March 18, 2019

हर चीज़ बदलती है - ब्रेख़्त

हर चीज़ बदलती है।
अपनी आख़िरी सांस के साथ
तुम एक ताज़ा शुरुआत कर सकते हो।
लेकिन जो हो चुका, सो हो चुका।
जो पानी एक बार तुम शराब में
उड़ेल चुके हो, उसे विलग नहीं कर सकते।
जो हो चुका, सो हो चुका।
वह पानी जो एक बार
तुम शराब में उड़ेल चुके हो
उसे उलीच कर बाहर नहीं कर सकते।
लेकिन हर चीज़ बदलती है
अपनी हर अंतिम सांस के साथ
तुम एक ताज़ा शुरुआत कर सकते हो।
~ बर्तोल्त ब्रेख़्त
EVERYTHING CHANGES
Everything changes. You can make
A fresh start with your final breath.
But what has happened has happened. And the water
You once poured into the wine cannot be
Drained off again.
What has happened has happened. The water
You once poured into the wine cannot be
Drained off again, but
Everything changes. You can make
A fresh start with your final breath.
~Eugen Berthold Friedrich Brecht

March 9, 2019

बताशे जितनी पूरी

"आभा दी फुचका" मेरे ऐसा कहते ही आभा मुस्कुराने लगी।

मैंने पूछा- "कुछ याद आई?" आभा ने कहा "हाँ आपकी दोस्त। उनकी क्या ख़बर है?"

मैंने कहा- "पता नहीं। कहीं रंग भरी अंगुलियाँ लिए ड्राइंग बोर्ड के सामने खड़ी होगी या किसी आर्ट गेलेरी में अपनी पेंटिंग्स बेच रही होगी।"

आभा ने कहा- "आपको उनके बारे में पता करना चाहिए।"

कैसे कोई एक बात किसी की हमेशा के लिए याद रह जाती है। उस बात के बहाने उसे हर बार याद किया जाता है। फुचका हमारे लिए नया शब्द था। बांग्ला लोग पानी पूरी को फुचका कहते हैं। हमारे लिए तो पानी पूरी भी एक नया शब्द था। पहले पहल जब भी इसके बारे में सुना तब ये पानी पताशा था।

रेगिस्तान के लोगों के पास मखाणे और बताशे ही केंडी के रूप में हुआ करते थे। इन्हें बरसों बिना किसी विशेष रखरखाव के संभाला जा सकता था। दादी की पेटी में, नाना के कुर्ते के खूंजे में, मेहमानों की थेलियों में, विवाह समारोहों के अवसर पर कट्टों में भरे हुये मखाणे और बताशे मिला करते थे।

ये बताशे ही थे जिनको स्थानीय बोली ने पताशे कर दिया था। पानी पूरी वाली, पूरी भी लगभग बताशे जितनी ही थी। इसलिए वह पताशा हो गई।

बाड़मेर में पहले पहल कौन इसे बेचने लगा था, ये मेरे लिए याद करना कठिन है। लेकिन इतना ज़रूर है कि मैं पाणी-पताशे को अपनी किशोरवय में जान चुका था। एक बहन को इसका बड़ा चाव था। अक्सर उसी बहन ने घर से बाहर के संसार के रास्ते खोलने में सेनापति की भूमिका निभाई थी।

उसके कारनामे अदम्य साहस से भरे होते थे। जैसे शिवरात्रि के अवसर पर भांग वाली ठंडाई मंगवाना। "भाई ला तो देखें क्या होता है?" उसी बहन ने पानी पूरी को "जाट" घर में प्रवेश करवाया था। जाटों का क्या वास्ता ऐसी चीजों से? हमारे लिए तो दुपहरी का भोजन सूखी हुई रोटियाँ और दही में कच्ची लाल मिर्च और नमक होता था।

हालांकि अब भी पानी पूरी हमारे लाल मिर्च वाले दही और सूखी रोटी को कोई चुनौती नहीं दे पाई है। हमारे बचपन और बच्चों के बचपन के खानपान में इतना अंतर आया कि मानु और तनु की दुपहरी में दही के साथ सूखी रोटियों की जगह आलू पापड़ी ने ले ली। ये भोजन उनकी प्रिय दुपहरी हुआ करती थी।

अब रेगिस्तान में कॉकरोच बहुत हो गए हैं। पहले किसी कठोन्तरे में किणारी माने झींगुर अवश्य मिल जाते थे लेकिन कॉकरोच न थे। ये छोटे बड़े तिलचट्टे जाने किस रास्ते रेगिस्तान चले आए हैं। मुझे लगता है कि मंडियों में होने वाली आवक के साथ आए और सब घरों में घुस बैठे। इन तिलचट्टों के कारण अब सूखी रोटियों को खाने से मनाही हो गयी है। कुछ एक स्वाद के दीवाने चटोरे लोग अब भी सूखी रोटियों को गैस चूल्हे पर सेक कर खाने से बाज नहीं आते।

ये चटोरी चीज़ें तेज़ी से हमारे जातिगत ढांचे की भोजन परंपरा को चुनौती दे रही है। मैं इन चटोरी चीजों का आभारी हूँ। अब पापड़ खाने वाले बनिए नहीं कहलाते। पापड़ खाण पदमणा होया, कहावत भी पीछे छूटती जा रही है। 
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तस्वीर पार्टनर की है।

March 7, 2019

एक पिता होना

एक पिता के लिए सबसे महत्वपूर्ण काम ये है कि वह अपने बच्चों की माँ से प्रेम करे। ~ थियोडोर हेज़बर्ग

ड्राइंग रूम की सेंटर टेबल पर अकसर कैरम जमा रहता। माँ, पापा और भाई माने सब लोग खेलते थे। बोरिक ऐसिड की सफेदी यहाँ वहाँ बिखरी रहती। शाम को ये कैरम बाहर खुले में आ जाता। इस खेल का आनंद बहुत देर तक चलता। कभी मानु आकर कैरम के बीच में बैठ जाती। इसे खेल के बीच का टी ब्रेक मान लिया जाता। खेल फिर से चल पड़ता। इस खेल के समापन का एक रिवाज सा बन गया था कि माँ की टीम हारने लगती तब माँ कैरम को एक तरफ उठाकर सारी गोटियाँ बिखेर देती।

एक ठसक और झूठे रूसने के साथ माँ रसोई की ओर चल पड़ती। पिताजी उनको मनाने के लिए राजसी सम्बोधन लिए पीछे चल पड़ते।

घर के भीतर के इन दृश्यों से इतर बाहर के संसार में पिता एक शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता और बेहद गंभीर व्यक्ति थे। उन्हें किसी प्रहसन, हंसी-ठिठोली और निंदा में सम्मिलित किसी ने नहीं पाया। वे इस तरह के स्वभाव के व्यक्तियों से यथोचित दूरी बनाए रखते थे।

जब तीनों बच्चों की नौकरी लग गयी। घर में बहुएँ आ गईं तब उन्होने अपनी इच्छा से नौकरी से सेवानिवृति ले ली। अपने प्रिय लोगों के साथ मिलकर एक एनजीओ बनाया। उसके लिए काम करते रहते थे। वे बहुत ख़ुश रहते थे। उनके चेहरे पर सेवा करने का संतोष साफ पढ़ा जा सकता था। इस तरह सेवारत रहने और सेवानिवृति के बाद भी वे दिन भर घर से बाहर ही रहते थे।

उनके घर में आते ही एक गाम्भीर्य साथ चला आता था। वे कुछ कहते नहीं थे लेकिन सब लोग एक बारगी कड़े अनुशासन में आ जाते। ये अनुशासन कभी-कभी घर में एक अनावश्यक चुप्पी भर देता था। इसलिए ही शायद कैरम की बाज़ियाँ सबको प्रिय थी। उस समय हम एक अनुशासित परिवार होने के स्थान पर खेल के दो दल हुआ करते थे।

इधर हर गोत्र का एक नख माना जाता है। इसका अर्थ है कि पूर्वज किस खानदान या वंश से संबंध रखते थे। जाटों में सारण गोत्र को भाटी गोत्र से मानते हैं। मुझे इसके बारे में बहुत पता नहीं है लेकिन पिताजी माँ के रूठने पर कहते थे "भाटियों रो रूसणों भारी" वे कभी-कभी माँ को आवाज़ लगाते थे "भाटी साब। कहाँ हो"

इस तरह एक बेहद गंभीर व्यक्ति ने हमारी माँ के साथ आप और साहब का सम्बोधन रखा। उनके मन को मनाने के लिए हर बार अथक लगे रहे।

हर पिता अपने दायित्वों के निर्वहन में कोई कसर नहीं छोड़ता, अपने सामर्थ्य से बढ़कर अपने परिवार के लिए कार्य करता है। पिता हम भाइयों को पढ़ाते रहे। हमें सही गलत समझाते रहे। हम जो बन सके वह सब उन्होने अपने हाथों से अपनी आँखों के सामने बनाया और जब हम दूर थे तब उन्होने अपने विश्वास से हमारी गढ़त जारी रखी।

लेकिन उन्होने हमारी माँ से असीम प्रेम किया ये सबसे बड़ी बात है। 
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लिखते समय मुसकुराता रहा लेकिन आखिरी पंक्ति तक आते ही आँखें भर आई हैं। पिताजी होते तो कहते- "तुम बड़े हो गए हो। अब तुमको रोने में मुस्कुराने का हुनर आना चाहिए।" 
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पिताजी की अधिकतर तस्वीरें साफ़ा-माला पहने हुये। सामाजिक कार्यक्रम में भागीदारी करते या इसी तरह के आयोजनों की हैं। उनकी ये तस्वीर उनके गंभीर स्वभाव से अलग है। इसे आर के पूनीया सर ने खींचा था। शायद बीबीएल भटनागर सर ने अपना चश्मा उनको पहनने को दिया होगा। या हो सकता है पिताजी ने कभी किसी यात्रा में ख़ुद के लिए चश्मा खरीद लिया हो। हालांकि मुझे इस बात पर विश्वास नहीं होगा कि वे अपने लिए कभी धूप का चश्मा खरीद सकते हैं। 
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आपके पिता हैं तो उनको एक बार मुस्कुराकर देख आइये। उनको एक कॉल कर लीजिये। मुझे महसूस होगा कि मैंने उनसे बात कर ली, मैंने उनको देख लिया। 
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कोई कहीं नहीं जाता। सब यहीं रहते हैं दिल के पहलू में या उसके अंदर। बहुत सारा प्यार। 
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March 3, 2019

बाड़मेर में पकवान दीवाने

सर दो पेग ले लेते हैं। 
भाई सुबह से कुछ खाया ही नहीं है। 
सर ये गेट के सामने पकवान वाला है, बहुत अच्छे पकवान देता है। 
ले आइये। 
सर मिर्ची कम या ज़्यादा?
मिर्ची अच्छी। 
सर मीडियम ठीक रहेगी। 
भाई एक पतला सा पापड़। थोड़ी सी दाल और प्याज के चार बारीक टुकड़े। इतना मत सोचो। जैसा अच्छा लगे ले आओ।

बाड़मेर में पकवान दीवाने रहते हैं। लोग सुबह सवेरे पकवान खाने निकल पड़ते हैं। हर पकवान वाले ठेले के पास खड़े होकर आपको इंतज़ार करना पड़ता है। पकवान खाने के दीवाने अधिकतर विस्थापित होकर आए लोग थे। वे ही अपने साथ पकवान लेकर आए। लेकिन जल्द ही ये हर एक का प्रिय होने लगा।

मैंने किसी जाट को पहली बार पकवान खाते हुये देखा, वो हमारा कॉमरेड दोस्त खेताराम था। मैं तब भी पकवान नहीं खाता था। पिताजी को गलियों में चटोरों की तरह खाने की आदतें अच्छी नहीं लगती थी। ये भी एक वजह रही होगी मैं बहुत बार ललचाने के बाद भी आलू-टिक्की, छोले और पकवान जैसे ठेलों के पास भी नहीं गया।

इधर आकाशवाणी के गेट के सामने बिजली विभाग की दीवार के पास एक व्यक्ति ने साल डेढ़ साल पहले पकवान का ठेला लगाया। बिक्री इतनी तेज़ी से बढ़ी कि हाथगाड़े की जगह कबट लगाना पड़ गया। अब यहाँ सुबह की पहली किरण के आने से लेकर नौ दस बजे तक खूब भीड़ रहती है।

मैंने कभी यहाँ का पकवान चखा नहीं था। आवश्यकता थी तो चखना पड़ा। मेरे लिए ये पकवान बंदर के मुंह में अदरक सा रहा। मुझे कोई वजह न मिली कि इसे अगली बार खाया जाये। मैं अब भी राब और दही खाकर घर से निकलना चाहूँगा। 
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दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.