Posts

Showing posts with the label बातें बेवजह

रोटी एक पहिया हो गयी है

न कहने सी बात

कहाँ है तुम्हारी प्रेमिका

जून के सात दिन-रात

कुछ एक अपवादों को छोड़कर

कई बार - डायरी दस दिनों की

कोई चरवाहा भी न रखे

आतिशदान के भीतर की गंध

साये, उसके बदन की ओट किये हुए

कमर पर बंधी है कारतूसपेटी

रेगिस्तान का आसमान अक्सर

शाम के झुटपुटे में

मैं उस रोशनी में जाकर क्या करूंगा

और कुछ याद, दाल और तुरई की

एक मरा हुआ आदमी कई बार सचमुच मरा हुआ नहीं होता है।

तस्वीर अधूरी है मगर मिटी तो नहीं है

सन्यास की चाशनी में वियोग की धुन

जिजीविषा के आखिरी छोर पर

परछाई की गंध

मार गिराता हूँ दिन और रात