August 23, 2018

कुछ बनाने का वहम

अब थकान ने हमारे भीतर स्थायी घर कर लिया है. हम इतना थक जाते हैं कि बैठकर आराम करने की बात से हमारा विश्वास उठ जाता है। हम खड़े हुए, चलते हुए, काम करते सोचते हैं कि ये सब क्या है? हम लम्बी सांस लेना भूल जाते हैं। हम अपने लिए चाय-कहवा बनाना याद नहीं रख पाते। हम मान लेते हैं कि अब कुछ ठीक न होगा। रात भर सोकर सुबह जागते हैं तो बदन में अधिक दर्द पाते हैं। आंखें बुझी-बुझी सी लगती हैं। बहुत देर बाद शरीर साथ देने लगता है।
इसका एक कारण हो सकता है मस्तिष्क में भरा हुआ अटाला।

बिछड़े साथी, टूटे सम्बन्ध, कटु अनुभव, असहज स्थितियां, उपेक्षा के क्षण, अपमान के कारक और भी ऐसी सब स्मृतियां हम अपने मस्तिष्क में भरे रखते हैं। मस्तिष्क एक कूड़ेदान बना रहता है। उसमें से एक भी बात मिटाने के लिए अगर कोई हमसे कहे तो हम तुरंत प्रतिक्रिया करते हैं। "अरे उसे कैसे भुला दूँ। तुम्हारे साथ बीता होता तो तुमको समझ आता। भाई किसी का विश्वास टूटना कैसा होता है. खरी कमाई का लुट जाना क्या होता है, अपना सौंपा हुआ जीवन व्यर्थ जाने की कीमत क्या होती है. काश तुम समझ सकते" इस तरह हम अपने जीवन की सबसे बुरी, अनुपयोगी और मन को नष्ट करने वाली स्मृतियों पर नाग की तरह कुंडली मार कर बैठ जाते हैं।

लुटेरों के घर कोठियों जैसे होते हैं. इसलिए कि वे ख़ुद लुटेरे हैं और उनको किसी के हाथों लुट जाने का भय नहीं है. गरीब और लाचार लोगों के घरों की दीवारें एक दूजे से जुड़ी रहती हैं. लगभग हर पड़ोसी दूजे के घर के हाल को कानों से देख सकता है. इसलिए कि लूट, चोरी, हमला, बदनीयती से प्रवेश जैसी घटनाओं पर चौकसी रहे और मिलकर मुकाबला किया जा सके. तो हम गरीबों के घरों के आगे पीछे खाली जगहें नहीं होती हैं. पिछले दो दशकों में हमने घर के आगे दस एक फ़ीट के लॉन बनाने शुरू किये हैं. वे भी अक्सर स्कूटर, मोटर सायकिल और ख़राब हुए घरेलू सामान रखने के काम आते हैं. कम ओ बेश यही हाल हमारे मस्तिष्क का भी है. अगर हम उसमें कहीं जगह बना पा रहे हैं तो उसे भी भरने के लिए हमारा अपना सामान तैयार पड़ा है.

घर की सफाई में रेलवे ट्रेक पर चेतावनी के लिए बिछाए जाने वाले पटाखे मिले. वे ऐसे पटाखे हैं कि जिनको रेल की पटरी पर बाँध दिया जाता है. इंजन का पहिया जब उस पर आता है तो एक धमाका होता है. इससे ड्राइवर को संकेत मिलता है कि आगे कुछ ख़तरा है और वह गाड़ी को रोक देता है. ऐसे पटाखे रेलवे में लम्बे समय तक काम लिए जाते रहे हैं. ये पटाखे नागरिक सुरक्षा के स्वयं सेवकों को भी दिए जाते रहे हैं. रेलवे भी युद्ध की स्थिति में देश के नागरिकों का प्रशिक्षण करता है. उनको क्या किया जाना और क्या नहीं किया जाना बताता रहता है. खैर ! मैंने माँ से पूछा कि ये क्या हैं? वे बोली- "पता नहीं. बरसों से पड़े हुए हैं." मैंने उनको बताया कि ये क्या वस्तु हैं और इसका क्या उपयोग हैं. माँ तुरंत पैंसठ की लड़ाई को याद करने करने लगीं फिर कहा इकहत्तर की लड़ाई के समय तेरे पापा ने कैसे एक बचने की जगह बनाई थी और पड़ोसियों ने भी कैसे खड्डे खोदे. जब हवाई जहाज आता तो सब उन खड्डों में छिप जाते.

बात पूरी हुई तब मैंने कहा कि इनका क्या करना है? वे बोली- "तू बता?" मैंने कहा माँ ये अब एक्सपायर हो चुके हैं. चालीस-पचास साल पुराने हैं. इनका कोई उपयोग नहीं. माँ ने कहा- "हे तो फूटरा" अब मैं माँ को देखूं और माँ पटाखों को देखे. बस इसी तरह कुछ वस्तुएं हमारे मस्तिष्क में भी बची हैं. वे कब की अवधिपार हो चुकी हैं. हम अजाने ही उनकी देखभाल और सुरक्षा का बोझ लिए जी रहे हैं.

तो वह जो लुटेरों का घर होता है. जिसमें आगे पीछे खुली जगहें होती हैं. उसमें वे पिछले खुले भाग को बैकयार्ड कहते हैं. हमारे घर में आगे, दायें और बाएं कोई खुली जगह नहीं है. पीछे एक ज़मीन का टुकड़ा है जिसे बैकयार्ड कहकर थोड़ा बहुत लुटेरे हो सकने का गर्व कर लेते हैं. उस टुकड़े पर चालीस-एक बरसों से घर का तमाम अनुपयोगी सामान पड़ा रहा है. किसी अनुपयोगी वस्तु को कबाड़ी को देने का मन नहीं होता. इसलिए कि याद आता कितना धन खर्च करके इसे लाया गया था और अब कितना सा मिल रहा है. ये कोई याद नहीं करना चाहता कि आवश्यकता का मोल था. आवश्यकता के योग्य न रहे तो अब कोई ग्राहक नहीं. कोई मोल नहीं.

इसी ज़मीन पर एक नीम का पेड़ था. वह सूख गया. उस पेड़ पर बेहया की बेल चढ़ गयी. बेल ने सूखी टहनियों पर एक छतरी तान दी. अब पक्षियों को आनंद आने लगा. वे उस छतरी के नीचे अपने घर बनाने लगे. लड़ाई भी वहीं करते और पंचायती भी. बुलबुल, गौरैया, कमेड़ी और सन बर्ड ये चार तरह की चिड़ियाएँ एक साथ रहती थी. एक और काले रंग की बड़ी चिड़िया भी कभी आती थी पर वह केवल पर्यटन भर होता था. इस दृश्य से मेरा मोह हो गया. मैं सुबह जागते ही बैकयार्ड में आता. हम वहीं बैठकर चाय पीते और कलरव सुनते. एक शाम अंधड़ आया. सूखा नीम का पेड़ धराशायी हो गया. बेहया की बेल में बने घोंसले धरती पर आ गिरे. मन दुखी हुआ. पंछी उड़ गये.

उस दिन हम चाय पी रहे थे. मैंने आभा से कहा- "हमें स्वार्थी नहीं होना चाहिए. सबको जीने के लिए जगह बराबर है" आभा ने कहा- "पक्षी सचमुच कुछ नहीं मांगते. उनको देखकर प्रसन्नता होती है." हमने तय किया कि सूखे पेड़ से भी अच्छी एक छाँव बनाते हैं. उस पर बेहया, गिलोय, मधुमालती जैसी बेल चढ़ जाने देते हैं. उसके नीचे पक्षियों के लिए स्वभाविक जगह बन जाने लायक हाल बना देते हैं. मैंने मिस्त्री से कहा कि ऐसा शेड बनाना है. उसने कहा- "ये क्या काम आएगा. पचास हज़ार रूपये लग जायेंगे. छाया भी नहीं होगी. आप टीन डलवा लो" बात नहीं बनी. मित्र हेमंत से चर्चा की. तब एक मिस्त्री मिला. उसने वैसी शेड बना दी जिस पर लताएँ चढ़ सकें और वे लम्बे समय तक रहें.

मनोज का बाड़मेर आना हुआ तो उसे शेड बहुत पसंद आया. शेड पर चढती बेलों और पक्षियों के लिए बनती जगह को देखकर मनोज ने कहा- "आज का आदमी दुनिया में अपने सिवा किसी को रहने ही नहीं देना चाहता है. वह सब पक्षियों और जानवरों को मारकर खाता जा रहा है. ऐसी भूख इस दुनिया में और किसी प्राणी में नहीं दिखाई देती." हम थोड़ी देर शेड के नीचे घूमते रहे और विचार किया कि कैसे मृदा पात्र टाँगे जो पक्षियों को स्वभाविक लगें या किस तरह के छोटे आले बना दें जहाँ वे अपने घर बसा सकें. लेकिन दो तीन विचार आकर रह गए. मनोज ने कहा- "आदमी अपने लिए कुछ भी बनाने को किसी का कुछ भी उजाड़ देता है. विध्वंसक सोच वाला ये प्राणी इस धरती के लिए अच्छा नहीं है. लेकिन हमने ये बहुत मामूली सा किन्तु अच्छा काम किया है."

बैकयार्ड की सफाई आरम्भ की. जैसा होता है वही हुआ. माँ आशंका से देखने लगी. ये बच्चे जाने कितनी चीज़ें बेकार ही कबाड़ी को दे देंगे या उनको फेंक आयंगे. वे कहीं से झांकती और चुप वापस मुड़ जाती. हमारा काम चलता रहा. अंततः माँ आई. पूछा यहाँ क्या होगा? मैंने कहा- "रामजी री चिड़िया अर रामजी रो खेत" माँ मुस्कुरा कर देखने लगी. उन्होंने भी साथ देना शुरू किया. अब कुछ महीने की मेहनत के बाद तीन चौथाई जगह सुंदर स्वच्छ और कचरा मुक्त हो गयी है. शेड पर बेलें चढने लगीं हैं.

हम बहुत सारे पौधे लाये. जिसने दिए उसको भी कम पता था कि किसमें क्या कैसा खिलेगा. लेकिन पौधे हैं तो हरियाली होगी. आँखें सुख पाएंगी. इसी तरह कुछ महीने बीते हैं कि कल एक पौधे से ट्यूब जैसा लम्बा और आगे से बेहद सुंदर रंग वाला फूल खिला. उसे देखकर सबको प्रसन्नता हुई. शाम की चाय पीते समय मैंने कहा- "ये बाड़ा हमारा दिमाग है. पहले इसमें कचरा भरा था. अनुपयोगी चीज़ें भरी पड़ी थी. इसमें बैठना अच्छा नहीं लगता था. लेकिन अब ये इतना अच्छा है कि हम अपने आप यहाँ चले आते हैं." माँ ने सर हिलाया और जूही, मोगरा सहित बहुत सी बेलों पर दृष्टि डाली. वे जड़ पकड़ने लगी हैं. उनमें कुछ फूल खिले हैं.

अगर इसी तरह हम अपने दिमाग से कचरा हटा सकें. बुरी, कड़वी और अनचाही स्मृतियाँ मिटा दें. सम्भावनाओं की नई पौध रोप सकें. तो... ?

आप अगर चेतना की ओर बढना शुरू करें. दिमाग में रखी वस्तुओं को देखें. उनकी उपयोगिता समझें. अनुपयोगी को बाहर कर दें. बुरे अनुभव मिटा दें. स्वयं से कहें कि आगे बढो. इस बोझ को हटाओगे तो और आगे बढोगे. तीव्रता से बढोगे. बच्चों की चिंता न करें कि उनका भविष्य अभी दूर है. हम अपने भविष्य तक कभी नहीं पहुँच पाएंगे कि वह सदा एक कदम आगे चलता है. इसलिए इस समय बच्चों से प्यार कीजिये. अच्छी बातें सिखाइए. आगे बढने को प्रेरित कीजिये. जो बनना होगा, वे बनेंगे. आग्रह परे करके अपने काम को शांति से करें. विश्वास करें कि शांत, सहज और सरल होने से, लालच मिटा देने से जीवन आसान और मीठा हो जाता है.

असल में आपको एक वहम ने घेर रखा है कि आप इस दुनिया में कुछ बना रहे हैं. जिस दिन आप इस दुनिया में कुछ बनाने की जगह जीने में लग जायेंगे. सबकुछ बदल जायेगा. अस्वस्थ होने के कारण आपने स्वयं जमा किये हुए हैं. उनको मस्तिष्क से हटाना शुरू करेंगे तो सुख भरी नींद आएगी और स्फूर्ति भरे जागेंगे.

ये सब लिखते हुए मैं सोचता हूँ कि अनेकानेक पक्षी आँगन में उतर आये हैं. उनके कलरव में राग यमन का आभास हो रहा है. मैं एक मीठी नींद में खोया जा रहा हूँ. परमानन्द मेरे पास खड़ा है और मैंने नन्हे बालक की तरह उसकी अंगुली पकड़ ली है. 
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August 18, 2018

मेटाथिसियो फोबिया - जड़प्रिय मन



गाड़ी के चलते ही आपका जी ख़राब होने लगता है उल्टियाँ आने लगती हैं? तो कोई खास बात नहीं है. आप हठी व्यक्ति हैं. नई चीज़ों, लोगों, सम्बन्धों, जगहों से डरते हैं. आपको लगता है कि जो जमा जमाया है उसमें कोई बदलाव नहीं आना चाहिए. मोशन सिकनेस केवल चलते वाहन से होने समस्या नहीं है. ये जड़ चीज़ों के प्रति भी होती है.

मेरी माँ ने जो चीज़ जहाँ रख दी है वहां से कोई हिला दे तो वे महाविस्फोट के नज़दीक पहुँच जाती हैं. घर में कभी भी धमाका हो सकता है. अधिकतर धमाका पेड़ बचाओ बाबा वाले मौन व्रत की तरह अनवरत चलता है, कभी गाँधी जी के नमक कानून तोड़ो की पदयात्रा की तरह घर से बाहर गली में बैठ जाने जैसा होता है. हालाँकि वे चीज़ों की बदली गयी जगह को कम ही बर्दाश्त करती हैं और उनको वापस उसी जगह ले आती हैं. इस क्रिया में एक चकाचौंध करने देने वाले प्रकाश का डरावना प्रस्फुटन होता है जो पूरे घर को अपने प्रभाव में ले लेता है.

इसलिए मैं या आभा या हम दोनों जब भी घर में किसी वस्तु, सुविधा अथवा चर्या में बदलाव चाहते हैं तो गम्भीर विमर्श होता है. अधिकतर विमर्श का परिणाम होता है "जाने दो, कौन टेंशन ले." कभी दीर्घकालीन आवश्यकता को ध्यान में रखकर हिम्मत जुटाते हैं और कार्य को संपन्न कर देते हैं. उसके बाद जो होता है, वह होता है.

बहुत बरस पीछे ऐसा था कि घर में झाड़ू फ्रीज़ के नीचे रखा रहता था. माँ को वह जगह ठीक लगती थी. एक बार आभा ने कहा "रसोई में क्या झाड़ू रखना. उसे कहीं एकांत में होना चाहिए. जैसे पोछा की बाल्टी, डंडे वाला पोछा, झाड़ू और सूपड़ी एक जगह रखे जाएँ. आसानी रहती हैं." मैंने कहा- "तुम पिटवाओगी. बाल्टी सीढियों के आगे रहेगी. पोछा सीढियों के ऊपर आधा लटका आधा टंगा रहेगा. सुपड़ी अख़बारों पर रखी जाएगी और झाडू वहीँ रहेगा. प्लीज़ इसमें कोई बदलाव नहीं होगा." आभा मुस्कुराई. आज बरसों बाद झाड़ू की जगह पता नहीं कैसे बदल गयी है मगर बाक़ी चीज़ें उसी क्रम में उन्हीं जगहों पर रखी होती हैं.

एक बूढी माँ के पास अधिकार जताने को क्या है? यहीं न कि जो काम वे बरसों से करती आई हैं. जिस घर को उन्होंने अपना जीवन देकर बनाया है उसे अपना जान सकें. अपने बनाये घर की तरतीब पर ही ज़ोर आजमा कर वे हमें जता सकती हैं कि ये मैंने बनाया है और इसमें हस्तक्षेप न करो. उनके रूठने के आन्दोलन असल में चीज़ों की जगह बदल जाने को लेकर नहीं है. वे जताना चाहती है कि बेटा अब तुम्हारी माँ से गरज खत्म हो गयी है. इसलिए मैं अपनी चीज़ों के साथ हूँ. मेरा जी इन्हीं पुरानी चीज़ों की तरतीब में लगता है तो टाइम पास हो जाता है.

अभी कुछ दिवस पूर्व मैंने ऑफिस के कुलीग्स को रात के भोजन पर बुला लिया. सोचा कि उमस भरे दिन हैं. कमरे बहुत सीले और गरम हैं एसी भी इफेक्टिव नहीं है तो बाहर बैठ जायेंगे. हमने खुले हिस्से में सोफा, चारपाई, टी टेबल और कुर्सियां लगा लीं. हम काफी लोग थे. अच्छी पार्टी रही. माँ ही सबकी मेजबान थी. उन्होंने ही अपने हाथ से रोटियां सेकी. आभा और मैंने खाना खिलाया. हम अब भी थोड़े रेगिस्तानी बचे हुए हैं कि लाख चाहकर भी मेहमानों के साथ खाना नहीं खा पाते. इसलिए सबको खिलाकर बाद में खाना खाते हैं. हमने खाना खाया और सो गए.

सुबह माँ ने कहा "बेटा राते मने नींद ही कोई आई नी. ऐ दोई सोफा कमरे में हा कोनी. हूँ घड़ी घड़ी जागूं न सोचूं के मरो रे कमरों कैड़ो खाली होयो. सुनियाड़ होगी." मैं माँ को देखता रहा. मन में सोचा कि बुजर्गों का जी कैसा हो जाता है. उनको अपने बच्चों के साथ-साथ चीज़ों से असीम आत्मीयता हो जाती है. वे किसी सोफा के कमरे में न होने से नींद तक नहीं ले पाते.

मैं आभा से कहता हूँ कि देखो बुजर्ग कैसे होते जाते हैं न? हम उनको कोसते हैं कि वे चीज़ें सलीके से नहीं रखते. वे क्या कर सकते हैं? असल में चीज़ें, सामान, घर सबकुछ एकमेव हो गया है. उनको कुछ हो जाने के डर से वे घबरा जाते हैं. ये सब उन्होंने बहुत कठिनाई से बनाया है इसलिए इनके बिना चैन नहीं आता.

अच्छा ये केवल बुजर्गों की बात नहीं है. हम हर उम्र के लोगों में होता है.

आपने देखा होगा कि नए लोग मिलते समय एक असहज अकड़ लिए होते हैं. आपको लगता है कि वे आपसे मिलना चाहते किन्तु किसी विशेष प्रदर्शन में भी खोये हैं. प्रदर्शन माने आपको ये बोध कराने का प्रयास करना कि ये अचानक हुआ है, मेरा आपसे मिलने का कोई प्लान न था. ये जताना कि मुझे अक्सर किसी से मिलना पसंद नहीं आता. कभी-कभी ये भाव भी पढ़ा जा सकता है कि आप हैं तो अपनी जगह होंगे मगर मैं भी कम नहीं हूँ.

इसे मैं मेटाथिसियो फोबिया समझता हूँ.

फोबिया का साधारण अर्थ भय है और मेटाथिसियो से अभिप्राय है बदलाव. किसी भी प्रकार के बदलाव से डरना. तो नए या पहली बार मिलने वाले लोग भयभीत हैं. वे नए के प्रति आकर्षित तो हैं. उनमें नए की चाहना तो है लेकिन ख़ुद को खो देने से डरते हैं. कि हमसे मिलकर वे वैसे नहीं रहेंगे जैसे पहले थे. हमारे बीच एक नया सम्बन्ध उग आएगा, परिचय का सम्बन्ध.

मुझसे मिलकर कई लोग आगे निकल जाते हैं. मैं उनको जाते हुए देखता हूँ. पाता हूँ कि वे थोड़ा आगे जाकर किसी बहाने से रुक गए हैं. अक्सर वे मुड़कर भी देखते हैं. तब मैं किसी बहाने से उनतक चला जाता हूँ. मैंने पाया कि मेरे सबसे अच्छे दोस्त वे ही हैं और वे मुझसे बिना शर्त बहुत सारा प्यार करते हैं.

क्या हुआ था उनको? क्यों रुके झिझके और आगे बढ़ गए? आप सोचना.

बुजर्ग किस बात से ख़ुश होंगे और किस बात से खफ़ा समझना नामुमकिन है। हम जयपुर में थे. सबसे छोटा भाई आया. उसने कहा- "माँ आपके हाथ की बाजरे की रोटी" माँ ने कहा- "बेटा मिट्टी का तवा होता तो मैं गैस पर भी बना देती." ये सुनने के बाद मैं और आभा पास के गाँव तक गए. वहां के बाज़ार में मिट्टी का तवा खोजा. उसे लेकर आये. रात को बाजरा की रोटियों की महक से फ्लैट भर गया. बच्चों के कोलाहल के बीच घी की ख़ुशबू बालकनियों तक जा पहुंची. माँ जो थकी-थकी चुप-चुप सी उदास रहती वह रसोई में उर्जा से भरी काम करती रही. उस रात माँ गहरी नींद सोई.

अगली शाम सब खुसर-पुसर करते हैं

अच्छा ! माँ चाहती क्या हैं? घर सब उनके हैं. माँ के लिए काम करने वाले लोग हैं. वे जो चाहें सो करें. उनको कौन रोकता है. वे ख़ुश क्यों नहीं रहती? मैं कहता हूँ- "पता नहीं" रसोई के बाएं कपबोर्ड से एक चौड़ा ग्लास लेता हूँ. आइस्क्यूब का बंद डिब्बा उठाता हूँ और बालकनी में आकर बैठ जाता हूँ.

इधर माँ हवाई यात्रा करके आई. "अरे मनुड़े बैठा दी. सा निकल जे आल तेरी माँ रो" माने छोटे भाई मनोज का नाम लेते हुए कहती है कि उसने मुझे बिठा दिया. मर ही जाती उसकी माँ" मैंने पूछा "उलटी दूजी?" वे कहती हैं. "ना रे एक हिचके में उपर आधे पूंण घंटे में दूजे हिचके में नीचे" मैं कहता हूँ तो हवाई जहाज ले लें तो कितना अच्छा रहे. माँ से इस तरह बातें करते रहो तो वे छोटे बच्चे की तरह ख़ुश रहती हैं।

माँ कार में हमेशा आगे वाली सीट पर बैठती है. कहती है इससे उलटी नहीं होती. किसी ने कहा सीट पर अख़बार बिछा लो तो वे अब अख़बार भी नहीं भूलती. पोते पोतियाँ मजाक बनाते हैं. माँ अखबार की कार बना दे? बहुएं इशारों और संकेतों में परिहास करती हैं "माँ को देखो." किसी भी यात्रा से पहले माँ कार में बैठ रही होती है तब ये सब चल रहा होता है. मैं कहता हूँ. "थोरीं माँ गी परी तो रोवो घणा. हमें खिल्खिलिया करो हो"

माँ मेरी ओर देखकर गर्दन हाँ में हिलाती है. जैसे मेरी बात की पुष्टि कर रही हो.

माँ की डिबड़ी माँ के आले में उसी जगह रहने दो। तुम जाओ और अपनी चीज़ें अपनी जगहें ख़ुद बनाओ। समझे। आये बड़े फोबिया वाले।

तस्वीर माँ और मनोज की है. १२ अगस्त २०१८ की सुबह घर में

August 15, 2018

कुछ देर के लिए

हवा चलने से रेत पर नई अनछुई सलवटें बन रही थी. मन जागती आँख के स्वप्न का पीछा करते थककर ठहर गया तो अचानक ख़याल आया कि सोच समझ कर दिन खर्च करना. कुछ रातें भी बचाए रखना. होंठ हँसते हैं. किसके लिए. क्या करोगे बचाकर? खाली कासे से हवा की आवाज़ आती है "क्या कोई कुछ बचा सकता है?" 

चारपाई पर बैठे हुए बालू रेत पर अंगूठे से जाने क्या लिखता हूँ. साँझ डूबने को आई कि पश्चिम से आती हवा रुक हई. उत्तर का आकाश गहरा हो चला. फिर भी यकीन नहीं होता. इसलिए कि रेगिस्तान के लिए बारिश एक अप्रत्याशित गीत है. जैसे कभी-कभी ये सोचना कि जीवन बहुत हल्का हो गया है. हम हवा में फाहों की तरह उड़ रहे हैं या हम किसी कंधे पर एक टूटे पंख की तरह उतर गए हैं. कुछ देर के लिए...

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.