January 28, 2011

ये कैसा वादा था कि...

धुंध भरे दिनों का ये मौसम धरती के छोरों की ओर लौट जायेगा. कुछ ही दिनों में अपने पंखों पर आग ढ़ोने वाली अबाबीलें आसमान पर मंडराएगी. लू दरवाजों पर दस्तक दे रही होगी और हरी घास दिन ब दिन झुलसती जाएगी. रोहिड़ा पर खिल रही होगी फूलों की रंगत. उन भरी धूप वाली लम्बी उदास दोपहर की नाउम्मीद छाँव में बैठे हुए सांस उखड़ने लगेगी. बरसों से ऐसा ही होता आया है कि ख्वाब दोपहर की नींद में सो जाते हैं और मैं किसी इंतज़ार में सुनता रहता हूँ... बुझ गई राह की छाँव.

हाँ उन सीढ़ियों के पास बैठा रहने वाला फ़कीर घनी छाँव वाले पेड़ के नीचे चला जायेगा. हरे कृष्ण गाते हुए दो भक्तों का जोड़ा पिछले कई बरसों से शहर के बीचे से तेज कदम गुजरता था. सुना, उनकी भी जोड़ी टूट गई. सूरज ढल गया तो परछाई भी बुझ गई. पुराने दोस्त के पास से उठते हुए मैंने खुद से कहा, शहर के दरवाजे छोटे हैं और भीड़ बढती जा रही है. इस रेत के सहरा को प्यासे पार करते हुए चालीस साल बीत गए हैं. चलो उसी छत पर जहां रात भर ख्वाबों को उधेड़ते और बुनते हो.


ये कैसा वादा था कि
अश्कों से जादू जगाने की मनाही थी
चुप सी पसरी थी परीशाँ मौसम में
जैसे बात कोई बाकी न थी
हवा अपनी सरसर से लिखती थी शिकवे रेत पर
शिकस्ता चाँद डूबा जाता था, ये किसकी याद आती थी.

चल उठ, उसी महबूब के घर चलें !


January 24, 2011

विलायती बबूल

मुद्दतों से ये आलम न तवक्को न उम्मीद. शाम के होने से पहले मैं सैनिक कॉलोनी से होता हुआ सड़क पर आता. वहां से कभी पैदल या रिक्शे में बैठ कर शहर के बीच सफ़ेद घंटाघर तक पहुँचता मगर फिर ख़याल आता कि कहीं नहीं पहुंचा हूँ. वही पत्थर से बनी हुई सड़कें, फुटपाथ तक पसरी हुई बरतनों की दुकानें, चाय पीने वालों के लिए बिछी हुई बेंचें, दर्जियों की मशीनों से आती परिचित सी आवाज़ें और मेरे साथ वही मेरी तन्हाई. एक तो वो शहर नया था और फिर मेरी निगाह में कोई दूसरी मंज़िल न थी. शहर से लौट कर आता तो रात भर घर से बाहर बैठे रहने को जी चाहता रहता था.

शाम के ट्रांसमिशन में रेडियो पर गाने बजा रहा होता तो गुजर हो जाती लेकिन खाली शामें बहुत सताती थी. ढाबे से पैक होकर आया खाना कमरे में अपनी खुशबू बिखेरता रहता और मैं अपने किराये के घर के कोर्ट-यार्ड में पसरी हुई रेत पर नंगे पांवों को रखे हुए कुछ सोचता जाता. रेत की ठंडक पांवों को सुकून देती थी. बेख़याल सामने की दीवार को देखता और विस्की पीता. उस समय मेरे पास में ऑफिस से लाया हुआ एक रजिस्टर रहता. जिसमें कुछ कविताओं सा लिखता जाता.

विलायती बबूल : चार कविताएं

[1]
जालोरी बारी में खड़े
घने नीम पर रोज कूकती है कोयल
फिर भी नीले रंग के घरों की
छोटी खिड़कियाँ अक्सर बंद रहती है.

चौराहे के पार कड़ी घूप में
शाही समोसा खाते हुए आता है ख़याल
कि काश यहाँ एक विलायती बबूल हुआ होता
या खुली होती कोई खिड़की
कि ज़िन्दगी में थोड़ी सी छाँव जरुरी है.

[2]
साफ़ मैदानों में खड़े लोग कहते हैं
देखो अब दीखता है ना सुंदर !

मगर विलायती बबूल फिर से उग आते हैं
दीवारों के बीच, गली के नुक्कड़ पर
रसोईघर के पीछे या आँगन की कोर पर.

गोया विलायती बबूल प्रेम की अमर बेल है.
(अक्टोबर 22, 1993 शुक्रवार)

[3]
विलायती बबूल से नहीं लिपटती
कोई फूलों वाली बेल
इसके छोटे-छोटे पत्तों में छुप कर
मुश्किल है कोयल के लिए गीत गाना
इसकी सूखी शाखों के बीच नहीं है घोंसला.

कभी एक सफ़ेद पंखों वाली खूबसूरत तितली
इसके पास से गुजरा करती है
जैसे डाकिया आता है खानाबदोश लुहारों की गली में.


[4]
प्रेम
पहाड़ से लुढका हुआ पत्थर है
या सूखी नदी के बीच का
हाथ भर गहरा भीगा हुआ गड्ढा है
या तनहा दोपहर की नितांत सूनी चौंध है

नहीं...
प्रेम वस्तुतः विलायती बबूल है, जिसकी जड़ नहीं जाती.

(अक्टोबर 27, 1993 बुधवार)


January 20, 2011

ऐसी भीगी सुहानी रात में

वह बड़ी खिड़की कमरे के पश्चिम में खुलती थी. रेगिस्तान के इस छोर पर बसे क़स्बे के नितांत आलसी लोगों के बीच दिन भर खुली रहा करती. चार भागों में बनी इस खिड़की से रात को ठंडी हवा आती थी. वह सड़क पर खुलने वाले मेहमानों के लिए बने कमरे में थी. उस कमरे का उपयोग बहुत कम होता था. हर सुबह इसमें एक छोटी सेंटर टेबल, लकड़ी का तख़्त, एक प्लास्टिक के फूलों वाला सदाबहार खिला एल्युमिनियम का छोटा सा गमला और पास के आले में अखबार बिछा कर उन पर रखी एक दो पुस्तकों को झाड़ कर साफ़ किया जाता और फिर दिन भर सूना पड़ा रहता.

मुझे उस कमरे की खिड़की बड़ी भली लगती थी कि उससे बाहर आते - जाते हए लोगों को देखा जा सकता था. घर हमेशा ठहरा हुआ सा जान पड़ता और मेरी ऊब को बढ़ाता रहता था. खिड़की के सामने बाहर गली के दूसरे छोर पर एक विलायती बबूल का पेड़ था. उसकी छाँव बहुत हल्की हुआ करती थी. जिन दिनों लू नहीं चलती उसके नीचे बैठ कर धूप से बचा जा सकता था. मैं भी घर की ठंडी तन्हाई को बाहर बबूल के नीचे की कुरकुरी छाँव से केश कर लेना चाहता था किन्तु कभी कर नहीं पाया. इसलिए सदा ही उसी खिड़की के पास बैठा हुआ दिन के सपने देखा करता.

उस गली में एक डाकिया भी आया करता था. खाकी वर्दी वाले उस इंसान की सूरत मुझे दुनिया में सबसे हसीन लगती थी. मेरे दोस्त क़स्बे के बीच बने हुए कस्टम के क्वाटर्स को देख कर अचरज से कहा करते थे. देखो इसमें फिल्मों का मशहूर चरित्र अभिनेता देव कुमार रहा करता था और वह सात फीट लम्बा था. मुझे यकीन था कि वे सुनी हुई बात को आगे बढ़ा रहे हैं लेकिन मैं सोचता था कि हमारे डाकिये से बेहतर कद काठी का गहरी आँखों वाला कोई न हुआ होगा. वह मुझसे बेहद खुश रहता कि मैं हमेशा उसके इंतजार में घर के बाहर खड़ा रहा करता, उसे कभी मेरी चिट्ठी देने के लिए अपनी सायकिल से उतरना ही नहीं पड़ता वह बस एक पांव को नीचे टिकाता और चिट्ठी देता और चला जाता.

चिट्ठियां अक्सर उसी खिड़की के पास बैठ कर पढता था और फिर एक लम्बी थकान भरी आह के साथ लकड़ी के तख्ते पर लेट जाता. वे ख़त कभी पुराने नहीं होते थे कि उनको बार बार किसी कविता की तरह पढ़ा जा सकता था. अद्भुत रहस्यों से भरी और बेहद डरावनी चीज वही एक भूरे रंग की दस्ती फ़ाइल हुआ करती थी जिसमें करीने से बंधे हुए ख़त और हर एक ख़त के शुकराने में कई कविताएं लिखी थी. उस फ़ाइल को थामे हुए अकूत सपनों की अविराम चलने वाली पगडंडियों पर मेरा मन भागा दौड़ा ही जाता. कोर्स की किताबें मेरा इंतज़ार करती रह जाती. मैं खाली पन्नों पर बबूल की मिमझर, गली से गुजरे लोगों और दूर खड़े नंगे पहाड़ के बारे में लिखता रहता.

आपने कुछ ऐसे बच्चे देखे होंगे जिनका पढने में बिल्कुल मन नहीं लगता, वे सिर्फ खेलने या एकांत में बैठे रहने के लिए अक्सर गायब हो जाते हैं तो उनसे मेरा चेहरा मिलता है. मैं हद दर्ज़े का पढाई चोर रहा हूँ. बाहर की दुनिया के लिए इतना लालायित रहा हूँ कि भरी धूप में भी उस खिड़की को बंद करना मुझे पसंद नहीं आता था. जब भी मौका मिलता मैं लगभग सारा ही दिन घर से बाहर बिताता रहा. मुझे एक बात हमेशा आश्चर्य में डालती है कि मैं घर से भाग क्यों नहीं गया ? ऐसी क्या चीजें थी जो मुझे रोकती रही. कभी ख़याल आता है कि वो खिड़की फिर लगता है कि नहीं वे ख़त... हाँ अगर मैं भाग जाता तो उन ख़तों का जवाब कौन देता ?

चिट्ठियां खो गई हैं मगर उनमें महकने वाले शब्द इस ग्लास पर जमी बूंदों की तरह बनते और मिटते जाते हैं. किसी का मासूम चेहरा आँखों में चमकता है. जाने अब वह सूरत कैसी हो गई होगी ? जाने उसके दिल में प्यार था भी या नहीं ? ... अट्ठारह साल के बच्चों अगर तुम मुझे पढ़ते हो या तुम्हें किसी से मुहब्बत है तो इसे सुनों कि हबीब वली मोहम्मद के इस नग़मे को मैंने जवान होने और उसे खो देने के बरसों बाद तक रेडियो पर प्ले किया है. मैं इसके कॉपी राईट को नज़र अंदाज़ करते हुए यहाँ लगा रहा हूँ कि मुहब्बत में सब जायज है...

January 16, 2011

मुख़्तसर ये कहना...

एक हल्के से टी-शर्ट में छत पर बैठा हूँ. शाम से ही मौसम खुशनुमा होने लग गया था. बदन से गरम कपड़े उतारते ही लगा जैसे किसी रिश्ते के बोझ को ढ़ो रहा था और संबन्ध ख़त्म हुआ. इतना साहस तो सबमें होना चाहिए कि वह ज़िन्दगी की कॉपी में लिखे कुछ नामों पर इरेजर घुमा सके मगर ऐसा होता नहीं है. मैं तो नए मिले लोगों के भी बिछड़ जाने के विचार मात्र से ही सिहर जाया करता हूँ. रौशनी में कस्बा चमकता है. आसमान में धुले हुए तारे हर दिशा में और चाँद पश्चिम में लटका है. मैं मदभरी हवा में तुरंत अपना ग्लास उठा लेता हूँ और भूले हुए सदमें याद करता हूँ.

अपनी गणित लगता हूँ कि सदमे का कोई स्थायी शिल्प नहीं होता. वह हर घड़ी अपना रूप बदलता रहता है. अभी जो नाकाबिल-ए-बरदाश्त है, वह कल तक अपनी गहनता को बना कर नहीं रख सकता. ग़म और खुशियाँ समय के साथ छीजती जाती है. उन पर दुनियादारी के आवरण चढ़ते रहते हैं और इस तरह हम जीवन में निरंतर सीखते हैं. सब वाकयों को हमारे भीतर का एक खामोश टेलीप्रिंटर दर्ज करता जाता है. इस सब के बावजूद ज़िन्दगी सदा के लिए अप्रत्याशित ही है. वह नई राह नए समय में बखियागरी के नए हुनर दिखाती है और मुश्किलों से लड़ते हुए सीखे गए सबक अक्सर बौने जान पड़ते हैं.

कभी कोई भूला हुआ लम्हा यकसां सामने आ खड़ा होता है. मुस्कुराता हुआ भीगी आँखों से भरा और अब तक याद में बचाए हुए रखने का आभार लिए हुए. बेचैन शामों की उदास परछाइयाँ विस्मित होकर उलझ जाती है. सफ़र में आधी उम्र के बाद के बड़े अजीब सवाल यूं ही परेशान किये रखते हैं कि आगे रास्ता कहां जाता है. हम किसलिए हैं, इस सफ़र में क्या करना लाजिमी था और क्या नहीं ? क्या फर्क होता अगर बहुत सी किताबें याद की होती, किसी बड़े ओहदे पर होते, कहीं लाइम लाईट में गिने जाते या फिर कहीं उदास बैठे होते... कुछ भी तो शाश्वत कहां है.

इन सवालों की कुंजी कहीं नहीं है, बस कुण्डलियाँ है. सुबह से रात तक का कोई साफ़ हिसाब नहीं है. बेहूदा सोच के दायरे में घिरा हुआ ऑफिस के तनहा कमरों में म्यूजिक प्लेयर्स की उठती गिरती हुई लहरों के बीच या फिर शोर मचाते हुए मोहल्ले में अपनी छत पर टहलता रहता हूँ. एक थकावट है. एक अनमनापन है. सर्द दिनों में बीते हुए तमाम मौसमों में मिले और बिछड़े हुए दोस्तों के सीने की गर्मी को चुरा लाने के ख़याल हैं. ऐसे में किसी से मिलने का वादा, कोई हाल ही में सुनी गयी आवाज़ और छोटी-छोटी चुप्पियों वाली बातचीत दुनियावी बना जाती है. रूहानी होने की जगह दुनिया भौतिक जान पड़ने लगती है.

इन उदास औए गुंजलक दिनों में बिस्तर में पड़ा रहा हूँ. सोचता रहा कि मिलने का अनिवार्य हासिल बिछोह ही हैं. वस्ल की शाम के बाद फिर एक तरल उदासी को अपने भीतर समेट कर रखना होगा. वह पहले से सहेजे हुए तमाम उदास रंगों में घुल कर मन के आईने को नया लुक देगी. खुद से पूछता हूँ कि तुम खुश क्यों नहीं हो ? तुम क्यों हमेशा भागते रहते हो ? अजीब प्यास की गिरफ्त में क्यों हो ? आह सवालों ! मुझे छोड़ दो. मैं बिखर जाने के लिए बनी खुशबू का बचा हुआ हिस्सा हूँ.

* * *
हाँ मैं ख़यालों में उलझा हुआ हूँ. मुझे कहानी-कविताएं लिख कर सुकून नहीं मिल रहा है. मैं किसी हाथ को थामे हुए समन्दरों के किनारे देखना चाहता हूँ, पहाड़ों के दरख्तों की घनी छाँव में शानों को चूमना चाहता हूँ, फिलहाल नुसरत साहब और उनके साथियों की गाई मीठे दर्द से भरी कव्वाली को सुन रहा हूँ... सुकून है !

January 7, 2011

मेहरुन्निसा ख़ाला, आप बहुत अच्छा लिखती हैं...

दोपहर की धूप लाचार सी जान पड़ रही थी. दफ्तर सूना और कमरे बेहद ठन्डे थे. स्टूडियोज में बिछे हुए कालीनों तक जाने के लिए शू ऑफ़ करने होते हैं तो काम के समय पांव सारा ध्यान खींचे रखते हैं. अफसरान का हुक्म है कि हीट कन्वेक्टर का इस्तेमाल किया जाये लेकिन रेगिस्तान में दिन के समय इनका उपयोग मुझे बड़ा अजीब सा लगता है. मैं अपनी रिकार्डिंग्स को पूरा करके बाहर खुले में निकल जाता हूँ. कार्यालय के भीतरी द्वार के ठीक आगे सरकारी कारों के घूमने के लिए जगह छोड़ी हुई है. बीच के छोटे से बागीचे और हमारे माली के बीच पिछले सत्रह सालों से लडाई चल रही है. मिट्टी अपने फूल खिलाना चाहती है माली दूसरे फूल.

गार्ड के पास कपड़े की लीरियों और चिंदियों को कातने का हुनर है. वह एक्स आर्मी पर्सन है. कभी मुलायम कपड़े की फुल थ्रू से बंदूकों की नाल साफ़ करते रहे होंगे, आज कल ढेरिया घुमाने या क्रिकेट कमेंट्री सुनने के सिवा विशेष अवसरों पर होने वाली पार्टियों में आर्मी के सलीके से पैग बनाते हैं. मुझे देखते हैं और कहते हैं कुर्सी लगा देता हूँ लेकिन मैं पिछले तमाम सालों में उलटे रखे हुए गमलों पर बैठना पसंद करता रहा हूँ. मैं धूप वाले गमले की ओर बढ़ गया. लाइब्रेरी में मैंने किताबों को आधे घंटे तक देखा था और कुछ समझ नहीं आया तो मेहरुन्निसा परवेज़ का कथा संग्रह सोने का बेसर उठा लाया था.

इन ख़ाला का जन्म शायद आज़ादी से पहले का है और साठोतरी कहानी से इनका नाम चर्चा में आया था. पुस्तक के फ्लेप पर जो परिचय लिखा है वह मेरे जैसे कम पढने वाले के लिए अपर्याप्त है. पाठक अक्सर लेखक के बारे में जिज्ञासाएं रखता है. कहानी और कथाकार दोनों से प्रेम एक साथ उमगता है. मैंने धूप में उलटे रखे गमले पर बैठ कर कहानियां पढनी शुरू की और फिर अपनी तीसरे दिन की ड्यूटी के दौरान इसे संपन्न कर लिया. मैं कम पढता हूँ किन्तु इस बार मैं संग्रह को जल्दी इसलिए पूरा कर पाया कि मेरा मन उचाट था, कोई वस्ल की बात नहीं थी और फ़िराक़ के किस्से भी नहीं थे.

इस कहानी संग्रह का प्रकाशन छठे दशक का है. ख़ाला ने इसे अपनी तीन नन्हीं जानों को समर्पित किया है. उनमें एक नाम है समर. इस संग्रह को पढ़ते हुए मुझे याद आता रहा कि ये उस दौर की कहानियां हैं जिसमें कविता, कथा बनने की और कथाएं कविता बनने की होड़ में नहीं थी. बिम्बों के कांकड़ हुआ करते थे और शिल्प ऐसी पटरियां गढ़ता था जिन पर कौतुहल भरा कथ्य दौड़ता रहे. कहानियां परिवेश को सूक्ष्मता से अंगीकार करती थी. पात्र उतने ही हौसले वाले हुआ करते थे जितने वे लाचार होते.

मैंने इन कहानियों को पढ़ कर बहुत आनंद उठाया है, खासकर पत्थरवाली गली को मैंने दो बार पढ़ा और जुगनू इसलिए पसंद आई कि उसके परिवेश से कथाकार का रोम रोम परिचित है. लोक जीवन की कहावतों और आंचलिक कथाओं का सुन्दरता से उपयोग इन कहानियों में एक कॉमन खूबी है. बोल-चाल के छोटे-छोटे किस्से सकेरना मेहरुन्निसा ख़ाला को बहुत आता है. कहानियां पढ़ते हुए मुझे कुछ याद आने लगता है मगर क्या ? इसी नासमझी में सोचता रहता हूँ फिर एक उपन्यास का नाम याद आया, समरांगण. हाँ मैंने इसे कभी पढ़ा होगा. मुझे मेहरुन्निसा परवेज़ के बारे में कुछ जानकारी नहीं है लेकिन उस उपन्यास के आगे कुछ ऐसा लिखा है, मेरे बेटे समर प्रताप के लिए जिसकी पार्थिव देह आँगन में मेरी आँखों के आगे रखी थी...

हम सब को एक दिन किसी न किसी पत्थरवाली गली से गुजरना होता है. ज़िन्दगी जितनी खूबसूरत है उतनी ही बेरहम भी होती है ?

January 4, 2011

बेहिजाब तन्हाई में

उदासियाँ अपने पहलू में सकेरता हूँ
और हथेलियों के आईने में उगती हैं तस्वीरें
फिर बेहिजाब तन्हाई में देखता हूँ कि
तेरे जूड़े में खिलती शाम से धुंधला गए हैं चमेली के फूल
और मैं छीजती शाम की आखिरी कोर पर बैठा हुआ
ओढ़ता हूँ तेरी सांसों के लिबास...

बच्चे जब स्कूल चले जाते हैं
या दफ्तर में अलसायी दोपहर पसरने लगती है
जाने ये कैसे ख़याल आते हैं ...बातें बेवजह हैं और बहुत सी हैं



* * *

सुबहें अब भी जरा देर से हुआ करती हैं. रात को सपने सताते रहते हैं. सपने में जंगल है. संकरे रास्ते हैं. मैं किसी अपघाती सा घूमता हूँ. कुछ टहनियों को हटाते ही खुला मैदान आ जाता है और दो एक पत्तियां सब कुछ अँधेरे से ढक देती है. मेरे साथ कोई है जिसकी शक्ल नहीं दिखती. सपने में दुस्साहस है मगर प्रेम नहीं है, सहवास नहीं है. बेचैनी में जागता हूँ और कोसता हूँ. उजाले में मकानों की पहचान गढ़ता हूँ. उलझे हुए धागों को भूलने के लिए म्यूजिक प्ले कर देना चाहता हूँ. सबकी की एक प्ले लिस्ट होती है मेरी भी है. इसमें शुजात हुसैन साहब की इस ठुमरी को कब से सुन रहा हूँ याद नहीं मगर ये चरवाहे सी है जो सुकून की भेड़ों को घेर लाती है.

January 1, 2011

थोड़ी सी शराब और बहुत सा सुकून बरसे...

ये बेदखली का साल था. हर कोई अपनी ज़िन्दगी में छुअन के नर्म अहसासों को तकनीक से रिप्लेस करता रहा. सौन्दर्यबोध भी एप्लीकेशंस का मोहताज हो गया था. हमने अपनी पसंद के भविष्यवक्ता और प्रेरणादायी वक्तव्य पहुँचाने वाली सेवाएं चुन रखी थी. सुबहें अक्सर बासी और सड़े हुए समाचारों से होती रही. शाम का सुकून भोर के पहले पहर तक दम तोड़ने की आदत से घिरा रहा. कभी किसी हसीन से दो बातें हुई तो कुछ दिन धड़कने बढ़ी फिर बीते सालों की तरह ये साल भी बिना किसी डेट के समाप्त हो गया.

पिछले साल एक किताब कभी रजाई से झांकती तो कभी उत्तर दिशा में खुलने वाली खिड़की में बैठी रहा करती. कभी ऑफिस में लेपटोप केस से बाहर निकल आती फिर कभी शामों को शराब के प्याले के पास चिंतन की मुद्रा में बैठी रहती. मैं जहां जाता उसे हर कहीं पाता था. कुछ एक पन्नों की इस किताब के एक - एक पन्ने को पढने में मुझे समय लगता जाता. आखिर दोस्त अपने परिवारों में मसरूफ़ हुए, ब्लॉग और फेसबुक पर ख़त-ओ-किताबत कम हुई और मैंने उसे पढ़ लिया. इसे पढने में मुझे कोई आठ - नौ महीने लगे हैं.

आंग्ल भाषा की इस किताब का शीर्षक है, क्या हम सभ्य हैं ? मुझे इसे पढ़ कर बेहद ख़ुशी हुई. इसे समझने में जो वक़्त लगा उसने मेरी एकाग्रता को बढाया. इससे मैंने जाना कि सभ्यता एक बेहद शिथिल विकास प्रक्रिया के सर्वमान्य मूल्यों के दस्तावेज़ को कहते हैं. दूसरी बात जानी कि जिसे हम सभ्य होना मान रहे हैं वह वास्तव में पांच सौ बरस ईसा पूर्व की ग्रीक वेतनभोगी गुलाम सभ्यता का बेहतर गणितीय उद्धरण मात्र है. हमारी कला साहित्य और संस्कृति का विकास बेहद लचीले तरीके से हुआ है और इसमें स्यादवाद का बड़ा भाग मौजूद है.

साल की आखिरी शाम को जया से पूछा कैसे चल रही है ज़िन्दगी ? उसने बताया कि "ख़ास उम्मीद तो नहीं थी लेकिन तुम ठीक निकले..." इस उत्तर के बाद हम दोनों बाज़ार चले गए. सड़कें गर्द से भरी थी फिर भी नए साल के स्वागत में दुकानों के आगे झालरें लगी हुई थी. मॉल जितने जवान थे, कमसिन लड़कियां उतनी ही दिल फरेब रही होंगी लेकिन हमने बाज़ार का एक चक्कर काटने के सिवा अपने मित्र कमल अग्रवाल साहब की मिठाई की दुकान जोधपुर मिष्ठान भंडार से गुलाब जामुन और कुछ नमकीन ली और पड़ौस की वाइन शॉप से आर सी की बोतल.

जया को अपनी एक छोटी सी कविता सुनाई. " सनसनाती याद के कोड़े, तुम बरसो इश्क़ की पीठ पर कि कोई शाप खाली न जाने पाए. इंतज़ार तुम कील बन कर चुभ जाना आँख में कि पलकों की ओट में छुपे रंगीन ख्वाबों के प्रेत को बींधा जा सके. सांसों तुम्हें मरुथल की मरीचिका की कसम कि दौड़ते रहना धरती के दूसरे छोर तक जहां उदास प्रेम आखिरी बोसा तुम्हारे गाल पर रखने के वचन से बंधा है. और फिर इस तरह तमाम बीते हुए सालों के इश्क़ की केंचुली, जब तक उतर न जाये, सनसनाते हुए याद के कोड़े तुम बरसते रहना, कीलों तुम चुभते जाना और साँसों तुम दौड़ते रहना... "

* * *
एक बेहद मामूली इंसान की नासमझी को पढना बड़ा कष्टदायक काम है इसलिए मैं हथकढ़ पढने वालों का दिल से आभार व्यक्त करना चाहता हूँ. मेरे इस बीते हुए साल का कुल हाल प्रिय शाईर इब्ने इंशा साहब के इस शेर में मिलता है. इस शेर में कुछ उर्दू के शब्दों का अर्थ इस तरह है. दहर - ज़माना, अमाँ - शांति, शहरे-बुताँ - प्रेमिकाओं का नगर, ख़राब - उजड़े हुए, दश्ते-जुनूँ - पागलपन का जंगल. नए साल में धन दौलत से क्या करियेगा इसलिए नया साल आपके लिए थोड़ा सा इश्क़ और बहुत सा सुकून लेकर आये. मेरे लिए थोड़ी सी शराब...

जब दहर के ग़म से अमाँ न मिली, हम लोगों ने इश्क़ इजाद किया
कभी शहर-ए-बुताँ में ख़राब फिरे, कभी दश्त-ए-जुनूँ आबाद किया

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.