July 31, 2017

कभी इस तरह थाम सकोगे


टिंग टिंग टिंग ट्विंग
सेलफोन में कोई वाद्य बजता रहता है. स्क्रीन एक बार नीला होने के बाद चमकने लगता है. अंगुलियाँ फोन नहीं उठाती. आँखें टेबल पर पड़े फोन को देखती रहती है.

दोपहर की गहरी नींद ढली हुई शाम में खुलती है. रात आये ब्रश करते हुए. कई दिनों की बाकी शेव पर रेजर फिराते. कस्तूरी की गंध का आफ्टर शेव हथेली में लिए आईने में देखना. शोवर के नीचे खड़े हुए पानी की बूंदों को पीठ पर गिरते हुए महसूस करना. कुछ महीनों की गर्द से भरे काले जूतों को झाड़ कर सफ़ेद जुराबें खोजना. साल दो हज़ार ग्यारह की ख़ुशबू से भरी एक चेक वाली कमीज एनयू 87 और खाकी ट्राउजर.

ड्रेसअप होकर कहाँ जाओगे? ड्रिंक लेने?

बालकनी में खड़े यही सवाल दिल में आया था. कल रात उस वक़्त दस बजकर बारह मिनट हुए थे. 
* * *

ज़िन्दगी एक कहानी है. ये बहुत जगह स्किप होती रहती है. जीए हुए पलों की तस्वीर से बहुत से सीन गायब रहते हैं.

याद के नन्हे गुरिल्ला सिपाही हमला करके छुप जाते हैं.

अचानक चौंक कर बहुत पीछे किसी तनहा लम्हे में दूर तक फैली रेत पर बैठे हुए ख़ुद को याद आता हूँ. वह लगभग पूरे आसमान को देखने की एक रात थी. तारे थे. उतने ही साफ़ जितने किसी सूने रेगिस्तान की रात में होते हैं. किसी तरफ उफ़क के पास एक धुंधली लकीर थी. यही एक रूमानी बात थी.

कभी-कभी आप चाहते हैं कि रेत किसी नाज़ुक छुअन भरे दरिया की तरह बहने लगे. आप उसकी बाँहों में समा जाएँ.

ज़िन्दगी में अकेले जीना अच्छा होता है मगर कभी-कभी अच्छा नहीं होता. उस कभी-कभी में प्यास को पानी में फेंकते जाना और हाँफते जाना होता है. वही उस कभी-कभी की टूटन की मरम्मत होता है. 
* * *

एक सुबह उसकी बाहों में जागने पर याद न आया कि दुनिया के किस कोने में पड़े हैं.

मगर बाद बरसों के अचानक याद आता है. जब वह अपना गोल सा चेहरा गरदन के पास रख देती थी न. तब लगता था कि कोई ऊन का गोला है. जिससे रह रहकर गुनगुनी भाप सी हवा आती है.

वह जहाँ रहती थी, कस्बे की अनेक हवेलियों के बीच की एक हवेली थी. उसके सबसे ऊपरी हिस्से में अनेक कमरे थे. वह जिस कमरे में रहती थी. वही एक कमरा था. जिसमें कोई रहता था. उसका कहना था कि ये लम्बी खुली छत कितनी सुकूनदेह और कितनी डरावनी है. मैं कभी बता नहीं सकती. उसने ये भी कहा था कि जब आते हो न तभी यहाँ दो लोग होते थे.

कई-कई बार के आने में एक बार के आने पर उसने कहा था- "मुझे कभी इस तरह थाम सकोगे कि मुझे लगे तुम्हें हमेशा के लिए मेरी ज़रूरत है."

बाद सालों के हँसते हुए किसी ने गाली दी थी- कैसोनोवा. 
* * *

नशे के बारे में शायद तुम जानते नहीं हो. ये कैसी तलब होता है और इसकी ज़रूरत क्योंकर होती है.

मैं जानता हूँ. मगर इन दिनों कुछ नहीं करता. 
* * *

शायद कल की रात, कोई भीगा नशीला सिरा पकड़ना था. मगर वह बीत गयी. उम्र की घड़ी तेज़ चल रही है. कि बीती जिंदगी की दो बातें लिखने में भी दो घंटे चले जाते हैं.

दस मिनट लिखने के बाक़ी उसे याद करते हुए खो जाने के. 
* * *

July 30, 2017

तेरे वास्ते

मिरे वुजूद से शायद मिले सुराग़ तिरा
कभी मैं ख़ुद को तेरे वास्ते तलाश करूँ।
~मोहसिन नक़वी


July 14, 2017

अक्सर

दोपहर का स्वप्न 
साँझ की आहट से टूट जाता है. 

किसी फूल के कान में 
स्वप्न टांकते हुए सांझ ढल जाती है. 

रात का पहला पहर 
अभी बीत रहा होता है 
घने अंधरे में अचानक लगता है 
कि उस फूल की आँखें 
ठीक सामने चमक रही है. 

एक चौंक उतरती है. 

हाथ बढाकर देख लूँ कि वह है? 
मगर जो हाथ बढ़ा नहीं 
उसमें एक लरज़िश है.

कभी-कभी नींद के स्वप्न 
और जाग के स्वप्न के बीच के 
फासले पर धुंध उतर आती है.

July 7, 2017

जैसे दो लोगों के बीच कुछ बचा न हो.

कोई बात परेशां करती थी. बेवक्त याद आती. फिर मैं देर तक उसी में उलझा रहता था. इससे बाहर आने को ब्लोगर का ड्राफ्ट खोलता और लिखने लगता. कच्चे ड्राफ्ट जमा होते गए. जैसे किसी किशोर के मन में सम्मोहन जमा होते जाते हैं. वह नहीं जानता कि उन सबका क्या करेगा? मुझे भी नहीं मालूम था. दोस्तों ने कहा इन कहानियों की किताब बना लो. तीन साल लगातार तीन किताबें आ गयीं.

एक रोज़ लगा किसलिए?

अपने बचे पड़े ड्राफ्ट्स को नहीं देखा. कम-कम पढता था, ज्यादा-ज्यादा सोचता था. फ़ितरतन फिर नए ड्राफ्ट जमा होते गए. दुखों को दूर रखने का कोई रास्ता नहीं था. इसलिए उनको लिखकर अपने पास बिठाता गया.

सबसे बड़ी तकलीफ होती है, बेमन हो जाना. तीन महीनों से लैपटॉप खोलता हूँ. जमा किये ड्राफ्ट की फ़ाइल तक जाता हूँ. फ़ाइल खुली पड़ी रहती लेकिन मैं किसी कहानी में नहीं जा पाता. ये एक उबाऊ सिलसिला बन गया. निराश होने लगता फिर हताशा आने लगती.

मेरी कहानियां कहाँ गयी? मैं सोचता कि इस तरह मेरा मन कैसे सूख सकता है? क्यों पपड़ियाँ बनकर सोचने की ज़मीन टूटने लगती है? मैं बहुत परेशान रहा. फिर सोचा कि मैंने कहानी संग्रह पूरा कर लेना सोचकर ख़ुद पर कोई दबाव बना लिया है. इसलिए कुछ काम नहीं होता. जबकि ऐसा कभी न था. मैंने कई बार तीस-चालीस दिन लगातार रोज़ दस घंटे तक लिखा है.

आज अचानक क्या हुआ?

सुबह का जागा हुआ सोचता रहा कि क्या कुछ लिख सकूंगा? लेकिन सोचना एक अलग बात होती है. दोपहर अलसाया पड़ा रहा. शाम होने से ठीक पहले मेरी आँखें चमक से भर गयी. मैं मुस्कुराने लगा. सबसे पास मानू मिली तो उसे कहा- "एक कहानी सुनो."

कई बार हम कुछ नहीं कर सकते. लोग बहुत बातें करते हैं कि हर परिस्थिति से लड़ना चाहिए. हिम्मत नहीं हारनी चाहिए. अथक प्रयत्न करने चाहिए. लेकिन मैं जानता हूँ कि जब आप कहीं चारों तरफ से घिर जाते हैं. तब आपके सब यत्न लगातार आपको निराश करते हैं. आपकी उर्जा चुकती जाती है. एक पल आता है जब आप गिव अप के मोड में आ जाते हैं. और ये कोई बुरी बात नहीं.

सुबह तक लगता था कि मेरे और कहानी के बीच सब खत्म हो चुका है. लेकिन ऐसा नहीं था.

July 5, 2017

मैं क्या कहता उसको?



तुम ख़ुशी की तलाश में 
एक खंडहर के सामने खड़े हो. 

हालाँकि मुझे तुम्हारे लिए ख़ुशी है. कि एक रोज़ तुम बीती ज़िंदगी को जानोगे. गुज़रे वक़्त के निशान पढना सीखोगे. समझोगे कि परमानन्द किसी साबुत चीज़ में नहीं है.

बीज का परमानन्द मिट्टी, पानी और हवा के साथ मिलकर फूट जाने में हैं. शाखों का परमानन्द हरा रंग छोड़कर भूरे हो जाने में हैं. एक बेहद बूढ़े पेड़ का परमानन्द आँख मूंदकर ठूंठ हो जाने में है. इसी तरह हर एक जो ज़िन्दा है. उसका परमानन्द अपनी गति को पा जाने में है.

प्रेम की भव्यता अधूरे होने में है और परमानंद नष्ट होकर बिखर जाने में. 
* * *

मैंने कहा- "अब जो भी लिखता हूँ बड़ा सतही और ग़ैर ज़रूरी सा लगता है." उस लड़की ने बहुत दिनों से रफ ड्राइव न किया था. सिगरेट बहुत रोज़ पीछे कभी पी थी. व्हिस्की के बारे में उसने कुछ बताया था मगर मुझे याद न रहा. उसने मेरी इस बात पर कहा- "केसी शराब को मेच्योर होने में वक़्त लगता है. आपने जो कुछ सात-आठ साल पहले लिखा है. वह आपको पसंद है. लेकिन यकीन जानो कि आज जो लिख रहे हो. वह सात आठ साल बाद वैसा ही अच्छा लगने लगेगा."

शाम की हवा गुम थी.

शायद बरसातें होने लगें. मैं आसमान में बादलों के फाहों को देखने लगा. उसकी आवाज़ फिर से आई- "मैं शायद उससे बात करना छोड़ दूँ" मैंने पूछा- "क्यों?" उसने कहा- "अब बार-बार प्रेम में पड़ने की हिम्मत नहीं रही. वही करीब होने का सोचना, मेल्स लिखते जाना, घबराये हुए रहना, सब कामों को भूल जाना. ये सब अब न हो पायेगा." मैंने कहा- "तुम भी थक जाओगी तो.." वह बोली- "तो.." जरा सा चुप रहा और फिर धीरे से कहा- "कुछ नहीं. अच्छा सुनो. क्या तुम्हें इस बात का एतबार होगा कि मैंने अपना एक बेकार सा सपना लिखकर एक लड़की को भेज दिया."

छत तक गली में हंस रहे बच्चों की आवाज़ आई.

मैंने नीचे झांककर देखा. वे दोनों बच्चे हंसी के जाल में फंस गए थे. एक दूजे को देखते और हंसने लगते. एक बूढ़ा आदमी इस हंसी से बेख़बर चारपाई पर बैठा था.

उसने पूछा- "फिर क्या जवाब आया?"

मैं क्या कहता उसको? 
* * *

सपनों के बारे में मुझे बस इतना पता है कि वे उसे बाँहों में भर लेने जैसे होते हैं. जिनके बारे में ठीक-ठीक नहीं समझा जा सकता कि ये सब क्या है? ठीक-ठीक किसी को कहा नहीं जा सकता कि क्या होगा. 
* * *

वह जो तुम्हारे पास इक ठहरी हुई निगाह थी न. वह अच्छी थी, केसी. 
* * *

July 4, 2017

धुएं के नीम नशे में स्वप्न


ये एक सामान्य दोपहर थी. उमस कम थी. एक सिगार के पैकेट में पड़े हुए कुछ सिगार बहुत पुराने हो चुके थे. क्या उनका स्वाद अब भी वैसा ही है. जबकि तम्बाकू पर बंधे हुए पत्ते में दरारें आ गयीं थी. बीस एक सिगारों में निचले वाली परत से उल्फत ने एक साबुत दीखता हुआ सिगार निकाला.- "लीजिये इसे ट्राय कीजिये." वह सिगार घुमाकर देखने से साबुत दिख रहा था. उसकी ख़ुशबू अभी तक काफ़ी बाकी थी. 

शहर के स्टेशन रोड पर हलके बादलों की छाँव कभी कभी शामियाना तान रही थी. बाज़ार में लोग कम थे. शादियों का आखिरी सावा निकल चुका था. निम्बू वाले गायब थे. बारिशो में पिलपिले हुए आमों से ठेला भरे हुए खड़ा आदमी ख़ुद बेहद गंदा था. उसे देखते सिगार के धुंएँ को खींचने के यत्न करते हुए पाया कि सिगरेट से इसका स्वाद अलग है. जीभ पर एक नीम कड़वाहट उतर आई है मगर गला अभी धुएं की खरोंच से बचा हुआ है. 

घर आया तो दोपहर अलसाने लगी. आँखों में नींद ने अपने पाँव पसार लिए. 

और स्वप्न की आहट हुई. 

विदेश में कहीं किसी काउंटी का क्लब था. जैसे हमारे बगीचे होते हैं. एक लम्बा रास्ता. उसके पास लोहे की फेंसिंग में हेजिंग के लिए खड़ी हरी झाड़ियों की कतार. आगे जाकर एक चौकोर बड़ा भवन जिसके नादर अलग अलग कमरे होंगे ऐसा आभास था. उसी हाल के बायीं तरफ बास्केटबाल का कोर्ट था. मैंने डॉक् हार सीढियाँ चढ़कर बायीं तरफ मुड़ते समय देखा कि वहां चार पांच लोग हैं. उनमें एक नौजवान था. एक अधेड़ उम्र का कपल था. बाकी दो लड़के थे. उनके बारे में ठीक से नहीं मालूम मगर वे कुल पांच लोग थे. 

औरत धीरे से बास्केटबाल कोर्ट की तरफ बढ़ी. मैंने देखा कि वह हवा में उछली. उसने कलाबाज़ी खाते हुए बास्केट रिंग की तरफ छलांग लगाई थी. ,उझे आश्चर्य हुआ कि वह इतना ऊँचा कैसे कूद सकती है. वह असल में बास्केट करने वाले खिलाडी की तरह कूदी ज़रूर थी लेकिन वह रिंग के ऊपर जाकर बैठ गयी.

एक छोटा सा गेप आया. जैसे अँधेरा फैल गया हो. 

वे चार लोग कहीं जा रहे थे. औरत बास्केट बाल बोर्ड के बराबर ऊँचाई पर लोहे के सपोर्ट पर बैठी थी. मैं उसकी तरफ बढ़ा. उस सपोर्ट तक पहुँचने से पहले मैंने देखा कि औरत में रुमान भर आया है. औरत बैठी थी. उसने पाने पाँव लम्बे किये हुए थे. वह मुझे पास न आने के संकेत की तरह ख़ुद को मुझसे दूर कर रही थी. असल में वह दूसरी तरफ झुक गयी थी. मैंने इसको नज़र अंदाज़ किया. मैं उसके करीब पहुंचा. एक छुअन को दो तीन बार दोहराया.  मैंने अपना सर उसकी दायीं जांघ पर रख दिया. आँखें बंद कर ली. 

अचानक औरत उन चार लोगों के साथ उसी रास्ते वापस जाती हुई दिखी. जिस रास्ते से मैं इस क्लब में आया था. औरत उनसे कह रही थी कि मैं इस बात की शिकायत करुँगी. मुझे लगा कि वह अपने पार्टनर के बारे में कह रही है. औरत और वे लोग बाहर चले गए तब वह नौजवान अचानक मेरे पास से गुज़रा. उसने मुझे कहा- "आपने ये क्या किया?"

नौजवान इतना कहकर खो गया. औरत का पार्टनर उस बड़ी बिल्डिंग के एक रास्ते पश्चिम की और जाता दिखाई दिया. उसकी बायीं जेब से एक लम्बी पिस्तौल झांक रही थी. उसका रंग चमकीला था. जैसे वह चाँदी से बनी है. वह आदमी अचानक पलटा. इसके पलटने के साथ मुझे ये अहसास हुआ कि वह मुझे खोज रहा है. शायद वह गोली चलाएगा. मैं दीवार के एक तरफ छिप गया. 

सहसा लगा कि वह आदमी मुझे खोजते हुए लुका छिपी की तरह दीवार के सहारे चलता हुआ मुझे देख लेना चाहता है. मैं गिव अप के हाल में पहुंच गया था. मैंने सोचा कि इस आदमी के साथ इस खेल में हार जाऊँगा. 

इसी भय में स्वप्न टूट गया.
* * *

दिन इतने तनहा है कि किसी आवाज़ में कोई रुमान नहीं आता. असल में मुझ तक मेरी या किसी की आवाज़ ही नहीं आती. 

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.