September 29, 2013

कमर पर बंधी है कारतूसपेटी

दो कवितायें -
तुम्हारी याद की
जबकि तुम इतनी ही दूर हो कि हाथ बढ़ा कर छू लूँ तुम्हें।
















तुम्हारे जाने का वक़्त था
या फसाने की उम्र इतनी ही थी
कि बाद तब से अंधेरा है।

वक़्त की
जिस दीवार के साये में
सर झुकाये चल रहा हूँ,
वो दीवार दूर तक फैली है।

धूप नहीं, याद नहीं,
और ज़िंदगी कुछ नहीं
कि आवाज़
जो लांघ सकती है दीवारें
वह भी गायब है।

कमर पर बंधी है कारतूसपेटी
हर खाने में एक तेरा नाम रखा है।

इस तंग हाल में
बढ्ने देता हूँ
उदासी के भेड़ियों को करीब
जाने कौनसा कारतूस आखिरी निकले।

काश एक तेरा नाम हुआ होता बेहिसाब
और एक मौत का कोई तय वक़्त होता। 
* * *


अश्वमेध यज्ञ के 
घोड़े की तरह मन
निषिद्ध फ़ासलों पर लिखता है, जीत।

आखिर कोई अपना ही
उसे टांग देता हैं हवा के बीच कहीं
जैसे कोई जादूगर
हवा में लटका देता है
एक सम्मोहित लड़की को।

हमें यकीन नहीं होता
कि हवा में तैर रही है एक लड़की
मगर हम मान लेते हैं।

इसी तरह
ये सोचना मुमकिन नहीं
कि तुम इस तरह ठुकरा दोगे,
फिर भी है तो...

शाम उतर रही है
रात की सीढ़ियों से उदास
और मेरी याद में समाये हो तुम।

[Painting Courtesy : Pawel Kuczynski]

September 27, 2013

रेगिस्तान में रिफायनरी की आधारशिला

सुबह अच्छी हवा थी लेकिन बारह बजते ही उमस ने घेर लिया। पचपदरा के नमक के मैदानों पर तने हुये आसमान में हल्के बादल आने लगे। मैं सवेरे छह बजे घर से निकला था। रेत के मैदान से नमक भरी जगह पर आ गया था। विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा के लिए तैनात जांच दल और प्रवेश पास बनाने वाली एजेंसी के पास जाते ही मालूम हुआ कि हमारे पास जिला मुख्यालय पर पीआरओ के पास हैं। ये बेहद उदास करने वाली बात थी। तीन दिन पूर्व पास बनाने के लिए किए गए निवेदन के बावजूद वे समय पर मिल नहीं पाये। मैं कार में अनमना बैठा था कि इंतज़ार करने के सिवा दूजा कोई रास्ता न था। इस तरह के वीआईपी दौरों के समय कई तरह की असुविधाएं होती हैं इससे मैं वाकिफ हूँ। लेकिन लापरवाही भरे तरीके से प्रवेश पास का गैरजिम्मेदार लोगों के पास होना और समय पर पहुँचकर भी सभा स्थल पर रिकार्डिंग के लिए अपने उपस्करणों को स्थापित न कर पाना अफसोस की बात थी।

सुबह जब हमारी टीम वहाँ पहुंची तब तक सब खाली था। कुछ देर पहले लगाए गए होर्डिंग्स और बैनर रस्तों को नया लुक दे रहे थे। ज़्यादातर होर्डिंग अपने नेता के प्रति वफादारी या अपनी सक्रिय उपस्थिती दिखाये जाने के लिए लगे थे। मैं इन सब से बेपरवाह बैठा रहा। अचानक मैंने देखा कि कुरजां का एक झुंड ऊपर से गुज़रने लगा। ये दृश्य मनोहारी था। मैंने कुरजां को संबोधित लोकगीत अनगिनत बार सुना है। सुना कहना ठीक न होगा वरन ये लोकगीत रेगिस्तान के हर बाशिंदे के मन में रचा बसा है। किसी विरहन की आर्द्र पुकार है कुरजां ऐ म्हारों भंवर मिलाय दो। उनके सलेटी रंग के डेने हवा में तैर रहे थे। वे नीचे से कुछ कम सलेटी दिख रही थी, जैसे काली स्याही पर खूब सारा पानी गिर जाने से रंग हल्का होकर छितरा गया है। एक विशेष ज्यामिती में उनके उड़ने का सलीका सम्मोहन से भरा था। मेरी उदासी को इन प्रवासी पंछियों ने एक बार भुला दिया।

लोगों के काफिले आने लगे और मेरी बेचैनी बढ़ने लगी। दो घंटे के इंतज़ार के बाद जिला मुख्यालय से आए पत्रकार साथी के साथ हमारा प्रवेश पत्र भी आया। सुरक्षा के कई चक्रों के पार एचपीसीएल कंपनी के अधिकारी ने मीडिया को प्रवेश दिये जाने वाले गेट पर हमें रोक लिया। उन्होने कहा कि आप ये पास अपनी जेब में रखिए और लौट जाईए। हम आपको प्रवेश नहीं दे सकते हैं। मैंने पूछा कि क्या इसकी कोई वजह है। वे कहते हैं कि इतने सारे लोगों को बैठने की जगह नहीं है। मैं कहता हूँ कि हम आकाशवाणी से आए हैं और इस कार्यक्रम को रिकर्ड करना एक ऐतिहासिक काम है। वे कुछ नहीं सुनते। पुलिस वाले कहते हैं वापस जाईए। वहाँ न तो कोई स्थानीय प्रशासन का अधिकारी होता है और न ही कोई पुलिस का अधिकारी जिनसे ये निवेदन किया जा सके कि आकाशवाणी जनता का सरकारी माध्यम है और इस अवसर की रिकार्डिंग करना लोक प्रसारण का दायित्व है। मैं पीआरओ को फोन लगाता हूँ लेकिन सुबह दो बार नो आनस्वर हुआ फोन इस बार लगता ही नहीं है। जाने क्या सोच कर एचपीसीएल का हठी और दंभी अधिकारी मुझे कहता है- तुम अंदर चले जाओ।

एक बड़े भूभाग में तने हुये लोहे के विशाल तम्बू के नीचे लोग जुट रहे थे। बारह बजे तक कोई सत्तर अस्सी हज़ार के आस पास लोग थे। लेकिन असल कारवां का आना तभी शुरू हुआ था। भव्य मंच के आस पास सत्तासीन जनप्रतिनिधि बेचैन कदमों से जायजा ले रहे थे। समय आहिस्ता गुज़र रहा था और कोलाहल बढ़ता जा रहा था। मुझे खुशी थी कि सौंपे गए काम के आधे अधूरे पूरे हो जाने का जुगाड़ हो गया था। हमें वहाँ तक नहीं जाने दिया गया, जहां से पत्रकार ऑडियो का आउटपुट ले सकते थे। जन प्रसारण की बात अब पीछे छूट गयी थी। हमें जनता को सुनने के लिए लगे हुये स्पीकर्स से ही कुछ रिकर्ड करना था। अचानक एक हल्की फुहार आई। नमक के मैदान पर तैर रहे बादल बरसने लगे थे। एक हल्की घरघराहट की आवाज़ आई और बादलों के बीच एक सफ़ेद और केसरिया रंग का चॉपर उतरता हुआ दिखने लगा। हेलिकॉप्टर के रंग को देखकर मेरे चहरे पर हल्की मुस्कान आई। मैंने खुद को याद दिलाया कि इस उड़ने वाले यान से पक्का संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी ही उतरने वाली हैं। वे बाड़मेर के पचपदरा में देश की एक बड़ी रिफायनरी और पेट्रो केमिकल कॉम्प्लेक्स के शिलान्यास का अनावरण करने आई थी। पेट्रोलियम मंत्री, राजस्थान के मुख्य मंत्री सहित कई ऊंचे नेता और मंत्री इस काफिले में शामिल थे। भाषणों के दौरान समय की कीमत रेखांकित थी। अपार जनसमूह में सबसे अधिक उत्सुकता सोनिया गांधी को देखने की थी।

केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं के बारे में बात करने से पहले मुख्य वक्ता ने इस रिफायनरी से होने वाले विकास के बारे में लंबी बात की। और आधे भाषण के बाद वही बात आई कि आज़ादी के इतने बरसों बाद भी जो सपना हमने देखा था वह अभी अधूरा है। लेकिन इस उद्बोधन में पुनः विश्वास दिलाया गया कि ये काम हम ज़रूर पूरा करेंगे। नेता और जन प्रतिनिधियों का काम डेढ़ घंटे में पूरा हो गया। केसरिया पीठ वाला चॉपर फिर से हवा में उड़ गया। भीड़ अपने घरों की ओर लौटने लगी। मैंने सोचा कि जिन अधिकारियों के कारण आकाशवाणी की रिकार्डिंग टीम को बेशुमार व्यवधान उठाने पड़े उनके बारे में उचित जगह पर एक शिकायत दर्ज़ करवाऊँगा लेकिन मैं भी लगभग भारतीय ही हूँ। मैंने दो दिन बाद इस तकलीफ को भुला दिया। हम सब अपनी मुश्किलों को कुछ ही देर याद रख पाते हैं और अक्सर हालत को बेहतर बनाने के लिए अपना योगदान देने की जगह खुद को हालत के अनुकूल ढालते हुये चुप रहना पसंद करते हैं। लौटते समय भी मुझे बहुत सारे प्रवासी पक्षी दिखे। उनका कलरव भेड़ों की आवाज़ों से अलग एक समूह गान सा प्रतीत हो रहा था। मैंने खुद को यकीन दिलाया कि एक दिन हम भी समूह स्वर में कोई गान गाते हुये जाग जाने का अहसास कर सकेंगे।

September 26, 2013

जो अपना नहीं है उसे भूल जाएँ।

ये परसों रात की बात है। शाम ठीक से बीती थी और दफ़अतन ऐसा लगा कि कोई ठहरा हुआ स्याह साया था और गुज़र गया। मेरे आस पास कोई खालीपन खुला जिसमें से ताज़ा सांस आई। काम वे ही अधूरे, बेढब और बेसलीका मगर दोपहर बाद का वक़्त पुरसुकून। 

कहीं कोई उदास था शायद, वहीं कोई शाद बात बिखरी हो शायद।
* * *
ऊंट की पीठ पर रखी उम्र की पखाल से, गिरता रहा पानी 
और रेगिस्तान के रास्तों चलता रहा मुसाफ़िर ज़िंदगी का। 

बस इसी तरह बसर हुई। 

कम फूलों और ज्यादा काँटों वाले दरख्तों, धूप से तपते रेत के धोरों और अकूत प्यास से भरी धरती वाले ओ प्यारे रेगिस्तान, तैयालीस साल असीम प्रेम देने का बहुत शुक्रिया। 

तुम्हारे प्रेम में आज फिर एक नए बरस की शुरुआत होती है।
जन्मदिन शुभ हो, प्यारे केसी।
* * *

शाम ढले घर में पाव के सिकने की खुशबू थी। 

पेशावर से मैं कभी जुड़ नहीं पाता। मुझे मीरपुर खास ही हमेशा करीब लगता है। देश जब बंटा तो सिंध से आए रिफ़्यूजियों के हर झोले में गोल ब्रेड थी। जिसे वे पाव कहते थे। कोई तीस हज़ार साल पहले किसी कवक के गेंहू के आटे में पड़ जाने के बाद जो फूली हुई रोटी बनी, ये उसी का सबसे अच्छा रूप है। जिस तरह तंदूर के बारे में हमें थोड़ी सी मालूमात है कि ये पहाड़ों से सरकता हुआ रेगिस्तान के देशों तक आया, उसके उलट किसी को ये मालूम नहीं है कि पाव ने किस रास्ते को तय किया है। योरोप के लोग जिंहोने हमारे जैसी पतली कागज़ी रोटी खाना अब तक नहीं सीखा, वे इस पाव पर बड़ा हक़ जमा सकते हैं अगर इटली वाले कोई आपत्ति न करें तो। असल में फ्रांस की क्रांति के बारे में बात करते हुये लोग रोटी की गंध से भर जाते हैं। 

पिछले दफ़े जब जयपुर में था तब आधी रात हो चुकी थी और खाने का वक़्त जा चुका था। बच्चे सो रहे थे और मैं रोटी सेक रहा था तभी मनोज ने कहा- दुनिया की सबसे अच्छी खुशबू सिकती हुई रोटी की होती है। फ्रांस के, वे केफ़ेटेरिया में बहसें करने वाले लोग जब भूख से बेहाल हुये तो ब्रेड के लिए राज महल को लूटने चल पड़े थे। अफ्रीका वाले लंबे और काले लोग ब्रेड के बाद ही हर धरम का उदय मानते हैं। वे अपनी इस अनमोल चीज़ से वेदिक लोगों की तरह ही भोग लगाते हैं। मैंने देखा है कि देवताओं के लिए ब्रेड एक ज़रूरी चीज़ है। रिफ़्यूजियों के आने से पहले ही हमारे यहाँ खूब ब्रेड बना करती थी। भारत आए गोरों ने ब्रेड बनाने की भट्टियाँ सबसे पहले लगवाई थी। उन भट्टियों ने हमें बताया कि भूख मिटाने के लिए पेट भरने की जगह विलासिता के कई तरीके ईजाद किए जा सकते हैं। औध्योगिक क्रांति के समय तपेदिक से मर जाने वाले अनगिनत नौजवानों की असल मौत ब्रेड के खत्म होने के बाद हुई थी। 

हम केक नहीं काटते। हम जन्मदिन पर मुंह मीठा करते हैं। गुड़ हो या रस-मलाई। फिलहाल आभा ब्रेड सेक रही है। जिसे हम पाव कहते हैं। इसकी खुशबू बेहद प्यारी लग रही है। ब्रेड हमेशा बची रहे कि बेहिसाब दुआएं दोस्तों ने दी है। दोस्तों का भला हो कि आज प्याला सिर्फ दुआओं से भरा है।

चलो आज का दिन कुछ यूं मनाए, कि जो अपना नहीं है उसे भूल जाएँ।
वैसे तो कुछ न भूला जाएगा हमसे, इसलिए भूल जाने की अफवाह उड़ाएँ।

September 23, 2013

रेगिस्तान का आसमान अक्सर



रेगिस्तान के बीच
एक पथरीले बंजर टुकड़े पर
कई लोगों को कल देखा था, मैंने।

कोलाहल के अप्रिय रेशे
छू न सके मेरे कानों को
कि कुछ इस तरह भरी भीड़ में
तेरी याद को ओढ़ रखा था, मैंने।

कितने ही रंग की झंडियाँ
लहराती थी हवा में मगर
मैंने देखा कि तुम बैठे हो
वही कुर्ता पहने
कल जो तुमने खरीदा था
याद आया कि कपड़ों की उस दुकान में
जाने कितने ही रंगों को चखा था हमने।

सुगन चिड़ी बैठी थी
जिस तार पर
वहीं मैं टाँगता रहा
कुछ बीती हुई बातें
कोई भटकी हुई बदली
उन बातों को भिगोती रही
लोगों ने ये सब देखा या नहीं, मगर देखा मैंने।

बाजरा के पीले हरे सिट्टों पर
घास के हरे भूरे चेहरे पर
शाम होने से पहले गिरती रही बूंदें
जैसे तुम गुलाब के फूल सिरहाने रखे
झांक रहे हो मेरी आँखों में
याद के माइल स्टोन बिछड़ते रहे
कार के शीशे के पार खींची बादलों की रेखा मैंने।

मैं कहीं भी जाऊँ
और छोड़ दूँ कुछ भी
तो भी तुम मेरे साथ चलते हो।

बीत गया
वो जो कल का दिन था
और उसके ऊपर से
गुज़र गयी है एक रात पूरी।

मगर अब भी
तुम टपकने को हो भीगी आँख से मेरे।

[बस इसी तरह बरसता है रेगिस्तान का आसमान अक्सर।]
















तस्वीर साभार : अली अब्बास सैयद

September 17, 2013

सबकी पेशानी पर है प्रेम की थोड़ी सी राख़

दो दिन की डायरी के तीन टुकड़े। 

रेत के बीहड़ में लोहे के फंदे में फंसी एक टूटी हुई टांग के साथ असहनीय दर्द की मूर्छा लिए हुये तीन सामर्थ्यहीन टांगों से छटपटाता है हिरण। हिरण, जो कि एक प्रेम है। अर्धचेतना में डूबा अपने महबूब शिकारी की प्रतीक्षा में रत। मृत्यु और भोर के बीच एक निश्चेष्ट होड़। 

उसके होठों जितनी दूर और उतनी ही प्यासी, बुझती हुई हिरण के आँखों की रोशनी। इस तड़प के वक़्त बेखबर शिकारी सो रहा है जाने किस अंधेरे की छांव। हिरण के डूबते दिल की आवाज़ समा रही है धरती की पीठ में। वह तड़पता है फंदे में बेबस और लाचार। 

सबकी पेशानी पर है प्रेम के अतीत की थोड़ी सी राख़। 

मैं एक अघोरी हूँ। जो बैठा हुआ हुआ है छत पर और रेत उड़ उड़ कर गिर रही है सूखे प्याले में।

15 Sept 2013 8 PM

वक़्त में नमी रही होगी। दीवार के बीच कहीं एक पत्थर के आस पास से झड़ गया था सारा सौदा जिसके साथ रहा होगा वादा थाम कर रखने का। ऊपर खुला आसमान था लेकिन बाकी तीन तरफ खाली छूटी हुई लकीरों को किसी तत्व का नाम नहीं दिया जा सकता था। उस जगह को दरारें ही कहना एक मजबूरी थी। 

पत्थर मगर अटल था किसी नियम से बंधा हुआ। न उसे कोई हवा गिरा पाती थी। न उस तरफ से कोई दीवार चढ़ने की कोशिश करता था। जैसे किसी ने सुन लिया हो प्रेम का हाल और और उसे छोड़ दिया हो उसी के हाल पर। 

भरी पूरी दीवार पर एक तन्हा पत्थर कैसा दिखता है? 

जैसे कोई केसी जैसा आदमी शाम ढले छत पर बैठा शराब पी रहा हो। एकदम तन्हा। और कोई हवा, कोई नशा न गिरा पा रहा हो उसे।

* * *

15 Sept 2013 10.30 AM

कल रात औंधा पड़ा रहा प्याला, रेगिस्तान की हवा उलट भी न सकी उसमें क़ैद दोपहर उदासी। मैंने रात का या रात ने थाम रखा था मेरा हाथ और उस उदासी को खींच लाया हूँ इस सुबह तक। नीम की टहनियाँ झुक रही हैं दक्षिण से उत्तर की ओर आक के पत्ते उड़ने लगे हैं आहिस्ता। मैं वक़्त का मुंह देख रहा हूँ इस उम्मीद में कि वह जल्दी जल्दी पौंछे तुम्हारी चीया के आँसू, बेटे की हतप्रभ आँखें और तुम्हारी संगिनी के दिल में रख दे वेदना को पीने का सामर्थ्य। 

ओ रेगिस्तान की आँधी मिटा दो कल के दिवस का निशान कि हम यूं भी जानते हैं स्मृति से बुनना दुखों को। आई लव यू दीपक अरोड़ा। मैंने उस दिन सच कहा था कि प्यार है। सुबह सुबह रोना बड़ी मामूली चीज़ है तुम्हारे न होने के सामने...

September 13, 2013

हसरतों का बाग़

कभी कहा न किसी से तेरे फसाने को न जाने कैसे खबर हो गयी ज़माने को। सिटी बस में यही ग़ज़ल बज रही थी। सवारियाँ इस सोच में डूबी थी कि डायवर्टेड रूट में किस जगह उतरा जाए तो अपने ठिकाने लग सकते हैं। हर कोई इसी कोशिश में है कि वह ठिकाने लग जाए। मेरे पास कोई काम न था। मैं छुट्टी लेकर राजधानी में घूम था और दिन की गर्मी सख्त थी। सिटी बस में कभी कभी हवा का झौंका आता लेकिन उसे अधिक ट्रेफ़िक कंट्रोल कर रही विशल की आवाज़ आती। शहर में बड़ा सियासी जलसा था। जलसे वाली जगह के बारे में मैंने पूछा कि यहाँ कितने लोग आ सकते हैं। मेरे पूछने का आशय था कि इस सभा स्थल की केपेसिटी कितनी है। जवाब मिला कि कोई तीन लाख के आस पास। विधानसभा का भवन जिस ओर मुंह किए खड़ा है उसी के आगे ये जगह है। अमरूदों का बाग़। खुला मैदान है। पहले यहाँ पुलिस का मुख्यालय बनना था लेकिन किन्हीं कारणों से इस जगह को खाली ही रहने दिया गया। मैं इस खाली जगह को देखकर खुश होता हूँ। खाली जगहें हमारी मत भिन्नता और असहमतियों के प्रदर्शन के लिए काम आ सकती है। अंबेडकर सर्कल से देखो तो विधान सभा के आगे कोने में दायें हाथ की तरफ एक छुपी हुए जगह है। यही अमरूदों का बाग़ है। मेरे ससुराल में एक अमरूद का पेड़ लगा हुआ है। वो पेड़ रहेगा कब तक ये नहीं मालूम मगर हमने बेसब्र होकर खूब कच्चे अमरूद खाये हैं। कच्चे अमरूद और पके अमरूद के खाने में सिवा इसके कोई अंतर नहीं है कि एक खट्टा लगता है मगर मुंह को पानी से भर देता है। दूसरा पका हुआ मीठा होता है और जल्दी खत्म हो जाता है। ऐसे ही लोग नए स्वाद के लिए उमड़ पड़े थे। जयपुर शहर की सड़कों पर भारी भीड़ थी। जिस तरह हमारी आबादी बढ़ी है उसके अनुपात में देखें तो सांख्यिकी का कोई जानकार इसे सामान्य भीड़ भी कह सकता है। लेकिन ये एक राजनैतिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जुटी हुई भीड़ थी। इसलिए समर्थन वाले अपने दोनों हाथ खड़े किए हुये थे और वे इसे दो दो लोगों के हाथ गिनवाना चाहते थे।

मैंने एक साहब से पूछा कि क्या आपने इससे पहले कभी इतनी भीड़ देखी है। उनका जवाब था कि अमरूदों का बाग़ में अलबत्ता इतना हुजूम कभी नहीं जुटा। हाँ मगर आरक्षण की माग को लेकर जब जाट एकजुट हुये थे तब ये जगह छोटी पड़ रही थी इसलिए उन्होने विध्याधर नगर के स्टेडियम में सभा की थी। यानी ये जयपुर की नहीं अमरूदों का बाग़ की अब तक की एक बड़ी सभा थी। जलसे में जो भाषण हुये उनमें देश का विकास किस तरह किया जाएगा इस पर बात नहीं हुई। एक ही बात हुई कि राज अक्षम लोगों के हाथ में है। नेतृत्व और नैतिकता का अभाव है। इसी जलसे के बाहर कुछ युवा काले झंडे लिए लिए हुये विरोध प्रदर्शन भी कर रहे थे। उनके विरोध को आयोजकों के कार्यकर्ताओं ने कठोर सबक सिखाया। सरे राह, बीच भीड़ के उनको इस कदर पीटा कि सारा विरोध नंगा हो गया, विरोध के कपड़े फट गए। मैं सोच रहा था कि विरोध करने की ये सज़ा कौन दे रहा है। उनके समर्थक जो नैतिकता का पाठ अभी अभी पढ़ा रहे हैं। सभा में खिल्ली उड़ाने की खूब बातों के बीच पसीना और गर्मी थी। लोकतन्त्र की खुशबू शायद इसी को कहते हैं कि जनता, शासन के दरवाजे पर खड़े होकर बदलाव की चुनौती दे रही है। असीम उत्साह से भरे हुये कार्यकर्ताओं ने इतने नारे लगाए कि जिनके नाम से नारे लग रहे थे वे खुद विचलित हो उठे। ये उन्माद अपूर्व था। केसरिया रंग के परचम और माथे पर वैसी ही पट्टियाँ बांधे हुये। गले में अपने प्रिय नेता के पोस्टर को पहने हुये। मैंने एक युवा से पूछा कि क्या लगता है? उसने कहा- इस बार ढाह लेंगे। मैं अगला सवाल निश्चित रूप से यही पूछता कि आप लोग 'ढाह' लेने के बाद क्या करोगे इसके बारे में कुछ बताते क्यों नहीं। लेकिन मैंने ये सवाल स्थगित ही रखा कि आज ही के दिन यहीं पर विरोध करने वालों की सरे राह किस तरह हजामत हुई थी। 

वापसी के वक़्त मैं जिस सिटी बस में बैठा था वह महल के आस पास पूरी खाली हो गयी। उसमें विध्यालय गणवेश में कुछ छात्राएं सवार थी। मेरे आगे बैठी हुई एक लड़की ने सफ़ेद रंग के पीटी शू पहन रखे थे। उन पर हल्की धूल जमा थी। दायें पैर के जूते पर लिखा था, अंजलि। अँग्रेजी में लिखे हुये उस नाम को पढ़ते ही मेरे मन में अपनी लिखी कहानी का स्मरण हो आया। मैंने सोचा कि क्या मैं इसके जूते की एक तस्वीर ले लूँ। अचानक मैं अपने ही इस खयाल से डर गया। सेलफोन से फोटो क्लिक करने की आवाज़ आते ही लड़की शायद नाराज़ हो जाती और उससे पूछ कर फोटो लेना होता तो मैं क्या कहता उससे? आसाराम जैसे कथित बापुओं ने हमसे ऐसे प्रिय सम्बोधन भी छीन लिए हैं जिन्हें हम अपनी बेटियों के लिए उपयोग में लेते आए हैं। मैं अंजली के नाम को पढ़ता हूँ। सिटी बस में कोई गीत नहीं बजता। हम चार लोग हैं जो बिना एक दूजे के सामने देखे आखिरी स्टॉप पर उतर जाते हैं। शाम को बेटे से फोन पर बात करता हूँ। उसने सायकिल चलना सीखा है। मैं कहता हूँ कैसा लग रहा है। वह कहता है सायकिल ढलान में अपने आप चलती रहती है, मुझे तो खूब मजे आ रहे हैं। उसकी बात सुनते ही मुझे खयाल आया की हर कोई ढलान में आते ही सायकिल की सीट को कब्ज़ाना चाहता है। अगले दिन सब अखबारों में एक खास वर्ग की महिलाओं के बड़े फोटो छपे होते हैं। वहीं कई लोग मिल कर कुछ लोगों को पीटते हुये दिखते हैं। मीडिया मेनेजमेंट है कि मीडिया किसी को बनाने के मुगालते में ये भूल जाता है कि वह कैसा रसायन बना रहा है। पंचतंत्र की नीति कथाएँ याद आ रही है। इसलिए मैं विष्णु शर्मा का आभार व्यक्त करते हुये चुप हो जाता हूँ।

September 4, 2013

शाम के झुटपुटे में


वीकेंड के खत्म होने से कोई छः घंटे पहले उसका मेसेज़ आता। मैं अभी लौट कर आई हूँ। इस मेसेज़ में एक थकान प्रस्फुटित होती रहती थी। संभव है कि इस थकान को मैं अपने आप सोच लेता था। इसके बाद वह बताती कि कुछ नहीं बस हम दोनों सोये रहे। हाँ वह होता है बिलकुल पास। मगर मुझे नहीं पसंद वह सब।

वीकेंड हर महीने चार पाँच बार आता था। समय बदलता रहता किन्तु उसके आने और बात करने का सलीका नहीं बदलता था। वह उसी की बाहों में होती थी और होता कुछ न था। कई बार मुझे ऐसा आभास होने लगता कि वह शायद इस तरह हर बार जाने से उकताने लगी है। उसने कहा भी था। मैं फिर से हमारी बातों से गुज़रते हुये पाता हूँ कि हाँ ऐसा ही कहती थी।

एक रात उसने कहा। कम ऑन, होल्ड मी।

रात उदास थी। हॉस्टल के कमरे में जो तनहाई थी उसने पूरे दिल्ली शहर को ढक लिया था। कहीं कोई सहारा न था। हॉस्टल के पास के हाईवे पर गुज़रते हुये ट्रक इस बेहिसाब तनहाई को तोड़ नहीं पाते थे। उन ट्रकों के पहियों की आवाज़ किसी भिनभिनाहट की तरह बुझ जाती।

इधर रेगिस्तान में एक बड़ी लंबी दीवार के पास लगे लेंप पोस्ट के नीचे मच्छर थे। वैसे ही जैसे उसको हॉस्टल की सीढ़ियों पर बैठ कर बात करते हुये काटा करते थे। मगर इधर एक और चीज़ थी जो उधर न थी। मैं सचमुच किसी प्रेम में था और उसको इस बारे में कुछ बता नहीं सकता था. 

कल दोपहर फिर वही वक़्त था।

तुम्हारी इतने दिनों तक आवाज़ नहीं आती कि मैं भूल जाता हूँ सलीके से रोना भी।

इन दिनों उतरते रहते हैं प्रेत साये के जैसे पारदर्शी नक्शे
मैं देखता हूँ तुमको भीड़ के बीच धूप के टुकड़ों पर चलते
हवा में जाने किसकी मालूमात लेते हुये तुम देख रही हो होती हो मेरी तरफ
मैं जो जाहिर था बंद कमरों के अँधेरों में, जालियों में क़ैद बालकनी में आती रोशनी में
मैं जो हाजिर था तुम्हारी बीती ज़िंदगी पर गिर रही रोशनी का गवाह।

वहीं दो बच्चे किलकते हैं
स्कूल में गुजरे वाकयों के लंबे सिलसिले लिए हुये
मैं देखता हूँ अजनबी लोगों की बंद सूरतें
तुम्हारी आँखें चहलकदमी करती हैं रंगीन झालरों के बीच
हर कोई जहां नोलिज़ की हवस से ढक रहा था अपनी बदशकल हसरतों की स्याही।

हम खड़े थे वहीं उस वक़्त और
बदन के पेचदार रास्तों से गुज़रने से पहले आवाज़ों के कारोबार के दिनों में
मैंने कहा था कि मुहब्बत है, ये मुहब्बत किसी नाम और शक्ल से शुरू नहीं होती
ये कुदरत का एक अंधा दांव है जो आ पड़ा है हमारी झोली में।

कुछ रोज़ पहले की बारिश में
नीम से झड़ गयी सारी निंबोलियाँ
अब वे बेर की सूखी गुठलियों जैसी दिखती हुई बिखरी पड़ी हैं

हाँ फिर से आने को है बेरी पर बहार का मौसम
मैं फिर से अपनी जेबों में कच्चे बेर भरे हुये बैठा रहूँगा स्टुडियो की सीढ़ियों पर
फिर एक आदमखोर जंगली जानवर का साया आहिस्ता से सरसराएगा हेजिंग के पीछे से
मुझे खींच कर ले जाएगा घने ठंडे अंधेरे में
मेरे बुझे हुये दिल के पास बैठा हुआ शिकारी देखेगा आखिरी बार अपनी चमकती आँखों से।

मैं दुआ करूंगा कि उस जंगली जानवर को
जीवन में एक बार पुकारना आ जाए तुम्हारा नाम
कि मैं यही सुनना चाहूँगा उस वक़्त जब मारी जा चुकी होगी मेरी देह
और मेरे प्राण उसे कह रहे होंगे आखिरी विदा
कि इसके बाद खुशी से जा सकूँ मैं हवा के साथ उन्हीं धूप के टुकड़ों तक।

तुम्हें मालूम है?
उस आदमखोर शिकारी के आने से पहले भी मैं मारा जाता हूँ कई कई बार
अपने ही हाथों, शाम के झुटपुटे में तुम्हारा खयाल आते ही।



दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.