February 27, 2019

सामूहिक उद्विग्नता - मास हिस्टीरिया

उद्विग्नता माने इज़्तराब माने एंजायटी अनेक कारणों से बचपन से ही हमारे भीतर घर कर लेती है। ये उद्विग्नता जब अनेक लोगों को चपेट में लेती है तो इसे सामूहिक उद्विग्नता अर्थात मास हिस्टीरिया कहा जाता है। सामूहिक उद्विग्नता अक्सर संक्रामक व्याधि की तरह समाज के बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लेती है। समाज का अधिसंख्य हिस्सा अपनी कल्पना शक्ति से भयावह स्थितियों के दृश्य बुनने लगता है। ईश्वर के रूठने, प्रकृति के कुपित होने, महामारी फैलने या राज्य के नष्ट होने जैसे किसी भी विषय के सामूहिक पागलपन में शामिल हो जाता है।

समाज का ये अस्वस्थ भाग ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए पशु-पक्षियों की बलि यहाँ तक कि नरबलि देने को एकमत हो जाता है। पहाड़ों, नदियों और अलंघ्य विशालकाय मैदानों में अनेक शापों के होने का प्रचार-प्रसार करता है। अनेक आशंकाओं में बाहरी सम्पर्क को समाप्त करता है और भेड़ों के झुंड की तरह मुंह में मुंह डालकर बैठ जाता है। अपने राज्य को नष्ट होने से बचाने के लिए प्रशिक्षित और बुद्धिमान योद्धा बनकर राज्य का स्वयंसेवक होने के स्थान पर विक्षिप्त होकर चिल्लाने लगता है। अपनी क्षति पर रोता है और दूसरे की क्षति पर हँसता है, तालियाँ पीटता है।

मास हिस्टीरिया समंदर की लहरों की तरह समाज में संचरित होता है। जब ये शांत हो जाता है तब तक अनेक लोग पूर्ण मनोरोगी हो चुके होते हैं।

हमारा अकेलापन, असंतोष, बेचैनी और घुटन इन क्रियाओं के मूल में है।
* * *

मित्रो शांत रहिए। धैर्य धरिए। विचार कीजिये। अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए जो योगदान देना चाहते हैं, वह काम कीजिये। दुख में अधीर हो उठना एक बात है और अपने कपड़े फेंक देना दूजी बात है। प्रसन्नता में आभारी होना एक बात है और विक्षिप्त की भांति गली में नाचना दूजी बात है।

सबके लिए प्रार्थना कि मन मस्तिष्क स्वस्थ रहे।

February 14, 2019

प्रेम दिवस पर एक दुआ

वो टाई बांधती है और खींच लेती है 
ये कैसे वक़्त उसे प्यार की पड़ी हुई है।
~आमिर अमीर

यूँ कब तक बेरोज़गार फिरोगे। दुआ कि तुम प्यार में पड़ जाओ। हर घड़ी कोई काम तो रहे कि सन्देशा आएगा, कॉल आएगा। मन घबराया रहे कि कोई मैसेज देख न ले, किसका कॉल है कोई पूछ न ले। घर के ओनेकोने में, दफ्तर के सूने गलियारों में कभी बाज़ार के बहाने किसी खाली जगह पर जाकर जल्दबाज़ी के कॉल करेंगे। बातों-बातों में तय कर लेंगे कि कभी मिलेंगे, चूम लेंगे, कहीं बहुत दूर तक घूमने जाएंगे। और फिर ख़ुश होंगे, इंतज़ार करेंगे, उदास रहेंगे, आंसू बहाएंगे, कोसने भेजेंगे। इस तरह कुछ बरस तेज़ी से कबाड़ किए जा सकेंगे। लेकिन ये सब बेकार न जाएगा। कभी दारू पी लेने पर कह उठेंगे "यार थी तो बड़ी बरबादी मगर अच्छी थी।"


आमीन। 😍😘

February 11, 2019

सूचना सम्पन्न रेगिस्तान



जैसलमेर में फतेहगढ़ में कोडा गांव से लौटते हुए झीझनियाली में ये वैन दिखी। इसमें एक बड़ा स्क्रीन लगा था। जब हमारी कार वैन के पास पहुंची तब स्क्रीन पर राजस्थानी वेशभूषा में कुछ लोग और खलिहान दिखाई दिए। वैन के आगे भारत के मन की बात लिखा था।

इसे देखते ही मुझे फ़िल्म प्रभाग और दृश्य एवं श्रव्य प्रचार विभाग की ओर से अस्सी के दशक में दिखाई जाने वाली फ़िल्म याद आने लगी। एक जीप में कुछ लोग आते। प्रोजेक्टर लगता। सफेद पर्दा लगाया जाता। उस पर कोई देशभक्ति या विकास पर बनी फ़िल्म दिखाई जाती। हम बच्चे कौतूहल से उस दिन का इंतज़ार करते। लेकिन वह दिन बरसों में कभी आता।


मैंने केवल दो फ़िल्म देखी थी। एक थी देव आनंद साहब की हम दोनों दूजी के बारे में ठीक से याद न रहा कि वह किस बारे में थी।

अब हर हाथ में मोबाइल है। सस्ता साहित्य, द्विअर्थी गीत, मार-काट और प्राकृतिक आपदाओं के दृश्य सबकुछ यूट्यूब पर उपलब्ध है। फ़िल्म और टीवी सीरियल का तो कहना ही क्या? वे यूट्यूब पर नहीं तो किसी टोरेंट के मार्फ़त डाउनलोड होकर एक मोबाइल से दूजे मोबाइल में आगे बढ़ते रहते हैं। ऐसे में इस वैन को देखकर मेरे मन में प्रश्न जगा कि क्या सचमुच ये प्रचार किसी के मन पर कोई असर छोड़ पायेगा। जैसा हम पर कभी पड़ा करता था।

आज रेगिस्तान के इन दूरस्थ गाँवों में रहने वाला हर व्यक्ति इतना सूचना सम्पन्न है कि वह किसी को सुन ले तो सुन ले मगर गुनता अपने मन की ही है। शहर क़स्बे का आदमी तो फिर भी कुछ दौड़भाग में लगा रहता है लेकिन गांव के लोग इतने समृद्ध हैं कि वे राजनीतिक बहस की चालों में इस तरह फिणसिया लगाते हैं कि तेज़ तर्रार गट्टे खाता हुआ दस कदम आगे धूल झाड़ता हुआ मिलता है।

कल एक मित्र ने कहा- "इकहत्तर की लड़ाई तक तो भारत सरकार भूल गयी थी कि बाड़मेर जैसलमेर भी इसी देश का हिस्सा है।"

मैंने उनको याद दिलाया कि वे भी क्या मज़े के दिन थे जब बरातें बॉर्डर पार जाती और दुल्हन ब्याह लाती थी। ये कोई बहुत पुरानी बात नहीं है। नब्बे के आस पास फेंसिंग होने से ये सिलसिला रुका।

इसी बातचीत में एक मुसलमान लड़ाका याद किया गया जिसने पाकिस्तान में रह रहे राजपूतों के भारत में रहने वाले राजपूतों के अनगिनत ब्याह सम्बन्ध करवाये।

हम अपने बचपन से इस द्रुत गति से दूर आ गए हैं कि यकीन नहीं होता तीस चालीस बरस ही हुए हैं। देखते-देखते मंज़र बदल गया है।

February 9, 2019

वेणासर की पाल - भंगभपंग



विज्ञान की कक्षा में पदार्थ के रूप पढ़ाये जा रहे थे। रसायन विज्ञान के माड़सा खूबजी ने बच्चों को सरल भाषा में बताया। "अवीं हंगाता हिय ठोस, अवीं मूत्राता हिय द्रव हिन अवीं टिट हणाता हिय गैस।"

#भंगभपंग - 7

कक्षा नौवीं की आख़िरी से पहली बैंच पर बैठा एक लड़का हंसा। उसकी हंसी के पीछे हंसी की एक लहर आई। लहर के साथ आगे की सब बैंचों के बच्चे बह गए। खूबजी ने कहा- "तुम्हारे लक्षण दिख रहे हैं। इस सेक्शन का एक भी बच्चा डॉक्टर नहीं बन पाएगा।"

कक्षा के पास से जा रहे हनु भा ने इस हंसी पर उपेक्षा भरी दृष्टि डाली। उनको इस बात की चिंता न हुई कि कोई बच्चा डॉक्टर नहीं बन पाएगा और विद्यालय का नाम रोशन न हो सकेगा लेकिन उनको मानव शरीर के अपशिष्टों के प्रति विद्यार्थियों की अरुचि से दुख हुआ।

टिट हणना एक अद्भुत सुखकारी कर्म है। पाद के प्रति अमानवीय सोच रखने वाले गांवों का ज़िक्र विश्व इतिहास में है। लेकिन बाड़मेर के बुजुर्ग पदेलों के लंबे पाद पर कोई नौजवान हंस दे तो पादक उसे उपहास भरी निगाह से देखता। साथ ही आस-पास के लोग भी बच्चों को इस तरह देखते कि बच्चे कई दिनों तक पादकों के आस-पास नहीं फटकते।

औरतें ज़रूर पादने के मामले में संकोची रही। वे इस क्रिया को गुप्तदान की तरह करती रही। इसे फुस्की कहा जाता था। आस-पास उपस्थित अन्य औरतें परशुराम की भृकुटी की तरह हो जाती किन्तु ये केवल चेतवानी भर होती। कुछ फूहड़ लड़कियां मुंह छिपा कर खेँ खेँ खेँ करती।

विद्यालय से निकले हनु भा फकीरों के कुएं के पास से नौरे की ओर चल पड़े। नौरे मैं सामूहिक भोज आयोजित होते थे। सभी प्रकार के मांगलिक और शोक पश्चात के भोज के कार्यक्रमों के लिए ये इकलौता पवित्र स्थल था।

नौरे में एक बड़ा कड़ाह था। इतना बड़ा कि उसमें दो आदमियों को रस्सी बांध कर अंदर उतारा जाता। कड़ाह में चिपका घी सदियों से स्थिर था। उस घी के कारण कड़ाह को साफ करके बाहर आना असंभव कार्य था। इसके लिए कड़ाह की सफाई के बाद आठ आदमी मिलकर रस्सी खींचते तब अंदर के लोग बाहर आ पाते थे।

भीकमजी एक दिन नौरे में अकेले बैठे थे। उन्होने सोचा कि आज कुछ काम तो है नहीं इसलिए कड़ाह साफ का देता हूँ। वे समाज सेवा के उद्धेश्य से कड़ाह साफ करने अंदर उतर गए। अट्ठारह दिन बाद पहले श्राद्ध आयोजन के लिए लोग नौरे पहुंचे तब उनको भीकमजी जलेबी के सूखे टुकड़े की तरह कड़ाही में पड़े मिले। भीकमजी की धोती और चमड़ी एक हो चुकी थी।

उनको कड़ाह से बाहर निकाल कर पुलिस थाने से गुमशुदगी की रिपोर्ट वापस ली गयी। वैसे भी थाने वालों ने रिपोर्ट दर्ज ही न की थी। जिस घी सने पन्ने पर रिपोर्ट लिखी गयी थी। वह एक रजिस्टर के बीच अधलटका था। वह लगभग सूख चुका था। उस पन्ने पर लगे घी से पुलिस वालों ने कई चूरमे कर लिए थे। पन्ने में चूंपा हुआ घी पुलिस की लूट से बच नहीं सका था।

कोतवाल साब ने कहा- "मैंने कहा था न पंडित आदमी है कहीं लंबे जीमण में चले गए होंगे। लेकिन ये कुछ ज़्यादा लंबा जीमण हो गया"

नौरे में आयोजित होने वाले भोज में जो चूरमा और हलुआ बनता था उसमें रुपए में दस आना घी हुआ करता था। भोज करने वाले भोजन का इतना सम्मान रखते थे कि खीर तालू तक भरी हुई मालूम होनी चाहिए। इसके बाद उनका सर शरीर से तीस डिग्री ऊपर हो जाता। इस डिग्री में थोड़ा सा भी झुकाव आता तो खीर टूटे हुये नल से टपकते पानी की तरह बाहर आने लगती। ये भोज का अपमान होता। इसलिए कोई भी अपने चप्पल नहीं देख सकता था।

जीमा हुआ हर देव अपने पाँवों से टटोलकर जूते चप्पल खोजता। विजया बूटी के प्रभाव से खोज की यह क्रिया इतनी शिथिल होती कि जूते और पाँव के अंगूठे का स्पर्श सामान्य मनुष्य के स्पर्श का एक हज़ारवां भाग होता। इससे जूते चप्पल यथास्थान बने रहते। जीपीएस सिस्टम की तरह आँखें ऊपर आकाश से ही जूतों की लोकेशन पता कर लेती।

नौरे के पश्चिम में पहाड़ी भूभाग है। इसकी खड़ी चढ़ाई पर इस तरह सहारा लिया जा सकता है कि आप लेटे हुये भी हैं और खड़े हुये भी हैं। ये पीसा की मीनार का सहारा लेकर सोने जैसी जगह है। इसके पत्थरों पर भांग और घी का सेवन किए हकूभा और उनकी बाद की पीढ़ियों के तमाम लोग लेट लगाते रहे हैं।

इस स्थान पर भोजन की सांद्रता के कारण एक नियत अंतराल से विस्फोट सुने जाते। पाद के साथ हर बार चालीस पचास ग्राम घी विसर्जित होता। इससे पहाड़ी के सब पत्थर इतने चिकने हो गए कि छोटे बच्चे फिसलपट्टी की तरह यहाँ पर सरकने के लिए दिन भर जमे रहते।

पाद के साथ आते घी से हुई रासायनिक क्रिया का ज़िक्र करते हुये हनु भा ने पहाड़ी पर तिरछे लेटे हुये कहा। "ग्रेनाइट में सिलिका और ऐलुमिना होती है और हाइड्रोफोलिक नामक रसायन ही इसे घोल सकता है। ये पत्थर चिकने और भुरभुरे इसलिए हो रहे हैं कि घी में भी शायद वैसा ही कोई रसायन हो।"

डमजी ने आँख निकाली और बाकी सब ने एक साथ कहा- "सू कालो थियु से?"

"पाद से अधिक बलशाली कोई रसायन नहीं है। ये मनुष्य का पाद ही है जो इस विशालकाय पहाड़ को टूटने बिखरने को मजबूर करता है।"

वेणासर की पाल के चिकने पत्थरों के पास जोशियों में सती हुई स्त्रियों की स्मृति में बनी छतरियाँ खड़ी थीं। तालाब के कादे जितने पानी को छूकर आती हवा में सभी पादक योग्यतानुसार सेवारत थे। पाद आता और घी के छोटे-छोटे फव्वारे छूटते।

डमजी ने कहा- "चौसठ की लड़ाई में चीन के पायलटो ने बाड़मेर में ये पत्थर देखकर समझा कि किसी बड़े कारखाने की चिकनी छत है। उन्होने यहीं पर बम बरसाने शुरू कर दिये। हवाई जहाज से बम गिरता और इस घी की चिकनाई पर फूट नहीं पाता। वह फिसलकर सीधा वेणासर तलाई के पानी में जमा हो जाता।"

खीर अब भी गले तक अटकी हुई थी इसलिए कोई भी डमजी की ओर देखकर निगाहों से प्रशंसा न कर सका। सबने आकाश की ओर देखते हुये। भांग से जुड़े जीपीएस के माध्यम से प्रशंसा के मौन संदेशे भेजे। तभी एक बड़ा पाद मशीनगन की तरह पत्थर से इस तरह टकराया जैसे स्कूल में लटके रेलवे पटरी के टुकड़े से रेलवे लाइन का बुश टकराता है और स्कूल में छुट्टी होने की घोषणा हो जाती है।


तस्वीर शिव मंदिर के रास्ते सूजेश्वर को जाने वाले मार्ग की है।


February 8, 2019

जीवन जैसा मिला

कभी महंगे काउच में धंसे रहे, कभी प्लेटफॉर्म पर पड़े रहे। न भला लगा न बुरा लगा। कभी सोए अजनबी बिस्तरों में, कभी घर के लिहाफ़ में दुबके रहे। न अफ़सोस रहा न ख़ुशी रही। कभी बैठे रहे मुंडेर पर, कभी गलियों की खाक पर चलते रहे। न कमतर लगा न बेहतर लगा। कभी मिले तो खो गए रूमान में, कभी बिछड़ गए तो तन्हा बैठे पीते रहे। 

जीवन जैसा मिला उसे जी लिया।

February 7, 2019

व्हाट टू डू दादी


मैंने दादी से कहा -"राउंड नेक टी और जीन्स में बहुत कम्फर्टेबल रहता हूँ पर दादी जब फॉर्मल कपड़े पहन लेता हूँ तब लगता है दिस इज अ पनिशमेंट। फिर मैं कोट कमीज़ को अलमीरा में टांग देता हूँ। ऐंड दादी व्हाट्स एप पर फोरवर्डेड मेटेरियल और जवाब न देने के बाद भी कमेंट्री की तरह आते मैसेज मुझे बहुत अनकम्फर्टेबल करते हैं। ये सब देखकर झुंझलाहट होने लगती है।" और फिर एक लंबी सांस लेकर कहा- "व्हाट टू डू दादी" 

दादी ने कहा- "टेक इट ईजी। एक्सपेक्ट ट्रबल एज एन इनऐविटेबल पार्ट ऑफ लाइफ एंड पीसफुली इग्नोर देम।" 

"मुझे अच्छा नहीं लगता दादी। प्लीज़ समझो।" मैंने उदास लहज़े और डूबी आवाज़ में कहा। 

दादी ने गाल पर हाथ फेरा और कहा- "इंयों मोलो के पड़े है। ऐड़ो ने मूंडे ई मति लगा। आगा बळण दे।"

"ऐंड दादी यू नो? फेसबुक में कमेंट पर थ्रेड चलाने वाले भी झाऊ चूहे हैं।" 

"मीन्स हेज हॉग?"

मैंने कहा- "हाँ दादी कांटों वाले चूहे"
* * *

February 2, 2019

कभी लगता है



सोचता हूँ कि इस समय गहरी नदी के बीच हिचकोले खाती नाव होता। डूबने और पार उतरने की आशंका और आशा में खोया रहता। जीने की इच्छा के सिवा बाकी यादें कहीं पीछे छूट जाती। मैं मगर सूखी नदी के तट पर पड़ी एक जर्जर नाव हूँ।

कभी लगता है बड़ी उदास बात है और कभी-कभी लगता है इससे अधिक सुंदर बात क्या हो सकती है?


दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.