April 27, 2019

जातिवाद - कर्क रोगों में सर्वाधिक गंभीर रोग

गिद्धों के स्वप्न में भूख से मरते प्राणी होते हैं। निम्नस्तर की राजनीति में विचारहीन धड़ों में बंटे हुए लोग होते हैं।।

महान चिंतक चाणक्य ने कहा है "जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।"

किसी भी धर्म और जाति में सब सज्जन हों, ये कामना करना असम्भव सा है। हर स्थान पर ओछे-टुच्चे, नीच-कमीने, लालची-धोखेबाज़ और इसी तरह कमतरी के दोषों से भरे लोग होते हैं।

बाड़मेर में कुछ दिनों से निरन्तर अफवाहें बढ़ती जा रही हैं। जाट और राजपूत नाम से धमकियां ली और दी जा रही है। दिन प्रतिदिन घटित होने वाली घटनाओं को असहज जातिगत रूप देकर प्रस्तुत किया जा रहा है।

बाड़मेर शहर में कुछ एक घटनाओं को लेकर आम चर्चा है। उन घटनाओं का उल्लेख करना असल में उनको हवा देना होगा इसलिए मैं उनका उल्लेख नहीं कर रहा हूँ। लेकिन कुछ रोज़ पहले एक ज़मीन के टुकड़े को लेकर हुए विवाद में एक ही जाति के दो पक्ष लहूलुहान हो गए थे। सोचिये अगर ये सब दो अलग जाति के पक्षों में हुआ होता तो मौकापरस्त इसे कितना भयानक रूप दे देते।

फेसबुक की कुछ पोस्ट्स से आपको मालूम होगा कि राजपूत चुनाव के बाद जीतते ही जाटों को मार-मार कर औकात याद दिला देंगे। इसी तरह जाट भी राजपूतों को मार-मार कर उनकी हेकड़ी निकाल देंगे। ऐसे कमेंट्स फेसबुक पोस्ट्स पर आ रहे हैं और उनको शेयर किया जा रहा है। ये कमेंट्स जातीय विद्वेष को बढ़ाने के सिवा कुछ उपयोगी नहीं है। इन कमेंट्स पर प्रशासन कार्रवाही कर सके, इतने संसाधन और तकनीक अभी सहज उपलब्ध नहीं है।

प्रशासन के पास शांतिपूर्वक चुनाव कराने का महत्वपूर्ण दायित्व है। अभी ऐसी एक-एक टिप्पणी पर कार्यवाही असंभव है। जब कोई गंभीर मसला होगा तब ही कुछ किया जा सकेगा।

आप पढ़े लिखे हैं। आप तकनीक को थोड़ा बहुत जानते हैं। आप ये क्यों नहीं सोचते कि कोई भी व्यक्ति किसी भी जाति के नाम से फेसबुक खाता बना सकता है। ये भी एक बार क्यों नहीं सोचते कि ये आईडी किसी जाट या राजपूत की होने की जगह किसी अन्य ने दो जातियों के बीच वैमनस्य बढ़ाने के लिए बनाई हो सकती है।

अच्छा कोई तो जीतेगा ही। क्या उसके जीतते ही जीतने वाले की जाति के लोग दूजी जाति पर बर्बर आक्रमण करने में लग जाएंगे?

कानून अभी बचा हुआ है। पुलिस में ईमानदार लोग भी हैं, नेताओं में भी लज्जा शेष है। वे समाज को तोड़ने वाली घटना पर समाजकंटकों का साथ नहीं देंगे। उस समय अपराधी रीढ़विहीन हो जाएगा। उसे अपने कर्मफल को भोगना होगा।

पिछले और कई पिछले चुनावों में जातिगत झगड़े हुए। कभी जान भी गयी। आप याद करिये कि जिन नेताओं के लिए लोग लड़े क्या उन्होंने कभी बचाव के कुछ काम किये। अगर किसी ने पक्षधरता की तो क्या वे न्यायपालिका से अपराधियों को बचा पाए?

आप लड़िये। नेता चुनाव के चार साल बाद आपके लिए सामाजिक पंचायत कर लेंगे। एक जुलूस निकालेंगे। समाज की प्रतिष्ठा और न्याय के लिए हुंकार भरेंगे। लेकिन इन चार सालों में आप कितना भोगेंगे? उसका हिस्सेदार आपके परिवार के सिवा कौन बनेगा? सोच लीजिये।

जाति के नाम पर लड़ाने की कोशिशों से सावधान रहिये। जातीय विद्वेष फैलाने वाले को आप व्यक्तिगत रूप से जानते हैं तो उसकी शिकायत कीजिये।

सड़ी गली पुरातन बातों के कीच में डूब कर नष्ट मत होइए। मनुष्यता को बंटने मत दीजिये। चुनाव सोच समझकर कीजिये। अपने मत का प्रयोग करके देश को दुनिया में सबसे बड़ा और शानदार लोकतंत्र बनाने में योगदान दीजिये।

गिद्ध मंडरा रहे हैं और भूख हद बढ़ चुकी है। प्यारे लोगों सावधान रहिये। 
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चेतावनी : 
तम्बाकू सेवन से कर्क रोग हो सकता है। जातिवाद कर्क रोगों में सर्वाधिक गंभीर रोग है।
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April 20, 2019

किन्तु एकान्त क्या है?

एकान्त एक निर्जन अथवा सूना स्थान है? अथवा शांत या शोरगुल रहित ऐसा स्थान जहाँ कोई न हो। क्या इसके आस-पास अकेलापन, तन्हाई, निर्जनता, सूनापन जैसे अलग शब्दों को रखा जा सकता है?

इस समय मेरे आस-पास कोई व्यक्ति नहीं है। जिस स्थान पर मैं हूँ उसके दायरे से बाहर ही कोई व्यक्ति है। किंतु इसे एकान्त कैसे कह सकता हूँ। ये सब कितना भरा पूरा है।

मोगरा पर कमसिन कलियां हैं। वे झुक-उठकर झांक रही हैं। मोगरा के पुष्प अपनी सुगंध के मादक जाल के तंतुओं को बुनते जा रहे हैं। मधुमालती के गुच्छों से वनैली गंध आ रही है। चिड़िया के थोड़े जल्दी आ गए कुछ बच्चे हैं। गिलहरियों के दो बच्चे भी हैरत भरी खोज में लगे हैं।


मुझे भाषा और शब्दों का ज्ञान कम है। मैंने कभी गम्भीरता से व्याकरण पढ़ा नहीं। मुझे केवल कहानियां और रोचक गद्य पढ़ना ही लुभाता रहा। ये याद करता हूँ तो लगता है कि एकान्त वह था जब मैं शब्दों में खोया हुआ था। मैं भूल चुका था कि बाहर के संसार में क्या हो रहा है?

सम्भव है एकान्त वह है, जहां आप सबसे अलग किसी ऐसे अंत तक पहुंचें जहां केवल आप रह जाएं। इसमें अगर कोई अन्य उपस्थित है और वह एक ही है तो ये एकान्त समर्पण है। आप और वह दोनों मिलकर एकान्त रच जी रहे हैं।

जैसे कोई स्मृति मोगरा की सुगंध से जाग उठती है और उसके बाद आप उस स्मृति से सम्पन्न होकर मोगरा सुगंध को भूल जाते हैं, वह आपका एकान्त समपर्ण है।

किन्तु एकान्त क्या है। अपने भीतर सिमट आना या कुछ और?
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April 2, 2019

अनलर्निंग

मुश्किल कामों में से एक काम है सीखे हुए को भुलाना।

सीखना हमारे भीतर इस तरह पैठ करता है कि हम उम्र ढल जाने तक भी अपने आपको बदल नहीं पाते हैं। हमसे पहले की पीढ़ी या हमारी पीढ़ी के पास सीखे को भुलाने का हुनर कम ही देखने को मिलता है।

अनलर्निंग एक कठिन कार्य है।

माँ को चीज़ें संभाल कर रखने की आदत है। वे ताले जो ख़राब हो चुके या लगभग गायब हो गए हैं उनकी चाबियों से लेकर सागवान की लकड़ी से बने दरवाज़े जो चौखट से उतर चुके हैं को संभाल कर रखती हैं। इस तरह अनगिनत चीजें कबाड़ की तरह जमा है।

ऐसा इसलिए है कि वे उन दिनों बड़ी हुई जब चीज़ों की उपलब्धता लगभग अप्राप्य थी। आप आज की तरह बाज़ार जाकर कुछ भी खरीदकर नहीं ला सकते थे। उन दिनों सहेजी हुई चीज़ें ही हमारे अटके काम निकालती थी। घर में सुई की जगह सुई और कुदाल की जगह कुदाल सहेजी जाती थी।

मैंने दादा के भंडारघर में लोहे की चद्दरों वाली छत के नीचे, दीवार में आलों और ओने कोने में अनेक ऐसी वस्तुएं देखी थी जिनका उपयोग लगभग कभी न देखा गया। बचपन में जिस किसी घर गया वहां मैंने पाया कि बाखल में, बाड़ में और घर के बाहर की तरफ भी अनेक अनुपयोगी चीज़ें लगभग सहेजी हुई पड़ी रहती थी।

गांव में तो जगह है। बड़े घर हैं। इसलिए चलता है लेकिन छोटे क़स्बों में अटालाघर रखना असम्भव सा है। समय भी इस तरह बदला कि यूज ऐंड थ्रो चीज़ों ने हमें घेर लिया। अब हर दिन हर घर से प्लास्टिक कचरे का उत्पादन होता है। अगर खाली बोतलें, थैलियां और कार्डबोर्ड के बक्से संभालने लग जाएं कि कभी काम आएंगे तो सोचिये क्या हाल होगा?

ये हाल लगभग हर उस घर का है जिसमें कोई बुजुर्ग साथ है। वह व्यक्ति हमेशा ऐसी ही चीज़ों पर नज़र रखता है। वह लगभग कबाड़ के संग्रहणकर्ता की भूमिका में रहता है लेकिन किसी कबाड़ी की तरह उसका निस्तारण कभी नहीं करता। इस कारण मैं कबाड़ी के स्थान पर संग्रहण करता कहता हूँ।

हम तीन भाइयों में केवल मनोज का परिवार ऐसा है जो कम उपयोगी वस्तुएं किसी ज़रूरतमन्द को दे देता है, अनुपयोगी वस्तुओं का त्वरित निस्तारण करता है। वह ज़्यादा लालच भी इस बात का नहीं रखता कि किसी वस्तु के बदले कुछ मिल जाए।

आप इसे बड़ा अधिकारी होना कहकर टालना चाहें तो मेरे पास उच्च पद और अथाह धन वाले ऐसे अनेक लोगों के उदाहरण है जो जीवन भर कूड़े के संग्रहण में डूबे रहे हैं। इसका अर्थ है कि वस्तुओं के प्रति लगाव और उनकी सहेज दिमाग में रच बस गयी एक सीख है। ये उनकी मूर्खता या कमअक्ली नहीं है कि वे समय के साथ नहीं चल पा रहे। ये उनकी समझ में बैठा स्थायी भाव है कि कोई चीज़ कभी काम आएगी।

माँ के इस संग्रहण में उपस्थित चीज़ों की एक लिस्ट मैंने पिछली एक पोस्ट में साझा की थी। उसमें सन बासठ की घिस चुकी लोहे की डिबड़ी, रेलवे ट्रेक के अलार्मिंग पटाखे, एक टूटा हुआ फौज़ी हेलमेट जैसी चीजें थी। माँ की नौजवानी के दिनों में जो सामान घर में आया वह टूट फूट, रो धोकर थक हार कर बैठ गया लेकिन घर से बाहर न जा सका।

कुछ रोज़ पहले ऑफ़िस तक पहुंचा कि घर से कॉल आया। "एक पांच छह फ़ीट का ब्लैक किंग कोबरा घर में आकर बैठ गया है।" मैंने आभा से कहा "आप लोग बाहर बाखल में न जाइये। घर के अंदर रहिये मैं ड्यूटी करके आता हूँ तब देखते हैं।"

मैं लौटा। बाखल का दरवाज़ा खोला और कार अंदर ली। हैडलाइट की रोशनी में मुझे वह शानदार विषधर दिखाई दिया। वह चमक देखकर वापस माँ के जमा किये असबाब में चला गया।

इधर माँ ने पानी में सोने को छुआ कर सोनेली तैयार की बिग्गेजी और गोगाजी से अनुरोध किया कि बाबा अपने इस प्रिय जीव को यहां से ले जाओ। अगली सुबह नागराज के बाहर जाने के चिन्ह दिखाई दिए।

कुछ दिन सब ठीक रहा। आज सुबह माँ ने मुझे बुला लिया। मैं आया तो देखा कि कोबरा सर वापस लौट आये हैं। अब वे उसी सामान के बीच आराम कर रहे हैं, जो माँ ने जमा किया है।

माँ हमको ये सामान हटाने नहीं देती है। हम इसे हटाना चाहते हैं। इस शीत खींचतान में कोबरा का आना माँ के पलड़े को हल्का करता है। इसलिए माँ बैकफुट पर आ जाती है। उनको ऐसे ढीला होते देखना मुझे अच्छा नहीं लगता। वे हमेशा रहें और मालिकाना अधिकार से रहें इसलिए मैं कहता हूँ- "माँ ओई जीव है बापड़ो। इरें कुण घर मोंडे है। बैठो है चार दिन। हापी जेई परो"

ये सुनकर माँ को आराम की लम्बी सांस आती है। कबाड़ हटने से बच गया लेकिन तुरंत चिंता होती है। "मरग्यो रे है तो भेवर।"

बुजुर्गों ने जो सीखा या उनसे हम जो सीखे वह सब खराब या असामयिक नहीं है। उनकी सीख में ये भी था कि आप चारपाई पर बैठें तो पांव नीचे न लटकाएं। नीचे हों तो उनको हिलाएं नहीं। पांव हिलाने पर वे बच्चों से कहते "पग मत हिला तेरी माँ रो पेट दूख ई।"

इसका मंतव्य था कि विषधर हिलते हुए पैर को कोई छोटा भोज्य जीव समझ सकता है। असल में हमारे शरीर से निकलने वाली ऊष्मा उनके थर्मल विजन में कैच हो जाती है। वे इंसान को काटना नहीं चाहते किन्तु हिलते हुए पैर को कुछ और समझ कर डस लेते हैं।

हर सीखना समय के साथ अनुपयोगी नहीं हुआ है। रेगिस्तान विषधरों का घर है इसलिए चारपाई पर पांव ऊपर रखकर बैठो।

अभी नागराज आराम कर रहे होंगे। गर्मी सुबह सुबह ही बहुत अधिक है। तस्वीर में उनके चलने से बने निशान से आप उनकी सेहत का अंदाजा लगा सकते हैं।

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.