September 30, 2011

आखिर थक कर सो जाओगे



अँधेरे में दीवार का रंग साफ़ नहीं दिख रहा था.
पच्चीस कदम दूर, उस दीवार की ईंटें बायीं तरफ से गिरी हुई थी. फ्रिल वाली स्कर्ट पहनी हुई नवयौवना उस लड़के तक जाना चाहती थी. लड़के का मुंह पूरब दिशा में था और वह उसके पीछे की तरफ थी. भौतिक चीज़ों से जुडी अनुभूतियों के साथ मेरा दिशा बोध जटिलता से गुंथा हुआ है. चीज़ें एक खास शक्ल में सामने आती है. जब भी मैं किसी दीवार पर बैठे हुए लड़के के बारे में सोचता हूँ तो तय है कि लड़का जिस तरफ देख रहा है, उधर पश्चिम है. लड़के के पैरों के नीचे की ओर ज़मीन बहुत दूर है. वह लड़का एक उदासी का चित्र है. इसलिए डूबते हुए सूरज की ओर उसका मुंह हुआ करता है. जिस तरफ वह देख रहा है उधर कोई रास्ता नहीं होता. घात लगाये बैठा समंदर या फ़िर पहाड़ की गहरी खाई लड़के के इंतजार में होती है. लड़के के थक कर गिर जाने के इंतजार में...

मैं उसे नवयौवना ही समझ रहा हूँ किन्तु लिखने में लड़की एक आसान शब्द है. दरवाज़े के साथ एक जालीदार पतला पल्ला है. इसके आगे कुर्सी रखी है और फ़िर खुली जगह में रेत है. इस पर कुछ पौधे उगे हुए हैं. इन सबके बीच वह डिनर टेबल कहां से आई, मैं समझ नहीं पाता हूँ. अचानक चली आई दीवार और उस पर बैठा लड़का भी अविश्वसनीय है. मुझे तुरंत लगा कि मैं इस विचार को यहीं त्याग दूँ. मैं इस लड़की के लिए, उस लड़के के बारे में और नहीं सोचना चाहता हूँ. हालाँकि डिनर टेबल पर कोहनियाँ टिकाये बैठी लड़की चुप थी और सिर्फ़ मैं ही उसके लिए सोच रहा था.

इस बार लड़का पूरब की और देख रहा था. इसलिए वह अधिक देर तक मेरे साथ नहीं रहा. मेरे ख़यालों में आने वाले सब झूलों की पींग पूरब की ओर उठती है. झूला दोलन का सुंदर प्रतीक है. दोलन, विचलन का और विचलन, यात्रा का अंश है. और मुझे यात्रायें कम पसंद है इसलिए मैंने लड़के को गायब कर दिया. हवा की रंगत बदली हुई थी. इसके स्पर्श में मादकता थी फिर भी जाने क्यों मैं सो नहीं पा रहा था.

बैडरूम से बाहर अँधेरे में जाने का सोचते ही लगता कि मैं चीज़ों से टकराने लगूंगा. मैंने सिर्फ़ आवरण को पढना सीखा है. अर्थात जब उजाला चीज़ों के औरा को समाप्त कर उनकी ज्यामितीय शक्ल को दिखाता है, तब मैं उन्हें समझ पाता हूँ. उनसे बराबर की दूरी बना कर रख सकता हूँ. अँधेरा पढना आता नहीं इसलिए अपने ही स्थान पर चीज़ों के बीच रास्ता खो गया है. मैंने अपने आवरण को सीखा, जाना है. बाहर के अँधेरे की तरह मेरे भीतर घना अंधकार है. जब अपने भीतर झांकता हूँ तो घबरा कर लौट आता हूँ.

इस घबराहट में सब शक्लें बुझा देना चाहता हूँ. लड़के के बहाने फ़िर से दिशा और उससे जुड़ी चीज़ों का बोध मेरे सिरहाने चला आता है. सोचता हूँ कि मैंने जब भी किन्हीं सीढियाँ के बारे में सोचा, वे उत्तर की ओर मुंह किये हुए क्यों दिखाई दी? जाने क्यों, हमेशा ऐसा लगता रहा कि सीढियाँ चढ़ते हुए मैं दक्खिन में ऊपर की ओर बढ़ रहा हूँ. मेरे ख़यालों में टूटी हुई इमारतें, मेहराब, कंगूरे, घर, चुंगियों के दफ्तर और खत्म हुए रास्ते से दिखाई देते हैं लेकिन सीढियाँ साबुत ही रहती हैं. जैसे उनकी गिनती पूरी हो रही है. वे मुकम्मल होने का अहसास दे रही है.

रात के बारह पचास...
अब मेरे पास ख़यालों की खुशबू के गोदने थे. उनमें बस इतना बचा रह गया है कि दीवार पर बैठा रहने वाला लड़का हसरतों का वजूद था. जिसके कंधों पर लड़की की आँखों के ख़्वाब टिके रह सकें. मगर वो लड़की कौन थी? हवा का झोंका फिर दस्तक दे गया है. मैं जानता हूँ कि बाहर दरवाजे के पार काली रात है फ़िर भी उस लड़की का गोरा बदन देख लेना चाहता हूँ, अगर वह वहां बैठी है तो... उनींदा दीवार से गिरने से पहले के सम्मोहन में घिरा हुआ, तकिये के नीचे अपनी कोहनी को डाल कर उसे थोड़ा और ऊपर कर लेता हूँ.

फ्रिल वाली स्कर्ट पहने लड़की के ख़्वाब जाने क्या हुए. दरवाज़े के पार अँधेरा प्यासा ही खड़ा रहा और मैं अपनी प्यास के चार जानिब एक दीवार चुनता गया.

September 29, 2011

ये मग़रिब से आती हवा न थी...



अँधेरे में रहस्य का आलाप है. इसमें सिहर जाने का सुख है.
वहां एक कुर्सी रखी है. बादलों के बरस जाने के बाद वह कुर्सी खुली जगह पर चली आया करती है. सर्द दिनों में धूप का पीछा करती रहती है. गरम दिनों की रुत में सीढ़ियों के नीचे के कोने में दुबकी हुई थोड़ी कम गरम हवा का इंतजार करती है. उस पर एक कुशन रखा है. कुशन पर रंगीन धागों से ढोला-मारू की तस्वीर उकेरी हुई है. दौड़ते हुए ऊंट की गरदन टेढ़ी है यानि वह संवाद कर रहा है. कहता है. "मुहब्बत की कोई काट नहीं है, वह ख़ुद एक बिना दांतों वाली आरी है."

मैं अभी भी कमरे में लेटा हुआ हूँ. रात के बारह बजे हैं. सोच रहा हूँ कि इस कुशन पर रेत के धोरों की तस्वीर धागों से बन जाती तो और सुन्दर दिखता. दौड़ते हुए ऊंट की पीठ पर सवार ढोला अपनी प्रेयसी मरवण से मुखातिब है. जिस वक़्त अपने कंधे पर प्रेयसी का हाथ नहीं पाता है, घबरा जाता है. प्रेम के लिए भागते जाने के इस अनूठे आयोजन का विस्तार असीमित है. अबूझ धोरों पर रेत की लहरों के बीच सुकून और बेचैनी की एक बारीक रेखा साथ रहती है कि इस रेगिस्तान में पकड़ा जाना मुश्किल है और अधिक मुश्किल है, बच पाना. ऊंट जितना तेज दौड़ता है, डर भी उतनी ही तेजी से उसका पीछा करता है. डर है कि भरी भरी छातियों और गुलाबी गालों वाली सुघड़ नवयौवना का साथ न छूट जाये. इसका तीखा नाक किसी और की नाक के नीचे न आ जाये. इसके लम्बे खुले हुए केश जो रात को और अधिक गहरा कर रहे हैं, उनसे कोई और न खेलता हो. कोई इसके एक आंसू को अपने शराब भरे प्याले में उतार न ले.  

आज की रात के इस लम्हे के बारे में मैंने कभी सोचा नहीं था कि ऐसे हवा दस्तक दे रही होगी. मैं लकड़ी के तख़्त पर लेटा हुआ, बाहर भाग जाने का सोच रहा होऊंगा. हम इसी तरह अपने जीवन को जीते हैं. ठीक इसी पल को थाम लेना चाहते हैं. आनेवाले पल की सूरत दिखती नहीं इसीलिए उसके प्रति आशंका है. उसके लिए आग्रह है कि जाने कैसा होगा? इसलिए जो ये पल है, अच्छा है. बस एक छोटी सी नौकरी, चंद शब्दों और आवाज़ का सफ़र... यश, प्रसिद्धि, बल, अधिकार, सामर्थ्य, प्रेम, दौलत और ऐसी ही सब चीज़ों के सफ़र में कुछ भी स्थायी नहीं है, फिर भी आने वाले लम्हे से कई वहम है. भय और लालच से बुनी गयी इस दुनिया में बस एक इंतज़ार स्थायी है, आखिरी वक़्त जब दुनिया से थक-हार जायेंगे तब भी बचा रहेगा.

बाहर के अँधेरे की ओर फ़िर से नज़र जाती है. वहाँ दीखता कुछ नहीं. बस सोचता हूँ कि क्या होता अगर वे कभी इस तरह न भाग पाते? क्या भूल ही जाते? वह पहली नज़र की मुहब्बत जेठ महीने में कितनी आँधियों और रेत के बगुलों के बाद मिट पाती? ऐसे सवालों के बीच, मैं अलग तस्वीरें बुन रहा हूँ. एक में किसी डायनिंग टेबल पर पंद्रहवीं सदी में पहने जाने वाली फ्रिल वाली स्कर्ट पहने हुए एक भरी देह की नवयौवना बैठी है. उसने अपने एक पैर को दूसरे पर चढ़ा रखा है. उसकी कोहनियाँ टेबल के किनारों पर टिकी है. जैसे वह अभी अभी कोई बात अधिकारपूर्वक कहने ही वाली हो. उसके भरे हए गाल गरदन के पास साफ दिखते हैं. जैसे मौसम का पहला फल इंतज़ार में और भारी हो गया है. बस मैं इतना दृश्य ही सोच पाता हूँ. मेरे ख़यालों से घटना या संवाद अक्सर गैर हाजिर रहते हैं.

अचानक अँधेरे के संसार की सोच में इस तरह के बेतरतीब ख़याल कैसे चले आते हैं, समझना मुश्किल है. लेकिन दूसरे दृश्य में एक नन्हा टोरनेडो है. जिसे मैं बतुलिया कहता हूँ. वह गोल चक्कर काटता हुआ मैदान में पड़े पत्तों, कागजों और ऐसे ही कचरे को अपनी बाँहों में गोल गोल घुमा रहा है. सम्भव है कि ये वर्तुल लालसाओं और कामनाओं का बिम्ब है जो सिर्फ़ रेत से भरा हुआ जूता खाने के योग्य है. हो सकता है कि इसी तरह के किसी अंधे वर्तुल ने ढोला के कसूम्बल रंग के ऊंट का रास्ता रोक लिया हो. या शायद ऐसे ही नन्हे टोरनेडो ने उस लड़की की स्कर्ट की फ्रिल को हवा में उड़ा दिया हो... और वह बहुत देर तक ये सोचती रही हो कि वो लड़का कौन था. जो अक्सर आधी टूटी दीवार पर बैठा रहता था. उस दीवार में लगी ब्रिक्स के लाल रंग पर जमी हुई धूल झरती रहती थी.

वो लड़का कौन था? क्या वहाँ कोई लड़का था... 
हवा फ़िर से दस्तक दे गयी है. जैसे कोई अपने गीले बालों को झटकते हुए गुज़रा हो. 

 * * *

September 28, 2011

रात की स्याही से भीगी हवा



यह कुछ ऐसा ही है जैसे ये सोचना कि दीवार के उस पार क्या है?
मैं अपने बिस्तर पर कभी औंधा लेटा हुआ आँगन को देखता या पीठ के बल सोते हुए छत को ताकता सोचता हूँ कि बाहर की हवा में ठण्ड है. अचानक कोई झोंका आता है. हवा इस तरह से बदन को छूती है जैसे कोई आहिस्ता आहिस्ता दस्तक दे रहा हो. वह असंगत लय है. अभी एक बार छुआ थोड़ा रुक कर तेजी से दो तीन बार फ़िर से छू लिया. मैं एक छोटे से इंतजार के बाद उसे भूलने को ही होता हूँ उसी वक़्त हवा फ़िर से दस्तक देती है. जैसे किसी ने अपने ठन्डे हाथ धीरे से गाल पर रखे और वापस खींच लिए.

ये कौन है? जो मेरे मन को दरवाज़े के बाहर खींच ले जाता है. वहां अँधेरा है. मैं उस जगह को रोज़ देखता हूँ, वहाँ कोई नहीं रहता. उस खुली जगह पर कोई नहीं है तो फिर वहां पर मेरा मन क्यों चला गया है. सूरज की रौशनी के बुझते ही शोर जब अपनी दुम को अपने ही मुहं में दबा कर सो जाता है तब क्या कोई दबे पांव वहाँ आकर रहने लगता है? संभव है कि चीजें जादुई हैं और वे हर घड़ी अपना रंग बदलती रहती है. हो सकता है क्योंकि हमारा रंग भी हर पल परिवर्तित होता रहता है. जैसे मन का रंग, सामर्थ्य का रंग, व्यवहार का रंग, आशाओं का रंग और भी हर तरीके से हम स्थूल और सूक्ष्म बदलाव को जीते रहते हैं. 

मेरा मन बाहर ही अटका है और हवा की छुअन एक बहाना भर है. संभव है कि किसी अजाने की प्रतीक्षा है और मैं उसे अपने आप से छुपा रहा हूँ. या फिर भीतर कुछ आलोडित है और बाहर भाग जाना चाहता हूँ. कुछ इस तरह की उम्मीदें भी हो सकती है, जिनके बारे में दिन को सोचना मुमकिन न हों. अब तक के सीखे और एकत्र किये गये अनुभव की स्मृति कहती है कि खुली हवा में साफ़ आसमान के नीचे पसरे अँधेरे में भय की सिहरन बिछी हुई होगी. सिहरन उत्तेजना और शिथिलता के बीच की बारीक और प्रभावी रेखा है.

बाहर अँधेरा है. अँधेरा हवस से भरा है क्योंकि कौमार्य को बचाए रखने के लिए जिसका प्रतिकार करना है वह हवस ही है. लेकिन अँधेरे का जादू बुला रहा है. वहाँ प्रतिपल आशंकाएं है. अँधेरे का चरम उत्कर्ष हर तरफ से चूमने लगेगा. सिहरन बढती जाएगी. क्या यही कामना मुझे बाहर बुला रही है. हवा फ़िर से छू गयी है. 

दरवाज़े के पार अँधेरा है.

September 25, 2011

फ़िर भी हेप्पी बर्थडे...



ख्वाहिशों की तितलियाँ बेक़रारी की आग को चूम कर उड़ जाती हैं. जाने किस नगर, किस देश को. झपकती हुई पलकों से देखे किसी अचरज की टिमटिमाती हुई याद रह जाती है. उन तितलियों के पंखों के कुछ रंग आस पास छूट जाया करते हैं.

ऐसे में कुछ शामें बेसबब स्टेडियम की पेवेलियन में बैठे हुए, कई सुबहें सूजेश्वर के पहाड़ी रास्ते वाले शिव मंदिर की सीढ़ियों पर, कई दोपहरें बेखयाल नीम के पेड़ों की छाँव में बीतती रही. वहां हसरतों के घोंसले न थे. बस ज़रा खुला खुला सा लगता था. उन्हीं जगहों पर मैं महसूस करता था कि आवाज़ की सुंदर तितलियाँ, खुशबुओं को छूकर आई है और लम्हों की उतरन को मेरी कलाई पर रखती हुई मुस्कुराती है.

वहीं बैठा हुआ जाने किस बात पर... अचानक किसी शोरगुल भरी कक्षा में पहुँच जाता हूँ. जहां विज्ञान के माड़साब किसी दर्शनशास्त्र के प्रोफ़ेसर में तब्दील हो कर बड़ी गहरी उदासी से बताते कि तितलियों की उम्र चौबीस घंटे हुआ करती है. वे गंभीर होकर खो जाते. जीवन के बारे में कोई ख़याल उनके दिमाग में अटक जाता था. इससे बाहर आने के लिए वे एक झटका सा देते हुए उस ख़याल को नीचे गिरा कर आगे पढ़ाने लग जाते थे.

अव्वल तो बची हुई स्मृतियों की तफ़सील में जाना नामुमकिन है और फिर मुझे प्राणिशास्त्र के रिसालों में भी खास दिलचस्पी कभी नहीं रही. डूबते डूबते ग्यारहवीं पास की और विज्ञान से तौबा कर ली. फिर तौबा का अफ़सोस इसलिए भी नहीं हुआ कि विज्ञान को आज भी मालूम नहीं कि मरने से पहले आदमी किस तरह मर जाता है...

रात को सोकर सुबह जागता हूँ तो बस ज़रा अजाने ही अपनी कलाई को फिर सूँघता हुआ सोचता हूँ कि शायद बचा हो कोई पता. मगर दिन और रातों की खुशबुएँ उड़ जाती है, उन्हीं रंगीन तितलियों की तरह... बेक़रारी नहीं जाती, खिलती रहती है रेलवे क्रीपर की तरह सदाबहार, उपेक्षित और इंतज़ार के हल्के सफ़ेद रंग में या याद के गुलाबी, बैंगनी रंग में...

और वह मुहब्बत भरी आवाज़ चुप्पी में ढल जाती है. तुम्हारे लिए कुछ बेतरतीब पंक्तियाँ लिख कर अपनी इस बात को पूरी कर रहा हूँ.

कभी कभी घर के बाथरूम से भी आने लगती है
होटल के कमरों जैसी गंध
और कभी डूबते समय सूरज
सबको बराबर कंदीलें नहीं बांटता है.

उन दिनों,
हमें
ख़ुद ही लाना होता है, घर की गंध को वापस
और रौशनी के लिए जलाना पड़ता है लाल रंग का दिल.


* * *

मैं हर जगह देख रहा हूँ मगर तुमने जाने कहां रख दिया है, अपना हेयर क्लिप... कि रात बहुत गहरी हो गयी है. वैसे इकतालीस साल काफी होते हैं फ़िर भी हेप्पी बर्थडे किशोर कि तुम अभी तक ज़िन्दा हो.

September 18, 2011

अग्नि के आचमन से

मैं ये जाने कब से सोच रहा हूँ कि तुमसे प्रेम करते हुए, मुझे देवीय कोप से भयभीत मनुष्यों की गरज नहीं है. मेरे पिता एक ऊँचे कद वाले और चौड़े हौसले वाले इंसान थे. उस भद्र पुरुष ने एक रात मुझे कहा था कि मैं अग्नि के आचमन और जल के अभिषेक से जन्मा हूँ. उस समय उनकी पेशानी पर बल थे. उनके तीखे नाक पर चमकता हुआ कोई उजाला छिटक रहा था. छोटी सी आँखों की लम्बी कोर के किनारे प्रेम से भीगे हुए थे. ऐसा देखते हुए मैंने पाया कि मैं एक नन्हा बच्चा हूँ. जो किसी की गोद में लेटा हुआ आँचल की ओट से ये सब देख रहा है.

कल मैंने एक ख़याल बुना. इसे जागती आँख का सपना कहा जा सकता है. सपना इसलिए कि इसमें सोचा गया सब कुछ अविश्वसनीय है. मैं देखता हूँ कि राजपथों जैसी चौड़ी सड़क के किनारे एक कार में तुम बैठी हो. उस कार के बंद दरवाजों पर, शीशों पर, छत पर बेशुमार बारिश गिर रही है. बरसात के शोर में कई सारी आवाज़ें खो कर मौन में ढल गयी है. एक ऐसा मौन, जिसमें शोर ही मुखर है मगर सुनाई कुछ नहीं देता.

बारिश की फुहारों और काली ऊदी घटाओं के बीच कोई उम्मीद नहीं झांकती. एक अरूप दर्द है. जिसका कोई ओर छोर नहीं, जिसकी शक्ल का खाका सही नहीं समझा जा सकता. जिसके होने की वजहों से अधिक दुःख इस बात का होता है कि बारिश की लय की तरह इसके अनेक रूप हैं. भीगे सीले इस ख़याल को थोड़ी ही देर में मुसलसल बारिश और भयावह बना देती है. मैं देखता हूँ कि बारिश का पानी अब कार के पहियों को ढक चुका है.

मुझे कई तरह के वहम और गुमाँ होने लगते हैं. कार तैरने लगेगी और एक सपनीली नाव में बदल जाएगी. लहरों पर सवार कार के मद्धम लयहीन हिचकोले, तुम्हें बचपन की किसी बैलगाड़ी जैसी यात्रा की याद दिलाएगी और तुम अपने सबसे खूबसूरत वक़्त में लौट जाओगी. वहाँ माँ की चुनर से एक मुकम्मल घर बनाया जा सकेगा. पिता की पीठ दुनिया का सबसे ऊँचा और मजबूत ठिकाना होगी. तुम लौटने लगोगी अपने अविस्मर्णीय सुनहरे वक़्त में. एक ऐसा वक़्त जिसमें रिश्तों को दुःख बुनना नहीं आता हो.

इस वक़्त मैं अपने पिता की याद के जंगल में किसी उदात्त घोड़े की हिनहिनाहट से भर उठा हूँ. ओ सफ़ेद दांतों और गुलाबी होठों वाली लड़की तुम्हारा भाल उन्नत है, तुम्हारा वक्ष उभरा हुआ है, घाटियों की शिखरों की तरह. तुम्हारी आँखों में बसा है तितलियों का घोंसला, तुम्हारी आवाज़ का कौमार्य अभी शेष है... आ कि अग्नि के आचमन और जल के अभिषेक से जीवन मुस्कुराता है, आ मेरी बाँहों में आ...

September 12, 2011

किसी ज़ीने पर पुराने दिन बैठे होते...

अच्छा रहता कि बारिश होती और एक दूजे का हाथ थामें सड़क के किनारे कार में बैठे रहते. इस तरह बहुत सा वक़्त साथ में बिताया जा सकता था. हम जरुर एक दूसरे को देख कर हतप्रभ चुप हो जाते. फ़िर थोड़ी देर बाद कार के पायदानों के नीचे से सरक कर कई बातें हमारे बीच आ बैठती. इस तरह मिलने के अचरज को हम गरम कॉफ़ी की तरह सिप करते जाते और इस स्वाद को दुनिया का लाजवाब स्वाद बताते.

विलासी चौराहों की ओर देखते हुए या फ़िर रिक्शा धोते हुए आदमी के बारे में कुछ भी सोचे बिना, इस पर भी बात की जा सकती थी कि उन शहरों को लोग क्यों याद नहीं रख पाते जहाँ उनका कोई महबूब न रहता हो. बातचीत का विषय ये भी हो सकता था कि किस तरह कई बार वे दीवारें भी स्मृतियों में जगह बनाये रहती है. जिनके सहारे चिपक कर एक बार चूमा गया हो. या पूछ ही बैठते कि क्या दीवारें तुम्हारी ओर धक्का देने का गुपचुप हुनर भी जानती हैं?

धूल हवा के पंखों पर सवार रहती और सूरज फूंक मार कर गोल-गोल धूल का खेल खेला करता था. अक्सर तनहा कमरे में दोपहर के वक़्त प्यार करने के ख़्वाब देखने में इतना समय जाया होता रहता था कि ख़ुद पर चिढ होने लगती थी. आले में रखी किताबें और रजिस्टर में महबूब की तारीफ में लिखी हुई चंद बेढब पंक्तियाँ सुस्ताती रहती थी. बड़े कमरों में रखी हुई चीज़ें अपने आकार से अधिक छोटी जान पड़ती थी. इससे प्यार की जगह और बढ़ जाती थी. आपस में बांटने के लिए ऐसी ही कितनी ही बातें बची हुई है.

इन दिनों बहुत बारिशें हो रही हैं. मैं आज वहाँ होना चाहता हूँ. दो बाँहों में न समाने जितने बड़े 'बुके' लिए हुए. जिनमें कुछ कार्ड्स रखें हों. उन पर लिखा हो कि प्रेम की हरीतिमा पहाड़ों को ढक सकती है, बाँध लेती है उड़ती रेत को, पानी के रंग को कर देती है, हरा. मेरे दो हाथों में कुछ नर्म गुदगुदे खिलौने भी हों जिनको संभालते हुए तुम्हें चूमना लगभग असंभव हो जाये.

* * *
गुज़ारिशों के बाद भी बारिश नहीं हुई. कितना अच्छा होता कि किसी ज़ीने पर हमारे पुराने दिन बैठे होते और हम मिलते पहली पहली बार फिर से...

September 8, 2011

क़ैदख़ाने में सुंदर पीठ वाली लड़की

मैदान में हरे रंग के पत्ते एक दूसरे की बाहें थामें हुए ऊँचे झांक रहे थे, यहीं कुछ महीने पहले धूल उड़ा करती थी. छत डालने के काम आने वाले सीमेंट के चद्दरों से दुपहिया वाहनों के लिए शेड बना हुआ है. यहाँ बैठा हुआ, सेटेलाईट डाटा रिसीविंग डिश के पार नीले आसमान में तैरते हुए बादलों के टुकड़ों को देखता हूँ. सप्ताह भर से लगातार बारिश हो रही है. अक्सर फाल्ट होने से पावर कट हो जाया करता है फिर स्टूडियोज़ के बंद कमरों में सीलन और ठहरी हुई हवा भारी होने लगती.

नाउम्मीद बैठे हुए अचानक तेज बारिश होने लगी. शेड के तीन तरफ पानी, फुहारें, एक लयबद्ध शोर, किनारे पर अटका एक भीगा हुआ पंख. दुनिया सिमट गयी है. यहीं बैठ कर इंतज़ार करो. सहसा आभास हुआ कि बारिश अपने साथ बहा ले जा रही है. मन की सतह का रंग बदल रहा है. अभी एक आवाज़ सुन रहा था. ताज़ा सीलन से भरी दोशीज़ा आवाज़. टूटती, बेदार और हिचकियों से भरी हुई... बारिश भी ऐसे ही गिरती है.

* * *
परसों रात
उस बंदीगृह के फर्श का बनना अभी बाकी था. सीमेंट मिली बजरी की रेतीली सूखी परत पर कई जगह बिछाने के लिए बारदाने या फ़िर फटी हुई कम्बलें रखी थी. उसकी पीठ मेरे हाथ के बहुत करीब थी. मैंने उसे छूकर देखा. अचानक सपनों में आने वाला समझदारी भरा सवाल सामने आया कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इस बंदीगृह में स्त्रियाँ और पुरुष दोनों को एक साथ रखा गया है.

अगले पल मुझे अपने पड़ोस का एक लड़का दिखाई दिया. वह किस जुर्म में यहाँ बंद था. यह मालूम होने से पहले एक आदमी उस लड़की के बारे में बताने लगा. "हाँ वो लड़की जो अस्पताल में मर गयी थी." मुझे नहीं मालूम कि उस लड़की के मरने के पीछे की असली वजह क्या थी. मैंने कयास लगाया कि संभव है इस लड़की ने उसे ज़हर दे दिया होगा. इस सुडौल चिकने कंधों वाली लड़की का मुंह उसकी पीठ से मेल नहीं खाता था.

बंदीगृह के दरवाज़े और खिड़कियाँ किसी भी सूरत में कैदख़ाने की शक्ल नहीं बुन पा रहे थे. उस आधे खुल सकने लायक दरवाज़े से कोई बाहर निकल गया. मैंने खिड़की की ओर देखा. उसमें लगी लोहे की ग्रिल आम तौर पर बाज़ार निर्मित और भद्र घरों में लगने वाली सी थी. उसमें लगे शीशे के कुछ पल्ले खुले थे. मैं खड़ा हुआ सोच रहा था कि इसके बीच से निकल कर भागा जा सकता है. मुझे उन लोगों पर अफ़सोस हुआ जिन्होंने इतनी कमजोर जगह को चुना था.

बंदीगृह में. मैं अपने आपको अपराधी ठहराए जाने को मान नहीं पा रहा था. मुझे एक खास किस्म की जल्दी थी. मेरा कोई काम बाकी था जिसे किया जाना जरुरी था. मुझे लगता था कि इस बंदीगृह में मेरा वक़्त जाया हो रहा है. दृश्य बदल गया. अब मैं सड़क पर चल रहा था. वही पडौस का लड़का जो कैदख़ाने में बंद था सामने आता दिखाई दिया. मैंने उससे पूछा. "तुम कैसे आये ?" वह बोला. "आपको मालूम नहीं कि माँ के नाम पर वहाँ से छूट सकते हैं. मैंने यही किया."

लड़का चला जा रहा था. मैंने पाया कि शाम घिर आई है. सड़क की वह ट्यूबलाईट जल चुकी है जिसके नीचे भीलों के लड़के अक्सर रात बारह बजे तक खेला करते हैं.

* * *

कल रात
बहुत पुराना समय है. ऐसा कि जिसमें किताबों के पन्नों का रंग काफी काला हो चुका हो. कोई इंगलिश्तानी लेखिका है. जिसके जूड़े में गुंथे हुए बालों का आकार उसके पूरे उपरी भाग को ढक रहा है. कंधों तक फैला हुआ जूड़ा किसी मछली पकड़ने के जाल में कसा हुआ है. वह अपना सर झुकाए हुए है. दो पन्नों पर छपे हुए गध्य से मेरा कुछ वास्ता है जबकि इसी सिलसिले में मुझसे कोई बात करना चाह रहा है.

वह मुझसे कोई बात नहीं करती वरन उसकी मौजूदगी भी एक तस्वीर की ही शक्ल में हैं.

मैं समझने की कोशिश करता हूँ कि मैंने किया क्या है ? किस तरह मेरा वास्ता उसके लिखे से हो सकता है. मगर यहाँ भी अपराधी हूँ और इससे बाहर आने को बेचैन हूँ. यह बहुत मंद गति का सपना है. चलता ही नहीं. बस वही दो पन्ने और वही तस्वीर सामने आती रहती है.

* * *
जब उस शेड के नीचे बारिश को देख रहा था तब मैं तुम्हें फोन करना चाह रहा था कि अब घर के लिए निकल रहा हूँ. आज याद आया कि कैदख़ाने में जो लड़की थी. उसकी शक्ल एन (Anne Bronte) से मिलती थी. जो सिर्फ़ उन्नतीस साल की उम्र में दुनिया और हमारे लिए बहुत सी खूबसूरत कविताएं छोड़ गयी.

September 5, 2011

मरक़दों पे तो चिरागां है शब-ओ-रोज़

मैं एक अजनबी की तरह पार्क में दाखिल हुआ.
वहां कुछ जगहों पर दूब नहीं थी और खास तौर से जिस जगह पर कसरत करने के लिए दो 'बार' लगी थी वहां बिलकुल भी नहीं थी. उस नौजवान आदमी ने बार पर टिकी हुई हथेलियों पर अपने शरीर को सीधा उठाये हुए मेरी तरफ देखा. जबकि उसकी पीठ मेरी ओर थी. उस आदमी की उम्र कोई पच्चीस साल रही होंगी. इसके बाद मैंने एक नन्हे बच्चे को देखा जो ज़मीन और बार के बीच जाने किस चीज़ पर बैठा था. वह बच्चा चूँकि बैठा हुआ था इसलिए उसके कद और उम्र के बारे में कुछ कहना मुश्किल होगा किन्तु वह चार साल की उम्र से छोटा ही रहा होगा. उसके पास एक लड़की खड़ी थी. इन तीनों को एक साथ देखने से लगा कि वह निश्चित ही एक परिवार है. अर्थात पति, पत्नी और उनका बेटा.

सूखी हुई घास की तरफ बढ़ते समय मेरी चाल निरुद्देश्य सी दिखती होगी लेकिन जल्द ही उन सब के पास पहुँच गया. जैसे अभी अभी बिना मकसद के चल रहा था और अभी अभी लगता है कि किसी ख़ास काम के सिलसिले में इन्हीं से मिलने आया हूँ. वह लड़की निरंतर मेरी ओर देख रही है, ऐसा मुझे लगता है. इसलिए कि मैं निरंतर उस नौजवान को देख रहा हूँ. जो वर्जिश में लगा है.

"हाँ मुझे बताया." ऐसा कहते हुए उस नौजवान ने किसी का नाम नहीं लिया, ना ही किसी ओर देखा. मगर मुझे लगा कि वह पास खड़ी युवती के बारे में कह रहा था. जो अब बिना किसी संशय के उसकी पत्नी समझ आने लगी. इस बागीचे से मेरा घर साफ़ दीखता है. मैं यहाँ बहुत कम आता हूँ. उसने थोड़ी देर में कहा. "आपके लिए जरुर करेंगे." मैं उसको धन्यवाद तक नहीं कह पाया.

मैंने करवट ली होगी, शायद करवट... कि जगह बदल गयी.
अब एक उंची आलीशान बिल्डिंग के आगे की चौड़ी सड़क थी. बिल्डिंग ऐसी कि किसी महानगर के संभ्रांत रिहायशी इलाके में खड़े शोपिंग मॉल सरीखी. उसके आगे की चौड़ी सड़क के पार एक पतली गली में घरों की कतार है. उनके आगे से गुज़रते हुए एक दोमंजिला मकान को मुड कर देखता हूँ. मकान के पास खाली छूटी हुई ज़मीन है. इस पर एक घर बनाया जाना अभी बाकी है. मकान वाली पंक्ति के सामने के घर के आगे लगे पेड़ के पास वही नौजवान बैठा है और लड़की खड़ी है.

अगले पल लड़की उस दोमंजिला घर के अन्दर दिखाई देती है जबकि नौजवान जा चुका होता है. शायद फ़िर करवट ली.

खुले मैदान जैसी जगह है. जो व्यस्त शहर के उसी मॉल की ओर जाती है. भारी भरकम सामान ढ़ोने वाला एक विशालकाय वाहन अचानक मुझे अपने सर के ऊपर दिखाई देता है. इसमें स्टील के चद्दर है. जो किसी झाड़ू की तरह रगड़ खाते हुए पीछे आ रहे हैं. मैं उनके बीच ख़ुद को इस तरह पाता हूँ जैसे किसी विशाल स्तम्भों पर खड़ी छत के नीचे हूँ. मैं अपनी ओर बढ़ते आते चद्दरों से कट जाने से बचने के लिए आखिरी प्रयास करता हूँ.

मैं चूमने जितने फासले से बाहर आ जाता हूँ. अब रौशनी है. एक रुकी हुई साँस है. मैं अपने पांवों पर खड़ा हूँ. वहां एक सड़क बन रही है...

कल रात की नींद में सपनों के सिनेमाघर की ये तीसरी फ़िल्म थी. इससे पहले की दो फ़िल्में मैंने जानबूझ कर याद नहीं रखनी चाही कि वे खास उत्साह नहीं जगाती थी. इसमें ऐसा लगता था कि वो लड़की तुम हो !

September 3, 2011

आज की एक रात रुक जाओ...

ढोला तमीणे देस में म्हें दीठा तीन रतन, एक ढोलो दूजी मरवण तीजो कसूम्बल रंग !

ओ माणीगर रेवो अजूणी रात, पूछों रे मनडे़ री बात
माणीगर रेवो अजूणी रात
थांरे कारणिये ढो़ला जीमणियो जिमाऊं, जीमणिये रे मिस आवो रे बादिला
माणीगर रेवो अजूणी रात, पूछों रे मनडे़ री बात
थांरे कारणिये केलूडी़ रोपाओं, दांतणिये रे मिस आवो रे बादीला
माणीगर रेवो अजूणी रात, पूछों रे मनडे़ री बात...

ओ प्रिये तेरे देश में मैंने तीन रत्न देखे हैं, एक प्रिय दूसरी प्रियतमा और तीसरा कसूम्बल रंग

ओ सौदागर आज की एक रात रुक जाओ तो मन की बात पूछूं
आपके लिए एक भोज का आयोजन करूँ, भोजन के बहाने से आ जाओ ओ हठीले
ओ सौदागर आज की एक रात रुक जाओ...
आपके लिए केलू का पौधा लगवा दूँ, दातुन के बहाने से आ जाओ ओ हठीले
ओ सौदागर आज की एक रात रुक जाओ...

रेगिस्तान में रात जब लाल रंग में घिरने लगती है तो उसे कसूम्बल रंग कहते हैं. मैं ऐसे ही रंग की रातों को ओढ़ कर सो रहा हूँ. विरह की उदासी से घिरी बैठी किस प्रेयसी ने ऐसे लोक गीतों को जन्म दिया होगा कि ज़िन्दगी बस उसके साथ की एक रात का ख़्वाब बन कर रह गयी. गफूर और उसके साथियों के गाये इन लोकगीतों में सुकून है. जिस दिन तुम्हें भूल जाऊँगा उस दिन कहूँगा. गफूर अब तुम घर जाओ, इन गीतों को किसी और के लिए रख लो !

मैं दिल को लाख समझाता हूँ. उसको हज़ार ऐसे किस्से सुनाता हूँ कि तुमसे दिल टूट जाये. ये मेरी सुनता ही नहीं. आज की रात जितनी पी सकता हूँ उतनी शराब पीने के लिए तय है कि मैं बहुत थक गया हूँ.


दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.