August 30, 2013

खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद

सेना युद्ध के मैदान में लड़ रही हो और सेनापति अफीम के नशे में किसी का सहारा लिए आखिरी पंक्ति के पीछे कहीं पड़ा हो। घुड़सवारी सिखाने वाला प्रशिक्षक खुद घोड़े की पीठ में सुई चुभोता जाए। तैराकी सिखाने वाला गुरु खुद बीच भंवर में डूबता हुआ छटपटा रहा हो। ये कैसा होगा? मैं सप्ताह भर की प्रमुख खबरें सूँघता हूँ और मितली आने के डर से अखबार फेंक देना चाहता हूँ, टीवी को ऑफ कर देना चाहता हूँ। मेरी आत्मा पर बार बार चोट कर रही खबरों से घबराया हुआ, मैं सबसे मुंह फेर लेना चाहता हूँ। वैसे हम सबने मुंह फेर ही रखा है। हम सब सड़ी हुई आदर्श रहित जीवन शैली को अपनानाते जा रहे हैं। लालच और स्वार्थ ने हमारे मस्तिष्क का इस तरह अनुकूलन किया है कि हमने स्वीकार कर लिया है कि ऐसा होता रहता है। हम चुप भी हैं कि आगे भी ऐसा होता रहे। विडम्बना है कि नैतिकता और उच्च आदर्शों से भरे सुखी जीवन का पाठ पढ़ाने वाला खुद चरित्रहीनता के आरोप से घिर जाए। ये निंदनीय है। ये सोचनीय है। विवादास्पद प्रवचन करने वाले आसूमल सीरुमलानी उर्फ आसाराम पर एक नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न का आरोप है।

जोधपुर के आश्रम में यौन उत्पीड़न किए जाने का सोलह वर्षीय द्वारा आरोप लगाए जाने के बाद आसाराम के खिलाफ इस संबंध में मामला दर्ज किया गया है। खबरों में आते ही उनके प्रवक्ता ने इस आरोप का खंडन ये कहते हुये किया कि बताए गए दिन आसाराम जोधपुर में ही नहीं थे। लेकिन प्राथमिक अनुसंधान में ही ये पुख्ता जानकारी मिल गयी कि ये बयान झूठा है। सत्य का प्रवचन करने वाले कथित संत के प्रवक्ता दारा दिया गया बयान, झूठ अथवा स्मृतिदोष का कड़ा उदाहरण है। आसाराम उस दिन जोधपुर में ही थे। जांच एजेंसी ने कहा कि जांच के दौरान उन्होंने पाया कि लड़की जोधपुर के मनाई आश्रम में एक धार्मिक कृत्य के लिए आसाराम से मिलने की इच्छुक नहीं थी लेकिन उसके माता-पिता ने उसके वहां जाने पर जोर दिया था। उसके माता-पिता की आसाराम में अंध भक्ति थी। छिंदवाड़ा में गुरुकूल से लड़की के माता-पिता को सेवादारों ने बताया कि उसे किसी बुरी आत्मा ने अपने कब्जे में ले लिया है। उन लोगों ने उन्हें झाड़फूंक के नाम पर विशेष अनुष्ठान के लिए बापू के पास ले जाने के लिए कहा। लड़की ने इनकार कर दिया था। लेकिन उसके माता-पिता ने बापू के पास जाने पर जोर दिया, जो उस वक्त जोधपुर में थे। एजेंसी का कहना है कि लड़की के पैतृक स्थल शाहजहांपुर में की गई जांच के बाद पाया गया कि लड़की के पिता की आसाराम में अंध भक्ति थी। शाहजहांपुर में यह परिवार आश्रम में नियमित जाया करता था। अंध भक्ति के खिलाफ अभियान चलाने वाले डॉ नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के महज सप्ताह भर बाद ही अंध भक्ति का एक नया सबक हमारे सामने आया है। इसमें पिता की अंध श्रद्धा के कारण एक मासूम लड़की को कथित रूप से प्रताड़ित होना पड़ा है।

हम जिस भारतवर्ष के गुणगान करते हैं, वह किस दशा से गुज़र रहा है। इसे भली भांति हर कोई जानता है। जयपुर के एक बालिका आवासीय छात्रावास में हुये दुष्कर्मों की पड़ताल और नतीजे के बारे में हम सब भूल गए हैं। राष्ट्रीय राजधानी में चलती बस में बलात्कार और निर्ममता पूर्वक की गई ह्त्या के आरोपियों पर लंबित फैसले का अभी तक इंतज़ार ही कर रहे हैं। इसी इंतज़ार में उत्तर पूर्व से एक और बुरी खबर आती है। हमारे जेहन में है कि पहाड़ी और खासकर उत्तर पूर्व के राज्यों में महिलाओं की समाज में स्थिति मैदानी भागों की स्त्रियॉं से बहुत बेहतर है लेकिन वेस्ट सियांग जिले के लिकाबाई में एक निजी स्कूल में होस्टल वार्डन को चौदह बच्चियों के साथ कथित रूप से बलात्कार के सनसनीखेज मामले में हिरासत में लिया गया है। आरोप है कि चार से तेरह साल की बच्चियों के साथ वार्डन तीन साल से अधिक समय तक बलात्कार करता रहा। इस घटना के सामने आने के बाद स्थानीय लोगों ने सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए लिकाबाली पुलिस थाने का घेराव भी किया। स्कूल के कुछ छात्रों ने लिकाबाली पुलिस थाने में कल शिकायत दर्ज करायी। नामित आरोपी को पुलिस गिरफ्तार कर लिया। वह स्कूल में अध्यापक के साथ ही होस्टल वार्डन भी था। इस संबंध में पूछताछ के लिए स्कूल के प्रिंसीपल और दो अन्य कर्मचारियों को भी हिरासत में लिया गया है। प्राथमिक जानकारी के अनुसार स्कूल में पिछले तीन साल से छात्राओं का यौन उत्पीड़न और बलात्कार जारी था। अपराध को अंजाम देने के बाद आरोपी ने छात्राओं को इसकी जानकारी अपने माता पिता को देने पर कड़ा अंजाम भुगतने की धमकी दी थी। इस तरह नाबालिग बच्चियों के मासूम मन को रोंद डाला गया है। ये कोई नवीन घटना नहीं है। ऐसा देश के लगभग सभी हिस्सों में होता आया है। इस तरह हम अपने देश के लिए भयभीत और स्त्री होने के नकली अपराधबोध से पीड़ित दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं। 

सुरक्षा का खतरा सिर्फ अबोध बच्चियों और बच्चों को ही नहीं है वरन वाणिज्यक राजधानी मुंबई में एक नौजवान फोटो पत्रकार के साथ पाँच लोग सामूहिक बलात्कार करते हुये तनिक भी नहीं घबराते। वे उसके साथी को पीटते हैं, बेल्ट से बांधते हैं और लड़की के साथ बलात्कार करते हैं। अंग्रेजी पत्रिका के साथ इंटर्नशिप कर रही इस तेईस वर्षीय फोटो पत्रकार से कथित रूप से सामूहिक बलात्कार एक सुनसान पड़ी मिल में किया गया। वह अपने पुरूष सहकर्मी के साथ फोटो खींचने गयी थी। जिस देश में काम के सिलसिले में घर से बाहर जाने वाली स्त्रियॉं के साथ दुर्व्यवहार करते हुये लोगों के मन में भय न हो, सत्य और नेकी का पाठ पढ़ाने वाले खुद चरित्रहीनता के आरोपी हों उस देश का भविष्य क्या होगा?हमारी जो उम्मीद है वह राज से है। मध्य प्रदेश में राज में बैठे हुये अस्सी बरस के वयोवृद्ध नेता अपने नौकरों के साथ कुकृत्य करने के दोष और उत्तर प्रदेश के निर्वाचित सत्ता दल के विधायक समुद्री किनारों पर अनैतिक आचरण करते हुये पकड़े जाए। और हम ये भी न भूल सकें कि विधानसभा में बैठे हुये जनप्रतिनिधि अपने मोबाइल फोन में अश्लील वीडियो देखते हुए दिखते हैं। कानून के इन पालकों के साथ क्या सलूक होना चाहिए। ये किससे पूछा जाए। देशभक्ति और धार्मिक चेतना से भरे हुये दलों का स्वरूप वास्तव में राष्ट्रभक्त होने का है या जो खबरों में दिखाई देता है, वह है। संत होने की उच्च प्रतिष्ठा पर लगी हुई कालिख, पुलिस थानों में अपना मुंह छिपाये हुये बैठे जनप्रतिनिधि और शिक्षा के मंदिरों में कुंठित यौन दुराचारी। खबरें यहीं हैं, और खबरें समाज का आईना भी हैं। फ़ैज़ पूछते हैं तो हमें भी यही पूछना याद आ रहा है। 

कब नज़र आएगी बेदाग़ सब्ज़े की बहार,
खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद।

August 23, 2013

मैं टूटे हुये तीर-कमां देख रहा हूँ।

ब्रूस स्प्रिंगटीन्स ने कहा कि अपने नेताओं या किसी भी चीज़ के प्रति अंध विश्वास आपको खत्म कर देगा। कुछ रोज़ पहले जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की पुणे में दो अज्ञात हमलावरों ने गोली मार कर हत्या कर दी।वे अंधविश्वास का विरोध करते हुये अपना जीवन समर्पित कर गए। हादसों की इस सदी में नित नूतन और हृदय को दुख से भर देने वाले समाचारों के बीच ये दुखद घटना भी संभव है कि काल की धूसर परछाई में भुला दी जाए। किन्तु ऐसा इसलिए न होगा कि उनका लक्ष्य बेहद ज़रूरी था और वह कोरा भाषण न होकर सक्रियता से किया जा रहा सामाजिक कार्य था। ये याद रखने की बात है कि अंध विश्वास के विरुद्ध लड़ना मनुष्यता की भलाई के लिए किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण काम है। श्री दाभोलकर उनहत्तर साल के थे। वे लंबे समय से अंधविश्वास विरोधी अभियान चला रहे थे। उनकी हत्या से अंधविश्वास विरोधी आंदोलन को तगड़ा झटका लगा है। उनके बेशकीमती जीवन का कोई मूल्य न चुकाया जा सकेगा। ‘अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ के प्रमुख दाभोलकर सुबह टहलने निकले थे तभी ये घटना शहर के ओंकारेश्वर मंदिर के पास पुल पर हुई। घटनास्थल ‘साधना’ पत्रिका के कार्यालय के पास है। दाभोलकर इस पत्रिका के संपादक थे।

समूचे विश्व में मनुष्य के ज्ञानवान होने का सहज अनुमान इसी बात से लगाया जाता है कि उसने कुदरत को कितना जाना है और अपने अज्ञान के प्याले में ज्ञान का कितना आसव भर चुका है। हम सब कोरे जन्मते हैं। यानि हमारे मस्तिष्क में कुछ भी ऐसा नहीं होता जो दुनिया के बारे में कोई विशेष धारणा रखता हो। हम अपने जीवन की रक्षा के लिए होने वाली नैसर्गिक प्रतिक्रियाओं के अतिरिक्त किसी भी तरह का ज्ञान साथ लेकर नहीं आते हैं। हमारे लिए ये दुनिया और इसकी तमाम जटिलताएँ अजानी और अभेद्य हुआ करती हैं। लेकिन हम अपने विवेक और पुरखों के ज्ञान से इस दुनिया की गति को जानते समझते हैं। अन्वेषी मनुष्य सदा सत्यकामी हुआ करता है। वह परखता है, वह जाँचता है और इसके बाद प्राप्त नतीजे से अपना ज्ञान रचता है। जो ज्ञान हमें हमारे पुरखों से मिला है, वह बेशकीमती है। उस ज्ञान का तिरस्कार नहीं किया जाना चाहिए कि किसी भी अकेले मनुष्य के पास इतना जीवन नहीं होता कि वह सारी दुनिया को जान समझ ले। पुरखों का ये बेशकीमती ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता ही जाता है। जिस सभ्यता में ज्ञान को एक से दूसरे को सौंपने का प्रचलन न था वे सभ्यताएं ही समूल नष्ट हो गयी। लेकिन चिंता की बात वहाँ होती है जहां हम अपने पुरखों के दिये ज्ञान को आँखें मूँद कर मान लेते हैं। हम ये चेष्टा नहीं करते कि पुरातन की परंपरा और आवरणबद्ध ज्ञान को नए जमाने की रोशनी में अनावृत किया जाए।

अमानवीय सामाजिक रीतियों के खिलाफ दो दशक से जारी अपने अभियान के लिए जाने जाने वाले दाभोलकर महाराष्ट्रराज्य विधानसभा में ‘अंधविश्वास एवं काला जादू रोधी’ कानून पास कराने के लिए जनमत बनाने में जुटे थे। वे इस मसले पर महाराष्ट्र सरकार के साथ लगातार चर्चाएं कर रहे थे। दाभोलकर ने हाल में इस विधेयक के पास होने में हो रही देरी को लेकर उन्होने सत्तासीन लोगों के प्रति कई बार सार्वजनिक रूप से विरोध प्रकट किया था। अंधविश्वासों के खिलाफ सख्त कानून न लाने को राज्य के प्रति धोखा कहते थे। अंधविश्वास और रूढ़ियों के विरुद्ध काम करते हुये दाभोलकर ने हाल में जात पंचायत के खिलाफ भी अभियान शुरू किया था और नासिक में कार्यशाला आयोजित की थी। इस कार्यशाला में समाज को पुरातन की अंधी पटरी से उतार कर विज्ञान और नए जमाने के रास्ते पर लाने की हिमायत की थी। खाँप पंचायतों के फैसलों पर देश भर के प्रगतिशील और बुद्धिजीवी तबके के बीच खूब चर्चा हुआ करती है लेकिन कहीं से किसी भी तरह के सामाजिक और सामूहिक कार्यक्रमों का आयोजन होने की खबर कम ही मिलती है। इसलिए भी दाभोलकर जी द्वारा आयोजित ये कार्यशाला महाराष्ट्र के प्रगतिशील होने का एक मजबूत आह्वान थी।

हम ऐसा नहीं कह सकते कि उनकी हत्या के साथ प्रगतिशील आंदोलन से एक पहचान छिन गई। इसलिए कि मनुष्य के गुणसूत्र प्रगतिशील हैं। उनको सही रास्ता और माहौल मिल सके इसी बात की ज़रूरत है। लेकिन हम ये कह सकते हैं कि उनकी ह्त्या से इस संभावित माहौल को गहरा सदमा पहुँच है। दाभोलकर अपने आंदोलन के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाने का काम कर रहे थे। उनके काम से महाराष्ट्र की प्रगतिशील विचारधारा लाभान्वित हो रही थी। सतारा के रहने वाले दाभोलकर ने मिराज मेडिकल कालेज से चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई की थी और करीब एक दशक तक चिकित्सक के रूप में सेवा देने के बाद समाजिक कार्यों से जुड़ गए थे। दाभोलकर जिस ‘साधना’ नाम की एक पत्रिका के संपादक उसकी शुरूआत साने गुरुजी ने की थी। दाभोलकर सामाजिक कार्यकर्ता बाबा आधव के ‘एक गांव एक कुआं’ आंदोलन और अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति से भी जुड़े थे। दाभोलकर मूर्तियों के विसर्जन के भी खिलाफ थे। उनका कहना था कि इससे पानी प्रदूषित होता है। इस तरह से उन्होने अपना जीवन अंधविश्वासों के खिलाफ और आम आदमी की भलाई को समर्पित कर रखा था। ये हमारे लिए बड़ी क्षति है किन्तु उनके लिए सबसे सच्ची श्रद्धांजलि ये हो सकती है कि हम अपने मन की बेड़ियों को काटें, रूढ़ियों और अंधविश्वासों से खुद को दूर रखें और अपने बच्चों को उनके प्रति जागरूक बनाएँ। हम एक दिन ज़रूर अंधविश्वासों से दूर हो जाएंगे लेकिन इस वक़्त यही हाल है कि उनके जाने का दुख असीम है। बाल स्वरूप राही साहब का एक शेर है- वो सोच में डूबे हैं निशाना है कहाँ पर, मैं टूटे हुये तीर-कमां देख रहा हूँ।

August 8, 2013

होने को फसल ए गुल भी है, दावत ए ऐश भी है

बारिशें नहीं होती इसलिए ये रेगिस्तान है। इसका दूसरा पहलू ये भी है कि ये रेगिस्तान है इसलिए बारिशें नहीं होती। एक ही बात को दो तरीके से कहा जा सके तो हमें ये समझ आता है कि हल कहीं इसी बात में ही छिपा हुआ है। अगर रेगिस्तान में कुछ पेड़ और पौधे बढ़ जाएँ तो यहाँ से गुज़रने वाले बादलों को रुकने के मौका मिल सकता है। वे बरस भी सकते हैं। उनके बरस जाने पर रेगिस्तान जैसी कोई चीज़ बाकी न रहेगी। मुझे ये खयाल इसलिए आया कि बुधवार को संसद में खाद्य सुरक्षा बिल प्रस्तुत कर दिया गया। यूपीए सरकार में इस बिल को लाने के प्रति बड़ी उत्सुकता थी। जिस तरह मनरेगा एक मील का पत्थर और जन कल्याणकारी योजना साबित हुई उसी तरह की आशा इस बिल के लागू होने से भी की जा रही है। इस पर काफी दिनों से चल रही खींचतान ने इसे भी कई लंबित योजनाओं में शामिल कर दिया था। ये आश्चर्य की कोई बात नहीं है कि गरीब और आम अवाम के लिए लाई जानी वाली योजनाओं पर खूब समर्थन और विरोध की बातें होती हैं। हर कोई भला करने का अधिकार अपने पास रखना चाहता है और दूसरे ये काम करें इसे स्वीकार नहीं करता।

मैंने बचपन में कई बार सुना कि फेमीन शुरू होने वाली है। मेरे लिए फेमीन शब्द का अर्थ था कि कोई काम शुरू करना जिससे लोगों को रोज़गार मिल सके। फेमीन का शाब्दिक अर्थ बहुत अरसे के बाद समझ आया। इसका अभिप्राय ये है कि रेगिस्तान के लोगों का और अकाल का वास्ता जन्म जन्मांतर का रहा है। सरकारों ने इस सूखे भू-भाग और देश के ऐसे ही अनेक हिस्सों में अपने नागरिकों को भूख से मरने से बचाने के लिए योजनाएँ बनाई और उनका क्रियान्वयन किया। इस बार जो खाद्य सुरक्षा बिल लाया जा रहा है इससे देश की दो तिहाई आबादी के लाभान्वित होने की उम्मीद है। इस योजना के मुताबिक गरीबों को दो रुपए किलो गेहूं, तीन रुपए किलो चावल और एक रुपए किलो मोटा अनाज राशन दुकानों के माध्यम से दिया जाएगा। एक परिवार को हर माह पच्चीस ‍किलो अनाज मिलेगा। गांवों की पचहत्तर फीसदी और शहरों में करीब पचास फीसदी आबादी तक यह योजना पहुंचेगी। इस योजना को फिलहाल तीन साल के लिए लागू करने की बात कही जा रही है। खाद्य सुरक्षा योजना के अंतर्गत मिड डे ‍मील, आईसीडीएस भी शामिल हो जाएंगे। अनुमान के मुताबिक इस योजना के लागू होने से सरकार को प्रतिवर्ष एक लाख चौबीस करोड़ रुपए की ‍सब्सिडी देनी होगी। आज के भाव से एक किलो चावल पर साढ़े तेईस और गेहूं पर प्रतिकिलो अट्ठारह रुपए की सब्सिडी देनी होगी। तीन साल में करीब छः लाख करोड़ की सब्सिडी दिए जाने का अनुमान है। योजना के तहत देश की पैंसठ प्रतिशत आबादी को सस्ते दामों में अनाज मुहैया कराया जाएगा। 

केंद्र सरकार ने इस योजना के लागू किए जाने का सारा जिम्मा राज्य सरकारों पर डाल दिया है। यह एक तरह से संघीय ढांचे को मजबूत किए जाने हेतु उठाया गया कदम है। केंद्र और राज्यों को मिल कर ही इस तरह की योजनों का क्रियान्वयन करना चाहिए। केंद्र सरकार सब्सिडी दे रहा है और राज्य सरकारें ये तय करे कि इसका फायदा किसको दिया जाना है। चयनित होने वाले लाभार्थी तक जो सस्ता राशन पहुंचेगा उसे उपलब्ध कराने का सारा श्रेय केंद्र सरकार न ले जाए इसलिए कुछ राज्य इसका विरोध कर रहे हैं। वे नहीं चाहते कि किसी भी रूप में उनका सिस्टम केंद्र के लाभ के लिए काम करे। लेकिन ये जो विरोध करने वाली सरकारें हैं वे ही अक्सर केंद्र से कई मामलों में सहायता दिये जाने की गुहार लगाती रहती है। क्या उस वक़्त उनको नहीं लगता कि केंद्र से मिला हुआ धन लाभार्थी को प्रभावित करेगा। या उनके विरोध की वजहें कुछ और हैं। एक वजह ये हो सकती है कि सब राज्यों की सरकारों ने गरीबों के लिए अपने स्तर पर कई योजनाएँ चला रखी हैं। वे इसका क्रेडिट ही चाहती है और केंद्र की भव्य योजना के सामने उन लघु योजनाओं के दम तोड़ देने के भय से घिरी हुई हैं।

इधर लोग अक्सर एक ही शिकायत करते हैं कि रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराने की जगह सरकारें इस तरह की योजनाएँ लाती हैं जिनसे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता हो। वही सिस्टम और वे ही उसके लाभ उठाने वाले। समाज का बहू संख्यक वर्ग ये मानता है कि आज राजनीति में आने के उत्सुक और आकांक्षी लोगों का पहला लालच यही है कि वे सरकारी योजनाओं में सेंध लगा कर अपने लिए कुछ चुरा सकें। सब्सिडी का खेल ही इसके लिए सबसे अधिक उपयुक्त है। हाल ही में ये तय किया गया है कि रसोई गैस पर दी जाने वाली सब्सिडी को उपभोक्ता के बैंक खाते में जमा करवाया जाएगा। ऐसा निर्णय करने के पीछे का सबक ये है कि आम उपभोक्ता की जगह रसोई गैस का बहुतायत से दुरुपयोग हो रहा है। तो क्या इस खाद्य सुरक्षा बिल के बारे में भी यही संदेह नहीं उभरता है। ये देश की राशनिंग प्रणाली को फिर ज़िंदा करने का काम है और हम सब जानते हैं कि राशन की दुकानों का खेला कैसा है। ज़रूरत इस बात की है सिस्टम को पहले दुरुस्त किया जाए। हम एक नयी सोच से मनुष्य के लिए रोजगार के अवसर बनाएँ। ताकि वह खुद कमा कर खा सके। उसके बच्चों को स्कूल के पोषाहार और बीवी को राशन वाली दुकान की कतार में न खड़ा होना पड़े।

याहया जस्दानवाला का एक शेर है-
होने को फसल ए गुल भी है दावत ए ऐश है मगर
अपनी बहार का मुझे आज भी इंतज़ार है ।  

[तस्वीर सौजन्य : रेडिफ़] 

August 1, 2013

रेगिस्तान के एक कोने के पुस्तकालय में प्रेमचंद

हम जाने कैसे इतने उदासीन हो गए हैं कि महापुरुषों को याद करने के लिए आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में उपस्थित होना ही नहीं चाहते हैं। इसका एक फ़ौरी कारण ये हो सकता है कि हम उस वक़्त इससे ज्यादा ज़रूरी काम करने में लगे हों। काम की ज़रूरत और महत्व क्या है इसके बारे में शायद सोचते भी न हों। कभी ये हिसाब न लगाते हों कि आज के दिन के सिवा भी कोई दुनिया थी, कोई दुनिया है और आगे भी होगी। उस दुनिया पर किन लोगों के विचारों, लेखन और कार्यों का असर रहा है। जिस समाज में हम जी रहे हैं वह समाज किस रास्ते से यहाँ तक आया है। बुधवार को प्रेमचंद की जयंती थी। इस अवसर पर दुनिया भर के साहित्य प्रेमियों ने उनको धरती के हर कोने में याद किया। शायद सब जगह उनको उपन्यास सम्राट और सर्वहारा का लेखक और सामाजिक जटिल ताने बाने के कुशल शब्द चितेरा कहा गया होगा। उनके बारे में कहते हुये हर वक्ता ने अपनी बात को इस तरह समाप्त किया होगा कि प्रेमचंद के बारे में कहने के लिए उम्र कम है, इस सभा में आए सभी विद्वजन उनके लेखन पर प्रकाश डालते जाएँ तो भी ये एक पूरी उम्र गुज़र सकती है।

रेगिस्तान के इस कस्बे में भी इसी अवसर पर जिला पुस्तकालय में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। विध्यार्थियों के लिए निबंध लेखन और भाषण प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। शहर के प्रबुद्ध लोग और अनेक विध्यार्थी इस कार्यक्रम में उपस्थित थे। प्रेमचंद अपने लेखन में जो भारत का अक्स हमें सौंप कर गए थे, उसमे ज़रा सा भी बदलाव नहीं आया है। हम अचानक से याद करते हैं कि आज़ादी से पंद्रह साल पहले से अब तक लगभग अस्सी साल गुज़र चुके हैं भारत की शक्ल में कोई खास परिवर्तन नहीं आया। हिन्दी के एसोसिएट प्रोफेसर आदर्श किशोर के वक्तव्य में सपनों का देश अनुपस्थित है। वे इसे वैसा ही मानते हैं जैसा कि प्रेमचंद अपने लेखन में हमें सौंप कर गए थे। उनके सब पात्र आज भी उसी हाल में जी रहे हैं। उनकी मूलभूत समस्याएँ वैसी ही हैं। जाति, शोषण, सामंत और अधिनायकवादी तत्वों का बोलबाला वैसा ही है।

लेखन के सरोकार ही लेखक की सबसे बड़ी पूंजी और चरित्र हुआ करता है। एक रूढ़िवादी, अशिक्षित और चेतना के संकट से घिरे हुये राष्ट्र में सर्वहारा के जीवन को कथाओं में बुन कर उनकी तकलीफ़ों को जन जन की सहज स्वीकार्य वाणी में बदल देना प्रेमचंद की थाती है। उनके बारे में बोलते समय विध्यालय के बच्चे ऐसा महसूस करते हैं जैसे वे किसी अपने देखे भाले हुये परिचित के बारे में बात कर रहे हों। ऐसा किस तरह संभव हुआ कि अस्सी से अभी अधिक बरस पहले का लेखन हमारे लिए आज का सबसे अधिक सामयिक दस्तावेज़ हो गया है। वक़्त बदला, समाज और राष्ट्रों ने अंगड़ाइयाँ ली मगर एक लेखक ने जिस समाज के तंत्रिका तंत्र को लिखा वह आज भी कायम है।

कैसे कृतियाँ समय के क्षय से आगे निकल जाया करती है। ये कितना अद्भुत लिखना है कि कई दशक बीत जाते हैं मगर एक एक बात उतनी ही खरी और सामयिक बनी रहती है। रेगिस्तान के आखिरी छोर से लेकर राजधानियों और वहाँ से हर कोने तक इस महान लेखक की असाधारण प्रतिभा को याद किया जाता है। प्रेमचंद के लेखन में जन की पीड़ा के स्वर हैं ही किन्तु जो सबसे बड़ी बात है वह है उनका राजनैतिक दृष्टिकोण। इस बात को अक्सर जान बूझ कर गोल ही रखा जाता है। महात्मा गांधी के प्रभाव की बात की जाती है लेकिन उन्होने जो खुद लिखा है उसे भुला दिये जाने की कोशिशें की जाती हैं। इसलिए कि रूढ़िवादी और दक्षिणपंथी ताक़तें सदा ही कुप्रथाओं और बेड़ियों में जकड़े हुये समाज में बेहतरी से पनप सकती है। प्रेमचंद समाज की रगों में दौड़ रही असमानता और पूंजी के चाहने वालों की करतूतों को उजागर करते रहे हैं। उनके पात्र, उनका जीवन और आचरण अपने आप में मनुष्य के बेहतर जीवन की कामना के उद्घोष का मेनिफेस्टो है।

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.