July 4, 2021

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था। 

लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने का शोर बढ़ता जा रहा था। शराब के नशे से भरे दिमाग पर दस्तकें बढ़ती ही गई तब वह जागा।

रात का एक बजा था। दरवाज़े के भीतर आती हुई औरत का चेहरा खुला था। काँधे पर शाल तिरछी पड़ी थी जैकेट भीगा-भीगा सा था। औरत की आंखों में एक बेचैनी थी। 

उसने सिगरेट के लिए दाएं बाएं देखा तब तक औरत लिहाफ के भीतर घुसकर सो गई थी। 

इंतज़ार कभी-कभी हिंसक बना देता है। शराब न पीने वाली औरत के होंठों पर उसने शराब की गंध से भरा मुंह रख दिया। औरत को प्रेम था या न था मगर इतनी बेसब्र चाहना थी कि हिंसा मद्धम आंच की तरह उगने लगी। 

वह उसके बदन की ज्यामिति से भली भांति परिचित था। लेकिन हिंसा उसके बदन से पहला परिचय कर रही थी। वह उसे अपने आगे लेकर एक हूकते सियार में ढल गया था। 

चौपाई हिंसा से लिहाफ गिर गया। रात की सर्द अकड़ गुम हो गई। वह कुछ देर उसकी छातियों में सर रखकर पड़ा रहा। जब तब उसकी पीठ को टटोलता। औरत की टांगों पर बहुत सारे बचपन के घावों और चोटों के बचे निशान उसे लिहाफ के भीतर अंधेरे में दिखने लगते। वह उन पर अपनी अंगुलियां घुमाता। 

बस इतना ही प्रेम था। हिंसा केवल एक थकान भर उपजा सकी। 

वह जब जगा तब तक सराय से लोग जा चुके थे। हिंसा एक स्मृति थी। वह शराब नहीं पीती थी, ये अजीब बात न थी। अजीब था कि वह बहुत हिंसक थी। 

उसकी हिंसा घड़ी से झरती टिक टिक की आवाज़ की तरह झरती थी।

June 25, 2021

सब कुछ किसी स्याही में

चाहनाएं तुम्हारा पीछा करती है दिल दीवार की तरह चुप खड़ा रहता है।

रेगिस्तान में दिन की तपिश भरी आंधियां रात को मदहोश करने वाली हवा में ढल जाती हैं। एक नशा तारी होने लगता है। बीत चुकी बातों और मुख़्तसर मुलाक़ात की याद किसी भीगी छांव की तरह छा जाती है।
कभी किसी शाम धूल उतरती नहीं। आकाश के तारे दिखाई नहीं देते। सब कुछ किसी स्याही में छुप जाता है। उस वक़्त बन्द आंखों में कोई बेहद पुराना स्वप्न टिमटिमाने लगता है।
जाने कब नींद आ जाती है कि स्ट्राबेरी जैसा चाँद देखना रह जाता है। जबकि वह ठीक बाईं और चमक रहा होता है।
इस चाँद को देखने वाली चाहनाएँ उस जगह जा चुकी है। जहां तुम हो।
मगर फिर भी...

June 13, 2021

तीज का चांद

शाम ढल रही थी। डूबते सूरज के ऊपर चाँद खिला था। रेगिस्तान के घर की छत पर आहिस्ता रोशनी का पर्दा गिर रहा था।

दफ़अतन अंगुलियां स्क्रीन को छूती और फिर मन उन तस्वीरों को देखने से मुकर जाता कि उसने कहा था "ये मैं नहीं हूँ।"
एक बार नज़र आसमान की ओर गई तो दिल धक से रह गया। ये चाँद कौनसा है। बचपन में किसी ने कहा था चौथ का चांद मत देखना। अपने ही भीतर गुम रहना।
अकसर तारीखें भी याद नहीं रहती तो तिथियों का हिसाब नामुमकिन था। कोई चाहना रहे तो मन हर कुछ खोज आता है। वह भी जो वह नहीं है।
ये चौथ का चांद न था। आसमान में तीज का चांद चमक रहा था। क्या ये अच्छा है?
पता नहीं। एक सिगरेट टिमटिमाती रही जिस में उसकी सांसें नहीं घुली थी।

June 6, 2021

और बालकनी धुएं से भर गई होती

वही इक रात का सौदा वही बरसों का वीराना। * * *

अंगुलियां एक अक्षर लिखती है
और दिल दो-दो बार धड़कता है।
यही इक बात है जिस पर, अभी तक प्यार आता है।
* * *
सोचता था कि
बड़ी कीमती शै है ज़िन्दगी।
मगर क्या मालूम था
कि कुछ पी लेंगे, उसको चूम लेंगे
बस यही सोचते हुए मर जाएंगे।
* * *
अब तक बना लिया होता दूसरा पेग
और बालकनी धुएं से भर गई होती।
अब तक
इनबॉक्स में ये लिखकर मिटा भी दिया होता
कि तुम्हारी याद आती है।
* * *

June 4, 2021

इस तिलिस्म में

शैतान की प्रेमिका पूछ रही थी तुम मुझको कितना याद करते हो। ठीक उस वक़्त रेगिस्तान की सोनल घास के कान में हवा फूंक रही थी सरगोशी सुनो जानाँ, सुनो जानाँ, सुनो जानाँ। * * *

शैतान की प्रेमिका ने कहा
तुमको बहुत दूर चलकर आना होगा
मुझे छूने के लिए।
शैतान, स्वर्ग से धकेले जाने के बाद
धरती की ओर गिरते हुए
बस यही तो सोच रहा था कि कहाँ जाऊंगा?
* * *
शैतान की प्रेमिका ने कहा
ये तूफ़ान मेरे भीतर से उठता है
तुम्हारे भीतर थमता है
और इसके इतर कुछ नहीं है।
शैतान ने हवस को एक ओर रखा
हवादिस से कहा चुप बैठो
ऐसी बात मैं फिर कब सुनूंगा।
* * *
उसे किसी बात को ढकना न आया
कि शैतान बहुत नंगा था।
रेगिस्तान की रात में चमकते पूरे चाँद की तरह।
* * *
उस वक़्त रात के ढाई बजे थे।
शैतान ने सोचा कि
वह कब इतनी देर तक जगा था
वह भी तो अब से पहले किसलिए जगी होगी।
* * *
तुम मारे जाओगे इस तिलिस्म में
मैं बहुत अधिक हूँ
शैतान की प्रेमिका ने कहा।
शैतान ने महसूस किया
दिल पर बर्फ गिर रही है, उसके बोसे गर्म हैं।
* * *
शैतान अजीर्ण हवस था
शैतान की प्रेमिका मुक्ति।
शुक्रिया।
* * *

June 3, 2021

जो होना है

सौ दर्द उठाए, तड़पे रोए, बेचैन फिरे कि जी न सकें। सुबह खिले और पल में कुम्हलाए। बाल बनाए चेहरा धोया। बाइक उठाई दफ्तर को गए। शाम ढले उल्फ़त की दुकान पर खड़े-खड़े जब थक से गए। तब घर लौटे। कभी पीने बैठे तो पीते ही रहे। कभी देखा ही नहीं सूंघा ही नहीं। कभी मिले तो कसकर यू गले लगे जैसे ये आख़िरी लम्हा हो। कभी याद किया तो मुस्काए। कभी सोच लिया तो उठ बैठे कि क्या सबकुछ ऐसे ही चलना है। कभी किसी नई सूरत पे आंखें कुछ देर रही। फिर हंसते हुए सोचा जाने दो।

कैसे भी रहो और कुछ भी करो
वो जो होना है सो होता है।

June 1, 2021

कितना।

मैं एक उड़ती निगाह से उसके चेहरे को कितना पढ़ सकता था?
चेहरे को देखा तो लगा कि शांति पसरी हुई है। उसके होंठ अधखिले बन्द हैं। आंखें मौन से आच्छादित। कुछ लटें जो बढ़कर गालों को चूम लेना चाहती थी, सिखलाए बच्चे की तरह बैठी थी।
पानी मोड़ पर जिस तरह हल्का बल खाते हुए उचकता है मैंने उसी तरह मुड़कर देखा था। सोचा कुछ कह दूं। फिर मैंने मौन की गहराई में तलछट तक झांकना चाहा मगर देख न पाया। स्वयं से कहा- "चुप रहो।"
शायद झिझक थी। पहचान में बची हुई अजनबियत की झिझक। बहुत बरसों से थोड़ा सा जानने की और उस क्षण तक कुछ न कहे जाने की झिझक।
सोच की वनलता पर झूलते हुए मैं बालकनी से बाहर झांकने लगा।
पत्तों के बीच अकेली चिड़िया ने जाने किसके लिए गाया। आस-पास कोई न था। मुझे लगा कि गाना सुख को सींचना होता होगा। या किसी ने कहा होगा कि हम मिलेंगे तुम गाते रहना।
दाएं बाएं दो तीन बार पल भर की निगाह डालकर चिड़िया उड़ गई। क्या सब ऐसे ही बिना किसी इच्छा से बंधे उड़ सकते हैं। कि अभी यहीं थे और अब नहीं हैं।
दोपहर उतर आई है। दूर तक धूप है। आकाश में रेत है। हवा में सरगोशी है। छतें सूनी है। सड़कें खाली हैं। बस एक मेरा मन है, जो भरा-भरा सा है। मैं अतीत की अनगिनत चीज़ों को टटोल रहा हूँ। ऐसा नहीं है कि ये बेसबब है।
सबको कुछ चाहिए होता है। ये नहीं मालूम कि कितना।

April 3, 2021

"शुक्रिया" मैं मुस्कुराया

अगर हम समझ सकें तो हर शै हमसे कुछ कहती है। इस दुनिया के स्थूल कारोबार से बहुत दूर अपने सघन एकांत में कभी हम दीवारों, पत्थरों, रास्तों, पंछियों से अपने मन की कोई बात कह बैठते हैं।

हमें किसी अबोले सजीव या निर्जीव से बात करते हुए कोई देख ले तो वह कह उठेगा "ये दीवानापन है। पागल हो चुका है।"
मैंने लोगों को बातें करते देखा है। मुझे अजीब लगता था। मैंने ऐसे लोगों के बारे में सुना कि वे बड़बड़ाते रहते हैं। मैंने ये मान भी लिया था कि ये केवल नीम बेहोशी में फूट रहे अस्पष्ट शब्द भर है। किंतु किसी रोज़ मैंने थककर दीवार का सहारा लिया। एक बीस साल का लड़का इतना थक चुका था कि पहली बार उसे लगा दीवार ने थाम लिया है। वह साथ खड़ी है।
दीवार के पास बहुत देर खड़े रहने के बाद अचानक लगा कि उसे धन्यवाद कहा जाए। मैंने बोलकर कहा- "शुक्रिया" इसके बाद मैं मुस्कुराया। किसलिए मुस्कुराया? शायद इस बात के लिए दीवार ने थैंक यू सुना है। उसे अच्छा लगा है।
आज सुबह फ़रीबा की कविताएं पढ़ रहा था। उन कविताओं से पहले पांच सात कवियों को पढ़ चुका था। एक साल नब्बे में जन्मी लड़की की कविताएं थी। मैं उनसे कनेक्ट होने की कोशिश करता रहा मगर मूल भाषा से आंग्ल भाषा में किए गए अनुवाद ने एक दीवार खड़ी कर दी थी। फिर भी वे कविताएं आश्चर्यजनक थी। इतनी कम उम्र की लड़की ने भौतिक बिम्बों के माध्यम से हमारे मन और सम्बन्धों को, हताशा और उम्मीद को बहुत सुंदरता से उकेरा था। लेकिन मैंने पाया कि इन कविताओं के बारे में दोस्तों को बताने लायक अभी समझा नहीं हूँ।
फ़रीबा की कविताएं अलग-अलग पन्नों पर पढ़ीं। उनमें से एक कविता शेयर की। कविता की आख़िरी पंक्ति में चमत्कार का भाव है। कविता इस तरह आरम्भ होती है जैसे कोई स्त्री बात कर रही है। अपनी पूर्णता में बात करने वाली एक कब्र मिलती है। सूफ़ी, परालौकिक या फिर जगत से नष्टोमोह की अथवा अपने क्षणभंगुर अस्तित्व की बातें करने वाली चन्द पंक्तियां हमें भेदती हुई भीतर प्रवेश कर जाती हैं।
कभी हम समाधियों और कब्रों के पास बैठे होते हैं। हम वहां लिखे नाम पढ़ते हैं। हम आहिस्ता से उनके भीतर प्रवेश कर जाते हैं। उस काल खंड में जब वे लोग थे। तो क्या हम उनसे मिलने नहीं जा चुके होते हैं? हमारा शरीर वहीं होता है लेकिन हम अतीत में उस व्यक्ति से संवाद कर रहे होते हैं, जिसके होने का प्रमाण उस समय पत्थर और उनपर खुदे शब्दों से अधिक कुछ नहीं होता।
कविता का काम चमत्कार करना भर नहीं होता लेकिन चमत्कार कविता को एक आह देते हैं। कथ्य, बिम्ब और कहन में जब रोचकता और श्रव्य सुख समाहित होता है तब कविता पाठक और श्रोता को बांध कर बैठ जाती है।
मुझे महसूस होता है कि मैं बंध रहा हूँ, तब उस कवि का नाम फिर से पढ़ता हूँ और उसे शुक्रिया कह देता हूँ।

March 14, 2021

अजनबी बने रहने का दांव

एक अरसे तक घुटनों के बल बैठा हुआ व्यक्ति ये जानता है कि उठा कैसे जाता है। उसकी स्मृति और अनुभव में अपना खड़ा होना याद होता है किंतु बैठे रहने की लंबी बाध्यता के बाद खड़े होने की स्मृति ठीक बची रहती है, अनुभव जा चुका होता है। अनुभव को जंग लग सकता है। उसका क्षय हो सकता है।

ऐसे ही मैं रेल गाड़ी में अपनी शायिका पर पहुंचने से पहले कई बार दौड़ चुका था। मैं मन ही मन भाग कर रेल पकड़ रहा था। मैं चाह रहा था कि उस नियत जगह तक पहुंच जाऊं। इसके बाद मुझे अपने गंतव्य तक पहुंचने के दौरान कहीं न जाना पड़े।
चार नम्बर प्लेटफॉर्म वैसा ही है जैसे दूजे होते हैं। लेकिन इस पर आते ही एक घबराहट होती है। मैं मुड़कर पीछे नहीं देखना चाहता हूँ। यही वह जगह थी। जहां से वह मुड़ी मगर उसने अलविदा न कहा था। क्या ये एक स्वप्न है। क्या ये न मिटने वाली याद है। क्या ये ज़रूरी है कि मेरी सब रेलगाड़ियां चार नम्बर से ही छूटे।
पौने छह बजने को थे। रेल आ गई। यात्री जल्दबाज़ी में उतरना चाहते थे कि चढ़ने वालों की जल्दी उतरने वालों से बड़ी थी। मैं संकरे रास्ते में फंसे लोगों को देखता रहा। दोनों तरफ की जल्दबाजी एक दूजे में फंस चुकी थी।
मिडल बर्थ पर कोई सो रहा था। वह शायद अलवर से आ रहा था। ये बहुत अच्छा था कि मैं चुपचाप निचली शायिका पर लेट सकता था। मैंने ऐसा ही किया। चमड़े के थैले से एक उपन्यास निकाला। चद्दर को तकिए की तरह खिड़की के नीचे रखा। अपने लंबे गमछे से खुद को आधा ढक लिया।
दो सौ तीस पन्ने। मैंने अनुमान लगाया कि जोधपुर आने से पहले मैं इसे पढ़ लूंगा। मेरा मोबाइल ऑफ था। चिंता आस पास के यात्रियों की थी। अक्सर मुझे बड़बोले, तेज़ गाने बजाने और मोबाइल पर ऊंची आवाज में कोई वीडियो देखने वाले सहयात्री मिले। मैं उनसे कभी कुछ नहीं कहता। सहयात्री चाहे जैसा उत्पात मचा ले, मैं सिर्फ बर्दाश्त करता हूँ। कभी जब बर्दाश्त के बाहर होने लगता है तो एक बार उनको देखकर करवट बदल लेता हूँ।
तीस पैंतीस की उम्र के तीन यात्री थे। विनम्र थे। एक लड़की और दो लड़के। एक साथ यात्रा कर रहे थे। उनकी बातों से मुझे मालूम हुआ कि वे जोधपुर उतरेंगे। कोच में आते ही मैंने उपन्यास खोल लिया था। इस कारण भी सम्भव है वे धीमे और ज़रूरी बातें कर रहे थे।
उपन्यास का कथानक था। अतीत को पुनः जीते हुए, अतीत से बदला लेना। रेल तेज़ चल रही थी। कहानी भी तेज़। रेलगाड़ी हर स्टेशन पर समयपूर्व आती और कुछ अधिक देर खड़ी रहती। मैं तेज़ी से पढ़ता और रेल की तरह ठहर जाता।
जब भी रेल रुकती एक अधेड़ स्टेशन पर उतरते और बीड़ी सुलगा लेते। बन्द मुट्ठी में रखे सिक्के की तह बीड़ी को पकड़े हुए फूंकते। उनकी मुट्ठी के बीच लाल रोशनी होती और मैं अंधेरी छत पर लाइटहाउस की तरह चमकती लाल रोशनी याद करने लगता। बीड़ी पीते हुए आदमी को देखना संक्रामक था। उस आदमी की नज़र हर बार मुझ पर होती। मैं एक दो बार देखकर फिर किताब में खो जाता।
ये डेगाना जंक्शन था। जहां मैंने सुना "हरामज़ादे मरना है तो मर जा" वही लड़की जो मेरे सामने बैठी हुई थी, अब ऊपर की शायिका पर थी और अपना सब्र खो चुकी थी। उसके सहयात्री ने कहा "सुबह उसका माफी भरा फ़ोन आ आ जायेगा। परेशान मत होवो।" फ़ोन पर उसका पति था जो फुलेरा स्टेशन पर गाड़ी के आने के समय से लगातार बात कर रहा था। लड़की हमारे कूपे से बाहर रेल कोच के दरवाजे पर खड़ी होकर उससे बहस करती आ रही थी। वह जाने कब आकर लेट गई थी। मुझे किताब के कारण ध्यान न रहा।
मेड़ता रोड स्टेशन के निकल जाने के कुछ देर बाद उपन्यास का एक पात्र मर गया। इसके बाद उपन्यास किसी नई कहानी की नीव रखने को बचा रह गया।
अचानक मुझे याद आया कि पोलोटेक्निक कॉलेज में रसायन के अध्यापक पद पर भर्ती की परीक्षा देकर आ रही और औरतों के पार्टनर ने मुझे पूछा था कि क्या आप बर्थ बदल लेंगे। मैं बदलना नहीं चाहता था। इसलिए कि रेल यात्रा मैं भूल चुका था। पिछले एक बरस से बाड़मेर से जयपुर तक की छह सात यात्राएं मैंने अपनी कार में ही की थी।
मैंने उनसे कहा था कि मैं बदल लूंगा लेकिन वे लोग वापस न आए। उनकी आवाज़ें पास के कूपे से आ रही थी। एक बुजुर्ग महिला साइड लोवर पर सो रही थी। मैंने पंखे बन्द कर दिए थे। एक बार सोचा कि उनको अपनी चादर ओढ़ा दूँ।
लेकिन जिस तरह मैं रेल यात्रा भूल चुका था उसी तरह किसी की मदद करने का समय जा चुका था। हम अब अस्पृश्य हो चुके हैं। किसी को छूना, बांटना या पास बैठना असामाजिक और व्यवस्था विरोधी हो चुका है।
मैंने सोचा कि मुझे चार नम्बर प्लेटफॉर्म के अतीत से नहीं घबराना चाहिए। अब हम साथ यात्रा कर रहे हों तो भी अनमने, चुप और उदासीन बैठे रहने के सिवा कुछ नहीं कर सकते।
मैंने सुना कि किसी ने कहा "माँ ये शाल ओढ़ा देता हूँ।" मुझे आराम आया। मैंने अपना लम्बा अंगोछा सर तक खींचा। कभी-कभी रोशनी के छल्ले मेरे अंगोछे पर गिरते। तब मैं सोचता कि किसी स्टेशन से रेल गुज़र रही है।
अब मैं बहुत डरने लगा हूँ मगर समय ने मेरे पक्ष में पासा चल दिया है। अजनबी बने रहने का दांव काफी सुकून भरा है।
शुक्रिया।
* * *

March 13, 2021

चुप्पी


वह कोई और थी कि रोशनी कुछ नहीं बोलती। दीवारों को परछाई देती हुई आहिस्ता सरकती है। रेतघड़ी से रेत गिरती है और ये सोचकर दिल कोई धड़कन खो देता है कि मुलाक़ात की इस रेतघड़ी को उलट कर नहीं रखा जा सकेगा।
बरसों पुरानी बात न होकर ये कुछ रोज़ पहले की या शायद बीते हुए कल की ही बात हो। लेकिन दिल को लगता है कि उससे जाने कब के बिछड़ चुके हैं।
एक चुप्पी ही थी मेरे पास। उसी की कुछ बातें। बेवजह की बातें।
* * *
अंत में हम याद नहीं कर सकते
कि मिलने के समय मौसम कैसा था।
हम उलझे होते हैं
बिछड़ने का मौसम कैसा होगा
क्या हम कुछ कह सकेंगे
या चुप्पी हमको बाहों में भर लेगी।
* * *
हमने जितनी भी बातें की थीं
उनको भूल गए या उनके अर्थ खोजे।
चुप्पी सच्ची दोस्त निकली
उसी में याद रहा चूमने के बाद एक दूजे को देखना।
* * *
ईश्वर चुप्पी का मित्र था
उसे खोजा नहीं जा सकता था
किसी हुड़दंग में।
इसलिए प्रेम में चुप्पी ही ईश्वर थी।
* * *
चुप्पी मृत्यु की प्रतिकृति थी।
प्रेम भी अनंत के लिए ठहरा हुआ
बहुत अच्छा दिखता था।
* * *
बातें उलझ उलझ जाती थीं।
मगर
चुप्पी से बनते जाते थे प्रेम के पिरामिड
बस इसलिए कि
तुमको देखते जाना सबसे अच्छा था।
* * *
हर बात उलट ही सीखी दिल ने।
प्रेम किया तो सोचने लगा कि टूट न जाये
साथ हुआ तो बिछड़ने के डर से भर गया।
एक चुप्पी ही थी, जिसने हौसला दिया।
* * *
मुझे चूमने दो तुम्हारे होंठ
कुछ न कहो।
कुछ भी कहना अर्थहीन है
कि शब्दों की मृत्यु हो जाने पर
उनको चुप्पी की कब्र में ही दफनाया जा सकेगा।
* * *
चुप्पी एक धुनका थी
एक सूप थी।
काश वो तुम्हारी बाहें भी होती।
* * *
दोपहर उनींदी थी। जैसे पानी पर लहराती शाख से कोई फूल पानी में गिर पड़ा हो। जैसे किसी की याद आती हो और उसे याद करना मना न हो। जैसे कोई दीवार का सहारा लिए खड़ा हो और किसी दूजे सहारे के ख़याल में खोया हो। मगर क्या होता है इस सबसे कि चुप्पी सिर्फ चुप्पी होती है।
तुम।

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.