November 30, 2013

ज़ुबानदराज़ होकर भी बेज़ुबान

लालकुर्ती बाज़ार का नाम लो तो जाने कितने शहर एक साथ याद आते हैं. पेशावर से लेकर मेरठ तक. ये लाल कमीज यानि अंग्रेज फौज़ की पोशाक बेचने वाले बाज़ार हर उस छावनी के आसपास हैं जिनको अंग्रेजी उपनिवेश काल में स्थापित किया गया. उस ज़माने के ये छोटे से बाज़ार अपनी तंग सर्पिल गलियों में भीड़ से आबाद रहते हैं. एक पुराना मौसम है जिसकी गंध यहाँ की हर छोटी बड़ी दुकान में समाई रहती है. ऐसा लगता है कि हाथ ठेले वालों से लेकर खुले दरवाज़ों के पीछे लगे हुए ऐ सी वाली दुकानों तक में कोई समय का साया ठहरा है. बारहों महीनों के हर मौसम में इतनी ही भीड़ इतने ही खरीदार और ऐसी ही रवानी. पाँव को आँख उग आती है कि वह हर क़दम पर ठिठक जाता है. सामने कोई अड़ा हुआ दिखाई देता है. भीड़ किस बात की है. भीड़ का ऐसा आलम क्यों है. लोग इतना सामान कहाँ रखेंगे अगर यहाँ से सबकुछ खरीद लेंगे तो नया नया सामान आने में कितना वक़्त लगेगा. इन बाज़ारों और मेरठ की गलियों में पुरातन और ऐतिहासिक यादों के साये में घूमता हुआ सोचता हूँ कि वक़्त अपने साथ क्या ले गया? कुछ ज़िन्दा लोगों की सांसें, कुछ उम्मीदें टूटी हुई. अब भी मगर पौराणिक कथाओं के ग्रंथों से कई चेहरे अचानक घनी भीड़ से सामने आ जाते हैं. शिवभक्त रावण के श्वसुर या युधिष्ठर के वास्तुकार मयासुर की नगरी के लोग सोमवार के दिन छुट्टी पर बैठे हुए. हर शहर का अपना अवकाश का दिन हुआ करता है. मुझे सोमवार के नाम पर हिन्दुओं के आराध्य शिव याद आते हैं और देखता हूँ कि दुकानों की कतारों में खासे शटर गिरे हुए हैं. जो शटर अप हैं वे मल्टी नेशन स्टोर्स की चैन मार्केटिंग वाले हैं. यहाँ धूप जब जाड़े की सुबह से आँखें मिलाती है तो बड़ा सुकून आता है. रेगिस्तान की तरह सूखे मौसम की जगह ओस और धुंध से भीगी हुई सुबह खिली हुई थी. एक धुंधली चादर के नीचे शहर की सड़कों पर लोग अपनी मंज़िलों की ओर दौड़े जा रहे थे. आहिस्ता क़दमों से चलते हुए देखता हूँ कि इस शहर में सड़कों के बीच पार्किंग की अनूठी रवायत है. सड़क के ठीक बीच में आप अपना वाहन खड़ा कर सकते हैं बाकी दोनों तरफ दुकानों के आगे खाली जगह कुछ ऐसे जैसे कोई रूठा हुआ महबूब ज़िद अपर अड़ कर कोई लकीर खींच गया हो कि तुम उस तरफ, हम इस तरफ. इस शहर को देखते हुए याद आता है कि इस दुनिया में सब कुछ मिटता नहीं है. कुछ बचा रह जाता है, तंग गलियों में नई नस्लों में.

दिल्ली की ओर लौटती हुई रेलगाड़ियाँ अपने पायदानों तक यात्रियों से भरी होती हैं. दिल्ली की ओर कूच के अनेक किस्सों में कोई हसरत, कोई लोभ समाया ही था. आजाद राजधानी की ओर जाने वाले असंख्य यात्रियों को रोज़गार खींचता होगा. वे हर रंग रूप और हाल में दीखते हैं. मैं एक डीएमयू में दरवाज़े के थोडा आगे जगह तलाश कर खड़ा होता हूँ. दुआ का कारोबारी अपनी आवाज़ लगाता हुआ, मेरी ओर बढ़ता हुआ आता है. कहता है अल्लाह तुम्हारी हर जायज मुराद पूरी करे. मैं अपनी मुरादों के बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि जायज मुरादें तो पूरी ही हैं. असल रोना जिन मुरादों का हम ढोते हैं वे सब नाजायज ही हुआ करती हैं. अचानक मुझे दुआ के इस कारोबारी पर शक हुआ. क्या ज़रूरी है कि इसकी दी हुई दुआ काम करे. इसकी खुद की जायज दुआ कि काश दो आँखें होती, वह भी अधूरी पड़ी हुई है. जिसको मेरी जायज दुआ पूरी करनी है उसी ने इसके साथ नाजायज किया हुआ है. फिर लगा कि शायद दुआदार देख सकते हों और सिर्फ अपने गुज़ारे के वास्ते इस तरह का कारोबार अपना लिया हो. रेलगाड़ी के दोनों तरफ गन्ने की नन्हीं पौध धरती को हरा रंग दे रही थी और अचानक मुझे मेरी एक नाजायज मुराद की याद आई, काश कहीं भाग जाओ. जाने कैसे ख्यालों में मैं दिल्ली की सड़कों तक चला आया. मेरे पांवों के नाखून बढ़ गए थे शायद या सर्द मौसम की आमद से जूते सिकुड़ गए थे. पंजों में बेहिसाब दर्द समां गया था. ऐसे में चुप अकेले चलते जाना और दिल्ली के पुराने रेलवे स्टेशन से आगे कपडा बाज़ार की तंग गली में चर्च मिशन मार्ग पर इकलौते दवा बेचने वाले से कहना कि कोई ऐसा साल्ट दे दो जिससे पेट की आँतों में हो रहा दर्द कम हो जाये और फिर सोचना कि काश साल्ट कुछ और बातों के लिए भी बने होते. मेरे आस पास सायकिल रिक्शे वाले हैं, उनकी शक्ल ओ सूरत किसी खानाबदोश और मज़लूम जैसी ही दिखती हुई. ये ज़िन्दगी किसके लिए बोझा ढो रही है? कुछ समझ नहीं आता. सोचता हूँ कि पूछूं लेकिन कोई नहीं समझता किसी को, न साथ रह कर न दूर रह कर. आदमी ज़ुबानदराज़ होकर भी बेज़ुबान हैं.

सब कुछ वैसा ही है बस जो ज़िन्दा हैं वे भरे हुए हैं ख़ुशी और रंज के असर से. कहाँ बदलता है कुछ कि उम्र के आख़िरी छोर तक कई लोग बचा कर ले जाते हैं हिचकियाँ दुखों वाली. किसी तनहा सिरे पर बैठ कर सोचते हैं कि क्या अच्छा होता गर इनको बाँट लिया होता इसे दुनिया में किसी से. आंसुओं का एक मौसम होता है. बड़े कच्चे रंग वाला मौसम. इस तरह बिखरता है कि न रंग आता न यकीन होता है कि सब पहले सा ही है. मेरे पास ही बैठा हुआ एक नौजवान जोड़ा किसी उलझन में एक दूजे को देखता है और फिर नज़र नीचे कर लेता है. लड़की शाम के वक़्त जागने का बहाना लेकर अपनी हिचकियों को पोंछते हुए सामने वाले को कहती है कि सब ठीक है. मुझे लगता है कि ऐसा कहते हुए वह भीतर से कितना बिखर रही होगी. मैं उन दोनों से कहना चाहता हूँ कि तुमने कभी याद किया है कि दुख आये और चले गए हैं. शायद वे इस बारे में जानते होंगे मगर ये सलाह अक्सर खुद के लिए काम नहीं आती. सफ़र अपने आप में ज़िन्दगी का हासिल है. हम दुःख और सुखों के अचरज को देखते हैं सांस लेते हुए.

November 16, 2013

आखर पोटली वाले बातपोश की विदाई

किसी भी लोक की कहावत को अगर हम किसी ख्यात व्यक्ति के नाम से उद्धृत कर दें तो उस पर कोई संदेह नहीं किया जाता कि ये उन्होंने कहा है या सदियों की मानव सभ्यता के अनुभव से जन्मी कोई बात है. ऐसे कहा जाता है कि गुलाब के फूल बांटने वाले के हाथों में गुलाब की खुशबू बची रह जाती है. अचानक सुना कि लोक कथाओं की खुशबू से भरी हुई अंगुलियाँ विदा हो गयीं. अचानक ही याद आया कि एक मित्र ने दस साल बाद भी अभी तक एक किताब नहीं लौटाई है. किताब का शीर्षक है अलेखूं हिटलर. ये किताब उसी लोक गंध से भरी है जिसके कारण बिज्जी यानि विजयदान देथा को जाना जाता है. बिज्जी चले गए हैं या वे कहीं नहीं गए अपने शब्दों के माध्यम से रेगिस्तान की हवा में घुल मिल गए हैं. अदीठ किन्तु हर वक़्त साथ. उस जादुई प्रेत की तरह जो नवविवाहिता पर मोहित होकर एक दुनियादार बन जाने को उकस जाता है. दुनिया में न होते हुए भी साकार दुनिया में उपस्थित. वे कहीं नहीं जा सकते हैं. वे हमेशा हमारे बीच रहेंगे. वे कुछ दोस्त थे. ऐसे दोस्त जिनको लगता था कि राजस्थान की इस बहुमूल्य लोक निधि को संरक्षित करने का काम किया जाना चाहिए. आज़ादी के बाद के पहले तीन दशकों में देश सेवा का जज़्बा इसी तरह के काम करने का हौसला देता था. उनमें से दो दोस्त अपने काम के कारण खूब जाने गए. एक दोस्त ने लोक कथाओं का संग्रहण किया, दूजे ने लोक संगीत को दुनिया के कोने कोने में पहुँचाने का काम किया. वे दूसरे दोस्त कोमल कोठारी थे. वे राजस्थान की घुमंतू, ख़ानाबदोश लोक गायकों की गायिकी को सबके सामने लाने के काम में जुटे रहे. आज भी लंगा, मांगनियार, मिरासी, ढाढ़ी और ढोली कलाकारों के मुख पर कोमल कोठारी का नाम मौजूद रहता है. लोक संगीत और उसके व्यापक फलक को कोई एक इन्सान किसी दिशा में नहीं बढ़ा सकता है. ये लोक जीवन की सामूहिक रचना है. इसमें सारा लोक किसी न किसी रूप में समाया हुआ है. सुर और शब्द कण कण में रचे-बसे-घुले हुए हैं. लेकिन जिस तरह के प्रयास कोमल कोठारी ने किये वे इन जिप्सी गायकों में पीढ़ी दर पीढ़ी याद किये जायेंगे. वैश्विक स्तर पर जो सम्मान राजस्थान की सीमान्त गायिकी को मिला उसका श्रेय भी कोमल कोठारी को ही दिया जायेगा.

बोरुन्दा गाँव में इन दो मित्रों ने जो अतुल्य धरोहर खड़ी की उसका नाम रूपायन संस्थान है. इसी संस्थान ने राजस्थान के लोक की सांस्कृतिक पूँजी को संरक्षित करने का काम शुरू किया था. बातपोश कला को लिखित रूप में सामने लाने और संग्रहित, संरक्षित करने का जो बीड़ा उठाया वह राजस्थानी भाषा की अद्वितीय धरोहर बन कर हमारे सामने आया. ये लोक कथाएं हमारे जीवन में गली कूचों में बिखरी पड़ी थीं. इनका वाचन हर जमावड़े में किया जाता रहा है. कहीं पांच लोग मिल बैठे तो सदियों पुरानी लोक द्वारा रची और संवारी गयी कहानियां हवा में बिखरने लगी. ये बेहद छोटे चुटकलों से लेकर लोक गाथा के रूप में उम्रदराज़ होती गयी थी. समय की गति के साथ आते हुए बदलावों में यकीनन इन कथाओं का लोप हो जाता. बातपोश नहीं रहते तो बातें भी ख़त्म हो जाती. सुनने वाले के पास मन बचा रहता किन्तु सुनाने वाला कहीं खो जाता. इन लोक कथाओं का संग्रहण और पुनर्सृजन कोई आसान और हर किसी के बस का काम न था. इसके लिए बेहिसाब जज्बे की और दीवानगी की ज़रूरत थी. ये सब कुछ विजयदान देथा के पास ही था. मुझे इस बात पर पूरा यकीन है कि जो सामर्थ्य और लेखन के तत्वों की समझ बिज्जी में थी वह अतुलनीय है. हालाँकि रानी लक्ष्मी कुमारी चूड़ावत का नाम ज़रूर मेरे मन में बिना किसी भूल के आता है. रेत के कण कण की गाथा को अक्षरों का बाना पहनाने में उनका भी योगदान अविस्मर्णीय है. मिठास से भरी हुई इन लोक कथाओं में नीति, ज्ञान, कष्ट, सुख, प्रतीक्षा और दुरूह जीवन की सच्ची झांकियां हैं. लोक मिलकर जिसकी रचना करता है वह किसी एक का गुणगान न होकर पूरे समाज का रूपक हुआ करता है. इसी रचना प्रक्रिया में सशक्त लोगों की चापलूसी के सूत्र भी बिखरे रहते हैं. सामंतों के गुणगान में सच्चाई अक्सर परदे के पीछे चली जाती है लेकिन आज़ादी के बाद शुरू हुए इस काम और प्रगतिशील विचारधारा की समझ के कारण ही लोक कथाओं के लिपिबद्ध होते समय राजस्थान की कथाओं का सच्चा दस्तावेजीकरण हो सका है.

उनके राजस्थानी भाषा को दिए योगदान को ये रहती दुनिया कभी न भूल पायेगी. बातां री फुलवाड़ी से फुलवाड़ी और उसके आगे अपने खुद के लेखक हो जाने तक के सफ़र में बिज्जी की वही किताब मुझे फिर से याद आ रही है. हालाँकि मैंने बातां री फुलवाड़ी के संग्रहकर्ता से लेखक होते जाने के पूरे काम को पढ़ा है. मैंने ये भी इसलिए स्वीकार कर लिया कि बिज्जी सचमुच ऐसा काम न करते तो ये कथाएं इतना सम्मान न पा सकती थीं. विजयदान देथा एक कुशल संग्रहकर्ता, राजस्थान के लोक जीवन के तत्वों के गहरे ज्ञाता और अपनी जुबान को खूब प्यार करने वाले थे. अलेखूं हिटलर, दुविधा और अदीठ जैसी जिन किताबों को मैंने पढ़ा है, उनमें संग्रहित कहानियों के तत्व और ढांचा राजस्थान की लोक कथाओं का है. मैंने चरणदास चोर यानि खांतीलो चोर को पढ़ा और देखा भी है. वह भी मुझे लोक कथा का नाट्य रूपांतरण ही लगता है. अगर ये लोक कथाएं न होकर ओरिजनल काम है तो ये कुछ ऐसा है जैसे गेंदे के फूल की खेती हो और उसमें से गुलाब की खुशबू आ रही हो. इस अनूठी खेती के लिए भी विजयदान देथा कभी विस्मृत न किये जायेंगे. लोक कथाओं पर बुनी गयी उनकी कहानियों को मैंने इसलिए बार बार पढ़ा कि उन कहानियों में मेरे आस पास की दुनिया झांकती है. ये कहानियां मुझे याद दिलाती हैं कि इस सदी के गुणसूत्रों में हिटलर प्रवृतियाँ रच बस गयी हैं. हम उसका गुणगान किये जाने से ज़रा भी शर्मिंदा नहीं होते. हम हिटलर प्रवृति के लोगों के लिए निर्विरोध समर्थन जुटाने के काम में लगे हुए हैं. बिज्जी राजस्थान के साहित्य ही नहीं वरन दुनिया भर में लोक रचनाओं के संरक्षण का काम करने वालों में सिरमौर गिने जायेंगे.

November 13, 2013

आतिशदान के भीतर की गंध

आले में रखी
प्रिय की अंगुली से उतरी
अंगूठी को छूकर आ रही
हवा की खुशबू से भरा कमरा.

चित्रकार की
आँखों में रंग करवट लेते हुए.
* * *

रात भर
लालटेन की रौशनी में
स्मृतियाँ बुनती हैं
स्याही पर सुनहरे पैबंद. 

दिन के उजाले में
घर की बालकनी पर
ज़र्द होकर झड़ते हैं मुसलसल
पिछली रुत में खिले बोसे.

ज़िन्दगी जिसे कहते हैं
पड़ी हुई है एक खराबे में.  
* * *

प्रेम के अतुल्य शोर के बीच
प्रेम का अपूर्व दुर्भिक्ष.
* * *

आतिशदान में बचाकर रखी हैं 
अधेड़ प्रेमी-प्रेमिकाओं ने कुछ मुलाकातें.

जाने कब
उसे आख़िरी बार देख लेने का मन हो
और वह आख़िरी बार न निकले.
* * *

उदास ही सही
मगर चुप बैठे हुए,
भेजते हैं कुछ कोसने खुद को.

तुम न रहो तो
ज़रूरी नहीं कि न रहे कोई काम बाकी.
* * *


हर रुत एक सी कहाँ होती है. कई बार कल की कोई बात पीछे कहीं छूट जाती है. उसी विस्मृति की खोज में उदासी की अंगुली को थामे रहना कैसी मजबूरी होती है. ये सोचना कि किस तरह बदल जाता है सब कुछ. सीली भीगी बारूद की तरह जल ही नहीं पाते. ठहरे हुए वक़्त की गंध सघन होती जाती है. भीगी हुई माचिस की तीलियों को रगड़ कर फैंक देने या धूप का इंतज़ार करने की दुविधा के साथ... 

[Painting Image Courtesy : Jane Beata]

November 11, 2013

बात, जो अभी तक न सुनी गयी हो.

घर के बैकयार्ड में लोहे का एक मोबाईल चूल्हा है. इस पर माँ बाजरे की रोटियां बनाया करती हैं. कभी इस पर काचर का साग पक रहा होता है. अब सर्दियाँ आई तो हर सुबह नहाने के लिए पानी गरम होता रहेगा. आज माँ गाँव गयी हुई है. मैं पानी गरम करने लगा था. चूल्हे की आंच के सम्मोहन में गुज़रे मौसम में टूटा हुआ एक सूखा पत्ता दूर से उड़ कर आग की परिधि में कूद पड़ा.

मुक्ति सर्वाधिक प्रिय शब्द है.
* * *

रौशनी का एक टुकड़ा दरवाज़े से होता हुआ कच्चे आँगन पर गिर रहा है. हवा भी उतनी ही ठंडी है जैसे बरफ की गठरी की एक गाँठ भर ज़रा सी खुली हो. प्लास्टिक की मोल्डेड कुर्सी पर बैठा हूँ. पांवों के पास अँधेरा आराम बुन रहा है.

छोले.

गाँधी चौक स्कूल के आगे पहली पारी की रिसेस से दूसरी पारी की रिसेस तक. आलू टिकिया के सिकने की खुशबू. और सर्द दिनों में छोलों की पतीली से उड़ती हुई भाप की दिल फरेब सूरत याद आ रही है. रात के वक़्त उजले दिन की याद जैसे कोई पीछे छूटे हुए शहर को बाँहों में भरे बैठा हो.

टीशर्ट.

उम्रदराज़ होने के बावजूद अपने नीलेपन को बचाए हुए. दूसरे सहोदर, समान रंगी अनगिनत टीशर्ट में से एक. ये रंग और पहनावा किसी पुरखे ने उस वक़्त मेरे कान में फूंक दिया होगा जब माँ को ज़रा सी झपकी आई होगी और मैं नवजात, सर्द रात के किसी पहर अपने हाथ और पाँव आसमान की ओर किये कुछ मंत्र बुदबुदा रहा होऊंगा.

विस्की.

बचपन में जैसे किसी ने कहा हो कि वह एक ऐसी बात बताएगा जो अभी तक न सुनी गयी हो. उसी बात के इंतज़ार में प्याले में भरी हुई.

मैंने कुछ कहानियां लिखी थीं. उनका किताब की शक्ल में आने का इंतज़ार कर रहा हूँ.

चीयर्स !!
* * *

अपनी ही अँगुलियों को छू रही है अंगुलियां, बाद मुद्दत के मिले बिछड़े यार की तरह. लौट के फिर से नज़दीक होके चलने का मौसम आया है.  

 

November 8, 2013

मौत से भी ख़त्म जिसका सिलसिला होता नहीं.

अभी कुछ दिन पहले पेरू की राजधानी लीमा से कुछ ही दूरी पर एक बस पहाड़ी से नदी में गिर गई. जिससे तेरह बच्चों सहित बावन लोगों की मौत हो गई. ये बस पिछले शनिवार की रात सांता तेरेसा की प्रांतीय राजधानी से चला थी. अपने गंतव्य तक पहुँचने से पहले नदी में करीब छः सौ पचास फीट की गहराई में गिरी. इस दुखद समाचार को पढ़ते हुए मुझे सिलसिले से अनेक दुर्घटनाएं याद आने लगी. हमारे देश में हर महीने कहीं न कहीं इसी तरह बस खाई या नदी में गरती है और बड़ी जनहानि होती है. हम हादसे के समय उदास और दुखी हो जाते हैं लेकिन आदतन उसे जल्दी ही भूल भी जाते हैं. पेरू में जो बस नदी में गिरी थी उसमें सवार कोई भी यात्री ज़िन्दा नहीं बच सका. पेरू और हमारे देश सहित दुनिया भर के गरीब और विकासशील देशों के लोग बेहतर सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था न होने के कारण ज्यादातर ट्रक और ट्रेक्टर में सफर करते हैं. इन वाहनों से भी इसी तरह की दुर्घटनाएं होना आम बात है. गाँव के गरीब लोग ब्याह शादियों जैसे अवसरों के लिए भी अच्छे वाहनों का बंदोबस्त नहीं कर पाते हैं. उनकी बारातें ट्रेक्टर ट्रोलियों और जुगाड़ जैसे साधनों से सफ़र तय करती हैं. यात्री परिवहन के लिए अनुपयुक्त इन साधनों के साथ हादसे और मौत भी सफ़र करते रहते हैं. हम अपनी सीमित और बेदम परिवहन व्यस्था की बड़ी कीमतें चुकाने को मजबूर हैं.
 
धार्मिक यात्राओं पर जाने के दौरान इस तरह के हादसों की झड़ी लग जाती हैं. बहुत सारे हादसे इसलिए भी होते हैं कि यात्रियों के भारी दबाव में टूर ओपरेटर अपने ड्राइवरों के लिए पूरी नींद का इंतजार नहीं करते. वे ज्यादा मुनाफे के फेर में सीजन के हर दिन को कैश करना चाहते हैं. ईश्वर की आराधना के लिए कोई खास वक़्त का होना मुझे कभी समझ नहीं आता है. जो आपका प्रिय है, जो आपका आराध्य है उसका स्मरण हर समय किया जाना चाहिए. वह सर्वशक्तिमान कोई आम आदमी थोड़े ही है कि जिन दिनों उसका मूड अच्छा होगा तभी आराधना करने से प्रसन्न हो सकेगा. वह को सर्वव्यापी है, सभी कुछ उसी का है. हर क्षण भी. फिर क्यों हम कभी इस बात को नहीं समझ सकते कि उसकी हाजिरी के लिए खास वक़्त की दौड़ एक गैर ज़रूरी काम है.

लेकिन हमारा आराध्य हमारी परवाह नहीं करता है कि सुबह का अख़बार पढ़ते हुए और भयावह ख़बरों से निरंतर सामना होता रहता है. आन्ध्र प्रदेश के महबूबनगर जिले में एक निजी लग्जरी बस में आग लग जाने के कारण यात्री जिंदा भस्म हो गए. इस बस से पैंतालीस लोगों के जले हुए शवों को निकाला गया. हैदराबाद से करीब एक सौ चालीस किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या चौवालीस पर तड़के पांच बजकर दस मिनट पर बेंगलूर से हैदराबाद जा रही यात्री बस के ईंधन की टंकी पलेम गांव के समीप एक पुलिया से टकरा जाने के कारण फट गई. जिसके बाद उसमें आग लग गयी. इस आग ने कुछ ही क्षणों में पूरी बस को अपनी चपेट में ले लिया. हादसे के समय इस बस में पचास यात्रियों समेत कुल बावन लोग सवार थे. शव इस कदर जल चुके थे कि उनकी पहचान कर पाना मुमकिन न था. यह पता लगाना मुश्किल हो गया कि पीड़ित महिला है या पुरूष. इस तरह की ग़मगीन कर देने वाली खबर को पढ़ते जाते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं. हम कल्पना नहीं कर सकते कि बस की सीट पर सोया हुआ आदमी अचनाक से आग के फंदे में फंस जाये. वह असहाय इस हादसे में ज़िन्दा भुन जाये.
 
साल उन्नीस सौ अठ्ठासी में अमेरिका के केरोल काउंटी अंतरराष्ट्रीय सड़क मार्ग पर महबूबनगर वाले हादसे जैसा ही हादसा घटित हुआ था. इस बस हादसे का कारण था सामने से एक शराबी द्वारा अपनी गाड़ी भिड़ा देना. इस बस में सवार आधे से अधिक यात्री दुर्घटना स्थल पर ही मृत्यु के ग्रास बन गए थे. सामने से गाड़ी टकराने के कारण बाहर निकलने के लिए आगे का दरवाज़ा क्षतिग्रस्त होकर बंद हो गया था. इस बस में एक आपतकालीन निकासी की खिड़की थी. उसी खिड़की से बच्चों को बाहर निकला जा सका था. बचाए गए चौतीस यात्री भी बाकि यात्रियों की तरह ज़िन्दा जल कर खाक हो जाते अगर ये निकासी द्वार न होता. महबूबनगर की घटना और इस घटना में बड़ा सामंजस्य है. दोनों ही बसें इंधन की टंकी फटने के कारण लगी आग में भस्म हुई. इस बार की दुर्घटना सबसे भयानक है. सभी यात्री अपनी जान से हाथ धो बैठे. ये कैसी मृत्यु है, इसके दुःख को सोचना भी असंभव है. अमेरिका के बस हादसे के बाद एक संगठन से जन्म लिया. उसका नाम है मदर्स अगेंस्ट ड्रंक ड्राइविंग. इस संगठन को बनाने वाले सभी लोग बस हादसे में मारे गए लोगों के परिजन हैं. ये संगठन शराब पीकर गाड़ी चलाने के विरुद्ध सक्रियता से काम करने लगा. मेरी जानकारी के अनुसार इस हादसे के जिम्मेदार को दस साल और ग्यारह महीने जेल में बिताने पड़े. लेकिन हमारे देश में माना जाता है कि सड़क दुर्घटना का कानून बहुत लचीला है. अक्सर सड़क हादसों के दोषियों को उतनी सख्त सजा नहीं मिलती जितनी कि इन्सान की जान लेने वाले अन्य अपराधों के लिए दी जाती है. हमारी जान बहुत कीमती हैं. नागरिक राष्ट की धरोहर है. राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी भी. इनकी सुरक्षा राष्ट्र का सबसे बड़ा ज़िम्मा है. जिगर मुरादाबादी कहते हैं- ज़िन्दगी एक हादसा है और ऐसा हादसा/मौत से भी ख़त्म जिसका सिलसिला होता नहीं.

November 2, 2013

उधर बकरे क़ुरबान, इधर बारूद

यहाँ से रेलगाड़ी मुनाबाव और फिर उससे आगे पाकिस्तान जाती है. मैं रेलवे स्टेशन पर एक लम्बे सन्नाटे के बीच दुबका हुआ बैठा था. एक काले रंग का कुत्ता किसी जासूस की तरह रेलवे ट्रेक की छानबीन करके एक ही छलांग में स्टेशन के प्लेटफार्म पर चढ़ आया. उसने मुझे पूरी तरह इग्नोर किया और पास से गुज़र गया. इसी तरह एक बच्चे ने छलांग लगायी और मेरी तरफ बढ़ने लगा. मैं उसे अपलक देख रहा था. बच्चे को ये अच्छा नहीं लगा इसलिए उसने इशारे से पूछा क्या?

एक ही छलांग में प्लेटफोर्म पर कैसे चढ़ जाते हो?
आराम से

मैं उसकी शान में ऐसा मुंह बनाता हूँ जैसे उसने कोई बहुत बड़ा काम कर लिया हो. वह मेरे पास रेलवे स्टेशन की बैंच पर बैठ जाता है. स्टेशन खाली. रेल महकमे के कामगार टहलते रहते हैं. पुलिस का जवान आधी नींद में स्टेशन को नापता हुआ गुज़र जाता है.

क्या नाम है?
मोहम्मद शोएब अख्तर
किसको लेने आये?
बकरे को
अच्छा कहाँ से आ रहा है?
नागौर से

मैं उसके हुलिए को देखने लगा. वह मेरे बेटे की उम्र का था. उसकी पेंट पर चीकट लगा हुआ था. उसके हाथों पर खुश्की थी. बाल उलझे हुए थे. पाँव के स्लीपर घिसे हुए थे.

तुम कैसे आये?

मैं चौंक गया कि एक बारह साल का लड़का मुझको तुम कहते हुए बात करता है. मैंने अपनी चौंक को छुपा लिया और कहा- मैं अपनी माँ को लेने आया हूँ.
और कौन आ रहा है ?
कोई नहीं
अकेली है?
हाँ अकेली
डोकरी को अकेले क्यों आने दिया, कहीं खो जाएगी

मैंने चाहा कि उसे बताऊँ इस डोकरी के बेटे पुलिस में अफ़सर, विश्वविध्यालय में अध्यापक और रेडियो पर बोलने का काम करने लायक हैं. ये इसी डोकरी के जाए हुए हैं. लेकिन मैं बात को बदलते हुए पूछता हूँ.

आप स्कूल जाते हो?
हाँ
कौनसी क्लास में
छठी
कौनसी स्कूल
राय कॉलोनी में पांच बत्ती के पास
खूब पढ़ते हो?
मैं सुबह दुकान जाता हूँ, फिर वापस घर, फिर स्कूल और शाम को फिर दुकान
इतना काम क्यों करते हो
मेरे पापा दारू बहोत पीते हैं इसलिए चाचा उनको दुकान पर नहीं आने देते तो मैं जाता हूँ
दारू पीना बुरा है?
ख़राब ही है
कैसे
पैसा डुबो देते हैं और काम करते नहीं
आप पियोगे
नहीं मैं नहीं पियूँगा... तुम पीते हो
हाँ मैं पीता हूँ
मत पिया करो घर बरबाद हो जाता है

मैंने सोचा कि बीवी की आत्मा इस नन्हे लड़के में प्रवेश कर गयी है. लेकिन तुरंत ही इसे ख़ारिज कर दिया कि बीवी कैसे किसी को हलाल करने का ख़याल लिए हुए, रेल में आ रहे बकरे का इंतज़ार कर सकती है. ये शोएब अख्तर ही है.

जोधपुर से आने वाली लोकल रेल आई. कुछ चहल पहल हुई और ज़रा सी देर में बुझ गयी. हम जिस रेलवे की बैंच पर बैठे थे उसकी पीठ वाली साइड में दो नार्थ ईस्ट के बीएसएफ के जवान आकर टिक गए. उनको रात ग्यारह बजे की गुवाहाटी जाने वाली रेल पकड़नी थी. उनके लिए ये रेगिस्तान अजूबा रहा होगा. इसी रेगिस्तान के रेलवे स्टेशन पर रेगिस्तान के दो लोग बातें कर रहे थे. एक मैं और दूसरा शोएब अख्तर.

दुकान में क्या करते हो ?
मुर्गा और मटन बेचता हूँ
आप मुर्गा काट लेते हो?
हाँ इसमें क्या है
इसमें एक बेक़सूर की जान चली जाती है
ये सब सोचने की चीज़ है, उसको खुला छोड़ो तो बिल्ली खा जाएगी

इसके बाद मैं चुप हो जाता हूँ. मैं उससे दूसरी तरह के सवाल करता हूँ. जैसे बहन अलग स्कूल में क्यों पढ़ती है. पापा जब काम नहीं करते तो क्या करते हैं. माँ कैसी है. वह कितना काम करती है. तुम जानते हो कि अच्छा पढने लिखने से मुर्गा काटने से आज़ादी मिल सकती है. अच्छे नए साफ कपड़े पहने जा सकते हैं.

वह कहता है मेरे नाना नागौर में रहते हैं. वहां पर पाडे यानि भैंसे काटने का बाज़ार है. मैं उधर जाता हूँ तो खूब मजा आता है. फिर ज़रा देर रुक कर कहता है.

हम बक़रीद पर एक क़ुरबानी करेंगे
अच्छा, कितने का बकरा
ये तीन हज़ार का होगा
तीन हज़ार तो बहुत बड़ी रकम है
अरे, तुमको नहीं मालूम, आज जो दो बकरे आ रहे हैं वे तीस तीस हज़ार के हैं

रेल आ नहीं रही थी और मैं खूब बेचैन हो गया. याद की अपनी सघनता होती है. हर याद का अलग वजन होता है. उसकी याद आते ही ऐसा लगता है जैसे कोई पत्थर सीने पर आ पड़ा है. इसी याद से बाहर आने के लिए मैंने कहा शोएब अख्तर साहब खूब पढ़ते जाना. ऐसा करने से ईद के दिन आप साफ कपडे पहने होंगे. आपका घर किसी कूड़े और बदबू वाली गली से दूर साफ़ जगह पर होगा. ज्यादा इत्र लगाने से गंदगी दूर नहीं हो जाती. गन्दगी को हटाने से ही गंदगी दूर होती है.

रेलगाड़ी आ गयी. आह प्यारी कालका एक्सप्रेस. इसका मुंह जब गाँधी नगर वाले फाटक को चूम रहा होता है तब कहीं जाकर ये अपनी पूँछ को रेलवे स्टेशन के भीतर तक समेट पाती है. मैंने माँ से कहा कि एक बारह साल का लड़का कहता है, डोकरी को अकेले न आने दिया करो. माँ कुछ नहीं कहती हंसती है. माँ को लगता है कि वह वाकई बूढी हो गयी है. मेरे पापा नहीं रहे वरना कितना सुख कायम रहता न? हर किसी के पापा होने चाहिए चाहे शोएब के शराबी पापा की तरह ही हों.

इसके बाद क्या हुआ मालूम है? गरीब भारत में लाख लाख रुपये कीमत वाले नीरीह बकरों की कुरबानी दी गयी. आज पता है, गरीब भारत के लोग धन को दुकानों में लुटा रहे हैं. सबकी मुंडेरों पर दीयों की जगह बिजली के बल्ब सम्मोहन बुन रहे हैं.

मैं ख़ुद को यकीन दिलाना चाहता हूँ कि एक गरीब देश का नागरिक हूँ. मगर हर तरफ पैसा है, तमाशा है. ईद चली गयी दिवाली भी चली जाएगी. उधर बकरे क़ुरबान हुए, इधर बारूद क़ुरबान हो जायेगा.

बधाई हो !!!

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.