May 25, 2017

मालूम था कि तुम मेरे नहीं थे

तुमने मोहा, गले लगाया. चूमा. तुम गये तो ज़िन्दगी को आंसुओं, बेचैनी और इंतज़ार से भरकर गए. तुम न होते तो खाली-खाली जीवन को लेकर जाने कहाँ-कहाँ भटकना पड़ता.

जीवन को इतना आसान कर देने के लिए मेरे दयालु सद्गुरु तुम्हारा आभार. 
* * *

पुराने रेलवे स्टेशन से बाहर आने वाले गलियारे के आखिरी छोर पर सुबह उतर रही थी. रेलवे स्टेशन के सूनेपन को तोड़ने के लिए कोई न था. इतने बड़े शहर में भीड़ गुम थी. दायीं तरफ कुछ दूर आकर रुकी एक कार ने इस नीरवता को भंग किया. इसके साथ ही आगे पीछे से कुछ लोग गुज़रने लगे. ऐसा लगा कि ठहरे हुए समय की रुकी सुई को किसी ने आहिस्ता से छू दिया. और ठहरी ज़िन्दगी चल पड़ी.

अपने जूतों पर जमी बारीक धूल को देखकर ज़रा नज़र उठायी तो देखा कि कार के अगले दरवाज़े से एक आदमी उतर रहा था. पिछली खिड़की से एक हाथ हिल रहा था. दिल धक् से एक बार धड़क कर देर तक ठहरा रहा. तुम्हारी साफ़ कलाई से बंधी घड़ी का काला पट्टा किसी धागे की तरह चमक रहा था.

उस हाथ के सिवा कुछ नहीं दिख रहा था मगर जाने क्यूँ लगा कि तुम मुस्कुरा रहे हो. तुम्हारा मुस्कुराना सोचकर मेरी आँखें पनियल होने लगीं.

मैंने चाहा कि तुमसे रुख फेरकर वापस चलूँ. तुमको अभी बहुत जीना है. तुम कब तक दुःख उठाये फिरोगे. तुमको अभी ख़ुश रहना चाहिए. तुमको कहकहों से भरी पार्टियों और ख़ुशनुमा दोपहरों में हमउम्र लड़के-लड़कियों के साथ होना चाहिए. इसी सोच में मैंने जब सोचा कि तुम बेहद कमसिन हो. मेरे पैर ठहर गए थे.

छुअन से ख़यालों का ओपेरा टूट गया था. उस आदमी ने मेरे हाथ से थैला ले लिए था. वह मुस्कुरा रहा था. 
* * *

“आपकी ज़रूरत थी” इतना कहते हुए उसने सूटकेस खोला. उसमें से कुछ छोटी-बड़ी स्पायरल डायरियां निकाल कर बाहर रख दी. ग्रेफाइट की डिबिया से एक पतली सींक निकाली. मुड़कर पास आते कहा- “हो सके तो समझना कि ये मेरी ख़ुशी के लिए था.” 
* * *

बाद तेरे बरसों तक उड़ती रही धूल 
ज़िंदगी चुभती रही, बारीक कांटे सी.

जबकि मालूम था कि तुम मेरे नहीं थे. 
* * *

[Painting : Shanti Marie]

May 24, 2017

बाद मुद्दत के अपने घर

बालकनी की जाली से एक काली चिड़िया पिछली कुछ शामों से आ रही थी. जब हम इस घर में नहीं रहते तब भी आती होगी. वह वाशरूम के एग्जास्ट के पास के कोने में दुबक कर बैठती है. मैं शाम होते ही बालकनी में आता हूँ. हम दोनों एक दूजे को देखते हैं. वह सोचती होगी कि ये अचानक कौन चला आया है.

बाद मुद्दत के अपने ही घर लौटने से सवाल खत्म नहीं हो जाते हैं.

सोफ़ा कवर से ढका रहता है मगर गर्द फिर भी आती है. कवर हटाते ही एक धूसर परत दिखती है. कॉफ़ी टेबल के नीचे रखी एक मैगजीन और एक उपन्यास भी उतनी ही धूल से भरे रहते हैं. जितना हमारा बिछड़ना होता है. तुम्हें पता ही होगा कि इंतजार में भी कोई अकेला नहीं होता. तन्हाई कम करने को सब पर गर्द आती रहती है.

May 17, 2017

अगर फूल कह देता

कनॉट प्लेस के इनर सर्कल में एक पेड़ गहरे लाल फूलों से भरा समाधिस्थ था। हवा के झौंके आते। पेड़ के फूलों को चूमते और चले जाते। फूल इसी चूमने से प्रसन्न होकर हवा के पीछे उड़ने लगते। मैंने चाहा कि एक फूल को अपनी अंगुलियों से छूकर पूछूँ- "ये तुम किस ख़ानाबदोश के प्रेम में गिरे। तुमने सोचा तक नहीं कि हवा है और हवा का ठिकाना क्या है?" मैंने फूल को नही उठाया। इसलिए कि अगर फूल कह देता "बाबू, तुम क्या जानो प्रेम?" तो मैं क्या जवाब देता।

"बहुत गर्मी है।" कल दोपहर ऐसा कहते हुए आदमी ने पसीना पौंछ कर उदास मुँह बना लिया। उसके पास खड़े आदमी ने कहा- "हाँ" मैंने देखा कि दोनों आदमी स्वस्थ थे और एक मामूली सी गर्म रुत से परेशान थे। क्या सचमुच आदमी केवल सुख से छींके में पड़ा रहने को दुनिया मे आया है?

मैं जब छुट्टियों पर होता हूँ तब मुझे बेवजह पैदल चलना। नए लोगों को देखते जाना और शाम को दोस्तों के साथ बिता देना। बस यही अच्छा लगता है। आज की सुबह अच्छी है। बादल हैं। अचानक बारिश की छोटी बूंदें गिरने लगती हैं। मैं पैदल चलते हुए रुक कर सड़क पर चलते लोगों को देखता हूँ।

मेरे सामने तिपहिया सायकल पर एक असमर्थ लड़का गरदन को एक तरफ लटकाए हुए पड़ा था। उसकी सायकिल और उसमें कोई हरक़त नहीं थी। सामने से एक दूजा वैसा ही आदमी आया। वह अधेड़ उम्र का था। उसने अपना रिक्शा पास लगाया और पूछा- "क्या हुआ? तबियत ठीक नही? क्या बात है? बोलो बताओ?" लड़के ने कुछ जवाब दिया था। 

वह अधेड़ अपने रिक्शे को उसके पास ही लगाए रहा। उस अधेड़ की आंखों में हौसला था। वह उस हौसले को लड़के के साथ बांट रहा था। मुझे उस आदमी की याद आई जो कल अपने दो पैरों पर खड़ा था। स्वस्थ था और गर्मी को कोस रहा था। उसकी बेबसी और नाकामी याद आई।

असमर्थ असल में वह है, जो दूसरों का दुःख न पूछ सके।

May 16, 2017

जहां पिछले बरस

वो साल भर पहले का ठीक यही दिन था। सुस्त क़दम चलते। प्लेटफॉर्म पर अनमने खड़े। रेल गाड़ी का इंतज़ार करते हुए। अजनबियों से उचटी हुई नज़र अतीत में कहीं झांक रही थी। आज वहीं हूँ। सोचता हूँ कि जीवन कितने अचरजों से भरा है। पिछले बरस इसी समय, इसी प्लेटफार्म पर था। उसी रेलगाड़ी की प्रतीक्षा कर रहा था, जिसमें आज जाना है। उसी जगह, जहां पिछले बरस गया था।

लेकिन जीवन जो था, अब बहुत बदल गया है। मैं अपने होठों पर मद्धम मुस्कान देखता हूँ। इतनी सी कि जिसे केवल मैं देख सकूँ। शुक्रिया कहता हूँ।

अकसर अनजाने हम ग़लत फैसले करते हैं। इसमें कुछ ग़लत नहीं है। ऐसा होता रहता है लेकिन जब हम ये जान लें। उसके बाद भी वहीं बने रहें। हालात को कोसें। किस्मत जैसी किसी सुनी-सुनाई चीज़ को दोष दें। ये ग़लत है।

उस रोज़ थकान थी। कैसलापन था। ऊब थी। घृणा थी। आज कुछ नहीं है। अभी ट्रेन में बैठ जाऊंगा और मेरे पास एक लंबी कहानी है, बीस हज़ार शब्दों की। उसे ठीक करूँगा। कहीं- कहीं गैरज़रूरी ब्यौरे हैं। कहीं कहानी के प्रवाह को तोड़ने वाले वाक्य हैं।

अगर चार्जिंग पॉइंट न मिला तो मेरे पास एक चार सौ पन्नों का उपन्यास भी है। कभी- कभी जब हम बोझ उतार देते हैं तब हमारे पास बहुत कुछ होता है।

May 15, 2017

काश! ऐसा होता

राजमार्गों से रास्तों,
हरीतिमा से सजे पैदल पथों, 
किनारे बने भव्य भवनों के ठीक बीच 
विलासी प्रदर्शन से ऐंठे बाजार के छोटे शराबघर में 
बीच की टेबल पर उतरी दोपहर थी।

मगर लगता ऐसा था 
कि दुनिया के किसी छोर पर बैठे हैं। 

और इसके सिवा कुछ नहीं चाहिए।
* * *


स्मृति ही समझ सकती है स्मृति को। 
दुःख ही जानते हैं दूसरे दुःख को।

काश! ऐसा होता।
* * *

उस शाम की ड्राइव में कई चीजें हमसफ़र हो गयी। तेज़ हवा, धूल, उड़ते हुए पत्ते और ज़रा दूर चमकती बिजली बाद पूरे बरस के एक शाम, कभी नहीं बुझती।

May 13, 2017

जाने को कह देंगे?

मैं उनसे कहता हूँ- "क्या पाओगे? किसी उदासी में करीब बैठोगे. किसी गहरी थकान में अपना सर कंधे पर रख दोगे. किसी गहरे दुःख को कहने लगोगे. किसी यकीन में कहोगे, मेरा हाथ न छोड़ना. इसके बाद..."

"इसके बाद?"

"जैसे पहले बहुत से लोग करते आये हैं. कुछ रोज़ सबकुछ भूलकर दीवाने रहे और बाद में चले गए. वैसे चले जाना होगा"

"तो आप जाने को कह देंगे?"

"नहीं. आपका मुझसे जो सम्मोहन है. वह पूरा हो जायेगा."

"फिर?"

"फिर कुछ नहीं. सबके पास नए सम्मोहन होते हैं, सबके पास हज़ार बहाने और झूठ होते हैं, किसी को भी कोसने के लिए."

"आपको ये सब लगता है? तो ये भी लगता होगा कि आपको बदनाम किया जायेगा."

"नहीं ये नहीं लगता. इसलिए कि बदनामी तो उस बात में होती है, जिसको छिपाना पड़े. मैं तो सबसे कह देता हूँ कि हाँ ऐसा किया था."

शाम की नीरवता फोन में भी पसर जाती है.
* * *

आज की सुबह सवा दस बजे थे. कितनी अजीब बात है न. ऐसा तो रोज़ होता होगा. अगर कोई ज़िन्दा रहे और होशियार हो तो हर सुबह देख सकता है कि सवा दस बजे हैं. कई बार कुछ वक़्त के पैमाने ऐसी शक्लों में ढल जाते हैं कि उनको उसी तरह देखने की आदत हो जाती है. 

इस आदत में समय एक खालीपन हो जाता है. जिन लोगों से बचकर चलते हैं वे दफ्तर से लुप्त हो जाते हैं. लगता है कि वे लोग सदियों से गुम हैं. वे शायद यहाँ कभी थे ही नहीं. असल में आज घड़ी पर उस वक़्त ध्यान नहीं जाना था मगर उसी वक़्त गया. 

बंद कमरे में बैठे हुए लगने लगता है कि बाहर बादल घिर आये हैं. धूप का लिबास अब धूसर हो चला है. हवा में बादलों की छाया की गंध है. कैसा होता है न आदमी. बंद कमरे से मौसम पढ़ लेता है. 

मैं कहता हूँ- "जाओ केसी, बाहर जाकर देखो. मौसम को तुम्हारा इंतजार है."
* * *

May 12, 2017

ख़ुश होकर जाओ

मैं था तो शागिर्दी के लायक भी नहीं 
मगर उनकी फ्रेंड रिक्वेस्ट आ गयी है.

फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट वाले बटन पर लाल बत्ती चमकी तो देखा कि सआदत हसन मंटो साहब की ओर से दोस्ती का हाथ आया है. ज़रूर उनके किसी चाहने वाले ने ऐसा किया होगा. 

सआदत हसन मंटो ने अफ़सानों से एक लकीर खींच दी थी. जिसके उस पार अगर दुनिया जा सकती तो मंटों नहीं रोकते. बरसों से दुनिया वहीँ पड़ी हुई थी. वे मेरे कॉलेज जाने से साल भर पहले के दिन थे. फिर कॉलेज जाने लगा तब ख़याल आता था कि इक्कीसवीं सदी आ रही है और मंटो की कहानियां गुज़रे ज़माने की याद भर बनकर रह जाएँगी. मुझे कहाँ समझ थी कि इस रहती दुनिया को उस लकीर के इस तरफ ही जीना है. जहाँ वही सब है जो मंटो लिख गए. मंटो के ज़माने से भी तेज़ कदम और बे हया.

कल मंटोमयी फेसबुक को देखना सचमुच अच्छा था. इधर एक दोस्त ने अपनी पोस्ट को हैशटैग ही मंटोमई दे दिया था. मानो मई का महीना हो तो मंटो के नाम ही होना चाहिए. उन्होंने मंटो के नाटक पढ़ते हुए उनके कुछ हिस्से शेयर किये. वे कुछ एक संवाद पढना ही गहरी सोच में डूब जाने को काफी था. उन पोस्ट्स के साथ मंटो की कहानियों का एक काफिला कदमताल करता हुआ आ ठहरता.

कल जब बहुत सी पोस्ट आ रही थी तो उनको ध्यान से देखता. मैं कहानियों के शीर्षक याद करने लगता. कि ये कौनसी कहानी थी. मैंने पढ़ी या नहीं? मैं ख़ुश था, मंटो को इतना याद किया जाना देखकर. मुझे दूर-दूर तक कोई दोस्त याद न आया जिसने मंटो को न पढ़ा हो.

मेरे पेज* पर आते ही कई बार कुछ दोस्त लगातार पढ़ते जाते हैं. उनको लगता है उनकी ही बातें लिखी हैं. वे उन बातों को शेयर करते हैं. कॉपी पेस्ट करते हैं. टैग करते हैं. पोस्टर बनाते हैं. और जो कुछ उनका किया जा सकता है. कल एक नौजवान आये थे. सुबह उनका संदेशा आया. "सर मैंने आपके पेज से बहुत सारी पोस्ट कॉपी पेस्ट कर ली है और आपको क्रेडिट भी नहीं दिया." मैंने कहा- "कोई बात नहीं. नाम न भी लिखो तो भी चलेगा." वे खुश हो गए.

मेरे साथ ऐसा पहले भी हुआ है. मेरी बातें बेवजह लोगों ने अपने नाम से छाप ली तो मेरे दोस्त नाराज़ हुए. जबकि मैंने कहा- "मेरा लिखा जो कुछ भी है. वह सब अपने नाम से छाप लो." क्या असल में ये कोई ऐसा रचनात्मक उत्पाद है, जिसका कॉपी राइट लिया या दावा किया जाये. क्या मैं अपने लिखे से कुछ यश, धन, लाभ बनाना चाहता हूँ? क्या इस लिखे हुए की उम्र अक्षुण है? मैं अपने ही प्रश्नों के साफ़ जवाब देता हूँ कि ये मेरे क्षणिक आवेश मात्र हैं. मैंने किसी गहरी पीड़ा में कोई कहानी लिखी. मैंने तरल उदासी में डूबते हुए कोई बेवजह की बात कही. मैंने किसी की याद में किसी को कोसना भेजा. मैंने दुआ की कि जाओ खुश रहो. ये अपनी अनुभूतियों को शब्द देना भर था. ऐसा करने पर किसी को प्रिय लगे. कोई उसे बाँटना चाहे. तो क्या बुरा है.

एक रोज़ सब ठाट धरा रह जायेगा.

प्रेम करना. पास बिठाना. मीठे से बोलना. सही बातें बताना. जो ठोकरें खाई हैं, वे सुनाना. अपने अनुभवों के सबक साझा करना. बाहँ पकड़ कर बैठना चाहे तो उसकी भी बाहँ पकड़ना. जाना चाहे तो कहना- खुश होकर जाओ और सदा खुश रहना.

पचास साठ साल बाद कॉपी राइट मर जाता है. मगर लेखक ज़िन्दा रहता है.

ये मंटो साहब के नाम से जिसने भी प्रोफाइल बनायीं है. पढ़ा लिखा है. मंटो के प्रोफाइल कवर पर चार्ली चैपलिन का होना दुखों की पराकाष्ठा है.

लव यू.

Kishore Choudhary Page

May 10, 2017

दुःख एक अश्लील चुटकला है

कभी-कभी होता तो इसे भूल कह लेता
मगर मैंने दुखों को अक्सर आगे बढ़कर चूमा है.

बुद्ध का बताया तीसरा आर्यसत्य है- दुःख निरोध. कारण के होने पर ही कार्य उत्पन्न होता है. अतः कारण के न रहने पर कार्य भी नहीं रह सकता. दुःख कार्य है अतः उसके कारण को दूर कर देने पर दुःख का निरोध संभव है.

मैंने इंटरनेट नहीं त्यागा. मैंने व्हाट्स एप को त्याग दिया. इंटरनेट जीवन सदृश्य है. व्हाट्स एप उस पर आश्रित उत्पाद है. इंटरनेट ही त्याग दिया होता तो समस्त दुखों से मुक्ति हो जाती. किन्तु प्रकृति के विरुद्ध जाकर, हमें जीवन का त्याग नहीं करना करना चाहिए. वह जिन संयोगों से हमें मिला है, उनके वियोग में परिवर्तित होने के समय तक प्रतीक्षा करनी चाहिए. इसलिए इंटरनेट बना हुआ है. व्हाट्स एप साल भर पहले अनइंस्टाल कर दिया है.

दुःख के त्याग में कुछ दिनों तक प्रतिबद्धता बनी रहती है. स्वयं का निर्णय है. कुछ और दिन बाद वे दुःख स्वयं को याद दिलाने पड़ते हैं. जिनके कारण व्हाट्स एप को विदा कहा था. उसके और कुछ महीने बाद अचानक किसी दोपहर, शाम या रात. या कभी नीम नशे में, या किसी पुरानी टीस के उभरने से बेहद खालीपन पसरने लगता है. मन कहीं किसी से कोई संवाद करना चाहता है. अंगुलियाँ फोन के स्क्रीन को ऑन करने के लिए आगे बढ़ना चाहती हैं.

तभी स्मृति के घने अँधेरे में एक हल्का सा उजास आता है.

आप थे मगर आपने रीड तक न किया. आपने रीड किया, जवाब नहीं दिया. आप ऑनलाइन थे और उत्तर देने में कोई रूचि न थी. किसको जवाब देते हैं और किसको नहीं देते हैं? हमें भी बताएं. रात आपका लास्ट सीन तीन बयालीस का था. किसकी याद में नींदें गुम हैं. या किसी को उस समय भी आप जवाब देते हैं. हमें भरी दोपहर में भी एक जवाबी स्माइली नहीं मिलती. तो आप हमारी चैट मिटाते नहीं है. ताकि समय आने पर सबको दिखा सकें कि हम ही आपके पीछे पड़े थे. दस मेसेज के बाद एक स्माइली भेजते हैं. जैसे कोई अहसान किया है. या शायद हम ओछे हैं. आप बड़े हैं. आपने मेरा नम्बर ब्लॉक करने का सोचा तो ये बताते जाना कि किसका नहीं करेंगे. सुनिए आप अच्छा लिखते हैं इसलिए हम बहक गए. घर हमारा भी अच्छा है. अच्छा आपको मन की बात कह दी तो अब आप ऐसा व्यवहार करेंगे कि हमारा कोई मोल ही नहीं. सुनिए, लव यू और इसके जवाब में ये न कहना आपको भी बहुत सारा प्रेम.

दर्शनशास्त्र में स्नातक किया था. पास होने के लिए बौद्ध दर्शन का सार कई बार पढ़ा. लगातार तीन साल तक पढ़ा. जीवन में ये पढाई, इतनी भर काम आई है कि व्हाट्स एप जैसे एक दुःख से अस्थायी मुक्ति पा ली.

दुःख एक अश्लील चुटकला है. इसे सुनकर सभ्य लोग सामने गंभीर हो जाते हैं और पीठ के पीछे खिलखिलाकर हँसते हैं.

इसलिए मैंने अपने हर नए प्रेम को पुराने प्रेम के बारे में कुछ नहीं बताया. 
* * *

बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर किसी के प्रेम में पड़िए. दुखों को आमंत्रित कीजिये ताकि दुःख के संदर्भ में चार आर्यसत्य और आर्य अष्टांगिक मार्ग को समझने का दिन आये. बुद्ध द्वारा ये सब जानने के लिए उठाये गए कष्टों का सम्मान कर सकें.

आ जाना कभी. दोनों एक दूजे के आस-पास आँखें बंद किये बैठे रहेंगे. अपने भीतर तक उतरते हुए, प्रेम में आचरण से उपजे दुखों को क्षमा कर देंगे. और फिर एक नया दुःख बुन लेंगे.

लव यू. 
* * *

May 9, 2017

उसी की शर्तों पर




प्रेम को लाख सरल कहो, मगर हज़ार आफ़तें हैं।

बोरोसिल का ग्लास खाली हो तो लुढ़क जाता है। अगले झौंके में चप्पल उड़ जाते हैं। ज़रा और बेख़याल रहो तो स्नेक्स का डिब्बा लुढ़कने लगता है। पूनम की रात है। हवा तेज़ है।

रेगिस्तान में उसी की शर्तों पर जीना पड़ता है।

[Painting courtesy : Jill Karsner]

May 6, 2017

एक बेहद पुरानी स्मृति

“कभी ऐसा हुआ कि हवा की आवाज़ में, चिड़ियों के शोर में, चारा काटने की मशीन में, पास से गुज़री मोटरकार की घरघराहट में, दूर कहीं मजदूर की गेंती की चोट में, कहीं भी, किसी भी, कैसी भी आवाज़ में केवल एक ही नाम सुनाई पड़ा हो?”

उसने क्षणांश में कहा- “हाँ”

उसके हाँ के पूरा होने से पहले ही कहा- “फिर सचमुच तुम जानते कि प्रेम होता है तो फिर किस कदर होता है. और शैतान को क्यों सुनाई पड़ता है. शैतान की प्रेमिका, शैतान की प्रेमिका, शैतान की प्रेमिका.”

ये सुनकर क्षणांश में उत्तर देने वाले चेहरे पर एक बेहद पुरानी स्मृति की लम्बी छाया फैल गयी.

May 4, 2017

चीज़ों के प्रति क्षोभ

कभी अचानक आवरण के भीतर झांकने की लत लग जाती है. फिर चीज़ों को बिना खोले भीतर से देखने लगते हैं. जैसे कोई चित्रकार पहले स्केलेटन बनाना सीखता है. उसके बाद मांस-मज्जा. फिर वह कटाव बनाता है. फिर एक ऐसी शक्ल सामने आती है, जिससे हमारा रोज़ का वास्ता होता है. हम चित्रकार नहीं होते हैं. इसलिए देखी हुई चीज़ों को जब उलटे क्रम में खोलते हैं. तब ख़ुद को याद दिलाना चाहिए कि ये सीखना नहीं है. ये असल में चीज़ों के प्रति क्षोभ है. ये उनको नकार देने की हद तक जान लेने की चाहना है.

हम तेज़ी से बदलते हैं, हमें इसपर कड़ी नज़र रखनी चाहिए.

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.