर्त पर आपने हाथों में मेरे हाथ दिया 
शर्त के टूटने तक कायदे से साथ दिया। 
इस मंच से आपने किस मंच की तारीफ की 
भीड़ ख़मोश है किस आदमी का साथ दिया।

आप इसका भाव समझ सकते हैं। जब हम पाँच साल के बच्चों से बात करते हैं तो हम अलग तरीके से बात करते हैं। इसी तरह हर उम्र और लिहाज से बात करने का एक सलीका होता है। राजकीय स्कूल और कॉलेज में छात्रों को जब आप कविता सुनाएँ तो मैं अपेक्षा रखता हूँ कि वह कविता जीवन के मोल को, मेहनत को, लगन को, लक्ष्य को, हार-जीत के भाव को सामने रखे ताकि छात्र कविता से प्रेरणा लें। न कि आपके राजनीतिक चुटकले सुनें, हँसे और अपना कीमती समय व्यर्थ करें।

हुस्न और इश्क़ की शायरी होनी चाहिए मगर उसकी एक जगह है। राजनीति की शायरी होनी चाहिए मगर उसकी एक जगह है। लेकिन आदमी के सुख-दुख और अधिकार की शायरी हर जगह की जा सकती है। इसलिए मुझे ऐसी शायरी, कवितायें प्रिय हैं। मैं शायर का नाम और सही शेर भूल रहा हूँ। मेरी याद में कुछ ऐसा है कि हरजोत सिंह से कहा।

सच किराए के घर में रहा उम्र भर 
झूठ बंगले पे बंगले बदलता रहा। 
जिसके तलवे छिले वो तो चुप है मगर 
जिसको कुछ न हुआ वह उछलता रहा।

ये शेर, ये कविताई हमेशा के लिए हैं। हमारे समय में थी, हमारे बाद भी रहेगी। मैं कुछ अधिक तल्ख़ हो गया हूँ मगर मुझे ये ज़रूरी लगता है।

आप सब भीतर से मजबूत बनना। मुझे किसी ने एक बात बताई थी कि फोर्ड कंपनी के मालिक हेनरी फोर्ड अपनी कंपनी की मीटिंग में जा रहे थे। उनके कोट की एक जेब की सिलाई उधड़ी हुई थी। उनके सहायक ने कहा-"सर कोट बादल लेते हैं। सिलाई थोड़ी से उधड़ी हुई है। इस पर फोर्ड साहब ने कहा- "जो मुझे जानता है कि मैं फोर्ड कंपनी का मालिक हूँ वह जानता होगा कि मैं ऐसे कितने नए कोट ले सकता हूँ। और जो मुझे नहीं जानता, उससे मुझे क्या फर्क और उसे क्या फ़र्क?" तो मित्रों बाहर के दिखावे को भुला दो। भीतर से योग्य बनो कि आपकी पहचान आपके कपड़े न हों। आपका ओढा हुआ आवरण न हो। आप खुद हों।

शायरी कविता सीखो तो ऐसी सीखना कि आम आदमी के दुख को उकेरती हो। प्रेम की टूटन को लिखती हो। उदासी का शृंगार करती हो। चापलूसी और नफरत की शायरी करना मत सीखना।

मित्रो मुझे इसी कॉलेज में लेक्चर सुनते हुये। कार्यशालाओं में बैठा दिये जाने से, या किन्हीं आयोजनों में आपकी तरह शामिल कर दिये जाने पर बहुत बोरियत होती थी। मैं थक जाता था। इसलिए आपका समय अधिक नहीं लूँगा। महाविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष जगदीश पुनिया, प्रिय प्रदीप राठी, प्रोफेसर आदर्श किशोर सर और आदरणीय डॉ तातेड़ सर सहित आप सबका भी आभार। हार्दिक अभिवादन। 
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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

मन में छुपे बुलावे

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आँखें पास की दीवार, छत, पेचदार सड़क या खुले आसमान की ओर रह जाती है जबकि मन चुपके से कहीं दूर निकल जाता है। मैं उसी जगह बैठा हुआ पाता हूँ कि खोया हुआ मन जहां गया है, वह कोई चाहना नहीं है। मन का जाना ऐसा है जैसे वह निरुद्देश्य भटक रहा है। 
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पर्दा हल्के से उड़ता है  जैसे कोई याद आई और झांककर चली गयी। 
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कभी-कभी हम इस चाहना से शीघ्र मुक्त हो जाते हैं और कभी हम सोचने लगते हैं कि किस तरह उसे बुला लिया जाए और साथ ही ये भी न लगे कि हमने बुलाया ह…

सपने में गश्त पर प्रेम

होता तो कितना अच्छा होता कि हम रेगिस्तान को बुगची में भरकर अपने साथ बड़े शहर तक ले जा पाते पर ये भी अच्छा है कि ऐसा नहीं हुआ वरना घर लौटने की चाह खत्म हो जाती. 
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* * *

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* * *

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कि मैं एक प्रेम का बिरवा हूँ
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कभी लगता है
कि मैं लकड़हारा हूँ और पेड़ गिरा रहा हूँ.
मुझे ऐसा क्यों नहीं लगता?

कि मैं एक वनबिलाव हूँ
और पाँव लटकाए, पेड़ की शाख पर सो रहा हूँ.
* * *

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कोमल, हल्का, नम, भीना और मादक.

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तक लेता मौसमों की राह और कर लेता सारे इंतज़ार पूरे.
* * *

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तब एक बड़े पेड़ की कल्पना करते हैं.

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* * *

प्रेम
उदास रातों में तनहा भटकता
एक काला बिलौटा है.

उसका स्वप्न एक पेड़ है
घनी पत्तियों से लदा, चुप खड़ा हुआ.

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