December 30, 2019

वह एक अफ़ीम ही था।

उसके इशारे में जाने क्या सम्मोहन था कि मैंने अपनी गाड़ी रोक दी।

उसके थैले में पोस्त का चूरा भरा है। उसने अपनी बंडी में अफ़ीम छुपा रखी है। वह कुछ चुराकर भाग रहा है। उसकी रेलगाड़ी छूट रही है। उसको बस अड्डे तक जाना है। कोई प्रिय अस्पताल में उसका इंतज़ार कर रहा है। वह ख़ुद अस्वस्थ है।

उसके हाथ से इशारा करने के पीछे अनेक वजहों में से कोई भी वजह हो सकती थी। उस वजह का मैं भागीदार हो चुका था। वह नशीले पदार्थ लिए होता तो मैं अपने को निर्दोष साबित करने के लिए भटकता रहता। उसे किसी ज़रूरी काम में कहीं पहुंचना होता तो वह अपनी ज़रूरत में मुझे कैसे याद रख पाता। उसको क्या याद रहता कि शुक्रिया कहना चाहिये।


वह मेरे पास की सीट पर बैठा था।

उसने अपनी एक उलझन कही। पूछा कि इसका क्या हो सकता है। मैंने उसको रास्ता बताया। ऐसा करने से तुम्हारी मुश्किल आसान हो जाएगी। मैंने एक फ़ोन लगाया। उसके बारे में बात की। मेरे कहने से उसे आसानी हो गयी।

इतना होते ही उसने एक नई समस्या मेरे सामने रख दी। मैंने कहा घबराओ मत। इस पर अधिक न सोचो। वह मेरी ओर इस तरह देखने लगा कि जैसे मैं कुछ करूँ। मैंने उसे कागज़ के छोटे से टुकड़े पर एक सिफ़ारिश लिख दी।

वह आदमी चला गया।

कल अचानक दिखा। आगे होकर उसने दुआ सलाम की। मैं किसी उदासी या उधेड़बुन में था। मैंने चाहा कि वह ज़रा देर मेरे पास ठहर जाए। मैं जानता था कि वह मेरी कुछ मदद नहीं कर सकता। लेकिन किसी लगभग अपरिचित का भी ऐसे में दो पल रुक जाना अच्छा होता। शायद मैं समझता कि कोई तो है।

वह जाने लगा तो मैंने उसे कहा। ऐसे न जाओ। बैठो।

इसके बाद क्या हुआ नहीं मालूम मगर मुड़कर देखे बिना चले जाने वाले को जाते हुए देखकर सुकून आने लगा। हमें अधिकतर ऐसे लोग ही मिले थे। वे एक प्रयोजन लेकर आए थे। आवश्यकता पूरी हुई तो चल दिए।

वह एक अफ़ीम ही था। जिसके सम्मोहन में मैंने गाड़ी रोक दी थी। मैं हर बार ख़ुद को कहता हूँ कि ऐसा करने के ख़तरे हैं। हर बार मेरा मन भूल जाता है कि करना क्या है।

December 29, 2019

पानी के रंगों वाला पेड़





पानी के रंग बरतने वाले कलाकारों के चित्रों में कुछ एक जैसा होता ही है। उनकी डायरी में ये पेड़ भी अक्सर मिल जाता है।

यूं तो दुनिया भर में गिरती हुई स्वर्णिम पत्तियों से ही पतझड़ सुंदर दिखता है किन्तु पेड़ पर एक साथ लगी सुनहरी, पीली और हरी पत्तियां इसे मोहक बनाती हैं। ये मुझे अपनी ओर खींचता रहता है।

पेड़ के साथ तस्वीर में आभा है।

December 16, 2019

तुम भय के बारे में क्या जानते हो?

माले कैम्प में एक रेस्तरां के आगे गुज़रते हुए ज्यूमा ने देखा लोग खा-पी रहे थे। रेस्तरां के भीतर सिगरेट का धुआँ था। वह एक खिड़की में रखे केक देखने लगा तभी उसके कंधे को किसी ने थपथपाया।

ज्यूमा ने मुड़कर देखा पुलिसवाला था। पुलिस वाले को देखते ही अपनी जेब से पास निकाला और आगे बढ़ा दिया। पुलिस वाले ने कहा "तुम यहाँ क्या कर रहे हो। घर जाओ अंगीठी के पास बैठो और बीयर का मज़ा लो"


इस बात से ज्यूमा को समझ आता है कि पुलिसवाला उस पर तंज कस रहा है। वह पूछता है "क्या आप मुझे जेल भेजने वाले हैं"

ज्यूमा वहां से चलकर ऐलोफ़ स्ट्रीट होता हुआ शहर के चौक तक पहुंचता है। उसका ध्यान गली में एक छत की ओर जाता है। वहाँ छत पर कोई भाग रहा है। भागता हुआ आदमी अचानक छत से फिसल कर लटक जाता है। उस आदमी के पीछे पुलिस वाले हैं।

आदमी का एक हाथ छूट जाता है। दर्शकों को पुलिस वाले धमका कर दूर कर देते हैं। तभी वह आदमी नीचे सड़क पर गिर जाता है। सब उसकी ओर दौड़ते हैं।

भीड़ को हटाते हुए पुलिस वाले आते हैं। लोग हटते हैं लेकिन एक आदमी उसके पास बैठा रहता है। पुलिस वाले पूछते हैं "तुम क्यों नहीं हट रहे"

वह कहता है "मैं डॉक्टर हूँ। इस आदमी का शायद हाथ टूट गया है" ये सुनते ही एक पुलिसवाला डॉक्टर को ज़ोर से थप्पड़ मारता है।

पास खड़े ज्यूमा की मुट्ठियाँ कस जाती है लेकिन भीड़ पुलिस के कहने पर बिखर जाती है। डॉक्टर पुलिस से अनुमति लेकर उस घायल को अपने घर ले आता है।

वह उसकी बाँह का ऑपरेशन करता है।

घायल जागते ही डर जाता है। वह कहता है ये गोरों का घर है। डॉक्टर कहता है "यहां सुविधाएं कुछ अधिक है किंतु ये गोरे का घर नहीं है।"

पुलिसवालों से घबराया हुआ आदमी जिसका एक हाथ टूटा हुआ था। खिड़की से कूद कर भाग जाता है। नर्स के ये बताने पर डॉ चिंतित होता है। वह क्षोभ में ज्यूमा से कहता है "अब तुम जा सकते हो। किसी गवाह की ज़रूरत न रही"
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ये पीटर अब्राहम की कही कहानी है। माले कैम्प की एक घटना। दक्षिण अफ्रीका की आज़ादी से कोई दस एक साल पहले लिखी गयी थी।

अफ्रीका के ही लोग है। अपने ही देश में घर से बाहर निकलने का पास लिए घूमते हैं। पुलिस जिसे चाहे उसे उठाकर बंद कर देती है। माले कैम्प के वे सब लोग, जिस ज़मीन पर जन्मे थे, वहीं डरे हुए जी रहे थे।

पुलिस के अदने सिपाही मददगार डॉक्टर को सरे राह तमाचा जड़ रहे थे। लोग चुप्पी ओढ़कर अपने घरों को चले जाते थे।

एक ज्यूमा था जो इसे बर्दाश्त नहीं कर पाता था। लेकिन वह भी लोगों व्यवहार के कारण हताश हो रहा था।
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ये कहानी मैंने जोधपुर विश्विद्यालय में पढ़ने के दौरान पढ़ी थी। माने तब तक दक्षिण अफ़्रीका आज़ाद भी न हुआ था।
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भय के बारे में तुम क्या जानते हो? क्या मुझे इस पोस्ट के साथ कोई तस्वीर लगानी चाहिए?
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December 4, 2019

एक लिफाफे में रेत



प्रेम की हड़बड़ी में वो स्नो शूज पहने हुये रेगिस्तान चली आई थी।

वापसी में रेत उसके पीछे झरती रही। कार के पायदान पर, हवाई अड्डे के प्रतीक्षालय में, हवाई जहाज और बर्फ के देश की सड़कों तक ज़रा-ज़रा सी बिखर गयी। थोड़ी सी रेत उसके मन में बची थी।

उसके मन में जो रेत बसी हुई थी वह बिखर न सकी। शिकवे बनकर बार बार उठती थी। उसके सामने अंधेरा छा जाता था। सांस लेने में तकलीफ होने लगती थी। बेचैनी में कहीं भाग जाना चाहती थी लेकिन रास्ता न सूझता था। बारीक रेत का स्याह पर्दा उसे डराता रहता था।


उस रेत को उसने एक लिफाफे में रखकर मुझे भेज दिया। मैंने उसे केवल एक ही बार पढ़ा था। उसे पढ़ा नहीं जा सकता था। उसमें मेरे लिए कोसने थे। बेचैनी थी। मैं लिफाफे को कहीं रखकर भूल जाना चाहता था। और मैंने बड़ी भूल की। उस लिफाफे को मन के अंदर रख लिया।

"तुमसे मिलते ही मैं बर्बाद हो गयी। मैं अपने बच्चों से, पति से, घरवालों से, पेंटिंग से, सोचने से, समझने से और हर उस बात से बेगानी हो गयी, जो मेरी दुनिया थी। जहां चाहे हरदम खुशियों के फूल न झरते थे मगर शांति थी। तुम्हारे पास से लौटकर छोटी बेटी को गोद में उठाया तो अचानक सिहर उठी। कि ये तुम्हारी बेटी नहीं है। इस ख़याल के बाद मैं नीम पागल अपना सर दीवार से फोड़ लेना चाहती थी। लेकिन मैं रेत की तरह सोफ़े पर बिखर गयी।"

कल सर्द मौसम की रात थी। लेकिन काली पीली आँधी से कमरा भर गया। सांस उखड़ने लगी। अंगुलियाँ अंधेरे में चमकीली पन्नियों में रखी दवा खोजने लगीं। दराज़ के कोने में बर्फ के फाहे रखे थे।

वे फाहे जो उसके स्नो शूज पर चिपके हुये रेगिस्तान चले आए थे।
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पेंटिंग थॉमस शोलर की है। आभार।

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.