March 31, 2010

एक लम्हे के बाद

कुम्हार के चाक सी नहीं होती है ज़िन्दगी कि सब कुछ उपयोगी और सुन्दर बनाते हुए ठीक वहीं आकर चक्का रुक जाये जहाँ से शुरू हुआ था. इससे से तो हर पल कुछ छीजता जाता है, किसी अल्पव्यय हानि की तरह जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं होती. मैं सुबह घर से निकला हुआ शाम होते ही दिन पर फतह हासिल करने के जश्न को किसी के साथ नहीं बांटता क्योंकि जिस तरह से इन दिनों मैं ज़िन्दगी को देखता हूँ. उसे मनो चिकित्सक नकारात्मक समझते हैं. हिसाब इसका भी कुछ खास नहीं है कि जो सकारात्मक माने जाते हैं वे आधी रात को नींद आने से पहले क्या सोचते होंगे ?

रात को एक पुराने दोस्त और सहकर्मी मेरे साथ थे. हमने 'ज़िन', आलू चिप्स, खीरा और नीम्बू के साथ बीत चुके दिनों की जुगाली की. जो मालूमात हुई वह भी ख़ास उत्तेजित नहीं करती है कि हम जब पहली बार मिले थे तब से अब तक अपने सत्रह साल खो चुके हैं. घर लौटा तो हवा तेज थी. घर का पिछवाडा जिसे मैं बैकयार्ड कहता हूँ वहीं परिवार सोया करता है. दीवार के सहारे लकड़ी के बड़े भारी पार्टीशन खड़े किये हुए हैं. रात तीन बजे आस पास उनमे से एक पार्टीशन हवा के तेज झोंके के साथ जमींदोज हो गया. उसके नीचे कोई सो नहीं रहा था इसलिए राहत रही मगर बाद की रात इसी सोच में बीती कि मेरी कल सुबह का मंजर क्या हो सकता था ? हवा केउस एक झोंके बाद का एक पल मेरे लिए ज़िन्दगी भर भारी हो सकता था, बुतों में यकीन नहीं है तो सोचता हूँकिसका शुक्रिया अदा करूँ ?

सुबह का जायका वाकई स्वादिष्ट नहीं था. पार्टीशन को तरतीब से रख कर बाँधने के काम के दौरान बाएं हाथ की पहली अंगुली का मुंह काला हो गया. चोट से एक बार का मैं परेशां हो गया कि आखिर ये सिलसिला क्या है ? मेरी समझ कई बार नहीं वरन अक्सर जवाब दे जाती है कि चीजें ठीक क्यों नहीं है ? एक वजह हो सकती है कि मैं इन दिनों शायद अवचेतन में जी रहा हूँ. वजहें सोचने को आज की शाम तय है.

मुश्किलें और भी हैं मगर राहतें नहीं. नसीम देहलवी के शागिर्द सैय्यद फज़ल उल हसन जिनको हसरत मोहानी के नाम से जानते हैं आज उन्हीं का एक शेर नए हौसले के लिए

दर्द मोहताज़ - ए- दवा हो ये सितम भी है या रब
जब दिया था तो कुछ इससे भी सवा देना था

March 21, 2010

ना-खुदा मैं शायद तेरा न था

भाई, तुम अगर होते
तो शायद झगड़ कर घुन्ना बने बैठे होते
हम एक दुसरे से
लेकिन तुम मर चुके हो बरसों पहले
और मेरे लिए तुम अब बस एक विषय रह गए हो
क्या कुछ और भी संभव था
जबकि न मैं तुमसे कभी मिला
न देखा तुम्हें ?

महेन की ये पंक्तियाँ मन को आलोड़ित कर देती है. बचपन में ज़िन्दगी से आगे निकल गए, एक अनदेखे भाई को स्मृत करती हुई कविता है. आवेगों को अपने केंद्र के आस पास घनीभूत करती है. भाई के होने और न होने के बीच के अन्तराल को माँ की आँख से देखने का प्रयास करती है. किन्तु कविता अपने आरंभिक संवेदन का गीला भीगा मौसम आगे बना कर नहीं रख पाती और दुनियावी चमत्कारों में विलीन हो जाती है. इस कविता को हाल में एक मित्र ने मुझे मेल किया था और कल मुकेश अम्बानी साहब को ब्रेबोर्न स्टेडियम की दर्शक दीर्घा से नीचे झांकते हुए देखा तो मुझे अनायास इसकी याद हो आई.

आज अनिल अम्बानी ने सड़क पर खड़े होकर अपने बड़े भाई को आवाज़ दी होती तो क्या वे अपने घर की बालकनी में आकर इसी तरह नीचे देखते हुए जवाब देते ?

हर भारतीय, औपनिवेशिक देशों के इस खेल की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है. मैं भी आईपीएल के मैच देखता हूँ क्योंकि मेरे ऍनलाईटेड होने का समय अभी आया नहीं है. मुर्गे लड़ाने और क्रिकेट खिलाड़ियों को खरीद कर लड़ाने में क्या अन्तर है यह समझना चाहता हूँ मगर कल मेरे दिमाग में भाई - भाई थीम वाली फ़िल्में, कहानियां, कविताएं, प्रेरक प्रसंग और प्यार से भरी अनुभूतियाँ घूमती रही. सोचा कि अनिल अम्बानी एक दिन अपने भाई की टीम मुम्बई इंडियंस की यूनीफोर्म में स्टेडियम में आये और नीले रंग के साफे बांधे नाच रहे समर्थकों के बीच टीम को चीयर अप कर अपने घर लौट जाएं.

फिर खाली हो चुके स्टेडियम की दर्शक दीर्घा में एक बड़ा भाई बैठा हो... पनियल आँखों से ख़ुशी छलक रही हो. वहीं घर पर ऑन स्क्रीन अपने चाचा को चीयर अप करता देख कर बच्चे उछल रहे हों और धीरू भाई को याद करती हुई कोकिला बेन मुम्बई से ही श्रीनाथ जी का हाथ जोड़ कर आभार व्यक्त करती हो.

यूं तो मन में ऐसी हज़ार बातें आती है मगर कभी तू नहीं होता तो कभी हौसला नहीं होता. अमीर कज़ालबाश भी यही कहते हैं

हम भी वही तुम भी वही मौसम वही मंज़र वही
फासला बढ़ जायेगा इतना कभी सोचा न था.

March 17, 2010

किसी तरह तो जमे बज़्म

ख़ुशी और उदासी के लिए कितनी छोटी - छोटी सी बातें पर्याप्त होती है. कल शाम को डॉ. विजय माल्या मुझे बहुत उदास दीखे, चार घंटे बाद वही उदासी ख़ुशी में बदल गयी. वे आईपीएल में खेल रही अपनी टीम रोयल चेलेंजर बेंगलोर के लिए चीयर अप करने आये थे.

पहली सीजन के आगाज़ में ही विकेटकीपर बल्लेबाज मेक्यूलम ने सब गुड गोबर कर दिया था. रोयल चेलेंजर के गेंदबाजों की बेरहमी से धुलाई की. उस किवी खिलाडी की आतिशी पारी को देखते हुए कोलकाता नाईट राईडर टीम के फ्रेंचाईजी, सिनेमा के हीरो पद्मश्री शाहरुख खान साहब अपने बांके मुंह की टेढ़ी मुस्कान को बिखरते हुए नाचते रहे.

रोयल चैलेंजर के कैब में किंगफिशर एयरलाईन की हवाई सुंदरियाँ, फैशन शो में छाई रहने वाली, सूखी हुई काले पीले रंग की देह वाली केट्वाक गर्ल्स, अपने पांवों को विशेष ज्यामिति में सलीके से टेढ़े किये खड़ी हुई थी. उनके बीच में दक्षिणी केलिफोर्निया विश्विद्यालय से व्यवसाय क्षेत्र में डाक्टरेट की मानद उपाधि से सम्मानित विजय माल्या अपने मातहतों को कोस रहे थे कि उनको अपनी पसंद के खिलाडी नहीं चुनने दिए गए और अब ये पजामा छाप बल्लेबाज उनके सम्मान की ऐसी तेसी कर रहे हैं. नीचे नई नवेली, मस्त बदन वाली चीयर गर्ल्स और फटाफट क्रिकेट के कोकटेल में दर्शक पगलाए जा रहे थे.

विजय माल्या साहब के इर्द गिर्द, मेक्डोवेल्स छाप का ताज़ा माल लिए जो सुंदरियाँ खड़ी थी. उनके गले की हड्डियाँ बाहर निकल चुकी थी और बदन पर कपड़े इस तरह लटके थे जैसे कपबोर्ड में हेंगर पर सिकुड़ी हुई नाईटी लटकी रहती है. वे भी बहुत हताश हुई थी. आधे खेल के बाद बीयर केन्स को भारी मन से विदा देनी पड़ी और एक सफलतम उद्योगपति छोटी सी हार से बेहद निराश होकर, अपनी टीम के खिलाड़ियों से मिले बिना चला गया.

अधिकतर लोग विजय माल्या को शराब व्यवसायी और टीपू सुल्तान की तलवार खरीदने वाले के तौर पर ही जानते हैं लेकिन एक वित्तीय वर्ष में संगठित उद्योग अवधारणा से पैंसठ फीसद टर्न ओवर बढाने का हुनर भी इन्ही के पास है. रसायन, जीवन विज्ञान, टेक्नोलोजी, उड्डयन और चिकित्सा सहित दर्जन भर व्यवसायों का सफलता पूर्वक संचालन भी करते है. हमारे देश में खेल और खिलाड़ियों को सुविधाओं के नाम पर रोना रोये जाने की एक तवील परंपरा है मगर करता कोई भी कुछ नहीं है. जबकि इसी हालत में माल्या साहब दो अभिजात्य और एक आम आदमी के खेल में सार्थक दखल रखते हैं.

वे ई लीग के क्लब ईस्ट बंगाल एफ सी के, साथ ही फ़ोर्स इण्डिया नामक फ़ॉर्मूला वन दौड़ में भाग लेने वाली टीम के भी मालिक हैं. अपनी टीमों को वे धन की कमी कभी नहीं आने देते हैं. पिछले साल उनके ड्राईवर जियानकार्लो फेसिचेल्ला ने उनकी फ़ोर्स इण्डिया टीम को बेल्जियन ग्रां प्री में दूसरा स्थान हासिल कर एक अंक दिलवा दिया था. किसी भी मोटर गाड़ी दौड़ाने वाली टीम के लिए एक अंक हासिल करना गर्व की बात होती है. साल 2009 में माल्या साहब को मोटर गाड़ी दौड़ के अलावा आई पी एल में भी सुख नसीब हुआ टीम ने फाईनल तक का सफ़र तय किया. पजामा छाप क्रिकेटरों के विशेषण से सम्मानित राहुल द्रविड़ साहब और उनके साथियों ने पजामे उतार फैंके और खुद को आधुनिक फटाफट क्रिकेट के योग्य खिलाड़ी साबित कर लिया.

मैं सोच रहा था कि आखिर माल्या साहब उदास क्यों बैठे हैं ? हालाँकि उनकी टीम एक मैच हार चुकी थी और कल दूसरा मैच था. इतना कामयाब व्यक्ति शायद इसी लिए उदास होता होगा कि उसके भीतर एक बड़े उद्योगपति के अतिरिक्त एक मासूम बच्चा अभी तक जिंदा है जो अब भी हार के अहसास से घबरा जाता है. उसमे एक तरुण का दिल भी है जो दुबली पतली देह वाली आकर्षक कही जाने वाली लड़कियों के अर्धनग्न कलेंडर छाप कर खुश होता है.

मैं पिछले तीन साल से यानि जब से ये खेल शुरू हुआ है, आरसीबी का फैन हूँ. उसकी ओफिसियल वेब साईट पर एक पंजीकृत समर्थक हूँ इसलिए नहीं कि मुझे शराब पसंद है और मैं रोज शराब पीने को दुनिया के सबसे अधिक सुखभरे कामों में एक काम मनाता हूँ, इसलिए भी नहीं कि माल्या साहब बेहतरीन शराब बनाने के करीब पहुंचने वाले हैं. इसलिए भी नहीं कि किंगफिशर की एयर होस्टेज अधिक सुन्दर और व्यवहारकुशल हैं. मगर इसलिए कि ईस्ट बंगाल सहित जिस भी खेल पर माल्या साहब धन व्यय करते हैं, वह मुझे उनका समर्थक बनाता है. फ़ुटबाल के अतिरिक्त भले ही दोनों खेल आम आदमी से बहुत दूर हैं फिर भी माल्या साहब का खेल के प्रति मन तो है. संभव है कभी वे कुश्ती और दौड़ भाग जैसी प्रतियोगिताओं के प्रतिभागियों के लिए धन उपलब्ध करा दें.

दुनिया के अरबपतियों में शुमार भारतीय, खेल के लिए बहुत उदासीन है. वे सिर्फ सुविधा संपन्न खिलाड़ियों के ओलम्पिक में पदक जीतने पर ही अपने खेल प्रेम से कोंपलें फूटते हुए देख पाते हैं मगर सुविधा उपलब्ध करने के नाम पर शून्य ही हैं.

कल रोबिन उथप्पा ने आतिशी पारी खेली और कालिस - कालिस का शोर मेरे भीतर उठता रहा. एक और शोर जो मेरे मन में उठा करता है, वह इन दिनों उदासीन है. मौसम में तेज गरमी आ पड़ी है फिर भी पिछली चार रातों से मेरे आईस क्यूब्स उदास से फ्रीजर में बंद है. चलते हुए फैज़ साहब का एक माकूल शेर...

किसी तरह तो जमे बज़्म मैकदे वालों
नहीं जो बादा-ओ-सागर तो हा-ओ-हू ही सही

March 11, 2010

इंसान करीने के

मेरा ये हाल था कि दरसी किताबों में जो नज़्में थी. उनमे मुझे कोई कशिश नहीं मिलती थी. लेकिन अगर किसी शेर या नज़्म का ऐसा टुकड़ा हाथ आ जाता था जिसमे बचपन के शऊर के मुताबिक मुझे रस, तरन्नुम और रंगीनी मिले, तो ये चीज़ें मेरे दिल में ख़ामोशी से उतर जाती थी. मैं खेलते - खेलते उन नज्मों में खो जाता था और अक्सर अपने साथियों और हमजोलियों में उन मौकों पर अपने आपको तनहा महसूस करता था.

ये फ़िराक गोरखपुरी का वक्तव्य है. जो रूहे - कायनात की भूमिका में लिखा हुआ है. मैं सोचने लगा कि हिंदुस्तान का एक खूबसूरत शाईर बचपन में भी कितना ज़हीन था और समझ के हिसाब से तनहा. भविष्य में जिसने भाषा प्रभाग के हर कमरे में बैठ कर अपनी बात को अधिकार पूर्वक कहा. जिसके शेर सुन कर बड़े - बड़े शाईर रश्क और हौसला करते रहे.

हमारे देश में ऐसा कोई विश्वविद्यालय नहीं रहा होगा, जहाँ होस्टल्स के चंद संजीदा कमरों में हर साल इस शाईर के शेर बार बार न पढ़े गए हों. फ़िराक साहब की इमेज इस तरह प्रचारित थी कि आम तौर पर सब मुशायरों का अंत उनके लौंडेबाजी के किस्सों और उसी पर कहे गए चुटीले शेरों से होता रहा है. मजाह निगार कहते रहे हैं कि एक दोशीजा अपने सहपाठी के पीछे तेज कदम थी तो उसे देख कर उन्होंने कहा था "तुम जिसकी फिराक में हो, फ़िराक उसकी फिराक में है."

क्या फ़िराक साहब को ये (अप्राकृतिक ?) शौक था ? मुझे नहीं पता. इसकी स्वीकृति उनकी जुबान से अभी तक मैंने पढ़ी नहीं है. ठीक ऐसा ही हाल मकबूल फ़िदा हुसैन का है अगर वे अपनी कला के बारे में किसी नए अनुभव को पाएंगे तो वे भी फ़िराक की ही तरह इन्हीं शब्दों को लिखेंगे कि "...मैं अपनी नई सोच में खो जाता था और अक्सर अपने साथियों और हमजोलियों में उन मौकों पर अपने आपको तनहा महसूस करता था." कला और विज्ञान में नवीनता अनिवार्य है और हर दौर में इसके भले - बुरे दोनों तरह के प्रभाव रहे हैं. इसी नवीन होने की चाह में जब आप सहज स्वीकार्य स्थापनाओं से अलग कुछ पाते हैं तो आपकी कला या फिर लेखनी पक्षद्रोही हो जाया करती है.

रघुपति सहाय "फ़िराक" का शौक तो समाज के ढांचे को ही ध्वस्त करने वाला था. सोचो कैसी दिक्कत हो जाती ? उनके जाने के तीस साल बाद अब कहीं जाके इस तरह के संबंधों पर कानून ने अत्याचार न करने फैसला किया है. आज हम जिस दौर में जी रहे हैं, उसने डिजिटल पोर्नोग्राफी से बारह साल तक के बच्चों को भी अछूता नहीं छोड़ा है. इसके विरुद्ध कोई जागरण मंच वैश्विक दूतावासों को ज्ञापन दे कर मांग नहीं करता कि ये हमारी सभ्यता और धर्म के विरुद्ध है. ये कैसा समाज है और इसकी रुचियाँ कितनी अनूठी है. जो किसी कद में ऊँचे एक सच्चे और गर्व करने लायक शाईर के सुने -सुनाये किस्सों पर चटखारे लेता है, किसी चित्रकार के काम को कला के रूप में नहीं देख सकता और बिना सुने फतवे जारी करता है.

फ़िराक साहब आप अगर लौंडेबाज थे तो भी और नहीं थे तो भी, मकबूल साहब आपने विद्वेष से चित्र बनाये थे या नहीं भी... मैं आपकी लेखनी और रंग से भरे ब्रश को अपने दिल में रखता हूँ.

एंटीक्यूटी लेबल वाली बोतल में कुछ पैग बचे हैं और दिन का खाना इंतजार कर रहा है तो फ़िराक के इस शेर के साथ बिस्मिल्लाह किया जाये.

मजहब कोई लौटा ले और उसकी जगह दे दे
तहज़ीब सलीके की, इंसान करीने के

March 8, 2010

दोस्त, उस पार भी कोई हसीन सूरज नहीं खिला हुआ है...

मुझे विस्की प्रिय है और रम मेरी आखिरी पसंद. इनके बीच हर उस तरह की शराब समा सकती है, जो पीने लायक है भी और नहीं भी. मैंने पहली धार की देसी शराब पी और लुढ़क गया. मैंने रात भर सड़क के किनारे बैठ कर आला अंग्रेजी शराब पी और सुबह उससे निराश हो कर सो गया. मैंने शराब पीकर अपने प्रियजनों को वे अद्भुत बातें कहीं हैं, जो बिना पिए कभी नहीं कह पाता.

मुझे पहाड़ नसीब नहीं हुए जहाँ से मैं अपनी प्रतिध्वनि सुन सकूँ. मुझे अथाह रेत का सागर मिला जो अपने भीतर सब कुछ सोख लेता है. मेरी हर आवाज़ अनंत में खो जाती है. मेरे कई दोस्त समय के प्रवाह में इत्ते दूर बह गए हैं कि उनकी स्मृतियाँ लोप होने को आतुर है. वैसे एक मनुष्य कितना याद रख सकता है ?

साहित्य का इतिहास, मूर्तिकला की अनूठी परंपरा और भौगोलिक पैमाने, एक हज़ार साल से आगे सर्वसम्मत राय नहीं बना सकते. कुल जमा इस सदी के विलक्षण मानव का ज्ञान क्या है ? ये सोचते ही मैं हैरान हो जाता हूँ कि साठ साल औसत आयु वाला इन्सान सौ साल तक जी सकता है. इससे आगे के किस्से अपवाद होंगे यानि हमारी सौ पीढ़ियों के अतिरिक्त हमारे पास कहने को कुछ नहीं है... बावजूद इसके तमाम माँ - बाप अपने बच्चों को जीनियस बनाना चाहते हैं. भविष्य की पीढ़ियों की स्मृति में कितना बचा रहेगा मेरा बेटा ?

सोच का अंत नहीं और हासिल है सिफ़र.

सात दिन बड़े बोझ में बीते. काम बढ़ता गया. एक परिशिष्ट के लिए कवर स्टोरी लिखने का काम भी इन्ही हालत में मिला. मेरा बड़ा मन फ़िजूल की व्यस्तताओं में डूब गया. मेरे पास उस मेहरबान को शुक्रिया कहने के सिवा अब कुछ नहीं है. जिसने मेरी आधी अधूरी स्टोरी को कितनी मेहनत से अन्य सामग्री से सजाया होगा. हालाँकि मैंने बिना पिए कोशिशें की मगर सूरत नहीं बदली.

एक हज़ार साल पहले दोहा साहित्य की प्रसिद्द विधा था. हेमचन्द्र के प्राकृत व्याकरण में संकलित एक श्रृंगार रस का दोहा याद आ गया है.
प्रिय-संगमि कउ निदड़ी पिअहो परोक्खहो केम
मईं विन्निवि विन्नासिआ निद्द न एब न तेम्ब।
प्रिय के संगम में नींद कहाँ ? प्रिय के परोक्ष नींद कहाँ ? मैं दोनों प्रकार से नष्ट हुई, नींद न यों, न त्यों.

मेरा भी बस ऐसा ही हाल था कि प्रिय नहीं थी तो नींद भी नहीं थी और प्रिय मिल जाये तो नींद कहाँ ? कल सात सौ किलोमीटर दूर से मेरे बचपन के दोस्त अमर को मेरे घर आने का अवसर मिला. वह सत्तर वसंत देख चुकी अपनी माँ के साथ आया था. बाईस साल बाद घर आये इस दोस्त की पापा से मिलने की बड़ी ख्वाहिश थी. घर में आते ही मैंने कहा अमर तुम सही दिन पर आये हो... आज पापा की दूसरी बरसी है. उसने तीन साल की उम्र में अपने पापा को खो दिया था और महीना भर पहले अपने जीजा को...

ज़िन्दगी अजब सवाल करती है और शराब उन्हें याद रखने का हौसला देती है.




March 2, 2010

कमबख्त नशीली गालियां

मौसम की ठण्ड को होली के रंग उडा ले गए तो एडिडास की गंजी भी कुछ चुभने लगी है. घर के बैकयार्ड से लगते कमरे में नाश्ता करके बिस्तर तोड़ रहा हूँ. तीन दिन से पीने को नहीं मिली इसलिए कुछ करने का मन नहीं है. पर्वों और त्योहारों में जाने क्यों पीना सुहाता ही नहीं. इसका एक संभावित उत्तर हो सकता है कि मैं बच्चों और मेहमानों के साथ, इन दिनों को बहुत करीब बैठ कर बिताना चाहता हूँ. खैर इतना अच्छा हो जाना साल भर के बाकी दिनों के लिए काफी है.

आज होली का आखिरी दिन है यानि सामूहिक रंग खेलने के बाद, औरतों का खास दिन. अभी बाहर गली में होली के गीत हैं, गीत क्या है नशे में लिपटे शब्द है. जिनको सींक पर किसी कबाब की तरह सेक कर परोसा जा रहा है. सांवले और काले रंग की देह वाली पैंतीस से पैंतालीस साल की आदिवासी भील समुदाय की औरतों का ये समूह मेरी स्मृति में उन दिनों से है जब मैंने कुछ याद रखना सीखा होगा. वे आज शराब भी पी लेंगी और बिना पिए भी ऐसी गालियां गायेंगी कि मेरे भीतर का मर्द शरमा जायेगा. अभी उन्होंने चार पंक्तियाँ गाई है कि मेरी माँ आ गयी... गीत की अगली पंक्तियाँ उलझ कर एक दबी हुई समवेत हंसी के साथ हवा में खो गयी. उनके स्वर में उल्लास था और निर्मलता भी.

गीत के इस मद भरे निवेदन को जाते हुए बेशर्म फाल्गुन ने लजाते हुए सुना होगा। गीत की चार पंक्तियाँ जो मैं सुन पाया हूँ, राजस्थानी में है. इनका भाष्यांतरण करता हूँ हालाँकि फीलिंग्स की हत्या हो जाएगी मगर मजबूरी है.

उंडी उंडी बेरियों, पातालों पाणी पडियों रे
सींचणियो नी पूगे तो हूँ सालू बांधू रे
पाणी पीतो जा...
घागरिये री छीयाँ में तू थोड़ोक रमतो जा... के पाणी पीतो जा

गहरे गहरे कुओं के पाताल में पानी पड़ा हुआ है, तेरा सींचने का सामान अगर नहीं पहुंचता है तो मैं अपना छोटा रंगीन ओढ़ना बांधती हूँ... पानी पीकर जा. मेरे घाघरे की छाया में थोड़ा खेलता जा... आज तो पानी पीकर जा.

रेत में प्यास का हल नहीं मगर ये तीजणियां तो दूसरी प्यास भड़काने पर आमादा है.

वे चली गई हैं गाती हुई, मेरी माँ ने उनको एक सौ एक रुपये दिए गालियां गाने के एवज में. मन के विकारों का विरेचन, हर साल इसी तरह होता रहे तो बेहतर है. वे अब साल भर तक मुझे सामान्य दिखेंगी उनके सम्मान में कोई कमी नहीं होगी मगर जब मेरी शाम होगी तब तक वे पी और गाकर थक चुकी होंगी.

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.