August 26, 2011

कोई भुला भी न सके...

भीगी हुई आँखों से देखते हुए अपने पांवों को समेटने लगी. उसने ख़ुद को इस कदर सौंप रखा था कि सिमट जाना असंभव था. वह रंग थी और बिखर गयी थी. ख़यालों की नामुराद दुनिया आँखों के सामने उग आई. अब वह उन धुंए से लिपटी रहने वाली अँगुलियों को छू कर देख सकती थी. कितने ही बरस पहले जिन खुशबुओं को हवा अपने साथ उड़ा ले गयी. वे अचानक काले घने बालों से उतर कर लम्बे लाल रंग के सोफे पर बैठी थी.

एक शाम बुझते हुए साये दीवार पर छूट गए. सालों तक दीवार का वह हिस्सा उतना ही ताज़ा बना रहा. वह आते जाते अंगुली के नर्म नाजुक पोरों से दीवार की उसी जगह पर एक अदृश्य रेखा खींचती हुई चलती थी. उसी दीवार से छन कर बेग़म अख्तर की आवाज़ आती थी. न जाने उसका मुहब्बत में हश्र क्या होगा जो दिल में आग लगा ले मगर बुझा न सके...

कुछ नहीं हुआ साल गिरते गए और जे एल ऍन मार्ग पर मौसमों के साथ नए फूल खिलते गए.

सफ़ेद संगमरमर के लम्बे चौड़े फर्श पर प्रार्थनाओं के बचे हुए शब्द बिखर गए. उसके बालों में हाथ फेरते हुए लड़की ने कहा. इधर आओ मेरे पास, यहाँ मेरी धड़कनों के करीब. तुम यहाँ रहते हो. गिरहों से उठती खुशबू से परे लड़का बरसों पहले की किसी गंध की तलाश में झुकता गया. उसने ज़रा और झुक कर अपने महबूब के पांवों को चूम लिया.
लड़की ने पांव पीछे खींच लिए. लड़के ने ऊपर की ओर देखा, जहाँ आसमान बीच से ठीक दो अलग टुकड़ों में बंट जाता है.

बारिश गिरती ही गयी...

August 20, 2011

ऐ ज़िन्दगी गले लगा ले

सिंधी केम्प बस अड्डे की सुबह बादलों की ढाल से ढकी हुई हल्की उमस बुन रही थी. मैन गेट के आगे सायकल रिक्शे कतार में खड़े थे. उनके मालिक कम पानी वाले बूढ़े दरख्तों जैसे थे. जिन्होंने इस शहर को पाँव पसारते हुए देखा, जिन्होंने मजदूरी के लिए जयपुर की बूढ़ी गलियों से आशिकी कर रखी थी. उनके काले धूप जले चेहरों पर सफ़ेद तिनके उगे हुए थे. एक रिक्शे की तिरपाल से बनी छत पर प्लास्टिक के दो पुराने चप्पल रखे थे. उसमें सोये हुए आदमी को देखते हुए ख़याल आया कि वह बहुत निर्जीव किन्तु रिक्शे सा ही वाचाल हो सकता है.

इधर सड़क पर चलने को तैयार खड़े रिक्शे के पास चालीस पार उम्र के दो आदमी खड़े थे. दोनों में एक समानता थी कि उनकी हड्डियों पर मांस नहीं था. एक का चेहरा लम्बा और सीधा था. दूसरे का गोल और पीठ के साथ नीचे की और झुका हुआ. लम्बे वाले के चेहरे पर कुछ शिकायतें रखी थी. वे लहरों की तरह होठों के पास से उठती और कान की तलहटी तक जाकर समाप्त हो जाती. उसके होठों के ऊपर चिपकाई हुई नाक के ऊपर दो आँखें रखी थी. उन्होंने दुनिया की चकाचौंध से डर कर गहरे खड्डों में छुप जाने की आदत बना रखी थी. मैंने सोचा कि इस आदमी को अगर अपनी आँखें साफ़ करनी हों तो उनको अँगुलियों से खोज कर बाहर लाना पड़ता होगा.

जिस आदमी का चेहरा गोल था. उसकी शक्ल सूजी हुई थी. उसकी आँखें मेंढकों की तरह बाहर की ओर किन्तु लटकी हुई सी जान पड़ती थी. जैसे शामियाने में प्लास्टिक के गोलों में बुझे हुए बल्ब लगे होते हैं. उन आँखों के बारे में बहुत सोचने पर भी मेरे पास कोई उचित संभावना नहीं थी कि वे ऐसी क्यों हैं ? अपने आप को इस विचार से बहलाया कि वे आँखें दुनिया के और स्वयं के प्रति बेहद उदासीन है. जैसे किसी के पास जीने की कोई वजह ही न हो.

मुझे एकाएक लगा कि मैं यहाँ बैठ कर अपनी उस भेड़ की कहानी को लिख सकता हूँ जो नैतिकता के दार्शनिक ह्यूम से बातें करती थी. जिसने मनुष्यों के बहकावे में आकर अपनी चार में दो आँखें हमेशा के लिए खो दी थी और अब नीचे वाली दो आँखों के सहारे सर झुकाए हुए गोल घेरे की संरचना में जी रही थी. इस गोल चेहरे वाले ने भी भेड़ की तरह नीची नज़र से रिक्शा खींचते अपने अधिकतर साल सड़क की किताब पर लिख दिए होंगे. संभव है कि वे आँखें सड़कों की नैतिकता से आजिज़ आ गयी हों.

वहां तब तक तीसरा आदमी आया नहीं था. वे दोनों किसी नियमित रहस्य पर आपस में मितव्ययी संवाद कर रहे थे. चाय की थड़ी वाले कांच के ग्लास को धोते समय पतले चेहरे वाले ने कोई अत्यंत उदासीन बात कही. वह एक तिरस्कार भरा वाक्य भी हो सकता था. मैंने सिर्फ़ इतना ही पाया कि वे शब्द कसैले थूक का गोला थे. जिन्हें निहायत जल्दी में थूक दिया गया.

वे दोनों सड़क पर खड़े रिक्शे को छोड़ कर दूसरी पंक्ति में खड़े एक रिक्शे तक आये. प्लास्टिक के देसी के पव्वे से एक तिहाई ग्लास में डाला. थोड़ा सा पानी मिला कर पीते समय पतले चेहरे वाले के मुंह में फ़िर कुछ शब्द आ गए. उनको भी किसी खास तवज्जो के बिना सड़क की किताब पर लिख दिया. उन शब्दों कि निर्बाध उत्पत्ति का स्रोत चालीस साल का उसका इतिहास रहा होगा.

तीसरा आदमी मेरी और पीठ किये खड़ा था. उसका कद उन दोनों से कम था और सर के बाल श्याम से श्वेत होने की प्रक्रिया के अंतिम पायदान पार थे. वह निरंतर कुछ संकेत करता हुआ बोल रहा था. जब गोल चेहरे वाले ने ग्लास को मुंह से लगाया तो कोई लहर उसकी सूरत की झील में नहीं जगी. वह उसी तरह झुका रहा. उसने ग्लास को प्रेम की जगह एक लघुतम शुकराना अदा करने के अंदाज़ में देखा या हो सकता है कि वह सड़क को ही देख रहा था.

गोल चेहरे वाले की मौन कुंडली में कुछ और गिरहें पड़ गयी. उसका मुंह शायद बंजर हो चुका था. वहा तिरस्कार न था, कोई लगावट भी न थी और फसलें क्या शब्दों की खरपतवार के निशान भी नहीं थे. पतले चेहरे वाला अब सायकिल के डंडे पर बैठा था और उसकी कमर किसी कूबड़ वाले इंसान जैसी हो गयी थी. ये ज़िन्दगी की कैसी शक्ल है. इसका तर्जुमा कैसे किया जाय ?

तीसरे आदमी ने उस ग्लास का क्या किया. इस पर उन दोनों ने कोई ध्यान नहीं दिया. तीसरे आदमी का ज़िक्र करते हुए मुझे रोटी से खेलने वाले तीसरे आदमी की याद आई जिसके बारे में मेरे देश की सांसद मौन थी. सुबह साढ़े पांच बजे इस तरह बोतल से उगते हुए सूरज को देखना कैसा लगता है, इसे मैं वहीं रिक्शेवालों के बीच बैठ कर लिखना चाहता था. तभी जिस रिक्शे की छत पर चप्पलें रखी थी. उसमें आधा सोया आदमी पूरा जाग गया.

उसने एक गाली दी. वह किस गिरी हुई नैतिकता से आहत था, कहना मुश्किल था. मगर उसके अंदाज़ से वह एक बहुत निरपेक्ष गाली थी क्योंकि उसने बकते समय अपने आस पास किसी की ओर नहीं देखा था.

August 16, 2011

ये सूरत बदलनी चाहिए...

अपने सब्जी वाले दोस्त की दुकान के आगे खड़ा हुआ नए पुल के लिए चल रहा निर्माण कार्य देखता हूँ. चार मशीनें हैं जो एक बड़े कटर को उठा कर ज़मीन पर मारती है. कल कारखानों से आने वाले लयबद्ध शोर का प्रतिरूप कानों से टकराता है. भाई अगर भ्रष्टाचार न होता तो ? ऐसा कह कर मेरे मित्र आसमान की ओर देखते हैं. वे भी एक आम आदमी की तरह उस सर्वशक्तिमान से अपेक्षा रखते हैं कि वह अवतार भले ही न ले मगर एक दिन अपनी जादुई ताकत से हमारा कल्याण करेगा. उनकी पैंतालीस साल की उम्र में अब तक उस उपरवाले ने कोई चमत्कार नहीं किया है.

जड़ता की प्राचीर से जकड़ा हुआ हमारा समाज बहुत पहले की बात नहीं है और हम रुढियों से उपजे कष्टों की बेड़ियों में बंधे हुए आदिम कबीलाई लोग हैं. आज इस मुकाम पर खड़े हुए पाता हूँ कि जिस भारत को आज़ाद कह कर अंग्रेज छोड़ गए थे, वह वास्तव में दिग्भ्रमित, असंगठित समूहों और कबीलों का भौगोलिक आकार मात्र था. उसका उत्थान हुआ मगर वह अपेक्षित रूप से बहुत कम है. यही हमारी निराशा है. हमारे पास अतुलनीय ज्ञान था किन्तु श्रेणियों की सीढियों पर सबसे ऊपर बैठे हुए चंद लोग उस पर मालिकाना हक़ का दावा किये हुए हैं. इसी का हमें अफ़सोस है. अँधेरा अभी भी इतना है कि आम अवाम अब भी नोकदार जूतियों के नीचे कुचल दिए जाने की ही हैसियत रखता है. आज़ादी के सातवे दशक की ओर बढ़ते हुए हम पाते हैं कि समय ने बहुत कुछ बदल दिया है. समय, जो एक काल्पनिक घड़ियाल है. जिसे हर वस्तु और प्राणी के भीतर रिवर्स मोड में फिट किया हुआ है. यह सिर्फ़ उलटी गिनती करता है. गिनती पूरी, परिणाम शून्य. ऐसा ही हाल सभ्यताओं का होता है.

भ्रष्ट होने के कई सारे अर्थ है. अपने कर्म और आचरण से गिरा हुआ, पद से निम्न, आधार से नीचे, दूषित, अशुद्ध, गंदा, अस्वच्छ आदि. भ्रष्ट न होना आदर्श स्थिति है. हालाँकि मैं विज्ञान से सहमत हूँ कि आदर्श स्थिति को हर हाल में नहीं बनाये रखा जा सकता. हम मनुष्य से जिस प्रकार के आचरण की अपेक्षा करते हैं, वह नदी के बहाव के विपरीत बहने का काम है. चाणक्य ने राज्य के नागरिकों और कर्मचारियों के बारे में कहा था कि "वे समुद्र की मछलियाँ हैं. उसी का जल पियेंगी और उसे ही अस्वच्छ करेंगी." इस कर्म में परिवर्तन इसलिए संभव नहीं है कि हमारी सोच एक निषेध का शिलाखंड है. इसको ईमानदारी और नैतिकता के पाठ पढाये जाते हैं किन्तु उनका प्रवेश निषिद्ध ही रहता है. सत्य, अहिंसा, ईमानदारी और शुचिता जैसी किसी भी शय का उपयोग हम अपनी सुविधा के अनुसार करना पसंद करते हैं.

परसों नगर परिषद् के कर्मचारी स्टेडियम की साफ़ सफ़ाई में लगे थे. उन्होंने यह कार्य सरकारी आदेश से बाध्य होकर किया. उनके भीतर इस कार्य को कर पाने का सामर्थ्य इस विचार से उत्प्रेरित था कि साल भर सरकार से तनख्वाह लेते हैं तो साल में दो बार तो थोड़ा काम करना ही चाहिए. उनके भीतर इतनी नैतिकता बची है. स्वतंत्र भारत की सालगिरह पर सूर्योदय हुआ. स्टेडियम में रंगीन ध्वज और पताकाएं लहराई. बच्चों ने व्यायाम प्रदर्शन किया, फौजी बूटों ने अपनी ठोकरों से आसमान को गर्द से भर दिया. तीन घंटे के कार्यक्रमों के बाद जय हिंद के उदघोष के साथ बड़े जलसे का विसर्जन हो गया. स्टेडियम में हम हमारी नैतिकता, आचरण की विशेषताओं और देशप्रेम के रूप में प्लास्टिक की खाली बोतलें, चाट खाने की डिस्पोजेबल प्लेट्स, कुल्फी की डंडियाँ, टूटी हुई कुर्सियां, पान और गुटखों के पीक से भरी हुई दीवारें और भी जो हमसे संभव हुआ छोड़ गए. ऐसा आचरण करते हुए हम जब सरकारों को भ्रष्ट कहते हैं तो यह लड़ाई कभी न खत्म होने वाली होंगी.

कई दिनों से हल्ला है. सरकार की चूलें हिला दी जाएगी. इस ऐतिहासिक कार्य के लिए, मेरे देश के लोग मसखरे समाचार विक्रेताओं का मुंह देख रहे हैं. प्रकाशन वालों की एक अंगुली सरकार और चार ख़ुद की तरफ है. क्या राज्य और व्यवस्था का निर्माण देश के एक चुने हुए मुखिया और उसके चंद सिपहसालारों से होता है. क्या न्यायपालिका किसी जादुई डंडे पर सवार है कि भ्रष्टाचार, अपराध और हिंसा को बुहार कर बंगाल की खाड़ी में डाल देगी. लम्बी जुबान वाले बड़बोले सामान्य रूप से सत्ता परिवर्तन के आकांक्षी हैं. वे समाज को व्यवस्था परिवर्तन का झूठा सपना दिखा रहे हैं. अभी उस प्रतिकारिणी प्रभा का आलोक फैला नहीं है जो जाति और वर्ग आधारित समाज, व्यवस्था और कानून को कुचल सके. समय की घड़ी में अभी कई फेरे बाकी है. अभी भी हिंदुस्तान में रोटी आराम से न सही पर नसीब जरुर है.

वे भले ही किसी मुंह से झंडा फहराएँ या न फहराएँ, हम जिस आन्दोलन में जायेंगे, वहा क्या छोड़ कर आयेंगे ? अपनी बदचलनी, भौतिकता की भूख का दैत्य, बेशऊर जीने की आदत, देश को लूट खाने की नियत, अपराध के जीवाणु, सांप्रदायिक सोच, कट्टरता... क्या क्या छोड़ कर आयेंगे. या फ़िर हर बार की तरह हमारे ही श्रम की कीमत से बने बेरीकेट्स को तोड़ते हुए एक कचरे का ढेर छोड़ आयेंगे. बंध्याकृत पुलिस के सर फोड़ कर अपने बेबसी के गुस्से के निशान छोड़ कर आयेंगे. या फ़िर पान और पीक की तरह खून बहा कर दीवारों को बदरंग करेंगे. हमारे राष्ट्र प्रेम के प्रतीक यही बचे हैं. नैतिकता के अभाव में हमारी हताशा का बूमरेंग लौट कर हमारे ही सर आएगा. निरंकुश शासन की जड़ों में ये खाद और पानी का काम करेगा.

मैंने बचपन में पढ़ा था कि क्रांतियों के जनक बुद्धिजीवी लोग होते हैं. वे हमारा पथप्रदर्शन करते हैं. उनके दिखाए हुए रास्ते पर चल कर सुखी और समृद्ध राष्ट्र का निर्माण होता है. मेरे मन में प्रश्न है कि ये रास्ता किसे दिखाना है ? सरकार जैसे एक तंत्र को जिसे हमने चुना है और जिसे आने वाले निर्धारित समय में पदच्युत करने का अधिकार हमारे पास बचा हुआ है. या फ़िर आम नागरिक को सामाजिक होने के लिए दी जाने वाली शिक्षा को दुरस्त किये जाने की जरुरत है. निजीकरण के नाम पर बेच दी गयी स्कूलें और यूनिवर्सिटीज़ को पुनः जीवित करना है ताकि खरीद की कागज़ी शिक्षा का स्थान गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा ले सके. हम गुणों के ग्राहक हो सकें. नैतिक लोगों की सामूहिक आह पञ्च तत्वों के भीतरी विस्फोट से उठने वाले रौंद्र धूमकेतुओं से भयानक होती है. वह तमाम तरह के अपशकुनों कि रौंदती हुई एक निर्मल संसार की रचना करती है. अगर हमारी कामना भ्रष्टता से मुक्त होने की है तो इसका रास्ता भीतर की ओर खुलता है.

समस्त प्राणी प्रदर्शन प्रिय होते हैं. वे अपने स्वरूप और आकार को वास्तविकता से ऊंचा और भव्य दिखाना चाहते हैं. यही हाल कमोबेश बौद्धिक होने में भी है. इस बार के अनुष्ठान के बारे में सोचते हुए मुझे उन अनपढ़ बंधुआ लोगों की याद आती है जिन्होंने अट्ठारह सौ सत्तावन में कोशिश की थी कि एक राष्ट्रव्यापी आन्दोलन हो. देश का हर नागरिक कुशासन और परतंत्रता से मुक्त होने के लिए घर - परिवार का त्याग करे. लेकिन इस बार इन पढ़े लिखे लोगों के दस सदस्यीय समूह के पास ऐसा कोई एजेंडा नहीं है कि गाँव कस्बों तक भ्रष्टाचार के विरुद्ध आम आदमी को कैसे लामबद्ध किया जाये. यह कई बार चंद ज्ञानी लोगों द्वारा बौद्धिकता के प्रदर्शन का अनुष्ठान अथवा उनकी आत्ममुग्धता का गान जान पड़ता है.

सियासत के लोग दुनिया के हर कोने में बदनाम है. उनको हेय दृष्टि से देखा जाता है. वे जिन कुर्सियों पर विराजते हैं. वे काम कुर्सियां है. उनके पाए अहंकार से बने हैं. उनकी गद्दियाँ लोभ की खाल से मढ़ी हुई है. पीठ अनैतिक लालसाओं बनी है. ऐसे आसन पर विराजमान साधारण या विशिष्ठ प्रतिनिधियों से जनपक्षधरता की आशा करना फिजूल की बात है. वे जिस कानून के तहत चुन कर आये हैं. उसका जनता की अपेक्षा अपने हित में सर्वाधिक उपयोग करेंगे. वे जनता की उम्मीद की कटोरी में हर बार नए मुद्दे का अंगारा डाल कर सुख शैय्या पर लेट जायेंगे.

खैर ! मुझे लगता है कि इस बार गाँधी टोपीवाले के आह्वान पर हर हिन्दुस्तानी की अंतरात्मा का नरसिंहावतार हो चुका है. उसने अपने मन की भ्रष्टता को धो डाला है. वह राष्ट्र की उन्नति हेतु अपने लिए निर्धारित अथवा सौंपे गए गए कार्य के अतिरिक्त कुछ योगदान देना चाहता है. वह आज से देश से भ्रष्टाचार की सफाई के लिए प्रतीकात्मक रूप से नगर परिषद् के कर्मचारियों का इंतजार किये बिना स्वच्छता के कार्य में लग जायेगा. सड़क पर चलते हुए नियम नहीं तोड़ेगा. राशन अथवा अन्य जनसुविधाओं के लिए लाइन में खड़ा होगा और अपने कीमती समय के जाया होने का रोना नहीं रोयेगा. वह ईमानदारी से जियेगा...

नैतिकता की मशीने हमारी जड़ हुई चेतना पर अपने सत्य के कटर से प्रहार करेगी और निषेध के शिलाखंड को चूर चूर कर देगी. आमीन ! ऐसा ही हो ! वाहे गुरु, मुझे भी सद्बुद्धि दो !


August 12, 2011

बिसात-ए-दिल भी अजीब है

मैंने सच कहा था कि ईमानदारी से लडूंगा लड़ाई. अपने हाथियों के बाड़े हरी टहनियों से भर दूंगा. घोड़ों के लिए काले चने और ऊँटों के मुंह के आगे बेर की मीठी पत्तियों से भरा बोरा रख दूंगा. मैं अपनी श्रेष्ठ योजना बनाऊंगा कि तुम फ़िर जीत कर उदास न हो जाओ.

घोड़ों के कानों में कहूँगा कि खेल से लौटते ही उन्हें अस्तबल में नहीं बांधूंगा. हाकिम के ओरण में छोड़ दूंगा, जहाँ वे हिनहिना सकेंगे किसी अन्दर की बात पर. ऊँटों को दूंगा प्रलोभन कि इस बार शीत ऋतु में सारी यात्रायें स्थगित कर दी जाएगी. वे अपने लटके हुए होठों के बीच से अपनी गलफाड़ से ब्ला बल बल की आवाज़ निकालते हुए ख़ुद को घोषित कर सकेंगे रेगिस्तान का पिता. हाथी हालाँकि अपने मृत प्रियजनों की स्मृतियों में है. वे बची हुई हड्डियाँ टटोलते हुए संवेदनाएं व्यक्त करते, दुश्मन को ढहा देने के विचार से भरे हैं. लेकिन उनको भी मना ही लूँगा कि मेरे पास कुछ छलावे के जंगल हैं. उनमें मैंने सच्चाई के पेड़ों पर झूठ की कलमें रोप रखी हैं, वहां सच धरती को थाम के रखता है और झूठ फलता फूलता जाता है.

इतनी वृहद् योजना के बाद लगातार चौथी बार शह और मात सुनते हुए गुम हूँ ख़याल में कि मेरे घोड़े क्यों आलसी हो गए है, दूसरे घर तक जाने से पहले गिर जाते हैं. लगातार गिरती बारिश से ऊँटों को हो गया है वहम कि शरद आ गया है. हाथी जाने किस अफ़सोस में पी गए हैं, मेरी सारी शराब और उठते गिरते हुए चलते हैं, ऊंट की टेढ़ी चाल ?

मेरे बच्चे, मुझे तुम्हारी इस बात पर अभी भी यकीन नहीं है कि ये लकड़ी के मोहरे भर हैं और मैं उदास हूँ इसलिए खेल नहीं पा रहा सलीके से.

कम होंगे इस बिसात पे हम जैसे बदक़िमार
जो चाल हम चले सो निहायत बुरी चले [ज़ौक]

August 10, 2011

अबूझ और उदास सपनों की रातें

एक धुंधलका था. चुप्पी थी और चंद शक्लें थी. कहीं जा रहा था. रास्ते की पहचान को लेकर कोई जिज्ञासा नहीं थी. संभव है कि एक दस साल के लडके का हाथ पकड़े हुए था या उसके साथ चलते हुए ऐसा फील होता था कि हाथ को थामा हुआ है. वह एक अनवरत घेरती हुई शाम थी. जैसे वक़्त के साथ शाम अपना रंग बदलना भूल गयी थी. सफ़र कुछ क़दमों पर रुका हुआ सा था. यानि कहीं जा नहीं पा रहा था और ऐसा भी नहीं था रुक गया हूँ. मन उदास, डूबता हुआ. कौन देस, कौन मुसाफ़िर... जिसे जानते थे, वो खो गया. अचानक प्यास लग आई. देखा दोनों बच्चे छत पर बिछी हुई चारपाई पर सोये हैं. नीचे बिछी हुई एक सफ़ेद रंग की राली पर मैं उठकर बैठ जाता हूँ.

शोर है. रौशनी है. कुत्तों की आवाजें हैं. रेल का इंजन शंटिंग की तैयारी में हल्की विशल देता हुआ घर की ओर बढ़ा आ रहा है.

दूसरी रात
अपने चश्मे को उतारता हूँ और आँखों के आगे धुंधले वृक्षों की कतार खड़ी है. आँखों को मसलते हुए फ़िर से खोलता हूँ मगर पेड़ों की कतार कायम रही. कनपटी से उतरता हुआ पसीना है. गीला और डरावना. एक बार फ़िर आँखें खोलते हुए अपना चश्मा लगा कर देखता हूँ. चश्मा भी ख़राब. उस पर भी गहरा धुंधलका. चश्मे के किनारों से कुछ सूझता है. यानि दुनिया बची हुई है मगर मेरी आँखें जवाब दे गयी है. चेहरा उदास हो जाता है. मन अधीर होने लगता है. बिना आँखों के जीने का ख़याल... चौंक उठता हूँ. बंद कमरे में ऐसी की ठंडक से बच्चे बेडकवर ओढ़े हुए हैं. जया तकिये की गोद में सर रखे सो रही है. मेरी चादर गायब है.

अँधेरा. विंडो ऐसी के फैन की आवाज़ और अचानक चुप हुए झींगुर. उन धुंधले पेड़ों से बिछड़े हुए एक पेड़ की तरह बाएं हाथ से बिजली का स्विच खोजता हुआ सीधा खड़ा होता हूँ. अलमारी के निचले हिस्से में रखी चादर लेकर सो जाता हूँ.

कल की रात
हरी भरी जगह है. एक ढलवां पहाड़ी पर दस पंद्रह कदम चलते ही दो नौजवान बातें कर रहे हैं. वे आधुनिक और एक अविश्वसनीय यन्त्र में लेट कर एक बेहद ऊंचे वाटरफाल से कूदने को तैयार है. सिहरन है. भय है. गिर जाने के असंख्य ख़याल है. पीछे नहीं मुड सकता हूँ. मेरा किसी से कूदने का वादा भी नहीं है. वे दोनों अपनी छलांग लगा देते हैं. मैं कूदने की जगह से नीचे देखता हूँ, एक अतल गहराई. वे टूटी हुए उल्का की गति से ओझल हो जाते हैं. मेरे भीतर की बुनावट के पत्थर आपस में टकरा कर शोर करते हुए टूटने लगते हैं मगर बाहर से उदासीन और साबुत दीखता हूँ.

अगली बारी मेरी है. असहाय और नितांत अकेला पानी की ओर खिंचा चला जाता हूँ. रो नहीं सकता. प्रतिरोध के लिए कोई नहीं है. पानी बुला रहा है. कोई मुझे देख रहा है. मैं गिरना नहीं चाहता...

किसका इंतज़ार है, क्यों बचे रहना है ?

* * *

सरल गायिकी के उस्ताद हैं. आलाप, गिरहें और सरगम को शब्दों में पिरो लिया है. समंदर खां और साथी दुनिया की चाल के साथ चलते हैं. इतना आसान गाते हैं कि मांगणियार गायन शैली से अलग नज़र आते हैं. हिचकी गाते हुए खड़ताल का सुन्दर प्रयोग इन्हें बचाए रखता है. तुम्हें समझ आये इसलिए इतना सरल गीत चुना है.

ओ सजन ये न समझना कि तुमसे बिछड़ कर मुझे चैन है. जल बिन मछली की तरह दिन रात तड़पती हूँ. सजन आये ओ सखी क्या भेंट करूँ, थाल को मोतियों से भर दूँ और उनके ऊपर रखूं अपने दो नयन.

मेरा पिया याद कर रहा है और मुझे हिचकी आ रही है, बाजरी के नन्हे दाने चिड़ियाएँ चुग रही हैं. ओ पिया मैंने तुम्हें मना किया था कि यूं परदेस न जाना वहां की जादूगर स्त्रियाँ तुम्हें अपने सम्मोहन में कैद कर के रख लेगी. तुम बिन मुझे छत सूनी लगती है और गढ़ गिरनार भी सूना लगता है. कुदरत ने पहाड़ के ऊपर सुन्दर पहाड़ रच दिए हैं ओ सुनार तुम तो मेरी पायल के लिए बजने वाले बिछिये घड़ दो. घर के आँगन में एक बेल लगी हुई है और उसमें से काला नाग निकल आया, वह डस ही जाता मगर मैं तुम्हारे भाग्य से बच गयी हूँ... ओ पिया तुम याद कर रहे हो और मुझे हिचकी आ रही है...

August 7, 2011

ऐ दोस्त तेरे लिए !


इस संदूक में जाने कितने ख़ुशी और अफ़सोस के मीठे नमकीन अहसास, विरह के आंसू और मिलन के उदात्त क्षणों की रंगीन झालरों के टुकड़े रखे हैं. मखाणे, बताशे और खटमिठियों के स्वाद के बीच सोने की चूड़ियाँ, गुलाबी पन्नों पर लिखे हुए सुनार के हिसाब, लाल रंग के गहने रखने के बक्से, पिताजी की कुछ डायरियां, बीकानेर के सरदार स्टूडियो में खिंची हुई मेरी माँ की श्वेत श्याम तस्वीर रखी है. और इस बड़े संदूक के अन्दर कीमती सामान रखने का एक छोटा संदूक भी है.

उम्रदराज़ अगड़म बगड़म के बीच रखे हुए इस छोटे से सदूक को माँ संदूकड़ी कहती है. इस पर किसी सिने तारिका की रंगीन तस्वीर छपी है. सुहाग की साड़ी में माथे पर लाल रंग की बिंदिया सजाये हुए नायिका, रेगिस्तान की दुल्हन से मिलती जुलती दिखती है. माँ जब भी बड़ा संदूक खोलती, एक खुशबू पूरे घर में बिखरने लगती. मैं दौड़ा हुआ उस तक पहुँच जाता. मेरा मन जिज्ञासा और मिठास की लालसा से भरा संदूक के आस पास अटका रहता. जब मखाणे खाने का मजा चला गया तो पहली बार देखा कि उस छोटे से सुन्दर संदूक की तस्वीर के पास से कुछ रंग उतर गया है.

मैंने पूछा. माँ इसको ये क्या हुआ ? माँ उस संदूक पर हाथ फेरते हुए शायद कुछ साल पीछे लौट गयी थी. मेरे ताउजी का सुन्दर पीला ऊंट और उस पर कसा हुआ पिलाण (काठी) माँ को विगत के हिचकोलों में खींच ले गया होगा. माँ को शहर तक पहुँचाने के लिए ताउजी ऊंट के साथ पैदल थे और माँ ऊंट पर मुझे लेकर बैठी थी. पिलाण के अगले सिरे पर लगी पीतल की सुन्दर खूंटी पर माँ ने अपनी कपड़े की थैली को टांगा हुआ था. उस थैली में यही सुन्दर सा नन्हा संदूक भी था. ऊंट की चाल के साथ पिलाण की खूंटी से रगड़ खाता गया और बाड़मेर आते आते उस पर गहरे निशान हो गए.

बरस बीतते गए और माँ अपना सुख दुःख समेट कर इसी डिब्बे के आस पास जमा करती गयी. उम्र की खरीदारी में क्या पाया और खोया इसका हिसाब नहीं होता. कितनी सुन्दर आरसियाँ आई. उनमें अपने चहरे देखे, खुश हुए और वे धुंधली होकर टूट कर बिखर गयी. माँ की सोने की चूड़ियाँ हर दो चार सालों में बदलती रही. कमर का कंदोरा उपेक्षित होकर सुनार के यहाँ टूट गया. पाँव की चांदी की कड़ियाँ एक दिन शहर के फैशन ने उतरवा दी आखिर हाथी दांत के चूड़े की जगह भी लाल रंग के मूठिये ने ले ली. कानों में पहने जाने वाली गोल टोटियों की जगह सोने के टॉप्स आ गए. गले की हंसुली की जगह सोने की चेन आ गयी. माँ के अधिकतर जेवर समय के साथ बदलते गए मगर यह छोटी संदूकची नहीं बदली.

मेरे नाना के पास भी ऊँटों का टोला था. माँ उनकी गर्दन से लटक कर उन पर चढ़ जाने में माहिर थी. कभी वैसे ही मामा मुझे लटका देते तो मैं रोने लगता. वे हँसते, नेनू ये लड़का कहां से लाई है ? ऊंट रोजाना पानी पीने जालिपा या उतरालाई नाडी तक जाया करते थे. मैं सिर्फ़ ऊंट की पीठ पर सीधा बैठने में ही खुश रहता था. ऊंट की पीठ से भेड़ें और छोटी दिखाई देती थी. समय के साथ आये बदलावों ने ऊंट को मनुष्य से दूर कर दिया. नाना ने सारे ऊंट बेच दिए. ताऊजी ने भी पीले ऊंट को बेच दिया. अब उसकी याद इस छोटे संदूक पर शेष है.

समय की अदृश्य नदी अपने साथ हमारे प्रियजनों को बहा ले गयी है. मेरे नाना, दादा, ताऊ, पिता, सब मामा और भी जाने कितने हँसते बोलते हुए चहरे अनंत में खो गए हैं. माँ चीज़ों से बातें करती हैं. उनके सुख दुःख पूछती है. छोटे भाई छुट्टी बिता कर वापस नौकरी पर जा रहे होते हैं तब घर के किसी कोने में आंसू सुखाती हुई कुछ बोलती है. जिसे सिर्फ़ ये पैंतालीस साल पुरानी दो हथेली पर रखने जितनी बड़ी संदूकची ही समझ सकती है. ये माँ की सच्ची मित्र है. मैंने माँ से कहा अपना संदूक दिखाओ ना... आज मित्रता दिवस है.

* * *

दोस्त आज तुम्हें लोकगीत करिया सुनवाता हूँ. करिया का अर्थ है नौजवान ऊंट. रेगिस्तान वासियों के सुख दुख के इस सच्चे साथी पर अनगिनत गीत रचे गए हैं. यहाँ के लगभग हर लोकगीत में इसका ज़िक्र आ ही जाता है. मुझे इस उदासीन दार्शनिक पर बहुत प्यार आता है कि ऊंट न होता तो रेगिस्तान की अनेक प्रेम कहानियां अधूरी रह जाती. इस गीत को हालाँकि मैंने ही रिकार्ड किया है मगर आदतन गफूर ने उत्साह में कुछ बंद अपनी मर्ज़ी से जोड़े घटाए हैं. यूं भी गफूर खाँ मांगणियार और उनके साथियों की गायिकी का मैं दीवाना हूँ इसलिए सब गलत सलत भूल जाता हूँ. गीत का आगाज़ एक दोहे से है जिसमें प्रेयसी कह रही है "ओ पिया तुम से तो ये जानवर भी अच्छे हैं जो दिन भर वन में चरते हैं और सांझ घिरने पर दिन के अस्त होने के समय तो घर की आस करते हैं".

ढोला थां सूँ ढोर भला, चरे वन रो घास
साँझ पड्या दिन आथमें करें घरों री आस.

सांवलें रे गैरो, म्हारे अन्नदाता रो करियो,
करिए रे घूघर माळ...
तड़के झकावों हाँ जी करियो रे, फड़के मंडावां पिलाण
सरवर सोने रा हाँ जी पगड़ा रे, मोतिड़े जड्योड़ी मुहार
करियो बंधायो हाँ जी कोटड़ी रे, घोड्लो गढ़ री भींत
करिए रे घूघर माळ.

गीत का भाव ये है कि मेरे पिया जी का सांवले रंग का सुन्दर नौजवान ऊंट है और घुंघरुओं की मालाओं से सजा हुआ है. भोर भये इसे झोक में बिठाएं और जल्दी से पीठ पर रख दें पिलाण (होदा). इसके सोने जैसे सुन्दर पाँव है और मोहरी (लगाम) में मोती जड़े हुए हैं, ओ नौजवान ऊंट तुझे बिठाएं मेहमानखाने के पास और घोड़े को बांधें गढ़ की दीवार के पास. इस सुन्दर गीत में नायिका ऊंट की प्रसंशा कर रही है और प्यार जता रही है ताकि वो इसके पिया जी को तुरंत घर ले आये.

तुम देखना एक दिन मेरे पास भी सुन्दर नौजवान ऊंट होगा और मैं उस पर चढ़ कर महबूब के घर चला जाऊँगा.

August 1, 2011

एक उड़ने वाला गाँव

मिहाई बाबित्स की कथा का एक पात्र भद्र लोगों के शहर में एक संभ्रांत शराबघर में असंभव की हद तक की घृणा और अपने शरणार्थी होने के अकल्पनीय दुःख से भरा हुआ आराम कुर्सी पर बैठा है. वह अभी अभी दोस्त हुए एक आदमी को कहानी सुना रहा है. श्रोता उसको टोकते हुए कुछ पूछता है. कथा के बारे में अचानक अविश्वास से पूछे गए प्रश्न पर कहता है. क्या तुमने कभी हवा में मेज खड़ी कर देने वाला तमाशा देखा है ? प्रश्नकर्ता अपना सर हिला कर हामी भर देता है.

"मेज हवा में कैसे खड़ी हो जाती है. ध्यान करने से, एकाग्र मन से. अगर ध्यान करने से एक साधारण सी मेज हवा में खड़ी हो सकती है तो हम एक मकान नहीं उठा सकते ? एक गाँव नहीं उड़ा सकते ? वह गाँव जहाँ हम बड़े हुए, जहाँ आज भी हमारी आत्मा भटक रही है. विश्वास करिए अगर मेरी तरह आधी रात को आप भी भागे होते, अगर आपने बर्फीली हवा के थपेड़े खाते हुए खुले मैदान में पहाड़ों की शरण में रात बितायी होती, आपके ख़यालों में होता आपका घर, गाँव के पेड़, उस गाँव की चीज़ें और आपने सोचा होता कि कल तो आप उन सबके बीच थे, कल तक तो आपने सपने में भी नहीं सोचा था कि आपको उनको छोड़ कर भागना पड़ेगा तो आप शेख चिल्ली की तरह ख़यालों में खो जाते. आप भी सोचते कि आपके ख़याल आपके घर को क्यों नहीं उड़ा लाये और सारी दुनिया ने आपके ख़यालों का हुक्म क्यों नहीं बजाया."

प्राइमरी के अध्यापक से विश्वविद्यालय के प्रोफेसर तक का सफ़र करने वाले और न्यूगात के संपादक रहे, बाबित्स इस कहानी में बेघर और अपनी ज़मीन से बेदखल होने के अहसासों गहरी बुनावट है. इसे पढ़ते हुए मैं एक बारगी अपनी इस ज़मीन से लिपट जाने के ख़याल से भर उठता हूँ. आप भी अपने बंगले, घर, फ्लेट या झोंपड़ी में बैठे हों और ये हुक्म मिले कि आपको अब यहाँ से विदा होना होगा. अपने साथ आप उतना ही ले जा सकेंगे जितना आपकी दो भुजाओं में सामर्थ्य है और वक़्त उतना ही दूर है जितनी दूर फौजी बूटों से आती आवाज़. आप सबसे पहले अपने बच्चों के हाथ थामेंगे फ़िर भयभीत पति अथवा पत्नी को दिलासा देती असहाय नज़रों से देखते हुए, अपने माता पिता को खोजने लगेंगे. यह दृश्य आपके ज़हन में आते ही उडीसा, पश्चिम बंगाल, झारखण्ड, गुजरात, नोएडा, थार मरुस्थल का बाड़मेर, उपजाऊ सिंगुर, नमकीन कच्छ, जंगल, भूख, तेंदू पत्ता, खेजड़ियाँ, सागवान, चन्दन, नदियाँ सब भूल जायेंगे. सिर्फ़ एक अदृश्य मुहर आपकी तकदीर पर लगी हुई दिखाई देगी. इस पर लिखा होगा, शरणार्थी.

हावर्ड फास्ट के उपन्यास पीकस्किल के नीग्रो पात्र जिन्हें अपनी ही जगह पर कुत्ते से बदतर जाना और व्यवहार किया जाता था. शरणार्थी न थे. वे अपमान सह रहे और अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे काले योद्धा थे. रियोनुसुके अकूतागावा की कहानी शकरकंद की लपसी का लाल नाक वाला नायक 'गोई' बेरहम ज़िन्दगी जीते हुए, उपहास के थपेड़ों से टकराते हुए, किसी एक व्यक्ति का प्रिय हो जाने की ख्वाहिश के साथ, एक दिन के लिए मीठा पकवान खा लेने की हुलस लिए फिरते कुत्ते जैसा होने के बावजूद शरणार्थी नहीं है. राबर्ट लुई स्टीवेंसन का मार्खिम, विद्रूप जीवन से हारा हुआ है. अपने आप को कोसता है लेकिन शरणार्थी नहीं है. इसी तरह जीवन में दुःख सर्वत्र है. दुख का निदान असंभव है. ज्ञान के आलोक में अपनी धरती से प्रेम दुखों का मरहम है. एक बार झुक कर उस मिट्टी को चूम लेना, जिसने जन्म दिया अतुलनीय औषधि है. इस दवा का छीन लिया जाना हद दर्ज़े का ज़ुल्म है. यह सबसे बड़ा दुःख है.

देशों के विभाजन से संक्रमण करने वाले अथवा अपने ही देश में अपनी ज़मीन से बेदखल प्राणी शरणार्थी है. बाबित्स की इस कहानी को कई बार पढने के बाद मेरे मन में ऐसे विचार आये जिनको बड़ा नाकारा कहा जा सकता है. एक विचार आया कि मेरे देश में आज कहानी के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर कहे जाने वाले लेखकों की प्रतिबद्धताएं किन से जुड़ी है. नौजवान होती पीढ़ी के विवाहपूर्व के सहवास के सम्बन्ध, जिन में एक ही लड़की या लडके के तीन चार बार के दोहराव से प्रेम की खिल्ली उड़ाती हुई कथाएं. गाँव से बेदखल हुए गरीब की घर से भागती हुई बेटियां. उन बेटियों के अंगों का भौतिक रूपांकन. पत्नी के पडौसियों से सम्बन्ध. धार्मिक आस्थाओं को ओढ़े फिरने वाले चरित्रों के पिछवाड़े का फूहड़ वर्णन. प्रेम के नाम पर गुलाबी रोयों पर आख्यान. राजनीति, क्रिकेट और पब का कॉकटेल. समाज की स्फूर्त रगों में दौड़ती गालियों के मुहावरे और एक छायावादी रूपकात्मक अंत. मैं इसे निम्नतम स्तर का मानता हूँ.

गाँव से शहर आये गरीब आदमी को शरणार्थी के रूप में कभी देखा है. वो वक़्त कितना कठिन रहा होगा जब जननी जन्मभूमि से मजबूर कर देने वाली हालातों में बेदखल होना पड़ा होगा. क्या नई पीढ़ी के दुःख की लकीरें राज्य के चेहरे पर दिखाई देती है ? हमारे ऊर्जावान लेखकों ने कभी सोचा है कि नितम्ब एंव उघडे हुए कूल्हों की बातें करते और पेंट की जेब में निरोध लिए फिरते बच्चों के जिस संसार को अपनी कथाओं में रचते हो उसके लिए सुनहरा भविष्य कहां रखा है. वह साहित्य कहां है, जिसमें वन नाईट स्टेंड, फक-यू और फक ऑफ़ के इतर एक बेबस और लाचार दुनिया है. वह कहानी कहां है जिसमें लिखा है कि माओवादी, नक्सलवादी या भगवा पट्टी सर पर बांधे घूमते हुए युवाओं के रोज़गार किसने छीन लिए ? उनके इकहरे पवित्र प्यार की मिठास को कौन निगल गया.

हम आत्म परीक्षण के अभाव में पीत लेखन के बहुत करीब पहुँच गए हैं. नए बहु राष्ट्रीय प्रकाशन संस्थान जिस तरह का लिखवाना चाह रहे हैं. वह कमोबेश पतनशील साहित्य है. जिस पर तुम यथार्थ का वर्क चढ़ा कर खुश होने का ड्रामा कर सकते हो. कितने लेखकों के पास ऐसे उपन्यास लिखने का कांट्रेक्ट है कि वे एक गरीब अछूत के इकलौते प्रयासों से आर्थिक राजधानी में सर उठा कर जीने का मुकम्मल सपना सच होते लिखेंगे, जंगलों और ज़मीनों से बेदखल हुए लोगों का शहरी समाज की गंदगी में डूबते जाने और उससे उबरने की छटपटाहट को लिखेंगे. जिस आरक्षण से देश के एक बड़े तबके का भला होना था, उसे किसने ज़हर का प्याला बना दिया है. घर में पांडुर पिशाच के साथ अकेली छूट गयी नव सामंत परिवारों की स्त्रियों के दुःख और वेब के पोर्न में उलझे हुए मासूम बच्चों के बचपन के हरण के बारे में लिखने का कांट्रेक्ट किसके पास है. सोचता हूँ कि गाली की स्वीकार्यता, अश्लील का जबरिया श्लीलकरण, स्त्री को कामुक देह और पुरुष को व्यभिचार का पिटारा लिखने वाले आत्ममुग्ध और भीतर से कामलिप्सा से भरे हुए युवा कार्पोरेट लेखकों की बडाई करने वाले बुजुर्ग लेखकों की पीढ़ी के लिए कोई आईना है या नहीं ?

मिहाई बाबित्स के नायक का गाँव, जिससे वह खदेड़ दिया गया था. उसके बेटे के सपनों में आता है. खेत में उगी घास चलने लगती है. गिरजा अपने प्यारे बच्चों से प्यार करने के लिए झुक जाता है. घर अपनी खिडकियों से उन सब फौजियों को बाहर फैंक देते हैं, जिन्होंने उन पर कब्ज़ा कर लिया था. हमारी आत्मा अपनी ज़मीन को पुकारती रहती है. अपने गाँव के ख़्वाब देखता हुआ छोटा सा बेटा सर्द रातों से चार दिन लड़ता हुआ आखिरकार पिता की बाँहों में मर जाता है. इस तरह एक 'उड़न छू गाँव' हर रात उम्मीदों के ख्वाबों से सजा हुआ अपने प्रिय बाशिंदों तक पहुँच जाया करता है. और उस गाँव से निकाला गया हर मनुष्य अपनी अंतिम साँस काल्पनिक रूप से उसी गाँव में लेता है. उसकी आत्मा का अपेक्षित मोक्ष उसकी अपनी जन्मभूमि में है. जिस तरह नए दौर के लेखकों को पढ़ते हुए मैं उदास हो जाता हूँ. उसी तरह बाबित्स की कहानी का नायक कहता है. मनुष्यों के विपरीत इस शराब में आत्मा है.

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दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.