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माया

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हेल्युसिनेशन तो माया ही है किंतु एकाधिक अनुभूतियाँ इस तरह गुम्फित होती है कि समझ नहीं आता ये माया, भ्रम, कोरी कल्पना, विभ्रम अथवा कुछ और है।  बरसों पीछे का फेरा देने के बाद मन दिग्भ्रमित हो जाता है। याद में जो बातें थीं, उनसे अधिक लगभग बेहिसाब बातें फिर से पढ़ लेना एक तरह से ओवरलोड ही जाना था। आधी रात को नींद उचटती। डर लगता कि आह ये कहीं आधी रात तो नहीं। अब नींद न आई तो? असल में नींद उन जगहों पर पहुंच जाने के स्वप्न से ही चटकती। वे जगहें, जो दशक भर पीछे छूट चुकी। उस समय का अब कोई साथी भी नहीं। वहां तक लौटा जा सकता है, न उस से बाहर आया जा सकता है।  जीवन के अवसान के बारे में कुछ नहीं सोचता हूँ मगर चीज़ें इस तरह शक्ल लेती हैं कि उनमें उलझा खोया सिहरता रहता हूँ। ये भी बीत गया, वह भी चला गया और जाने कितना बचा है? सन्देह, भय और पीड़ा। बस इतना भर आधी नींद या अधखुली नींद में होता है। कविता के रूप में कही बेवजह की बातों की तलाश में अतीत में इतना गहरा क्यों उतरा। मैंने एक किताब को शक्ल देने की दोबारा कोशिश क्यों की। ये सोचता हुआ सुबह से पहले के वक़्त में सो जाना चाहता हूँ। शहर की रात गर्म है। एसी की

मिलेंगे किस से?

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कि जहां हम खड़े हैं  यहां से वे दिन, ज़रा से उस तरफ हैं कि दो कदम पीछे चल सकें तो वहीं पहुंच जाएं। * * *  टीशर्ट की सलवट को ठीक करते हुए हमेशा दूसरे टी की याद आई। कि इस समय वह अलमारी में कहां रखा होगा।  याद एक सहारे की छड़ी बनकर बहुत दूर तक ले जाती। याद पुरानी होने में बहुत समय लगाती है। याद में सबकुछ थ्रीडी दिखता रहता है। मॉल के चमकदार फर्श में दो लोगों का अक्स। बेशर्मी से मुस्कुराते, तेज़ी से आगे बढ़ते, हथेलियों के बीच किसी बदतमीज बात को सलीके से छुपाए हुए एस्केलेटर से नीचे उतरते हुए भीड़ में गुम होते हुए। बादल अचानक बरसने लगे। सड़क पर बिखरे पानी के पेच में फिर से दोनों की परछाई एक साथ दिखी। फिर मुस्कुराएं। मगर याद में अकसर चेहरे पर ठहरी उलझन भी सामने आ खड़ी होती है। कि सारा साथ और सारा झगड़ा, ठीक करने को है या मिटा देने को है। कि ये या वो नहीं सब चाहिए। सब।  शहर इतने पसरे क्यों होते हैं कि घने बादल क्षण भर में पीछे छूट जाते हैं। दो बहुत दूर के घरों पर खाली आकाश तना रहता है। उनके बीच के आकाश पर बादल छाए रहते हैं।  कभी बारिश के मौसम में भी रात भर बरसात नहीं होती, अगले दिन क्लास लंबी होती है और

अतीत कोई मर चुकी शै नहीं है

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बहुत नई एक पुरानी बात  इतना सा लिखकर ड्राफ़्ट में छोड़ दिया था। तीन साल पहले का अक्टूबर महीना था। मैं सोचने लगता हूँ कि क्या बात थी?  मुस्कुराता हूँ। बीत चुकी बात केवल दो काम की ही होती है। एक मुस्कुराने की दूजी सीख लेने की।  सीखने की बात आते ही मैं मुस्कुराने लगता हूँ कि जीवन में जो काम दिल की खुशी के लिए किया हो, उनसे क्या सीखना। वे तो खुशी के लिए किए काम थे। जैसे जुआ करना, सट्टा लगाना, दोपहरें तम्बाकू के धुएं की छांव में बिता देना, शामें शराब से भर लेना और प्रेम कर बैठना।  सब ग़लत काम बहुत सही होते हैं। लू चल रही है। हर दो दिन बाद हीट स्ट्रोक गले लग जाता है। बदन हरारत से भर जाता है। तपिश मुसलसल बनी रहती है। नींद किसी अधबुझी लकड़ी सी लगी रहती है। रह रहकर नींद का झकोरा आता है। ऐसी नीम बेहोश नींद में बेवक़्त के सपने ऐसे आते हैं, जैसे तमाशा दिखाने वाला आधे तमाशे के बाद बात बदल देता है। जागना नींद से अधिक भारी होता है। ऐसे बैठा रहता हूँ जैसे कुछ सोच रहा हूँ मगर असल में केवल चुप बैठा होता हूँ। एक अधपके पेड़ से अधिक चुप या उदासीन। क़स्बे की सड़कें, चाय की थड़ी, बालकनी से दिखती गली, छत से दिखता आसमा

बता दो कि तुम हो।

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शराबियों का नियम है  कि झगड़ना है, हिंसक हो जाना है  फिर एक दूजे पर गिर पड़ना है।  प्रेमियों का हाल इनसे भी बुरा हैं।  ~रूमी  [जलाल उल दीन मोहम्मद रूमी 1207 से 1273 तुर्की] मेरा हाल इन दोनों से खराब रहता है कि मैं सोशल साइट्स पर एक मुकम्मल ऐंटीसोशल की तरह रहता हूँ। हर जगह हूँ और कहीं भी सोशल नहीं हूँ।  मेरे फॉलोवर नहीं है। मेरे दोस्त हैं। चाहे वे फेसबुक पर हों, इंस्टा, ट्विटर, ब्लॉगर और भी कहीं हो। मैं उनके संदेशों का, अपनेपन का, प्रेम का जवाब नहीं दे पाता।  अखरता ही होगा मगर क्या कीजे।  कोई किताब मंगवाता है तो सूचित करता है। वह अपना प्रिय माध्यम चुनता है। मैं सब प्लेटफॉर्म्स से उकताए हुए रहता हूँ। दोस्तों और पाठकों के मैसेज देखकर बेहद प्रसन्न होता हूँ लेकिन समझ नहीं आता कि उनको जवाब में क्या कहूँ?  इसलिए शुक्रिया हमेशा समझा जाए।  बहुत बरस हुए। जाने कितने बरस। लिखने वालों के लिए मेरे भी गहरे सम्मोहन रहे हैं। वे अजीर्ण हैं। किसी आहट, किसी झांक, किसी धुएं की गंध, ऑटो के भीतर तक आती हवा की अनूठी महक, बेजान और रूखी सड़क पर सबसे अधिक आत्मीय यात्रा। माने कुछ भी भूल के हिस्से में नहीं जाता।  सम्

तस्वीरों में दुःख

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मनुष्य को निकट से देखोगे। उसके दुःख को समझने की कोशिश करोगे। उसकी आवाज़ बनोगे तो तुम सच्चे मनुष्य बन जाओगे।  जीवन तो सबका गुज़रता ही है।  सोनी ने इस वर्ष के लिए प्रोफेशनल फ़ोटोग्राफ़र ऑफ ईयर का पुरस्कार एडम फर्ग्युसन को दिया है।   फ़ोटो खींचने की तकनीक में कमाल की प्रगति हुई है। लेंस और बॉडी गुणवत्ता से ऐसी तस्वीरें खींची जा सकने लगी हैं कि हम उन पर सहसा विश्वास नहीं कर सकते।  इतने क़ीमती कैमरा एडम के पास नहीं थे। उनके पास साधारण कैमरा था। एक ट्राइपॉड और एक केबल। लेकिन महंगे कैमरा वाले फ़ोटोग्राफ़र्स से एक अतिरिक्त चीज़, उनके पास थी। मनुष्यता।  एडम ने अमेरिका में प्रवेश करने की राह देख रहे शरणार्थियों के जीवन का डॉक्यूमेंटेशन किया था। उन्होंने ज़िंदा रहने के लिए शरण मांगने वाले लोगों के दुःख को, उनके असहाय जीवन को तस्वीरों में उतारा।  अपने आस पास के जीवन को देखिए। उसकी तकलीफ़ों को लिखिए। हर प्राणी की मदद की सोच रखिये। मनुष्य बनने की ओर बढिए।  [सूचना स्रोत - रेडिफ न्यूज़]