January 11, 2022

अपने लिखे में ढल जाना

शाम ढ़लने के समय कोई छत से पुकारता है। मैं अजाने सीढियां चढ़ने लगता हूँ। छत पर कोई नहीं होता। पुकारने वाला शायद उस ओर बढ़ जाता है, जिधर सूरज डूब रहा होता है। 

पश्चिम में पहाड़ पर जादू बिखर रहा होता है। उपत्यका में रोशनियों के टिमटिमाने तक मैं डूबते हुए सूरज को देखता रहता हूँ। किसी सम्मोहन में या किसी के वशीभूत। 

अचानक मन शांत होने लगता है कि क्या करूँगा वहां जाकर जहां से लौटना ही होगा। मैं कभी सिगरेट सुलगाता हूँ कभी चुप बैठे सोचता हूँ कि अब तक कितनी बर्फ गिर चुकी होगी। 

एक कहानी कही थी 'एक अरसे से', कहीं मैं उस कहानी के नायक में तो नहीं ढल गया। मैं बदहवास सीढियां उतर कर उस किताब को खोजने लगता हूँ ताकि अपनी कही कहानी का अंत पढ़ सकूँ।

January 9, 2022

शायद प्रेम हाथी होता है

 हाथी एक भद्र व्यक्तित्व है।

~रुडयार्ड किपलिंग 

हाथी चला जा रहा था। सुबह साढ़े नौ बजे एफसीआई के सामने था। दोपहर दो बजे स्टेशन रोड पर था। उसके पिछले कूल्हों पर फूल उकेरे हुए थे। उसके पांव कीचड़ से सने थे। उसका एक दांत बेढब था। 

उसकी पीठ पर एक मामूली हौदा था। हाथी की बेबसी की शक्ल का हौदा। हौदे के गद्दी तो थी मगर उसकी पुश्त न थी। हौदे की गायब पुश्त की तरह हाथी की पुश्तें कहाँ छूट गई थी, ये जानना असंभव था। 

हाथी की चाल चलने की बात याद आई। मैंने ठहर कर देखा कि हाथी कैसे चल रहा है? उसकी मद्धम लय क्या कोई स्थायी चाल है? शायद नहीं। मैंने कहीं आवेशित या आक्रोशित हाथियों को भी देखा था। इसलिए ये कहना ठीक है कि हाथी की चाल मतवाली होती है लेकिन ये कोई स्थायी बात नहीं है। 

हाथी की याददाश्त के बारे में कहीं पढा था। वे बचपन की बात और रास्ते को बुढ़ापे तक नहीं भूलते। हाथी की दुर्लभ इच्छा के बारे में जाना कि वे अपने पूर्वजों की जगहों पर जाना चाहते हैं। वहां जाकर अक्सर गंभीर हो जाते हैं। वे उनके होने की स्मृति को बार-बार जी सकते हैं। यही अद्भुत है। 

मैंने दस बारह बरस की उम्र में पहली बार हाथी देखे थे। रेलवे स्कूल के रास्ते में एक मैदान में खड़े नीम के बड़े पेड़ के नीचे बैठे या लेटे हुए थे। वे गोबर के बड़े पिण्डारे जैसे दिख रहे थे। मुझे उनके पास जाने की उत्सुकता नहीं हुई। मैंने अपना बस्ता सम्भाला और घर की ओर बढ़ गया। 

इसके बाद आगे के जीवन में बार-बार ख़बरों में हाथी पढ़ने को मिले। वे उद्दात थे, उनमें आवेश था, वे मद से भरे थे, उनमें सहवास करने का पागलपन था। वे आदमियों को चींथ रहे थे। वे बेतहाशा भाग रहे थे। वे रास्ते में आई किसी भी चीज़ को ध्वस्त कर रहे थे। 


हाथी उतने ही भद्र रहे होंगे जितना कि प्रेम होता है। शायद प्रेम हाथी ही होता है। 

* * * 

आज दोपहर स्टेशन रोड बाड़मेर पर एक बंदी हाथी।

December 31, 2021

एक और बरस का अवसान

एक रस्म सी बन गई है

तुझे भूल जाने को, तुझे ही याद करना। 


क्या कुछ नहीं बीतता। सब कुछ। माने कोई शै नहीं जो साथ बनी रहे। उदास, हताश, अवसाद से भरे मगर फिर भी किसी आस में कभी मुस्कुराते हुए कभी बेख़याली में कहीं चल पड़ते हैं। जब चल नहीं सकते तो चले जाने का स्वप्न देखते हैं। 


मैं हर बरस की आख़िरी शाम एक पोस्ट लिखता हूँ कि बरस कैसा था? 

इस बार याद ही नहीं कि शहर, देश और दुनिया में क्या घटा। कौन किस तरह, किस राह चला गया। क्या था जिसकी आस थी और इंतज़ार में उसी ढब बैठे रह गए। 

अपनों की पार्थिव देह से पटी हुई धरती को देखना सबसे भयावह था। पूर्व की पीढ़ियों की ज़ुबान से यदाकदा सुने गए महामारी के किस्सों में जो दहशत थी। उसी को अपनी आंखों से देखना, यही इस बरस का नग्न सत्य था। जिस पर डाले जा रहे पर्दे मौन आहों से चाक होते गए। आंसुओं का सैलाब पार्थिव देहों पर पड़ी ज़रा सी रेत को बहाकर ले गया। 

ये अविश्वसनीय, दुःखद और असहनीय था। 

समाज को बांटने वाली ज़ुबादराज़ राजनीति ने पिछले दशक में दुनिया के हर देश के नागरिकों को बांटा। इसी मंत्र से सत्ताएं हथियाई गईं। राजनीतिक हमले किए गए और मनुष्यता की गर्दन पर पांव रखकर नाच किया गया। किंतु वैश्विक महाशक्ति के नागरिकों ने मामूली अंतर से फिर समानता और साझेपन को चुन लिया। 

तालिबान लौट आए। उनका आना हैरत की बात नहीं है। तालिबान वैश्विक शक्तियों की एक कठपुतली ही है। धागे से बंधे हथियारों वाले हाथ किसी के इशारों से ही चलते हैं। 

धर्म आधारित तमाम संस्थाओं में स्त्री दोयम दर्जे की है। तमाम पाबंदियां उसी पर आयत होती हैं। आदमियों के संसार में वही एक ख़तरा होती है। इसलिए शिक्षा, रोज़गार और आत्मनिर्भरता छीन ली जाती है। तालिबान की वापसी इसी दुःस्वप्न का सच होना है कि आधुनिक दुनिया असल में अभी भी आदिम दुनिया से बदतर दुनिया ही है। 

मुझे इस बरस के बारे में याद कम ही है। मैं थोड़ा सा लिखता हूँ और बहुत सारा सोचता हूँ मगर कुछ याद नहीं आता। यहां तक कि अपने बारे में भी याद नहीं कर पाता कि ये बरस कहाँ गंवा दिया। इस बरस की याद में सुबह शाम स्कूटर लिए अपने क़स्बे में भागता हुआ याद आता हूँ। क़स्बे से बाहर की याद में जयपुर शहर का रास्ता याद आता है। 

हम दोनों ड्राइव कर रहे हैं और समय बीतता जा रहा है। 

मैं कितना बदल गया हूँ। मैंने क्या सीखा। मैं क्या हो सकता था। ऐसे सवाल खुद से पूछता हूँ तो कभी मुस्कुराता हूं, कभी चुप हो जाता हूँ। 

अब मैं निजी जीवन, परिवार के हाल, दोस्तो और अपने काम के बारे में नहीं लिखता। मैं ऐसा क्यों करने लगा हूँ इसकी कोई ठीक वजह नहीं मालूम होती। 

मेरी चाहना, निजी सम्बन्ध, खराब कही जाने वाली आदतें माने जैसा और जो कुछ मैं हूँ, उसके बारे में लिखने से कोई परहेज नहीं है। असल में मैंने बरसों एक खुली डायरी लिखी। प्रेम कविताएं लिखी। उदास कहानियां लिखी। यात्रा वृतांत लिखे। इस सब को लिखकर खुशी ही हुई। 

मैं अगले बरस क्या करूँगा? इस बारे में कुछ सोचना फिजूल है। इसलिए कि मैं खुद को नहीं जानता कि मैं कैसा आदमी हूँ, जिसे क्या करना चाहिए। और न ये जानना चाहता हूँ। 

मैंने डूबकर प्रेम किया। तुम भी यही करना। प्रेम में कुछ भी बरबाद नहीं होता है। अगर समझ सको कि प्रेम कोई लकीर नहीं है, जो खिंचती चली जाए। ये एक लम्हे की बात भर है। अनेक लम्हे जुटाना। प्रेम के दुख ही सच्चे हासिल हैं। 

इस बरस जो मिले। उन सबको लव यू। जो मुझे मिले, उनको मुझ से बेहतर इंसान नए बरस में मिलें। दुआ।

December 26, 2021

बहाने से

 सब चकचकाचक है मगर 


अक्षय कुमार सज्जाद अली खान बने। हिन्दू लड़की से प्रेम किया और जान गवां दी। ये लक्षण सही नहीं है। कुछ तो गड़बड़ है। 


मुझे फ़िल्म देखने और समझने का शऊर नहीं है। शायद इसलिए फ़िल्म देखने का मन भी नहीं होता। हालांकि मैं बहुत बार फ़िल्म देखना आरम्भ करता हूँ मगर हद से हद पंद्रह मिनट देख पाता हूँ। 

मेरे भीतर अकूत ऊब है। वह मुझे एक जगह टिकने नहीं देती। कभी-कभी तीन-चार घण्टे कविता और कहानी पढ़ लेता हूँ। कि वहां तुरंत स्किप करके सर्फ किया जा सकता है। बस फ़िल्म ही है जो सब कलाओं को समेटे होती है उसे तुरंत स्किप नहीं किया जा सकता इसलिए बर्दाश्त के बाहर होने पर ही छोड़नी पड़ती है। 

आज सुबह आकाश बादलों से ढक गया। मुझे लगा कि छुट्टी के दिन यही मौसम होना चाहिए। बिस्तर में घुस जाएं। कुछ पढ़ते देखते रहें। 

हॉटस्टार पर नई फ़िल्म दिख गई। अतरंगी रे। न देख पाने की आशंका के साथ देखना आरम्भ किया। मैं मुस्कुराया। 

अतरंगी रे आप देखिए। पूरी फ़िल्म में अनेक फ़िल्मों के अंश याद आते रहेंगे। कटपेस्ट की बेहिसाब कारीगरी साथ चलती रहेगी। एक कमी खलेगी कि फ़िल्म में कोई वल्गर सीन या डायलॉग नहीं है। इस कमी के लिए आप शुक्रिया कह सकेंगे। 

फ़िल्म की नायिका मनोरोग से पीड़ित है। 

मैं इस फ़िल्म के साथ नहीं जुड़ पाता और अतीत में धंस जाता हूँ। नायिका की अम्मा को नायिका लेकर प्रकाश मेहरा ने अस्सी के दशक में मनोरोगी किरदारों से भरी एक फ़िल्म बनाई "चमेली की शादी" मैं जाने क्यों उसी फ़िल्म को याद करता रहा।

उस फ़िल्म के निर्देशक हैं बासु भट्टाचार्य। फ़िल्म एक रोमेंटिक कॉमेडी है लेकिन कुछ निर्देशक सामाजिक और मानसिक व्याधियों को उकेरने से ख़ुद को रोक नहीं पाते। 

फ़िल्म का आरंभ उस्ताद मस्तराम के अखाड़े के दृश्य से होता है। उस्ताद जी ब्रह्मचर्य के मनोरोग से पीड़ित हैं। वे अपने प्रथम व्याख्यान में कहते हैं। औरत गन्ने का रस निकालने वाली मशीन है। नरक का द्वार। वह आदमी को खोखला कर देती है। 

नायक चरणदास अपने बड़े भाई के साथ रहता है। वे हर समय दुनियादारी में खोए रहते हैं। उनके हिसाब से दुनिया में एक ही काम है। कमा कर लाओ। 

चमेली के पिता कल्लुराम कोयले बेचने वाले बनिए हैं। लेकिन असल में उनकी आत्मा बिरादरी के भीतर बसती है। जातिप्रथा और बिरादरी के भयावह रोग को उनके चरित्र में समझा जा सकता है। 

चमेली की एक सखी है जिसे फ़ीमेल उस्ताद मस्तराम कहा जा सकता है। वह अपने प्रेम के अनेक अनुभवों के पंख अपनी टोपी में लगाए रखती है। उसके कमरे में सिने स्टार्स के पोस्टर लगे हैं। वे पोस्टर लड़की के ख़्वाबों का अधूरा संसार है। जो कभी मुकम्मल न होगा। 

एक पात्र है, अफ़ीमची चाचा। ख़ुद नशे में ग़ाफ़िल रहता है लेकिन समाज बिरादरी के नाम की ठेकेदारी करता है। 

चमेली की माँ का मानना है कि लड़की अपनी पंसद का खसम ढूंढ रही है, तो ये अपराध है। 

एक वकील साहब हैं। वकालत का पेशा, पैरवी का पेशा है मगर वे झूठ गढ़ते हैं। 

कहानी में इन किरदारों को सामाजिक रूढ़ि और कुरीति के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है मगर वास्तव में ये सारे पात्र मनोरोग से ग्रसित हैं। 

नायक को पहली बार अहसास होता है कि वह रिबेल सलीम है और नायिका क़ैद कर ली गई अनारकली। नायक दोस्तों के साथ नायिका के पिता के ठिकाने वाली गली में प्रवेश करता है। 

सामने दीवार पर लिखा होता है "भगंदर का इलाज" 

ये एक कष्टदायक बीमारी है। किंतु समाज में इसे जिस रूप में देखा जाता है, वह अधिक कष्टप्रद है। शारीरिक व्याधियों के प्रति असंवेदनशील समाज से क्या अपेक्षा की जा सकती है। 

फ़िल्म का एक स्टिल जिसमें दीवार पर लिखा प्रचार एक सिम्बल है। वह प्रतीक कहता है कि कष्टप्रद बीमारी का इलाज संभव है मगर जातिवाद जैसी बीमारी का कोई इलाज नहीं है।

फ़िल्म कोई कहानी नहीं होती। वह अपने हर फ्रेम में एक सन्देश होती है। 

चमेली की शादी फ़िल्म बासु भट्टाचार्य की रूमानी पारिवारिक संवेदनशील फ़िल्मों की परम्परा की ही फ़िल्म है। मैं इसी तरह के ड्रामा देखते हुए थोड़ा सहज रहा। माने मन से देख सका। लेकिन मेरी प्रिय फ़िल्में गरम हवा जैसी रही। वे अब कहीं नहीं बनती।

अतरंगी रे, मैंने पूरी देखी। नायिका को देखकर अच्छा लगा। सहज अभिनय था। 

भारतीय सिनेमा में एक्टिंग करने का भूत ज़बरदस्त है। इस से कोई नायक नायिका बच न पाया। एक धर्मेद्र हैं, जिन्होंने अपने आपको महान कलाकार साबित करने जैसी एक्टिंग नहीं दिखाई। भले ही ख़राब फ़िल्में कर ली। 

फ़िल्म, कथा, कविता या किसी भी कला का आलोचक कभी नहीं बनना चाहिए। उसके रस और अनुभूति का आनंद लेना चाहिए। यही आनंद दुर्लभ है। इसलिए अक्सर स्मृतियां घनघोर होकर छा जाती है। 

अतरंगी रे एक ऐसा ड्रामा है। जो इस पीढ़ी के बरबाद, गुंजलक और दृष्टिहीन समय से आसानी से डेढ़ घंटा चुरा सकता है। मेरे जैसा व्यक्ति उन फ़िल्म दीवानों को कोस सकता है। जो विश्व सिनेमा की क्लासिक फ़िल्मों का गुणगान करता है और मैं किसी फ़िल्म के साथ टिक कर बैठ नहीं सकता। 

सबके अपने मनोरोग है। सबके पास दवा नहीं है।

October 11, 2021

छीजने की आहट

मन एक तमाशा है 

जो अपने प्रिय जादूगर का इंतज़ार करता है।

शाम से बालकनी में बैठे हुए सुनाई पड़ता है। तुम कितने कोमल हो सकते हो? खुद से पूछने पर कोई हैरत नहीं होती। न मुड़कर देखना होता है कि किसने पूछा। 

मगर सवाल छुअन होता है। कभी स्मृति में ले जाता है। 

मन के सम्बंध के छीजने की आहट को सुनकर बस अपनी नज़र भर उठाकर वीराने को देखते हो। तुम चुप बैठे रहते हो। क्या कुछ टूट जाएगा, ये नहीं सोचते। बस एक ही बात रह रहकर जंगली घास की तरह आस-पास हिलती हुई महसूस होती है। ये सब क्या हुआ? 

तुम जानते हो कि हवा उस ओर बह रही है जबकि तुमको दूर से हिलता हुआ हाथ ऐसे दिखाई देता है, जैसे वह इधर आ रहा है। 

तुम हल्की स्याह शाम में मुस्कुराते हो मगर छीजत उस मुस्कान पर उतर आती है। तुम मुंह फेरकर दूजी ओर देखते हो। जबकि तुमको देखने वाला कोई नहीं होता। वह जो दूर से हिलता हुआ हाथ है, असल में वह जा चुका और स्मृति उसके होने का भ्रम है। 

डायरी का पहला पन्ना छूने से पहले सोचने लगते हो कि वह जो जीया, उस से अधिक खराब कैसे जीया जा सकता था। 

अचानक ठहरी हुई शाम तुम्हारी हंसी से भर जाती है। तुम अपने आपको माफ कर देते हो। छीजत फिर से आने लगती है मगर दिल कड़ा करके खुद से कहते हो। सबको भुला दो। 

शुक्रिया।

July 4, 2021

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था। 

लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने का शोर बढ़ता जा रहा था। शराब के नशे से भरे दिमाग पर दस्तकें बढ़ती ही गई तब वह जागा।

रात का एक बजा था। दरवाज़े के भीतर आती हुई औरत का चेहरा खुला था। काँधे पर शाल तिरछी पड़ी थी जैकेट भीगा-भीगा सा था। औरत की आंखों में एक बेचैनी थी। 

उसने सिगरेट के लिए दाएं बाएं देखा तब तक औरत लिहाफ के भीतर घुसकर सो गई थी। 

इंतज़ार कभी-कभी हिंसक बना देता है। शराब न पीने वाली औरत के होंठों पर उसने शराब की गंध से भरा मुंह रख दिया। औरत को प्रेम था या न था मगर इतनी बेसब्र चाहना थी कि हिंसा मद्धम आंच की तरह उगने लगी। 

वह उसके बदन की ज्यामिति से भली भांति परिचित था। लेकिन हिंसा उसके बदन से पहला परिचय कर रही थी। वह उसे अपने आगे लेकर एक हूकते सियार में ढल गया था। 

चौपाई हिंसा से लिहाफ गिर गया। रात की सर्द अकड़ गुम हो गई। वह कुछ देर उसकी छातियों में सर रखकर पड़ा रहा। जब तब उसकी पीठ को टटोलता। औरत की टांगों पर बहुत सारे बचपन के घावों और चोटों के बचे निशान उसे लिहाफ के भीतर अंधेरे में दिखने लगते। वह उन पर अपनी अंगुलियां घुमाता। 

बस इतना ही प्रेम था। हिंसा केवल एक थकान भर उपजा सकी। 

वह जब जगा तब तक सराय से लोग जा चुके थे। हिंसा एक स्मृति थी। वह शराब नहीं पीती थी, ये अजीब बात न थी। अजीब था कि वह बहुत हिंसक थी। 

उसकी हिंसा घड़ी से झरती टिक टिक की आवाज़ की तरह झरती थी।

June 25, 2021

सब कुछ किसी स्याही में

चाहनाएं तुम्हारा पीछा करती है दिल दीवार की तरह चुप खड़ा रहता है।

रेगिस्तान में दिन की तपिश भरी आंधियां रात को मदहोश करने वाली हवा में ढल जाती हैं। एक नशा तारी होने लगता है। बीत चुकी बातों और मुख़्तसर मुलाक़ात की याद किसी भीगी छांव की तरह छा जाती है।
कभी किसी शाम धूल उतरती नहीं। आकाश के तारे दिखाई नहीं देते। सब कुछ किसी स्याही में छुप जाता है। उस वक़्त बन्द आंखों में कोई बेहद पुराना स्वप्न टिमटिमाने लगता है।
जाने कब नींद आ जाती है कि स्ट्राबेरी जैसा चाँद देखना रह जाता है। जबकि वह ठीक बाईं और चमक रहा होता है।
इस चाँद को देखने वाली चाहनाएँ उस जगह जा चुकी है। जहां तुम हो।
मगर फिर भी...

June 13, 2021

तीज का चांद

शाम ढल रही थी। डूबते सूरज के ऊपर चाँद खिला था। रेगिस्तान के घर की छत पर आहिस्ता रोशनी का पर्दा गिर रहा था।

दफ़अतन अंगुलियां स्क्रीन को छूती और फिर मन उन तस्वीरों को देखने से मुकर जाता कि उसने कहा था "ये मैं नहीं हूँ।"
एक बार नज़र आसमान की ओर गई तो दिल धक से रह गया। ये चाँद कौनसा है। बचपन में किसी ने कहा था चौथ का चांद मत देखना। अपने ही भीतर गुम रहना।
अकसर तारीखें भी याद नहीं रहती तो तिथियों का हिसाब नामुमकिन था। कोई चाहना रहे तो मन हर कुछ खोज आता है। वह भी जो वह नहीं है।
ये चौथ का चांद न था। आसमान में तीज का चांद चमक रहा था। क्या ये अच्छा है?
पता नहीं। एक सिगरेट टिमटिमाती रही जिस में उसकी सांसें नहीं घुली थी।

June 6, 2021

और बालकनी धुएं से भर गई होती

वही इक रात का सौदा वही बरसों का वीराना। * * *

अंगुलियां एक अक्षर लिखती है
और दिल दो-दो बार धड़कता है।
यही इक बात है जिस पर, अभी तक प्यार आता है।
* * *
सोचता था कि
बड़ी कीमती शै है ज़िन्दगी।
मगर क्या मालूम था
कि कुछ पी लेंगे, उसको चूम लेंगे
बस यही सोचते हुए मर जाएंगे।
* * *
अब तक बना लिया होता दूसरा पेग
और बालकनी धुएं से भर गई होती।
अब तक
इनबॉक्स में ये लिखकर मिटा भी दिया होता
कि तुम्हारी याद आती है।
* * *

June 4, 2021

इस तिलिस्म में

शैतान की प्रेमिका पूछ रही थी तुम मुझको कितना याद करते हो। ठीक उस वक़्त रेगिस्तान की सोनल घास के कान में हवा फूंक रही थी सरगोशी सुनो जानाँ, सुनो जानाँ, सुनो जानाँ। * * *

शैतान की प्रेमिका ने कहा
तुमको बहुत दूर चलकर आना होगा
मुझे छूने के लिए।
शैतान, स्वर्ग से धकेले जाने के बाद
धरती की ओर गिरते हुए
बस यही तो सोच रहा था कि कहाँ जाऊंगा?
* * *
शैतान की प्रेमिका ने कहा
ये तूफ़ान मेरे भीतर से उठता है
तुम्हारे भीतर थमता है
और इसके इतर कुछ नहीं है।
शैतान ने हवस को एक ओर रखा
हवादिस से कहा चुप बैठो
ऐसी बात मैं फिर कब सुनूंगा।
* * *
उसे किसी बात को ढकना न आया
कि शैतान बहुत नंगा था।
रेगिस्तान की रात में चमकते पूरे चाँद की तरह।
* * *
उस वक़्त रात के ढाई बजे थे।
शैतान ने सोचा कि
वह कब इतनी देर तक जगा था
वह भी तो अब से पहले किसलिए जगी होगी।
* * *
तुम मारे जाओगे इस तिलिस्म में
मैं बहुत अधिक हूँ
शैतान की प्रेमिका ने कहा।
शैतान ने महसूस किया
दिल पर बर्फ गिर रही है, उसके बोसे गर्म हैं।
* * *
शैतान अजीर्ण हवस था
शैतान की प्रेमिका मुक्ति।
शुक्रिया।
* * *

अपने लिखे में ढल जाना

शाम ढ़लने के समय कोई छत से पुकारता है। मैं अजाने सीढियां चढ़ने लगता हूँ। छत पर कोई नहीं होता। पुकारने वाला शायद उस ओर बढ़ जाता है, जिधर सूरज डू...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.