December 30, 2019

वह एक अफ़ीम ही था।

उसके इशारे में जाने क्या सम्मोहन था कि मैंने अपनी गाड़ी रोक दी।

उसके थैले में पोस्त का चूरा भरा है। उसने अपनी बंडी में अफ़ीम छुपा रखी है। वह कुछ चुराकर भाग रहा है। उसकी रेलगाड़ी छूट रही है। उसको बस अड्डे तक जाना है। कोई प्रिय अस्पताल में उसका इंतज़ार कर रहा है। वह ख़ुद अस्वस्थ है।

उसके हाथ से इशारा करने के पीछे अनेक वजहों में से कोई भी वजह हो सकती थी। उस वजह का मैं भागीदार हो चुका था। वह नशीले पदार्थ लिए होता तो मैं अपने को निर्दोष साबित करने के लिए भटकता रहता। उसे किसी ज़रूरी काम में कहीं पहुंचना होता तो वह अपनी ज़रूरत में मुझे कैसे याद रख पाता। उसको क्या याद रहता कि शुक्रिया कहना चाहिये।


वह मेरे पास की सीट पर बैठा था।

उसने अपनी एक उलझन कही। पूछा कि इसका क्या हो सकता है। मैंने उसको रास्ता बताया। ऐसा करने से तुम्हारी मुश्किल आसान हो जाएगी। मैंने एक फ़ोन लगाया। उसके बारे में बात की। मेरे कहने से उसे आसानी हो गयी।

इतना होते ही उसने एक नई समस्या मेरे सामने रख दी। मैंने कहा घबराओ मत। इस पर अधिक न सोचो। वह मेरी ओर इस तरह देखने लगा कि जैसे मैं कुछ करूँ। मैंने उसे कागज़ के छोटे से टुकड़े पर एक सिफ़ारिश लिख दी।

वह आदमी चला गया।

कल अचानक दिखा। आगे होकर उसने दुआ सलाम की। मैं किसी उदासी या उधेड़बुन में था। मैंने चाहा कि वह ज़रा देर मेरे पास ठहर जाए। मैं जानता था कि वह मेरी कुछ मदद नहीं कर सकता। लेकिन किसी लगभग अपरिचित का भी ऐसे में दो पल रुक जाना अच्छा होता। शायद मैं समझता कि कोई तो है।

वह जाने लगा तो मैंने उसे कहा। ऐसे न जाओ। बैठो।

इसके बाद क्या हुआ नहीं मालूम मगर मुड़कर देखे बिना चले जाने वाले को जाते हुए देखकर सुकून आने लगा। हमें अधिकतर ऐसे लोग ही मिले थे। वे एक प्रयोजन लेकर आए थे। आवश्यकता पूरी हुई तो चल दिए।

वह एक अफ़ीम ही था। जिसके सम्मोहन में मैंने गाड़ी रोक दी थी। मैं हर बार ख़ुद को कहता हूँ कि ऐसा करने के ख़तरे हैं। हर बार मेरा मन भूल जाता है कि करना क्या है।

December 29, 2019

पानी के रंगों वाला पेड़





पानी के रंग बरतने वाले कलाकारों के चित्रों में कुछ एक जैसा होता ही है। उनकी डायरी में ये पेड़ भी अक्सर मिल जाता है।

यूं तो दुनिया भर में गिरती हुई स्वर्णिम पत्तियों से ही पतझड़ सुंदर दिखता है किन्तु पेड़ पर एक साथ लगी सुनहरी, पीली और हरी पत्तियां इसे मोहक बनाती हैं। ये मुझे अपनी ओर खींचता रहता है।

पेड़ के साथ तस्वीर में आभा है।

December 16, 2019

तुम भय के बारे में क्या जानते हो?

माले कैम्प में एक रेस्तरां के आगे गुज़रते हुए ज्यूमा ने देखा लोग खा-पी रहे थे। रेस्तरां के भीतर सिगरेट का धुआँ था। वह एक खिड़की में रखे केक देखने लगा तभी उसके कंधे को किसी ने थपथपाया।

ज्यूमा ने मुड़कर देखा पुलिसवाला था। पुलिस वाले को देखते ही अपनी जेब से पास निकाला और आगे बढ़ा दिया। पुलिस वाले ने कहा "तुम यहाँ क्या कर रहे हो। घर जाओ अंगीठी के पास बैठो और बीयर का मज़ा लो"


इस बात से ज्यूमा को समझ आता है कि पुलिसवाला उस पर तंज कस रहा है। वह पूछता है "क्या आप मुझे जेल भेजने वाले हैं"

ज्यूमा वहां से चलकर ऐलोफ़ स्ट्रीट होता हुआ शहर के चौक तक पहुंचता है। उसका ध्यान गली में एक छत की ओर जाता है। वहाँ छत पर कोई भाग रहा है। भागता हुआ आदमी अचानक छत से फिसल कर लटक जाता है। उस आदमी के पीछे पुलिस वाले हैं।

आदमी का एक हाथ छूट जाता है। दर्शकों को पुलिस वाले धमका कर दूर कर देते हैं। तभी वह आदमी नीचे सड़क पर गिर जाता है। सब उसकी ओर दौड़ते हैं।

भीड़ को हटाते हुए पुलिस वाले आते हैं। लोग हटते हैं लेकिन एक आदमी उसके पास बैठा रहता है। पुलिस वाले पूछते हैं "तुम क्यों नहीं हट रहे"

वह कहता है "मैं डॉक्टर हूँ। इस आदमी का शायद हाथ टूट गया है" ये सुनते ही एक पुलिसवाला डॉक्टर को ज़ोर से थप्पड़ मारता है।

पास खड़े ज्यूमा की मुट्ठियाँ कस जाती है लेकिन भीड़ पुलिस के कहने पर बिखर जाती है। डॉक्टर पुलिस से अनुमति लेकर उस घायल को अपने घर ले आता है।

वह उसकी बाँह का ऑपरेशन करता है।

घायल जागते ही डर जाता है। वह कहता है ये गोरों का घर है। डॉक्टर कहता है "यहां सुविधाएं कुछ अधिक है किंतु ये गोरे का घर नहीं है।"

पुलिसवालों से घबराया हुआ आदमी जिसका एक हाथ टूटा हुआ था। खिड़की से कूद कर भाग जाता है। नर्स के ये बताने पर डॉ चिंतित होता है। वह क्षोभ में ज्यूमा से कहता है "अब तुम जा सकते हो। किसी गवाह की ज़रूरत न रही"
* * *

ये पीटर अब्राहम की कही कहानी है। माले कैम्प की एक घटना। दक्षिण अफ्रीका की आज़ादी से कोई दस एक साल पहले लिखी गयी थी।

अफ्रीका के ही लोग है। अपने ही देश में घर से बाहर निकलने का पास लिए घूमते हैं। पुलिस जिसे चाहे उसे उठाकर बंद कर देती है। माले कैम्प के वे सब लोग, जिस ज़मीन पर जन्मे थे, वहीं डरे हुए जी रहे थे।

पुलिस के अदने सिपाही मददगार डॉक्टर को सरे राह तमाचा जड़ रहे थे। लोग चुप्पी ओढ़कर अपने घरों को चले जाते थे।

एक ज्यूमा था जो इसे बर्दाश्त नहीं कर पाता था। लेकिन वह भी लोगों व्यवहार के कारण हताश हो रहा था।
* * *

ये कहानी मैंने जोधपुर विश्विद्यालय में पढ़ने के दौरान पढ़ी थी। माने तब तक दक्षिण अफ़्रीका आज़ाद भी न हुआ था।
* * *

भय के बारे में तुम क्या जानते हो? क्या मुझे इस पोस्ट के साथ कोई तस्वीर लगानी चाहिए?
* * *

December 4, 2019

एक लिफाफे में रेत



प्रेम की हड़बड़ी में वो स्नो शूज पहने हुये रेगिस्तान चली आई थी।

वापसी में रेत उसके पीछे झरती रही। कार के पायदान पर, हवाई अड्डे के प्रतीक्षालय में, हवाई जहाज और बर्फ के देश की सड़कों तक ज़रा-ज़रा सी बिखर गयी। थोड़ी सी रेत उसके मन में बची थी।

उसके मन में जो रेत बसी हुई थी वह बिखर न सकी। शिकवे बनकर बार बार उठती थी। उसके सामने अंधेरा छा जाता था। सांस लेने में तकलीफ होने लगती थी। बेचैनी में कहीं भाग जाना चाहती थी लेकिन रास्ता न सूझता था। बारीक रेत का स्याह पर्दा उसे डराता रहता था।


उस रेत को उसने एक लिफाफे में रखकर मुझे भेज दिया। मैंने उसे केवल एक ही बार पढ़ा था। उसे पढ़ा नहीं जा सकता था। उसमें मेरे लिए कोसने थे। बेचैनी थी। मैं लिफाफे को कहीं रखकर भूल जाना चाहता था। और मैंने बड़ी भूल की। उस लिफाफे को मन के अंदर रख लिया।

"तुमसे मिलते ही मैं बर्बाद हो गयी। मैं अपने बच्चों से, पति से, घरवालों से, पेंटिंग से, सोचने से, समझने से और हर उस बात से बेगानी हो गयी, जो मेरी दुनिया थी। जहां चाहे हरदम खुशियों के फूल न झरते थे मगर शांति थी। तुम्हारे पास से लौटकर छोटी बेटी को गोद में उठाया तो अचानक सिहर उठी। कि ये तुम्हारी बेटी नहीं है। इस ख़याल के बाद मैं नीम पागल अपना सर दीवार से फोड़ लेना चाहती थी। लेकिन मैं रेत की तरह सोफ़े पर बिखर गयी।"

कल सर्द मौसम की रात थी। लेकिन काली पीली आँधी से कमरा भर गया। सांस उखड़ने लगी। अंगुलियाँ अंधेरे में चमकीली पन्नियों में रखी दवा खोजने लगीं। दराज़ के कोने में बर्फ के फाहे रखे थे।

वे फाहे जो उसके स्नो शूज पर चिपके हुये रेगिस्तान चले आए थे।
* * *

पेंटिंग थॉमस शोलर की है। आभार।

October 21, 2019

जब तुमने पढ़ लिया, मैंने उसे मिटा दिया।

मेरी चाहना का हासिल वे नोट्स तो होने ही चाहिए थे, जो तुम्हारे कभी न आने वाले जवाब के बारे होते। मेरी बेचैनी के बारे में होते। उन शामों और रातों के बारे में होते जब ऐसा लग रहा होता कि मैं तुम्हारे ख़याल से भरा कोई लम्हा जी रहा हूँ।
* * *


प्यार करने पर क्या मिलता है?

एक लम्बी प्रतीक्षा जो सही जा सके। एक बार देख लेने का एफर्ट जो कभी न लिया जा सके। मगर जो हो पाता है वह ये है कि एक डर मिलता है।

इस बात का डर कि इसका अंजाम भी वही होगा।

रेगिस्तानी क़स्बे की एक सड़क के पास गुलमोहर खड़ा था। उसे देखते हुए सोचा कि मैंने तुमको चाह कर ग़लत तो कुछ न किया। गुलमोहर को रेगिस्तान चाह सकता है तो मैं भी तुम्हें चाहने के लिए माफ़ कर दिया जाऊं। शायद।
* * *

उदासी एक बर्फीला रेगिस्तान थी
समय रेल के डिब्बों की तरह गुज़रता था
चेरी ब्लॉसम भी किसी चीज़ का नाम भर था।

जब तक
नहीं देखा था तुम्हें मुस्कुराते हुए
सीधी लटों में नहीं खो गया मेरा दिल
तुम्हारी हंसी ने चुरा न लिया मुझे।

इसके बाद ये चेरी ब्लॉसम स्माइली
मेरी अंगुलियों पर चढ़ गयी
जैसे एक मौसम दिल तक उतर आता है।

और
मैं जानता हूँ, दिल कितना लालची है।
🌸🌸

पंडित ने कहा
राहू ने ऐसा घर कर रखा है
कि जेल जाओगे तुम।

वह भविष्यपत्र को पढ़ता
समझाता, ज़ोर देता
इस चक्र से बाहर आओ।

हवस का अथाह सागर बन चुके हो।

मगर मैं अपनी चाहना को बचा लाया
कि जो होगा सो होगा, राहू तो उसी घर में है।
* * *

अचानक बाहर जाकर बैठ जाना होता है
कि परिंदों को देख सकें, सुन लें उनकी आवाज़
रास्ते का शोर और आती हुई शाम
भुला दे पिछला लम्हा
कि उस एक लम्हे के बाद कितना कठिन होता है
वहीं होना, जहां तुम हो।

प्रेम में होना साधारण छुअन को
बदल देता है एक अलभ्य बात में।

फिर अचानक लगता है कि मैं क्या हो गया हूँ
एक ऊंघता ऊदबिलाव, एक खोया हुआ परिंदा
एक लहराता चलता हाथी
या कि कोई शहद स्वप्न से भीगा हतप्रभ भालू।

ईश्वर करे कि किसी को प्रेम न हो,
न वह भागता फिरे ख़ुद से।

तुम्हारे पास होने के उस लम्हे के बाद।
* * *

तुम न होते तो चाहना क्या होती
क्या लिखता में किसी के लिए।

न ऐसा इंतज़ार होता
जिसके बारे में किसी को पता भी न हो
कि इंतज़ार करना चाहिए।

मगर
पीछे छूटती रही कविताएं
आगे बढ़ता रहा इंतज़ार।

कभी पता न होना भी अच्छा होता है
कि अगर तुमसे कहना हो तो
क्या कहूंगा मैं
सिवा इसके कि तुम बहुत अच्छे हो।
* * *

मैंने ऐसी पचासों चिट्ठियां मिटा दी हैं कि तुम न थे तो उनको रखकर भी क्या करता।

लेकिन पत्थरों के बीच जंगली फूलों के बीज बचे रह जाते हैं। बारिश के बाद पीले, नारंगी, गुलाबी फूलों से ढक जाती है पहाड़ की तलहटी। ठीक ऐसे ही आती हुई सर्दियों में मेरा दिल भर जाता है तुम्हारे नाम से।
* * *

जाने क्या बदा है
जाने क्या सोचता हूँ।
* * *

11 January 2019 17.25
Canon EOS 550D
f/1.8 1/640 50.00mm ISO 100

October 20, 2019

रंगीन पैबल्स

जीवन रंगीन पैबल्स के लुढ़कने का कोई खेल है। अनिगिनत रंग बिरंगे पैबल्स अनजाने-अनदेखे रास्ते पर लुढ़कते हुए टकराते हैं। साथ चलते है। बिछड़ते हैं। कोई रास्ते से बाहर उछल जाता है। कोई टूटता हुआ बढ़ता रहता है। अंततः हर पैबल रंगीन धुएं में बदल जाता है। इस खेल में हमारा सफ़र खत्म हो जाता है।

कभी दफ़्तर से लौटकर, कॉलेज से आकर, दुकान से आकर लगता है कि कितना बोझिल है। इससे हम कब मुक्त होंगे। घर साफ करते, खाना पकाते, परिवार को आकार देते हुए एक मोड़ पर यह सब भी बोझिल होने लगता है। हताशा उगने लगती है।


उस पल कभी सोचा है कि आज का हो गया। सो सके तो कल जागेंगे तब देखेंगे। इतना भर सोचते ही सब मुश्किलें यथावत होते हुए भी एक कदम पीछे छूट जाती है। कि क्या सचमुच कई बरसों में कुछ बनाने का लक्ष्य पक्का साधा जा सकेगा? नहीं, नहीं कभी नहीं।

फिर क्या है? किस बात की चिंता।

वह जो पार्टनर है, वे जो बच्चे हैं, वह जो काम है। इतना मत सोचो, ये सब अलग हैं। सब का अपना रास्ता है। सब रंगीन पैबल्स अपने ढब से आगे बढ़ेंगे। कौन कब कहाँ होगा कोई नहीं जानता।

फिलहाल एक बार आराम से बैठ जाइए। आप ज़िंदा हैं, मशीन नहीं है। आप यहां कुछ बनाने के लिए नहीं जी रहे, जीने के लिए बना रहे हैं।

रंग भरा धुआँ होने से पहले जीवन जिएं। चीयर्स। शुक्रिया।

October 13, 2019

खुद के पास लौटते ही



छाँव के टुकड़े तले बैठ जाना सुख नहीं था। वह आराम था। काम से विराम।

इसी बैठ जाने में जब तुमने देखा कि तुम बैठे हुए हो। तुम पर छाँव है। धूप पास खड़ी तुमको देख रही है। तुमने एक गहरी सांस ली। ये सब महसूस करते और देखते ही आराम सुख में बदल जाता है।

चिंता बड़ी होती है। उसका लम्बा होना अधिक भारी होता है। अक्सर पांच, दस, पन्द्रह बरस तक आगे की लंबी चिंता। इसका क्या लाभ है। हम अगले क्षण कहाँ होंगे। सब कुछ अनिश्चित लेकिन चिंता स्थायी।


चिंता के लंबे बरसों को पार करते ही चिंता किसी जादुई चीज़ की तरह रूप बदल कर कुछ और साल आगे कूद जाती है। उसे मिटाने के लिये फिर से पीछा शुरू हो जाता है।

दिन भर तगारी उठाते। ठेला दौड़ाते। रिक्शा खींचते। बच्चों को पढ़ाते। वर्दी पहने धूप में खड़े हुए। दफ़्तर में फ़ाइलें दुरुस्त करते। आदेश देते हुए। आराम किया होगा मगर सुख को पाया। शायद नहीं।

सुख तब होता जब काम के आराम में अपने आपको देखा जाता। अपने हाल पर एक नज़र डाली जाती। जैसे एक धावक अपने पसीने को देखता है। जैसे एक चिड़िया अपनी चोंच साफ करती है। धावक दौड़ लिया। अब वह दौड़ से बाहर खुद के पास है। चिड़िया ने भोजन जुटा लिया, अब वह अपने पास लौट आई है।

अपने लिए दौड़कर अपने पास लौट आना।

इस दुनिया में कागज़ी मुद्रा, कीमती धातुएं, भव्य आवास सब हो तो कितना अच्छा हो। फिर भी सुख तभी आएगा जब खुद के पास लौट आओगे। खुद के पास लौटते ही ये सब चीज़ें अपना मोल खो देंगी।

तुम बहुत थके हुए हो केसी आराम किया करो। ऐसा आराम कि जिसमें सुख चीन्ह सको।
* * *

October 12, 2019

माँ है




गिलहरी के दो छोटे बच्चे एक साथ दिखे। अचानक तीसरा दिखाई दिया। मैं उसे देखने लगा। मैंने अब तक तीन बच्चे एक साथ न देखे थे। मैं मुस्कुराया।

उनके खाने लिए दालें, गेंहूँ और बीज रखे रहते हैं। ये गेहूँ और दाल बीनने के बीच बचे हुए या बचाये हुए होते हैं।फलों को खाने पर गुठलियां और बीज ऐसे रख दिये जाते हैं कि गिलहरियां इनको कुतर सके।

गिलहरियां और चिड़ियाँ एक उदास चलचित्र में सजीवता भरती है। उनके उछलने, कूदने, दौड़ने, कुतरने और कलरव से हम कहीं खोये होने से बाहर आते हैं। हम पाते हैं कि जीवन चल रहा।


नन्हे बच्चे जिज्ञासु होते हैं। वे पास चले आते हैं। थोड़ा झिझकते हैं फिर भाग जाते हैं। आलू पपड़ी इनको बहुत प्रिय है। मेरे बच्चे मशीनों से पैक होकर आई हुई खाते हैं। वे गिलहरियों के लिए शायद उतनी मज़ेदार भी न हों। थोड़ी मोटी हाथ से बनी आलू पपड़ी को कुतरने का स्वाद उनकी तन्मयता में पढ़ा जा सकता है।

तीन बच्चों को देखते हुए मैं अचानक चिंतित हुआ। उनकी माँ नहीं दिख रही थी। जबकि सबसे पहले वही दिखा करती थी। मुझे एक और चिंता हुई तो मैं बाहर दरवाज़े की ओर देखने लगा। दरवाज़ा खोलकर माँ खड़ी हुई थी।

माँ को हमेशा होना चाहिए। माँ लोहे के जाल पर छाई वनलता है। वह मधुमालती की मादक वनैली गन्ध है। वह पैरों के नीचे की ज़मीन है, जिस पर हम खड़े हैं। वह दरवाज़े पर नज़र लगाए चौकीदार है। वह एक भरोसा है कि घर पर माँ है तो सब हैं।

दीवार पर दौड़ हुई तो मेरा ध्यान फिर उधर गया। बच्चों की अम्मा आ चुकी थी। उसने एक बच्चे को गिरफ़्तार कर लिया था। वह उसकी गर्दन, पीठ और कान सहित पूरे बदन से कुछ चुन रही थी। उसके दांत किसी काम में लगे थे। बच्चा सरेंडर किए हुए था लेकिन शायद वह भी जल्द इससे मुक्त होकर अपराजिता और अमृता के पत्तों के बीच दौड़ लगाने को आतुर था।

मैंने अख़बार एक ओर रखा। दरवाज़े पर खड़ी माँ की तस्वीर खींची। मैं मोबाइल में देर तक देखता रहा कि माँ खड़ी है। गली सूनी है। लताएं प्रेम से उलझी बढ़ी जा रही हैं। जीवन सुंदर है। माँ है।

October 8, 2019

चाहना



चाहना कोई काम थोड़े ही था कि किया या छोड़ दिया जाता। ये तो वनफूल की तरह खिली कोई बात थी। उसे देखा और देखते रह गए। वह दिखना बंद हुआ तो उसकी याद आने लगी। उस तक लौटने लगे तो खुश हुये। उससे मिल लिए तो सुकून आया।

तुम वनफूल से थे, वो किसी खरगोश की तरह तुम्हारे रास्ते से गुज़रा होगा।

इस में कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं है। सबकुछ एक रोज़, एक लम्हे के लिए होता है। ज़रा ठहर कर सोचोगे तो पाओगे कि उस लम्हे का होना, होने से पहले था और होने के बाद भी वह है। मगर तुम केवल वही होना चाहते हो जिसमें पहली बार में बिंध गए थे।


चाहना का भूत और भविष्य कुछ नहीं होता। इसे को न चाह कर बनाया जा सकता है न मिटाया। जाने दो।
* * *

September 28, 2019

अवसाद एक अजगर है

मैं एक बार गिर गया था। ऐसे गिरा होता कि लोग देख पाते तो शायद वे मुझे उठाने दौड़ पड़ते। मैं सीधा खड़ा हुआ था। मेरी चोट नुमाया न थी। ये गिर पड़ना कुछ ऐसा था कि रेत की मूरत झरकर ज़मीन पर पसर गयी है। एक अक्स लोगों की निगाह में बचा रह गया था। जिसे वे देख रहे थे लेकिन वे जान नहीं रहे थे कि अक्स मिट चुका है।

मैंने हेमन्त से कहा- "क्या करूँ?" बाड़मेर के ताज़ा उजड़े बस स्टैंड की खाली पड़ी शेड के नीचे बनी बैठक पर हम दोनों बैठे हुए थे। वो उम्र में मुझसे काफी छोटा है, अनुभवों और दुनियादारी की समझ में बहुत बड़ा है।


उसने कहा- "आपको लगता है कि ख़त्म हो गया है।" मैंने कहा- "हाँ" उसने अगला सवाल पूछा- "ज़िन्दगी में कितने दुःख उठाना चाहते हैं?" मैंने कहा- "कितने भी मगर ये नहीं"

"अब मुड़कर न देखना। इस ख़त्म को आख़िरी खत्म रखना। एक बार के गिरने का बार-बार गिरना हताश करता है। इसे छोड़ दीजिए"

मैं रेत की तरह ख़ुद के पैरों में पड़ा था। मैं अपना नाम, काम, पहचान और जीवन एक किनारे करके खड़ा हुआ था। जहां मैंने चाहा था कि इसके बाद कुछ नहीं चाहिए। वहीं पर धूल उड़ रही थी।

बरसों बाद आज फिर मैं वहीं बैठा था। हेमन्त से मैंने कहा- "मैं सोशल साइट्स के लिए ठीक आदमी नहीं हूँ। मैं लोगों को उकसाता हूँ। मैं उनकी ठहरी हुई कामनाओं में पलीता लगाता हूँ। ये सब करते हुए मैं स्पोइल हो जाऊंगा"

हेमन्त उस शेड की ओर देख रहा था। जहां कुछ बरस पहले हम दोनों एक तपती दोपहर में बैठे थे। मुझे नहीं पता कि उस तरफ देखना हेमन्त का उसी दिन को याद करना था या बेवजह एक ठहरी हुई निगाह थी।

हेमन्त ने कहा- "छोड़ दीजिए। वे जिनको आप दुःख महसूस करते हैं, उनसे क्यों जुड़े रहते हैं? आपको कितने सारे काम हैं। सुबह से रात हम एक साथ होते हैं तब ये समझ आता कि सब कुछ ओवर बर्डन सा है। आप अपने बोझ उतारिये।"

"क्या ये सब डीएक्टिवेट कर दूं। क्या लॉगआउट करके छोड़ दूं।"

हेमन्त जानता है कि दुनिया वह नहीं रही। अब हम उतने ही बचे हैं जितने सोशल साइट्स पर दिखते हैं। "आपकी किताबें और पाठक? ये भी तो एक काम है। जो काम की तरह नहीं दिखता"

मैंने कहा- "लॉगआउट करके छोड़ देते हैं। अवसाद एक अजगर है। वह आपको तब तक नहीं छोड़ता जब तक कि आपका दम घुट न जाए। इसके बाद वह आपको पूरी तरह निगलता है।"

मेरे चेहरे पर वही धूल उड़ उड़कर गिर रही थी। वह धूल जो कुछ बरस पहले मेरे बिखरने से बनी थी।

September 16, 2019

बातों के ठिकाने



जो साथ नहीं हो पाए, उनके पास बचाकर रखी चिट्ठियां थी, रिकॉर्डेड कॉल्स थे। जो साथ हुए उनके पास अधनंगी तस्वीरें थी, चूमने के स्मृति थी, बदन पर उतरे निशानों के पते थे, आधी नींद में सटे पड़े रहने की याद थी।

जो कुछ भी जिस किसी ने बचा रखा था, वह केवल सुख या दुख न था। वह लालच और प्रतिशोध भी था।

इस दौर के आदमी के पास बस यही बचा है। इसे वह मिटाना नहीं चाहता। इसे वह बार-बार टटोलता है। जिस तरह बिल्ली अपने बच्चों की जगह बदलती है वैसे ही ऐसी यादों और बातों के ठिकाने बदलता रहा है।
* * *


मैं चलता था। चलते हुए एक इच्छा करता था। मैं जिधर से गुज़र रहा होऊँ, उधर से मेरा गुज़रना मिटता जाए। मैं लिखूं और मेरा लिखा मेरी याद से मिटता जाए। मैं चूम रहा होऊं और चूमने के निशान किसी आत्मा पर न पड़ें।

खिड़की से पर्दे हटाये। रजाई से बाहर निकला उसका आधा मुंह देखा। उसकी बन्द आंखें देखी। खिड़की के पास खड़े हुए सोचा कि रात और दिन हम क्या चाहते हैं? क्यों हम चाहना की राख से भरे हुए मंद दहकते रहते हैं। क्या दिमाग में हवस ही भरी है। क्या हम कभी इससे बाहर आ सकते हैं। क्या हम बाहर आना चाहते हैं?

अंगुलियां तपिश महसूस करती है। सिगरेट राख हो चुकी होती है। शायद ज़िन्दगी भी इसी तरह लगभग खत्म है जबकि वह ख़त्म होती दिख नहीं रही।
* * *

तुम्हारे पास क्या है? चिट्ठियां, बातें, तस्वीरें, पते या मेरी तरह केवल चाहना और हवस। हालांकि मेरे पास ये है, इसका भी मुझे सन्देह है।
* * *

September 14, 2019

किसी लालच में

इस तरह ठहर कर किसी तस्वीर को न देखा था। अचानक वही तस्वीर फिर सामने थी। उसे फिर देखा। इस तरह दोबारा देखते हुए चौंक आई कि इसे क्यों देखा जा रहा है।

यूँ उस तस्वीर को देखने की हज़ार वजहें हो सकती हैं। उन हज़ारों वजहों से आप बच निकल सकते हैं। अपने आप से कैसे बचें, ये जुगत कठिन हो जाती है।

उस में क्या है। तुम क्या देखना चाहते हो। देखकर क्या पाओगे। बेहद होने के मुकाम तक पहुंच कर किस ओर मुड़ोगे। ऐसे सवाल बुलबुलों की तरह उठते हैं मगर वेगवती लहरें उनको बुझाती जाती हैं।

तस्वीर वहीं है। आंखों के सामने।

उसके चेहरे पर एक शांति है मगर लगता है कि अफ़सोस है। इस बात का अफ़सोस कि उसने किसी लालच में कोई बात कही थी। उसके मुड़े हुए घुटने पर एक विनम्र स्वीकारोक्ति रखी है कि तुम्हारा होना एक चाहना था। उसके कंधों पर उकेरे फूलों में शालीनता है कि वे एक दूजे पर गिर नहीं रहे। उसकी आंखें, इस बारे में कुछ नहीं कहना कि उन आंखों के बारे में कभी कुछ मत सोचो, जिनमें झूठ बोलते वक़्त भी कनमुनि तरलता थी। हालांकि तब उन आंखों में एक स्याह उदासी थी, जब उसके होठ मुस्कुरा रहे थे।

असल में ये सब एकतरफा सोचना है तस्वीर देखते हुए। उसके ज़ेहन में ये सब नहीं है। ये शायद किसी लम्बी उकताहट के बाद की तस्वीर है। इसमें उसे अपने उन दिनों की तलब है, जो किसी उम्मीद में गवां दिए थे। या शायद ये भी नहीं है। एक सुंदर तस्वीर समझ कर रख दी गयी तस्वीर भर है।
* * *

प्रेम के बारे में कहा गया एक झूठ अक्सर बहुत सी उम्मीदों का बीज होता है। ऐसा बीज जो बार-बार अंकुरित होता है।
* * *

September 10, 2019

हमें बिछड़ना चाहिए

जब उदास बात आई। उस क्षण अचानक बेचैनी न आई थी। केवल इतना महसूस हुआ कि समय की चाल थोड़ी धीमे हो गयी है। जीवन के प्रवाह में बहे जा रहे थे मगर नदी के रास्ते की किसी किनार पर पत्ते की तरह अटक गए।

जब कभी इस तरह अचानक ठहर आती है। हम अपने क़रीब आ जाते हैं। हम उस चेहरे को पढ़ने लगते हैं। बरसों साथ रहने के बाद भी ठीक से पहली बार देखते हैं।

इस देखने में याद आता है कि जब उसे पहली बार देखा और चाहना जगी थी, तब भी उसे इतना गौर से न देखा था। उसके साथ रहे। चेहरे से चेहरा सटा रहा। घंटों बतियाते रहे। बाहों में खोये रहे तब भी इस तरह उसे न देख पाए थे।

एक उदास बात हमें ख़ुद के कितना क़रीब कर देती है।

जब हम साथ होने जैसे न बचे तब मिले। वह मुलाक़ात आख़िरी मुलाक़ात होगी ये दोनों को मालूम न था। केवल मैं जानता था। इसलिए कि प्रेम में असीम हो जाने के साथ-साथ अक्सर बेहद लघु हो जाना पड़ता है। असीमता के भावावेश में अक्सर नाव उलट जाती है।

हम उससे प्रेम करते हैं मगर जीना चाहते हैं। उस समय हम उसके बारे में बेहद बुरा सोच रहे होते हैं। उन कारणों को कभी भुलाना और मिटाना नहीं चाहते, जिनके कारण हमारे पास दुःख आया।

लेकिन टूटन के बीच जब आप जीना चुनते है। किसी के बेहद पास रहने की चाहना वाला मन, एकान्त चुनता है। उस पल ये भी चुनाव हो जाता है कि हम एक रोज़ सब माफ़ कर देंगे। या अपने आप माफ हो जाएगा।

उदासी के लम्हों में मैंने अकसर किताबों से धूल झाड़ी। अपनी अलमारी को देखा। उसमें बहुत सी ऐसी चीजें पाई जिनको इन दिनों भूल गया था। मुझे याद आया कि मैं कुछ और भी था। मैं केवल उतना भर न था। फिर भी हर वो बात जो कभी हमारे साथ थी और बिछड़ गयी चुभती तो है ही।

एक रोज़ कहीं किसी जगह किसी पल अचानक वही चेहरा याद आता है। मैं पाता हूँ कि सबसे अधिक गहराई से मैंने उसे उसी पल देखा था, जिस पल हम बिछड़ रहे थे। वह उदासी मेरे मन में उसका सबसे अधिक ठहरा हुआ चित्र छोड़ गयी है।

कभी न कभी, किसी न किसी से हमें बिछड़ना चाहिए कि फिर कभी हम जिसके साथ हों उसे खुशी में उतनी ही गहराई से देख सकें।

September 4, 2019

नुई बात नव दिन

ऊंट बस का नाम सुना है। कभी देखा है। कभी व्हाट्स एप फॉरवर्ड, जाति के प्रदर्शन, धर्म की अंधभक्ति से बाहर झांका है?

भारत में नया मोटर व्हीकल एक्ट लागू हो गया है। जिस चालान की ख़बर ने इंटरनेट को हथिया लिया है, वह कोई मसखरी सी लगती है।

हम इस एक्ट को कोस रहे हैं। हमको यही आता है, कोसो और भूल जाओ। हम कुछ दिन बाद इसके अभ्यस्त हो जाएंगे। जिसके पास कार है। जो अस्सी रुपये के आस पास कीमत वाला पेट्रोल भरवाता है। वह दो चार हज़ार में जुर्माने का सौदा पटा भी सकता है। कोई बहुत महंगी बात नहीं है।

कुछ बरस पहले ट्रैफिक में कोड चला करते थे। अपनों के लिये और अघोषित जुर्माना भर चुके लोगों के लिए। जैसे आपके पास हैलमेट नहीं था। आपको ट्रैफिक अनुशासन की पालना करवाने वालों ने रोक लिया। आपने अपने भारतीय कॉपीराइट वाले हुनर से जुर्माना भर दिया। अब आपकी यात्रा तो समाप्त न हुई। अगले चौराहे पर रोके जाओगे। तब दोबारा जुर्माना न भरना पड़ेगा। आप पहले जुर्माने के साथ एक कोड पाएंगे। कोकाकोला, फेंटा, पारले जी, ओके, टाटा या बाय बाय। ये कोड अगले सर्कल पर बताते ही आप के जुर्माना भरे जाने की पुष्टि हो जाएगी। आप द्रुत गति से गंतव्य को बढ़ जाएंगे।

कालांतर में ये व्यवस्था किन्ही कारणों से चरमरा गई।

अब क्या व्यवस्था है ये मुझे मालूम नहीं। हज़ारों रुपयों के चालान की ख़बर सुनकर आपके होश फाख्ता हो जाएं तो क्या अचरज की बात है। मेरे भी होश फाख्ता हैं।

भारत में मोटर व्हीकल एक्ट की आड़ में अनगिनत हत्याएं हुई। उनकी सज़ा केवल लापरवाही से वाहन चलाने तक की रही। सड़क दुर्घटना के नाम पर हत्या एक ऐसा विषय रहा जिसपर सरकारें, न्यायालय और समाज बेहद चिंतित रहे हैं। क्या इसके लिए कठोर कानून की आवश्यकता नहीं है? है।

लेकिन कोई भी बात इकहरी नहीं हो सकती। अगर आप आँख फूटने के डर से बच्चे को गिल्ली डंडा नहीं खेलने देना चाहते हैं तो आपकी ज़िम्मेदारी है कि उसे खेल की दूजी सामग्री उपलब्ध कराएं। उसके लिए फुटबॉल लाकर रखें और गिल्ली डंडा खेलते पाए जाने पर कठोर कार्रवाही करें।

कुछ गोबर के पिण्डारे आज इस कानून की खिल्ली उड़ा रहे लोगों को विदेशों के सख्त कानून की दुहाई दे रहे थे। मैंने ऐसे लोगों को ये भाषण करते हुए भी देखा है कि अमेरिका में बकरियां एक साथ झुंड में चिपक कर बैठती है। अमेरिका और यूरोप में लोग सवेरे जाग कर जॉगिंग को जाते हैं। हमारे यहां के लोग आलसी और देशद्रोही हैं। वे ख़ुद को फिट नहीं रखते।

जहां अधिक ठंड है, वहीं चिपक कर बैठा जा सकता है। जहां गर्मी है, वहां सबको दूर दूर बैठना पड़ता है। जहां ठंड आपके बदन को जकड़ लेती है, वहां आपको अपने बदन में हरकत करनी होती है।

भारत में गर्मी ही होती है। इसलिए आदमी के पास काम करने को केवल दो तीन घण्टे सुबह और एक दो घण्टा शाम का समय होता है। मौसम आपको काम करने की अनुमति नहीं देता। आप हैं कि ठंडे प्रदेशों के लोगों की नक़ल करना चाहते हैं।

भाई भारत में हो तो सुबह उठकर ज़रूरी काम करो। दोपहर आराम करो। शाम को बचे काम पूरे करो। यही सम्भव है।

जब बेहद नुकसान होता है तब नए एक्ट लाये जाते हैं। अमरीका में भी छियासठ में नया मोटर कानून लाया गया था। वजह थी कि गाड़ियां बेलगाम बढ़ी और दुर्घटनाओं से मृत्यु आसमान को छूने लगी।

इस पर लाये गए एक्ट में सड़कों के अंधे मोड़, सड़कों का घर्षण, गाड़ियों की स्थिति और सुचारू परिवहन के लिए अलग लेन पर कड़ा काम किया गया। जितनी ज़िम्मेदारी ड्राइवर की रखी उससे अधिक सड़क निर्माण और यातायात सुरक्षा पर रखी गयी।

चालीस साल पुराने एक्ट में संशोधन करने से चार साल में ही उत्साही परिणाम मिल गए थे। मृत्युदर अविश्वसनीय रूप से कम हुई। सड़क हादसे घट गए। मोटर व्हीकल एक्ट ने सफ़र सुरक्षित बना दिया।

ये कैसे सम्भव हुआ? सड़क रखरखाव और भ्रष्टाचार रहित यातायात प्रबंधन से, केवल इससे नहीं कि कानून बन गया है।

कल एक कलाकार सड़क पर बने गड्ढों पर मूनवॉक कर रहा था। आप जानते हैं न कि चाँद पर जाए बिना मूनवॉक का हुनर हर हिंदुस्तानी के पास है। फिर क्यों अचानक आपको हंसी आए। हम सब जन्मजात मूनवॉकर हैं। हमारी ये योग्यता देश की सत्ता की अविराम नाकामी के कारण है।

देश तीन तरह के होते हैं। एक पूंजीवादी, दूजे साम्यवादी तीजे धार्मिक। सबके अपने अपने दुख हैं। पूंजीवादी देश के मोटर व्हीकल कानून के बारे में दो बातें आपको बताई है। एक बात साम्यवादी देश की बता देता हूँ।

क्यूबा में निजी कारें अमेरिका की उतरी हुई कारें हैं। जो कार अमेरिका में कबाड़ हुई वही क्यूबा के धनी के गले का हार हुई। इसलिए कि क्यूबा की सरकार ने निजी ऐश्वर्य के लिए कुछ न किया। उसने जो बनाया वह सार्वजनिक बनाया। क्यूबा में ही कैमल बसें चलती रही हैं। ये गांव और शहरों में समान रूप से चलती हैं।

क्यूबा में दुर्घटनाओं की रोक के लिए सरकारी यातायात संसाधन बढ़ाये गए। भारत में ऊंट द्वारा खींचे जाने वाली बसों की तरह पिचके कूबड़ वाली बसें क्यूबा में हर जगह चलती हैं। हालांकि उनमें ऊंट की जगह डीजल इंजन का उपयोग है।

धार्मिक देशों में मोटर व्हीकल एक्ट का लगभग ये हाल है कि अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान। जो निकल गया सो निकल गया। जो बख़्शा गया सो माफ़।

हम चौथे क़िस्म के देश हैं। नुई बात नव दिन खोंची तोणी तेरह दिन।

सख़्त कानून और अलभ्य सुविधाएं एक त्रासद मसखरी है। इस पर कोई सवाल करना अपराध है। सरकार से पहले गोबर के पिण्डारे कार्रवाही के लिए तैयार हैं।

आपको पता है? कोई साधारण व्यक्ति पार्किंग के लिए जगह खोजता परेशान नहीं होना चाहता है। कोई गरीब आदमी किसी ऋण से वाहन नहीं उठाना चाहता। कोई भी व्यक्ति ऐसा नही चाहता कि आने जाने की सुविधा होने बाद भी निजी ऐश्वर्य के प्रदर्शन में लाखों खर्च करे।

असल बीमारी कुछ और है, दवा कोई और की जा रही है।

कैमल बस को इंटरनेट पर सर्च करेंगे तो आपको लिखा मिलेगा। भारत अद्भुत आविष्कारकों का देश है। सच क्या है ये आप ख़ुद सोचना।

August 21, 2019

तुमने मेरे लिए कुछ किया था

ये लोहे का जाल लगाया तब इसके साथ मालती, जूही, अमृता, रातरानी और अपराजिता की लताएं भी लगाई थी। अपनी गति से लताएं बढ़ती गई हैं।

अमृता ने बेहद तेज़ गति से पूरे जाल को हथिया लिया है। इसलिए जाल का एक कोना खाली करना पड़ा। अमृता को हटाया ताकि मालती चढ़ सके। उसे धूप मिले।

जीवन में कभी कोई सम्मोहन, लालच, चाहना हमको इस तरह ढक लेती है कि बाकी सब बातें मिटने लगती हैं। हम उसी के अधीन हो जाते हैं। जीवन एकरस हो जाता है। एकरसता से ऊब होती है। ऊब से उदासी आती है। उदासी कभी हमको हताश भी कर देती है।

कभी किसी को अपने जीवन पर इस तरह न पसरने देना कि केवल वही रह जाए। वह मन पर एक अंधेरा कर दे।

नए लोगों से मिलना, कलाओं के संसार से संवाद करना, अकेले बैठना, सिनेमा जाना, किताबें पढ़ना, गलतियां करके न पछताना जैसे अनेक काम करते रहने की जगह जीवन में बची रहनी चाहिए।

जिस काम में आंखें मूंद कर डूबे हो, एक रोज़ वह काम ये मानने से इनकार कर देगा कि तुमने मेरे लिए कुछ किया था।

शुक्रिया। ❤️

August 20, 2019

कोई खोया हुआ शख्स

बढ़ई का रणदा था. जब भी दिल पर कोई दाग़ लगा, दिल को छील कर नया कर लिया. एक मोची वाली सुई थी, दिल में छेद करके, दिल को सी लिया. मोहोब्बत के सितम की कड़ी धूप में दिल सूखने लगा तो कच्ची शराब थी, उसमें भिगो कर रख दिया. दिल बरबाद तो हर तरह से हुआ मगर किसी न किसी तरकीब से उसे मरने नहीं दिया.

एक दोस्त ने कहा- "केसी दिल की बातें अक्सर जुबां तक आते-आते टूट जाती हैं. कुछ पोशीदा बातें कहने का जरिया होना ही चाहिए." मैंने कहा- "बातें दिल में पड़ी रहे तभी तक अच्छा. ग़ालिब के सलीके में ये बात कुछ ऐसी है कि मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में."

दरअस्ल मैं क्या हूँ? ये मैं ख़ुद नहीं जानता हूँ.

मेरी प्रोफाइल में छांटकर लगाई चंद तस्वीरें देखकर. मेरी कही कुछ कहानियां पढ़कर. मेरी डायरी में लिखे ज़िन्दगी के कड़वे, खट्टे और नंगे शब्दों से दो-चार होकर किसी ने अपने आप को कहीं खोज लिया होगा. कोई खोया हुआ शख्स याद आया होगा. कच्चे दिनों में लिए बोसे का निशाँ फिर से उभर आया होगा. कोई एक टीस उठी होगी. कभी बदन ने थककर ख़ुद को बिस्तर पर इस तरह पटक दिया होगा कि ऐ ज़िन्दगी अब तुम्हारा बोझ बढ़ गया है.

दोस्तों की आमद मेरी पोस्ट्स पर हमेशा रहती है. वे गहरी मोहोब्बत से दुआ-सलाम करते हैं. उनको देखकर नए-नए जानने वाले मुझे कोई सेलेब्रिटी समझ लेते हैं. एक ऐसा आदमी जिससे हर कोई मोहोब्बत करता है. अक्सर उनको ये भी लगता होगा कि मेरे इनबॉक्स में महफ़िलें सजी रहती हैं. जहाँ हम बेहिसाब बातें किया करते हैं. ये धोखा भी होता होगा.

असल में जब कुछ एक दोस्त हाथ थामकर चलते हैं. पब्लिक प्लेस पर मुझे गले लगाये खड़े रहते हैं. मुझसे कहते हैं, आपकी अंगुलियाँ चूम लूँ. उनको मेरी कहानियों के किरदारों के दुःख बांधते हैं. एक लम्हे की मोहोब्बत की दुआ में जी रहे पात्र अपील करते हैं. इन दोस्तों को धूप में खिले पीले फूलों, सीढियों की बेबसी, रास्तों के इंतज़ार, स्याह रातों की बेचैन उदासियाँ, दोपहरों के कड़े एकांत अपने पास खींचते रहते हैं.

मैं शायद इतना भर ही हूँ.

किसी की इल्तज़ा नहीं हूँ मैं किसी की फरियाद नहीं हूँ. अगर हूँ तो मैं उसे छोड़कर चला जाता हूँ.

हम अक्सर एक व्यक्ति होते हैं लेकिन सोशल साइट्स हमको संस्था बना देती है. शिकवे आने लगते हैं कि मैसेज पढ़ो तो जवाब दिया करो प्लीज़. लेकिन एक रोज़ आप ऐसे मक़ाम पर आ जाते हैं जहाँ से सबको जवाब नहीं दे सकते. जहाँ से आप किसी का हाथ नहीं थाम सकते. जहाँ से आप किसी को चाहकर बाँहों में नहीं भर सकते. उस समय आपका जीना ख़त्म हो चुका होता है. बस उसी जगह हूँ.

20 अगस्त 2017 की डायरी।

तस्वीर मनोज ने भेजी है।

August 17, 2019

हमारे पास क्या कुछ है?



हमारे पास क्या न था। प्रतीक्षा, एकान्त, उदासी और कभी-कभी हताशा भी। लेकिन हमने इतनी सरल अनुभूतियों को देखा ही नहीं। उन क्षणों में स्वयं से बात ही नहीं की। प्रतीक्षा में थे तो कितना सुंदर था कि किसी के आने के ख़याल में सबकुछ भूल गए है। एकान्त था तो कितना अच्छा था कि हम बहुत बरस पीछे लौटकर अपनी याद से गुम हुए लम्हों की तलाश कर सकते थे। उदास थे तो ख़ुद से बतियाते। क्या चाहिए प्यारे। जब तुम किसी की कामना करते हो तो ये तुम्हारा गुण है, उसका कुछ नहीं है। कितने ही हीरे जब हमारी कामना में नहीं होते तो उनका क्या मोल होता है। हताशा इसलिए थी कि हम एक नई शुरुआत कर सकें। सब कुछ नया। लेकिन हम कब उन चीज़ों, सम्बन्धों और साथ की कद्र करते हैं, जो हमारे पास होता है।

सोचना, हमारे पास क्या कुछ है? जो भी है, उसे समझोगे तो बहुत उपयोगी पाओगे।

August 16, 2019

परमिंदर

ये हादसा भी होना था।

एक लड़की थी। उसके नाम को बदले बिना स्कूल के दिनों के कहानी लिख दी थी। कहानी पैंतीस साल पहले घटी। उसको लिखा घटना के चौदह साल बाद। किताब छप गयी।

पैंतीस साल बाद अचानक वह फेसबुक पर दिखी। मैं कहानी कहने की ख़ुशी भूल गया। सोचने लगा कि वह कहानी पढ़ेगी तो उसे कैसा लगेगा? मैंने आभा को कहा- "देखो परमिंदर" आभा ने विस्मय भरी आंखों से उसे देखा।

मुझे कहानी याद है लेकिन बेचैन होने लगा। इसलिए कि वह कहानी मैंने जिस तरह समझी और लिखी, उसे परमिंदर कैसे पढ़ेगी? उसे कैसा लगेगा।

रात का पहला पहर जा चुका था फिर भी मेरी पेशानी की सलवटें मानु ने पढ़ ली। वह गयी और कहानी संग्रह ले आई। उसने कहानी पढ़नी शुरू की। मैं भी चाहता था कि कहानी पढ़ी ही जाए। मेरा अपना डर था कि कोई प्रिय हो या अपरिचित हो, उसके बारे में कुछ भी कहना हो, ज़िम्मेदारी बड़ी होती है।

कहानी पढ़ने के बाद आभा और मानु ने कहा। आपने इसमें परमिंदर के लिए तो अच्छा ही लिखा है। आपने कहानी लिखी ही इसलिए है कि कभी परमिंदर मिल जाए तो उसे कहानी के रास्ते बचपन का क्रश याद दिलाया जा सके।

परमिंदर अपने परिवार के साथ खड़ी थी। आभा कह रही थी। उसकी बेटी भी बहुत प्यारी है। मानु के पास अपनी चुहल थी। कहानी के पात्रों के बारे में पूछती कि ये आप हो? वो कौन है? ऐसा सचमुच था?

मैं लेकिन आकाश में तारे देखता हुआ सोचता रहा कि परमिंदर कहानी पढ़ेगी तो क्या होगा?

परमिंदर के इंतज़ार में ठहरा हुआ समय ग्यारहवीं कक्षा की उदास धूल भरी बैंचों पर बैठा रहा। लेकिन अचानक ये क्या हुआ?
* * *

इस तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी में लालच, चाहना और कामना से भरा मैं कई लोगों से मिला और बिछड़ा लेकिन उनमें से किसी के भी बारे में छोटी सी टिप्पणी भी न लिखी। इसलिए कि मैं जानता हूँ, लिखे हुए को मिटाया न जा सकेगा। कभी जब हम अलग सोचेंगे, पुरानी बातों पर हंसेंगे तब सम्बन्धों के बारे में लिखा हुआ मिटा देना चाहेंगे, लेकिन कैसे मिटायेंगे?

ग्यारहवीं कक्षा के दिनों की कहानी जब लिखी तब समझ कम थी। समझ अब भी नहीं है कि ये सब लिखकर साझा कर रहा हूँ। लेकिन मैं चाहता हूँ कि मेरे दोस्त ये जानें कि कभी कुछ लिखो तो सोचना कि उसे मिटाओगे कैसे?
* * *

June 30, 2019

नदियों का हत्यारा



दो दिन पहले मुम्बई प्यासी मरने वाली थी। दो दिन बाद पानी से भर गयी है। ये चमत्कारों का देश है।

पहला चमत्कार था कि देश में अचानक सूखा पड़ गया था। इस सूखे से होने वाले विनाश के आंकड़े निकाल कर प्रस्तुत कर दिए गए थे। अगले बीस साल में चार फीसद आबादी पानी के अभाव में मरने वाली थी।

मेरा भी गला सूखने लगा। मैंने पाया कि बूढा जर्जर केसी सूख कर निढाल होकर पड़ गया है। उसके शरीर से पानी की आख़िरी बून्द उड़ रही है। फटी आंखें अनंत विस्तार को देखती रह गयी है।

मैंने तुरन्त तय किया कि पानी बचाने निकल पड़ो बाबू। बुढापे में इस तरह प्यास से मरना अच्छा न होगा। जाओ अपने टांके में झांको। अपनी बिसरा दी गई बावड़ियों, तालाबों और पोखरों का फेरा देकर आओ। मैं निकलता तब तक मुम्बई में बारिश आ गिरी। मुम्बई वाले बारिश पर लतीफे बनाने लगे। ये सब सुनकर मन प्रसन्न हो गया और मैंने बाहर निकलना स्थगित कर दिया।

एक दिन पहले सूखे से भरे न्यूज़ चैनल्स के स्टूडियो पानी से भर गए।

कल पानी के लिए युद्ध था, आज पानी से तौबा है। ऐसा कैसे हो सकता है? ये ख़बर संसार है या सिनेमाघर है। सूखा फ़िल्म उतरी और गीला फ़िल्म लग गयी। कल तक आप देख रहे थे कि अगली सदी प्यासी मरने वाली थी। आज देखिये कि पानी से बाहर कैसे आएंगे।

ऐसा इसलिए होता है कि टीवी समाचार और प्रिंट के पत्र, जिनको आप पत्रकारिता समझते हैं। असल में वे प्रायोजित प्रोपेगण्डा के माध्यम और सियारों की हुआ-हुआ-हुआ हैं।

तीन रोज़ पहले मानु ने कहा "पापा, वाटर क्राइसिस इज अलार्मिंग"

शाम थी। मैं ऑफिस से आया ही था। चाय का इंतज़ार था। उसी समय मानु ने ये चेतावनी जारी की। मैंने कहा- "तुमको इसके बारे में पढ़ना चाहिए। समझना चाहिए कि भूगोल, आबादी और विकास का इससे क्या सम्बन्ध है? तुमको अच्छा लगेगा। पानी पढ़ने से सत्ता का चरित्र भी साफ दिखने लगेगा"

मानु ने कहा- "आप बताओ न"

देखो भाई, पानी कोई लोंकी की पूंछ तो है नहीं कि जोगियों की तरह जंगल से पकड़ा और पूंछ काट लाये। क्या पानी किसी पेड़ का फल है। पानी किसी लता का पुष्प है। क्या पानी को उगाया जा सकता है। क्या पानी को खत्म किया जा सकता है?

नहीं।

पानी के चक्र के बारे में हम बचपन में पाठ्य पुस्तकों के माध्यम से जान लेते हैं। हम पानी का मोल समझते हैं। लेकिन ग्रामीण इकत्तीस दिन पानी में बैठे आंदोलन करते हैं और देश को कोई फर्क नहीं पड़ता। पानी में बैठा आदमी लाश की तरह फूलने लगता है। उसकी चमड़ी गलने लगती है लेकिन किसी को फर्क नहीं पड़ता।

इस देश में पानी बचाने के आंदोलन ही इकलौते ऐसे आंदोलन हैं, जिनमें पानी बचाने को लड़ने वाला हर बार हारा है।

आज़ादी से पहले महाराष्ट्र में हुए आंदोलन से लेकर, टिहरी और सरदार सरोवर बांध तक और इसके आस पास के सब आंदोलनों में हताशा और पराजय ही रही है।

भारत में 1919 में नदी जोड़ो परियोजना की बात हुई थी। पानी की तब भी कमी थी। अंग्रेज चाहते थे कि पानी का प्रबंध ठीक कर लिया जाए। इसके बाद 1960 में फिर संसद में पानी का मामला उठा। 1984 में पानी का बोर्ड तक बना दिया गया। तब गंगा की सफाई का लक्ष्य रखा गया पच्चीस साल।

हाल ही में तीन चार साल पहले तो बाक़ायदा गंगा सफाई का प्रण सरकार ने लिया। पैसा पड़ा रह गया और गंगा नाले की तरह बहती रही। इसलिए कि धर्मावलंबियों को केवल कर्मकांड से वास्ता रहता है। उनको स्वच्छ गंगा की कामना नहीं होती।

विज्ञान मानता है कि गंगा का जल विषाणु रोधी है। इसलिए क्या फर्क पड़ता है। कारखानों का दूषित जल आये, सीवरेज के पाइप आएं। पहाड़ नंगे होकर घिसते जाएं। पत्थर मिले, मिट्टी मिले, कीचड़ मिले। गंगा सबको साथ लेकर निर्मल बनी रहेगी। सोए रहो।

नदी जोड़ो परियोजना में साठ नदियों को जोड़ा जाना है। इसमें न्यायालय की भी रुचि है। केंद्र सरकार को बार-बार इसके क्रियान्वयन के आदेश दिये जाते हैं। व्यक्तिगत रूप से मैं इस काम का पक्षधर नहीं हूँ। ये भूगोल को अनुचित चुनौती है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक त्रिपुरा से कच्छ के रन तक भौगोलिक विविधता है।

हम कोई पश्चिम का छोटा सा देश नहीं है कि जिसके प्लेन्स में बह रही किन्ही दो नदियों को जोड़ दिया जाए। नदी जोड़ो परियोजना का बजट ही इतना बड़ा है कि उससे देश भर के प्राकृतिक जल संसाधनों का पुनरुद्धार नहीं बल्कि पुनर्निर्माण किया जा सकता है। हमारे बावड़ी, तालाब, पोखर और इनका भराव क्षेत्र सुरक्षित किए जा सकते हैं।

मैं बांध बनाने का पक्ष भी नहीं लेता। इसकी वजह विस्थापन नहीं है। इसकी वजह है जैव और वानिकी विविधता को बचाए रखना। बांध बनाएँगे तो नदियों का प्राकृतिक बहाव अवरुद्ध हो जाएगा। इससे नदी के आस-पास के क्षेत्र में वन प्रभावित होंगे। भूगर्भीय जल प्रवाह और भरण खत्म होने लगेगा। जमीन के नंगा होने से बारिश कम होती जाएगी। इस तरह बांध बनाकर हम एक नदी की हत्या कर देंगे।

मनुष्य नदियों का हत्यारा है।

अभी कुछ दिन पहले ही हजारों एकड़ जंगल की जमीन एक औद्योगिक घराने ने विकास के नाम पर साफ कर दी। योग दर्शन वाले पतंजलि के नाम पर व्यापार का योग करने वालों को सैंकड़ों एकड़ जंगलात की ज़मीन दे दी गयी है।

एक ओर पानी की चिंता है दूजी ओर जंगलों का बेरहमी से सफाया किया जा रहा है। एक तरफ न्यायालय नदियां जोड़ने को तो जागरूक है, लेकिन नदियों के सहोदर जंगलों पर चुप है।

बात बहुत लंबी है इसलिए यहीं पर सम्पन्न कर लेते है कि देश में अगर किसी को पानी कि चिंता है तो उसे आंदोलनरत उन ग्रामीणों का सदा साथ देना चाहिए, जिनको ज़मीन से बेदखल किया जा रहा है। जिनके हिस्से से पानी छीना जा रहा है।

सत्ता, मीडिया और विकास मिलकर जाने किस कारण ये भूल जाते हैं कि सन्न दो हज़ार चालीस में चार प्रतिशत लोग पानी के कारण नहीं मरेंगे। अभी, हाल, इस वक़्त ही तेईस प्रतिशत मौतें जल जनित बीमारियों से हो रही हैं।

पानी का संकट है। हमने ही बनाया है। हमको ही जागरूक होने की आवश्यकता है।
* * *

June 15, 2019

ठहरे उदास चितराम

आकाश में कुछ बादल आ गये थे। बरसात की आस न हुई। गर्म दिनों का लंबा सफ़र अभी और चलना था। बादलों के आने से उमस और बढ़ गई थी। अच्छा फिर भी लग रहा था। गर्मी में उमस के बढ़ जाने से तकलीफ़ बढ़ती ही है मगर जाने क्यों सब अच्छा लगने लगा।

कि बादल आ गए थे।

अचानक किसी ऐसे व्यक्ति की याद, जो आप तक कभी आएगा नहीं। जो आपके लिए कुछ न करेगा। लेकिन मन के ठहरे उदास चितराम में कोई हलचल होने लगती है। वह जो नहीं है, उसका न होना तय होने पर भी कुछ बदलने लगता है।

कुछ लोग जो जीवन से ही नहीं वरन दुनिया से भी जा चुके होते हैं, उनका अचानक ख़याल आता है। मन बदलने लगता। हमारी परिस्थिति में क्षणभर में कोई बदलाव नहीं आता लेकिन हम महसूस करते हैं कि अब कुछ अलग लग रहा है।

वे जिनके होते हुए कुछ होने की आस नहीं है, वे जो नहीं है या वे जो कभी न होंगे। वे कैसे हमारा मन बदल देते हैं। क्या ये बादल बरसेंगे? शायद नहीं, शायद कल या शायद अगले कुछ दिन बाद। फिर मन तो बदल गया। क्या हुआ?

हमारे भीतर कुछ ऐसा है। जिसके अनगिनत खिड़कियां हैं। वे खिड़कियां बन्द रहती हैं। लेकिन कभी खुल जाती है। उनके खुलते ही जीवन, शरीर में बहने लगता है। हम एक थकान में ऊर्जा का संचार पाते हैं।

हम खड़े हो जाते हैं। हम बाहर आते हैं। बालकनी में नहीं वरन उदासी और शिथिलता से बाहर आते हैं। तो वो जो हुआ नहीं, जिसके होने की आस कम है, वह भी हमको बदल देता है।

अपने काँधे पर हाथ रखे हुए एक भले आदमी की याद। एक प्रेमिल बिछोह की उदास स्मृति, एक टूटा हुआ सम्बन्ध, एक गुज़रा हुआ पल कितना बड़ा होता है।

जाने कितना।

ज़िन्दगी वही रहती है लेकिन कभी-कभी मैं महक उठता हूँ। मैं मुस्कुराने लगता हूँ। मुझे लगता है कि कहूँ शुक्रिया। मैं दीवार पर हाथ रखता हूँ। वह सुनती है मेरे हाथ मे बहती धड़कनों को। कभी-कभी दीवार कहती है- 'सुनो तुम धड़क रहे हो।" तब मुझे अपनी हथेली में धक धक सुनाई देने लगती है।

तुम मुझसे दूर कैसे जा पाओगे? सोचना।

June 9, 2019

मैसेंजर बैग



छोटा भाई पुलिस में एडीसीपी है। जयपुर पुलिस हैडक्वाटर में उसे जो कक्ष आवंटित है, उसके बाहर उसने नेम प्लेट नहीं लगवा रखी।

भाई के पास एक मैसेंजर बैग है। लेदर का है। कीमती ही होगा। उस बैग को कई बार परिचितों ने लेडीज़ बैग बता दिया है।

एक बार कुछ परिचित मिलने कक्ष में पहुंचे। उन्होंने देखा कि रूम में टेबल पर लेडीज़ बैग रखा है। वे दरवाज़े से झांक कर ही चले गए।


उन्होंने फ़ोन किया साहब कहाँ हो? मनोज ने जवाब दिया। "अपने कक्ष में हूँ। पधारो।" उन्होंने कहा- "साब नेमप्लेट तो आपकी लगी नहीं और जो कमरा नम्बर बताया उसमें तो टेबल पर किसी महिला अधिकारी का पर्स रखा है।"

भाई के उस मैसेंजर बैग में एक आईपैड, एक फ़ोन, कुछ दवाएं, कुछ सुगंधित द्रव की शीशियां और शायद ओबामा की तरह एक हनुमान जी की मूर्ति भी रखी रहती है। इसके अलावा कुछ और भी चीजें होंगी।

भाई ने मेरा बैग देखकर पूछा- "आपको मेरे वाला बैग लेडीज़ बैग दिखता है?" मैंने कहा- "दिखता तो मैसेंजर बैग ही है लेकिन इतना सारा सामान और सामान की प्रकृति के हिसाब से लेडीज़ होने की वाइब्रेशन दे सकता है।"

मनोज ने पूछा- "आपके बैग में क्या है?" मैंने कहा- "देखो"

उसमें से दो स्पायरल ड्राइंग बुक, एक बाइन्ड ड्राइंग डायरी, पेस्टल और पेंसिल रंगों के टुकड़े, पेंसिलें, फ़ोन, कैमरा आदि चीज़ें थीं।

मैंने कहा- "भाई अब एक शनिदेव की मूर्ति रखनी है।"

जय शनि देव सब ट्रोल्स की ख़बर लो।

* * *

May 12, 2019

किसी बात का तो है

जब गर्मी बढ़ती है तो हवा गर्म होकर ऊपर उठ जाती है। हवा के ऊपर उठने से खाली हुई जगह को भरने के लिए हवा आने लगती है। जितनी तेज़ गर्मी उतनी ही तेज़ हवा। फिर आंधी आने लगती है। गर्मी तब भी नहीं रुकती तो रेगिस्तान की बारीक धूल आसमान पर छा जाती है। सूरज के ताप और धरती के बीच धूल की चादर तन जाती है। ऊर्जा के अजस्र स्रोत के तेज़ को पैरों तले की धूल भी बेअसर कर देती है।

धूल सांस में घुलने लगती हैं। आंखों में भरने लगती है। दिखाई नहीं देता, सांस नहीं आती। हर शै पर गुबार धूल की चादर तान देता है। लगता है धूल का साम्राज्य स्थापित हो गया है। फिर पानी की चंद बूंदें धूल को बहाकर वापस धरती पर पैरों तले डाल देती है। पैरों की धूल हवा पर सवार होकर ख़ुद को आकाशवासी समझने लगती है लेकिन ये पल भर का तमाशा ठहरता है।


पानी के बरसते ही दबी कुचली घास हर जगह से सर उठाने लगती है। वनलताएँ सारी दुनिया को ढक लेना चाहती हैं। रास्ते मिट जाते हैं। जंगल पसर जाता है। कांटे ख़ुद को जंगल का पहरेदार समझ हर एक से उलझते और चुभते हैं। सहसा हवा की दो एक झांय से कोई चिंगारी निकलती है और जंगल अपने पसार के गर्व को धू धू कर जलता देखता है। हरियाली का दर्प राख हो जाता है।

तुमको भी थोड़ा सा गर्व तो है ही किसी बात का?

May 8, 2019

अकेले कब तक बैठे रहोगे

रेत ने हवा से कहा
आओ कुछ रोज़ के लिए
किसी के घर चलें।

यूं बियाबां मैं बैठे-बैठे ऊब होने लगी।
* * *


नीमपागल आदमी का ख़्वाब
उसकी गर्दन पर फिसलता बार-बार।

भरी भरी पीठ पर पड़े
कॉटन के कुर्ते पर सजे फूलों से कहता।

तुम भी अकेले कब तक बैठे रहोगे?
* * *

इच्छा ज़हर है
पूरी होते ही, आप मर जाती है।
* * *

इसके आगे भी बहुत कुछ लिखा। उसे यहाँ नहीं लिख रहा हूँ। अब मुझे अजीब लगता है, असल चाहना का लिखना।

May 7, 2019

सोशल साइट्स एक फन्दा है

कुछ मित्र कहते हैं वे अनुशासित तरीके से इनका उपयोग करते हैं। मैं अक्सर पाता हूँ कि कहीं भी कितना भी अनुशासित रह लें कुछ अलग नहीं होता।

सोशल साइट्स पैरासाइट है। वे हमारे दिल और दिमाग को खोजती रहती है। एक बार हमारे दिल-दिमाग में घुस जाए तो ज़हर फैलाने लगती है। इसके दुष्परिणाम हमको कम ही समझ आते हैं।

अनिद्रा, थकान, बदनदर्द, चिड़चिड़ापन, अकेलापन जैसी समस्याएं हमको घेर लेती है।


मित्रों से मिल नहीं पाना। उनसे फ़ोन पर बात नहीं कर पाना। अपने कार्यस्थल पर सहकर्मियों के सुख-दुःख सुनने कहने का समय नहीं मिलना। देर से सोना और नींद पूरी होने से पहले जाग जाना। बिस्तर में पड़े रहना कि अभी तो सुबह भी न हुई मगर ध्यान सोशल साइट्स पर ही होना। आख़िर किसी बहाने से फ़ोन उठा लेना। सोशल साइट्स को देखना और अल सुबह हताश हो जाना कि वहां कोई ख़ुशी की ख़बर नहीं है।

ये भयानक है। लेकिन इसे लगातार बरदाश्त किया जा रहा है।

सोचिये हमारे पास कितना ज्ञान है।

कुछ साथ नहीं चलता 
तो सोशल साइट्स पर क्या इकट्ठा कर रहे हैं।

अपनी ख़ुशी के लिए दूसरे पर निर्भर न रहो 
तो सोशल साइट्स में क्या खोज रहे हो।

गुज़रा हुआ वक़्त वापस नहीं आता 
तो इस वक़्त को कहां गुज़ार रहे हो।

सबको प्रेम से रहना चाहिए
तो सोशल साइट्स पर ज़हर आगे बढ़ाने में ख़ुशी क्यों मिल रही।

ऐसी हज़ार बातें हैं।

मैंने कुछ महीने पेज पर ध्यान नहीं दिया। एप को फ़ोन से हटा दिया। अचानक प्रोफ़ाइल से उपजी ऊब ने मुझे पेज पर धकेल दिया। मैं एक बीमारी से दूजी बीमारी के गले पड़ गया।

सोशल साइट्स का फीडबैक ही उनका विज्ञापन और जाल है। महीने भर में पांच पोस्ट लिखी तो पेज की रीच हज़ारों में हो गयी। लाइक करने वाले कई सौ बढ़ गए। फेसबुक ने तुरंत मैसेज किया कि आपका पेज एक पोटेंशियल पेज है इसके लिए वेरिफिकेशन कीजिये और सिक्योर बनाइये।

मैं सचमुच नाख़ुश हूँ। इसकी वजह है सोशल साइट्स। मैं इनको छोड़ क्यों नहीं देता? क्योंकि हम सबको अपने सुख बरदाश्त नहीं होते।

मौला अक्ल दो। 😎

May 6, 2019

प्यार में कभी-कभी

ये डव है। वही चिड़िया जो बर्फीले देशों में सफ़ेद रंग की होती है। पहाड़ी और जंगल वाले इलाकों में हरे नीले रंग की होती है। मैदानी भागों में धूसर और लाल मिट्टी के रंग की मिलती है।

ये वैश्विक शांति का प्रतीक है। ईसाई लोग इसे आत्मा और परमात्मा के मिलन की शांति का प्रतीक भी मानते हैं। मुंह में जैतून की टहनी लिए उड़ती हुई डव को विश्व भर में शांति कपोत के रूप में स्वीकारा गया है।


रेगिस्तान में इसे कमेड़ी कहा जाता है। उर्दू फारसी वाले इसे फ़ाख्ता कहते हैं।

इसके बोलने से रेगिस्तान के लोग चिढ़ रखते हैं। असल में इसके बोलने से ऐसा लगता है कि जैसे कह रही हो। "हूँ कूं कूं" हिन्दी में इसे आप समझिए कि ये कह रही होती हैं "मैं कहूँ क्या?" जैसे कोई राज़ फ़ाश करने वाली है। जैसे कोई कड़वी बात कहने वाली है।

लोग इसे घर की मुंडेर से उड़ा देते हैं। इसके बोलने को अपशकुन माना जाता है।

रेगिस्तान की स्थानीय बोली में इसे होली या होलकी कहते हैं। यहाँ दो तरह की कमेड़ी दिखती है। एक भूरे-लाल रंग की दूजी धूसर-बालुई रंग की। मैंने यहाँ कभी सफ़ेद कमेड़ी नहीं देखी।

कल दोपहर लंच के लिए घर जाने को निकला तो ऑफिस में कार पर ये फ़ाख्ता दिखी। इसके पंखों का रंग अनूठा था। ऐसा पहले मैंने कबूतरों में देखा था। कुछ सफ़ेद आयातित पालतू कबूतर और देशी कबूतर जोड़ा बना लेते थे तो चितकबरे कबूतर देखने को मिलते थे। लेकिन चितकबरे कबूतर बहुत जल्द गायब हो जाते थे। उनकी आने वाली पीढ़ियों का क्या होता था? मालूम नहीं।

इस फ़ाख्ता में डर भी कम था। मैंने कुछ तस्वीरें ली तब तक कार पर बैठी रही।
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May 4, 2019

इसके आगे क्या कह सकता था

हरियल तोते लौट आये। उनकी टीव टीव की पुकार हर वृक्ष पर थी। जाळ पर लगे कच्चे पीलू तोड़ती उनकी लाल चोंच दिखाई दी। वे टीव टीव की पुकार लगाकर जाळ की शाखाओं से लटके हुए कुछ कुतरने लगे। मैं हरी पत्तियों से लदे वृक्ष में कभी-कभी दिखती लाल चोंच में खो गया।

सुघड़ चोंच तीखी थी। किसी कटर के लॉक जैसी। मेरे निचले होंठ को अपने चोंच में दबाये हुए सहन हो सकने जितना ज़ोर लगाया। चोंच खुल गयी वह मेरे गाल को छू रही थी। मैं किसी रूमानी तड़प में उसे बाहों में भींच लेता मगर मैंने अपनी जीभ होंठ के भीतर घुमाई।

क्या कोई यहां था?

कोई न था। तोते पेड़ पर फुदक रहे थे। शाम हो चुकी थी। दफ़्तर से दिन की पाली वाले लोग जा चुके थे। मैंने लोहे की बैंच पर बैठे हुए चारों ओर देखा। तन्हाई थी। उस तन्हाई को देखकर यकीन आया कि जब मुझे काट लेने का ख़याल था। उस समय मेरे चेहरे पर अगर कोई चौंक आई तो उसे किसी ने नहीं देखा।

शायद मैं चौंका भी नहीं था।

एक समय बाद रूमान पर वे बातें हावी हो जाती हैं, जिनसे सम्बन्ध खत्म हुए थे। वनलता जिस तरह पेड़ों को ढ़ककर उनसे रोशनी छीन लेती है। उसी तरह कुछ उदास बातें स्याह चादर बनकर रूमान का गला दबा देती है।

मैं ये सब क्यों सोच रहा था।

हमारे पास झील का किनारा न था। न अथाह पानी था। न हम एक साथ थे। मगर ऐसी किसी जगह पर मेरी तस्वीर देखकर उसने कहा- "तुमको धक्का देने का मन हो आया।" मैंने उससे कहा- "फिर तो ज़रूर तुम्हारा मन होता होगा कि बंधे हुए घोड़े खोल दूँ।" उसने हंसते हुए कहा- "एग्जेक्टली दिस"

मैं चुप रहा। मैं इसके आगे क्या कह सकता था। मेरी चुप्पी ही मुझे बचा सकती थी। उसने प्रश्न किया- "व्हाट हैप्पन्नड हैंडसम" इस वाक्य में हैंडसम एक ख़तरनाक शब्द था। मैं इससे बच नहीं सकता था। मैं उसके आगे सर झुकाए बैठ गया। जैसे कोई समर्पण कर दे।

इसके बाद कई बार मैं झील की पाल से फिसला। मुझे तैरना नहीं आता था। मैं अपने आपको फिसलन और पानी के रहम पर छोड़ देता। इसलिए कि जब आप तैरना नहीं जानते मगर अथाह पानी को देखने, उसके पास बैठने और छूने की चाहना रखते हैं तब आपको उसकी बाहों में मर जाने का साहस भी रखना चाहिए।

मैं ख़यालों में जब भी पानी मे फिसला, मैंने मुड़कर देखना चाहा कि क्या पीछे वो है? लेकिन उसका होना कभी न दिखा। उसके न दिखने से भय हुआ और चौंककर ख़याल से बाहर आया।

पानी से इतर किसी का होठों को काट लेने वाला ख़याल शायद दूजी बार आया था। मेरे होंठ सुर्ख हो गए होंगे। मैंने अपनी हथेली से उनको पौंछा। वे सूखे थे। उन पर लू की लकीरें खींची थी।

मैं उस लोहे की बैंच से उठा और दूर तक आया। अब मैं देख सकता था कि उस बैंच पर मैं बैठा था। जब उस बैंच को देख रहा था तभी दो तोते सर के पास से उड़े। अब बैंच पर मैं नहीं था। शायद वो जो कोई आस पास था, मुझे कहीं ले गया।

मैं जानता हूँ कि वह कभी साथ न होगा। जंगली इच्छाएं अक्सर बेलगाम होती है। उनका कोई स्थायी मन नहीं होता। 
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तस्वीर : आकाशवाणी परिसर।
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दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.