December 31, 2021

एक और बरस का अवसान

एक रस्म सी बन गई है

तुझे भूल जाने को, तुझे ही याद करना। 


क्या कुछ नहीं बीतता। सब कुछ। माने कोई शै नहीं जो साथ बनी रहे। उदास, हताश, अवसाद से भरे मगर फिर भी किसी आस में कभी मुस्कुराते हुए कभी बेख़याली में कहीं चल पड़ते हैं। जब चल नहीं सकते तो चले जाने का स्वप्न देखते हैं। 


मैं हर बरस की आख़िरी शाम एक पोस्ट लिखता हूँ कि बरस कैसा था? 

इस बार याद ही नहीं कि शहर, देश और दुनिया में क्या घटा। कौन किस तरह, किस राह चला गया। क्या था जिसकी आस थी और इंतज़ार में उसी ढब बैठे रह गए। 

अपनों की पार्थिव देह से पटी हुई धरती को देखना सबसे भयावह था। पूर्व की पीढ़ियों की ज़ुबान से यदाकदा सुने गए महामारी के किस्सों में जो दहशत थी। उसी को अपनी आंखों से देखना, यही इस बरस का नग्न सत्य था। जिस पर डाले जा रहे पर्दे मौन आहों से चाक होते गए। आंसुओं का सैलाब पार्थिव देहों पर पड़ी ज़रा सी रेत को बहाकर ले गया। 

ये अविश्वसनीय, दुःखद और असहनीय था। 

समाज को बांटने वाली ज़ुबादराज़ राजनीति ने पिछले दशक में दुनिया के हर देश के नागरिकों को बांटा। इसी मंत्र से सत्ताएं हथियाई गईं। राजनीतिक हमले किए गए और मनुष्यता की गर्दन पर पांव रखकर नाच किया गया। किंतु वैश्विक महाशक्ति के नागरिकों ने मामूली अंतर से फिर समानता और साझेपन को चुन लिया। 

तालिबान लौट आए। उनका आना हैरत की बात नहीं है। तालिबान वैश्विक शक्तियों की एक कठपुतली ही है। धागे से बंधे हथियारों वाले हाथ किसी के इशारों से ही चलते हैं। 

धर्म आधारित तमाम संस्थाओं में स्त्री दोयम दर्जे की है। तमाम पाबंदियां उसी पर आयत होती हैं। आदमियों के संसार में वही एक ख़तरा होती है। इसलिए शिक्षा, रोज़गार और आत्मनिर्भरता छीन ली जाती है। तालिबान की वापसी इसी दुःस्वप्न का सच होना है कि आधुनिक दुनिया असल में अभी भी आदिम दुनिया से बदतर दुनिया ही है। 

मुझे इस बरस के बारे में याद कम ही है। मैं थोड़ा सा लिखता हूँ और बहुत सारा सोचता हूँ मगर कुछ याद नहीं आता। यहां तक कि अपने बारे में भी याद नहीं कर पाता कि ये बरस कहाँ गंवा दिया। इस बरस की याद में सुबह शाम स्कूटर लिए अपने क़स्बे में भागता हुआ याद आता हूँ। क़स्बे से बाहर की याद में जयपुर शहर का रास्ता याद आता है। 

हम दोनों ड्राइव कर रहे हैं और समय बीतता जा रहा है। 

मैं कितना बदल गया हूँ। मैंने क्या सीखा। मैं क्या हो सकता था। ऐसे सवाल खुद से पूछता हूँ तो कभी मुस्कुराता हूं, कभी चुप हो जाता हूँ। 

अब मैं निजी जीवन, परिवार के हाल, दोस्तो और अपने काम के बारे में नहीं लिखता। मैं ऐसा क्यों करने लगा हूँ इसकी कोई ठीक वजह नहीं मालूम होती। 

मेरी चाहना, निजी सम्बन्ध, खराब कही जाने वाली आदतें माने जैसा और जो कुछ मैं हूँ, उसके बारे में लिखने से कोई परहेज नहीं है। असल में मैंने बरसों एक खुली डायरी लिखी। प्रेम कविताएं लिखी। उदास कहानियां लिखी। यात्रा वृतांत लिखे। इस सब को लिखकर खुशी ही हुई। 

मैं अगले बरस क्या करूँगा? इस बारे में कुछ सोचना फिजूल है। इसलिए कि मैं खुद को नहीं जानता कि मैं कैसा आदमी हूँ, जिसे क्या करना चाहिए। और न ये जानना चाहता हूँ। 

मैंने डूबकर प्रेम किया। तुम भी यही करना। प्रेम में कुछ भी बरबाद नहीं होता है। अगर समझ सको कि प्रेम कोई लकीर नहीं है, जो खिंचती चली जाए। ये एक लम्हे की बात भर है। अनेक लम्हे जुटाना। प्रेम के दुख ही सच्चे हासिल हैं। 

इस बरस जो मिले। उन सबको लव यू। जो मुझे मिले, उनको मुझ से बेहतर इंसान नए बरस में मिलें। दुआ।

December 26, 2021

बहाने से

 सब चकचकाचक है मगर 


अक्षय कुमार सज्जाद अली खान बने। हिन्दू लड़की से प्रेम किया और जान गवां दी। ये लक्षण सही नहीं है। कुछ तो गड़बड़ है। 


मुझे फ़िल्म देखने और समझने का शऊर नहीं है। शायद इसलिए फ़िल्म देखने का मन भी नहीं होता। हालांकि मैं बहुत बार फ़िल्म देखना आरम्भ करता हूँ मगर हद से हद पंद्रह मिनट देख पाता हूँ। 

मेरे भीतर अकूत ऊब है। वह मुझे एक जगह टिकने नहीं देती। कभी-कभी तीन-चार घण्टे कविता और कहानी पढ़ लेता हूँ। कि वहां तुरंत स्किप करके सर्फ किया जा सकता है। बस फ़िल्म ही है जो सब कलाओं को समेटे होती है उसे तुरंत स्किप नहीं किया जा सकता इसलिए बर्दाश्त के बाहर होने पर ही छोड़नी पड़ती है। 

आज सुबह आकाश बादलों से ढक गया। मुझे लगा कि छुट्टी के दिन यही मौसम होना चाहिए। बिस्तर में घुस जाएं। कुछ पढ़ते देखते रहें। 

हॉटस्टार पर नई फ़िल्म दिख गई। अतरंगी रे। न देख पाने की आशंका के साथ देखना आरम्भ किया। मैं मुस्कुराया। 

अतरंगी रे आप देखिए। पूरी फ़िल्म में अनेक फ़िल्मों के अंश याद आते रहेंगे। कटपेस्ट की बेहिसाब कारीगरी साथ चलती रहेगी। एक कमी खलेगी कि फ़िल्म में कोई वल्गर सीन या डायलॉग नहीं है। इस कमी के लिए आप शुक्रिया कह सकेंगे। 

फ़िल्म की नायिका मनोरोग से पीड़ित है। 

मैं इस फ़िल्म के साथ नहीं जुड़ पाता और अतीत में धंस जाता हूँ। नायिका की अम्मा को नायिका लेकर प्रकाश मेहरा ने अस्सी के दशक में मनोरोगी किरदारों से भरी एक फ़िल्म बनाई "चमेली की शादी" मैं जाने क्यों उसी फ़िल्म को याद करता रहा।

उस फ़िल्म के निर्देशक हैं बासु भट्टाचार्य। फ़िल्म एक रोमेंटिक कॉमेडी है लेकिन कुछ निर्देशक सामाजिक और मानसिक व्याधियों को उकेरने से ख़ुद को रोक नहीं पाते। 

फ़िल्म का आरंभ उस्ताद मस्तराम के अखाड़े के दृश्य से होता है। उस्ताद जी ब्रह्मचर्य के मनोरोग से पीड़ित हैं। वे अपने प्रथम व्याख्यान में कहते हैं। औरत गन्ने का रस निकालने वाली मशीन है। नरक का द्वार। वह आदमी को खोखला कर देती है। 

नायक चरणदास अपने बड़े भाई के साथ रहता है। वे हर समय दुनियादारी में खोए रहते हैं। उनके हिसाब से दुनिया में एक ही काम है। कमा कर लाओ। 

चमेली के पिता कल्लुराम कोयले बेचने वाले बनिए हैं। लेकिन असल में उनकी आत्मा बिरादरी के भीतर बसती है। जातिप्रथा और बिरादरी के भयावह रोग को उनके चरित्र में समझा जा सकता है। 

चमेली की एक सखी है जिसे फ़ीमेल उस्ताद मस्तराम कहा जा सकता है। वह अपने प्रेम के अनेक अनुभवों के पंख अपनी टोपी में लगाए रखती है। उसके कमरे में सिने स्टार्स के पोस्टर लगे हैं। वे पोस्टर लड़की के ख़्वाबों का अधूरा संसार है। जो कभी मुकम्मल न होगा। 

एक पात्र है, अफ़ीमची चाचा। ख़ुद नशे में ग़ाफ़िल रहता है लेकिन समाज बिरादरी के नाम की ठेकेदारी करता है। 

चमेली की माँ का मानना है कि लड़की अपनी पंसद का खसम ढूंढ रही है, तो ये अपराध है। 

एक वकील साहब हैं। वकालत का पेशा, पैरवी का पेशा है मगर वे झूठ गढ़ते हैं। 

कहानी में इन किरदारों को सामाजिक रूढ़ि और कुरीति के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है मगर वास्तव में ये सारे पात्र मनोरोग से ग्रसित हैं। 

नायक को पहली बार अहसास होता है कि वह रिबेल सलीम है और नायिका क़ैद कर ली गई अनारकली। नायक दोस्तों के साथ नायिका के पिता के ठिकाने वाली गली में प्रवेश करता है। 

सामने दीवार पर लिखा होता है "भगंदर का इलाज" 

ये एक कष्टदायक बीमारी है। किंतु समाज में इसे जिस रूप में देखा जाता है, वह अधिक कष्टप्रद है। शारीरिक व्याधियों के प्रति असंवेदनशील समाज से क्या अपेक्षा की जा सकती है। 

फ़िल्म का एक स्टिल जिसमें दीवार पर लिखा प्रचार एक सिम्बल है। वह प्रतीक कहता है कि कष्टप्रद बीमारी का इलाज संभव है मगर जातिवाद जैसी बीमारी का कोई इलाज नहीं है।

फ़िल्म कोई कहानी नहीं होती। वह अपने हर फ्रेम में एक सन्देश होती है। 

चमेली की शादी फ़िल्म बासु भट्टाचार्य की रूमानी पारिवारिक संवेदनशील फ़िल्मों की परम्परा की ही फ़िल्म है। मैं इसी तरह के ड्रामा देखते हुए थोड़ा सहज रहा। माने मन से देख सका। लेकिन मेरी प्रिय फ़िल्में गरम हवा जैसी रही। वे अब कहीं नहीं बनती।

अतरंगी रे, मैंने पूरी देखी। नायिका को देखकर अच्छा लगा। सहज अभिनय था। 

भारतीय सिनेमा में एक्टिंग करने का भूत ज़बरदस्त है। इस से कोई नायक नायिका बच न पाया। एक धर्मेद्र हैं, जिन्होंने अपने आपको महान कलाकार साबित करने जैसी एक्टिंग नहीं दिखाई। भले ही ख़राब फ़िल्में कर ली। 

फ़िल्म, कथा, कविता या किसी भी कला का आलोचक कभी नहीं बनना चाहिए। उसके रस और अनुभूति का आनंद लेना चाहिए। यही आनंद दुर्लभ है। इसलिए अक्सर स्मृतियां घनघोर होकर छा जाती है। 

अतरंगी रे एक ऐसा ड्रामा है। जो इस पीढ़ी के बरबाद, गुंजलक और दृष्टिहीन समय से आसानी से डेढ़ घंटा चुरा सकता है। मेरे जैसा व्यक्ति उन फ़िल्म दीवानों को कोस सकता है। जो विश्व सिनेमा की क्लासिक फ़िल्मों का गुणगान करता है और मैं किसी फ़िल्म के साथ टिक कर बैठ नहीं सकता। 

सबके अपने मनोरोग है। सबके पास दवा नहीं है।

October 11, 2021

छीजने की आहट

मन एक तमाशा है 

जो अपने प्रिय जादूगर का इंतज़ार करता है।

शाम से बालकनी में बैठे हुए सुनाई पड़ता है। तुम कितने कोमल हो सकते हो? खुद से पूछने पर कोई हैरत नहीं होती। न मुड़कर देखना होता है कि किसने पूछा। 

मगर सवाल छुअन होता है। कभी स्मृति में ले जाता है। 

मन के सम्बंध के छीजने की आहट को सुनकर बस अपनी नज़र भर उठाकर वीराने को देखते हो। तुम चुप बैठे रहते हो। क्या कुछ टूट जाएगा, ये नहीं सोचते। बस एक ही बात रह रहकर जंगली घास की तरह आस-पास हिलती हुई महसूस होती है। ये सब क्या हुआ? 

तुम जानते हो कि हवा उस ओर बह रही है जबकि तुमको दूर से हिलता हुआ हाथ ऐसे दिखाई देता है, जैसे वह इधर आ रहा है। 

तुम हल्की स्याह शाम में मुस्कुराते हो मगर छीजत उस मुस्कान पर उतर आती है। तुम मुंह फेरकर दूजी ओर देखते हो। जबकि तुमको देखने वाला कोई नहीं होता। वह जो दूर से हिलता हुआ हाथ है, असल में वह जा चुका और स्मृति उसके होने का भ्रम है। 

डायरी का पहला पन्ना छूने से पहले सोचने लगते हो कि वह जो जीया, उस से अधिक खराब कैसे जीया जा सकता था। 

अचानक ठहरी हुई शाम तुम्हारी हंसी से भर जाती है। तुम अपने आपको माफ कर देते हो। छीजत फिर से आने लगती है मगर दिल कड़ा करके खुद से कहते हो। सबको भुला दो। 

शुक्रिया।

July 4, 2021

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था। 

लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने का शोर बढ़ता जा रहा था। शराब के नशे से भरे दिमाग पर दस्तकें बढ़ती ही गई तब वह जागा।

रात का एक बजा था। दरवाज़े के भीतर आती हुई औरत का चेहरा खुला था। काँधे पर शाल तिरछी पड़ी थी जैकेट भीगा-भीगा सा था। औरत की आंखों में एक बेचैनी थी। 

उसने सिगरेट के लिए दाएं बाएं देखा तब तक औरत लिहाफ के भीतर घुसकर सो गई थी। 

इंतज़ार कभी-कभी हिंसक बना देता है। शराब न पीने वाली औरत के होंठों पर उसने शराब की गंध से भरा मुंह रख दिया। औरत को प्रेम था या न था मगर इतनी बेसब्र चाहना थी कि हिंसा मद्धम आंच की तरह उगने लगी। 

वह उसके बदन की ज्यामिति से भली भांति परिचित था। लेकिन हिंसा उसके बदन से पहला परिचय कर रही थी। वह उसे अपने आगे लेकर एक हूकते सियार में ढल गया था। 

चौपाई हिंसा से लिहाफ गिर गया। रात की सर्द अकड़ गुम हो गई। वह कुछ देर उसकी छातियों में सर रखकर पड़ा रहा। जब तब उसकी पीठ को टटोलता। औरत की टांगों पर बहुत सारे बचपन के घावों और चोटों के बचे निशान उसे लिहाफ के भीतर अंधेरे में दिखने लगते। वह उन पर अपनी अंगुलियां घुमाता। 

बस इतना ही प्रेम था। हिंसा केवल एक थकान भर उपजा सकी। 

वह जब जगा तब तक सराय से लोग जा चुके थे। हिंसा एक स्मृति थी। वह शराब नहीं पीती थी, ये अजीब बात न थी। अजीब था कि वह बहुत हिंसक थी। 

उसकी हिंसा घड़ी से झरती टिक टिक की आवाज़ की तरह झरती थी।

June 25, 2021

सब कुछ किसी स्याही में

चाहनाएं तुम्हारा पीछा करती है दिल दीवार की तरह चुप खड़ा रहता है।

रेगिस्तान में दिन की तपिश भरी आंधियां रात को मदहोश करने वाली हवा में ढल जाती हैं। एक नशा तारी होने लगता है। बीत चुकी बातों और मुख़्तसर मुलाक़ात की याद किसी भीगी छांव की तरह छा जाती है।
कभी किसी शाम धूल उतरती नहीं। आकाश के तारे दिखाई नहीं देते। सब कुछ किसी स्याही में छुप जाता है। उस वक़्त बन्द आंखों में कोई बेहद पुराना स्वप्न टिमटिमाने लगता है।
जाने कब नींद आ जाती है कि स्ट्राबेरी जैसा चाँद देखना रह जाता है। जबकि वह ठीक बाईं और चमक रहा होता है।
इस चाँद को देखने वाली चाहनाएँ उस जगह जा चुकी है। जहां तुम हो।
मगर फिर भी...

June 13, 2021

तीज का चांद

शाम ढल रही थी। डूबते सूरज के ऊपर चाँद खिला था। रेगिस्तान के घर की छत पर आहिस्ता रोशनी का पर्दा गिर रहा था।

दफ़अतन अंगुलियां स्क्रीन को छूती और फिर मन उन तस्वीरों को देखने से मुकर जाता कि उसने कहा था "ये मैं नहीं हूँ।"
एक बार नज़र आसमान की ओर गई तो दिल धक से रह गया। ये चाँद कौनसा है। बचपन में किसी ने कहा था चौथ का चांद मत देखना। अपने ही भीतर गुम रहना।
अकसर तारीखें भी याद नहीं रहती तो तिथियों का हिसाब नामुमकिन था। कोई चाहना रहे तो मन हर कुछ खोज आता है। वह भी जो वह नहीं है।
ये चौथ का चांद न था। आसमान में तीज का चांद चमक रहा था। क्या ये अच्छा है?
पता नहीं। एक सिगरेट टिमटिमाती रही जिस में उसकी सांसें नहीं घुली थी।

June 3, 2021

जो होना है

सौ दर्द उठाए, तड़पे रोए, बेचैन फिरे कि जी न सकें। सुबह खिले और पल में कुम्हलाए। बाल बनाए चेहरा धोया। बाइक उठाई दफ्तर को गए। शाम ढले उल्फ़त की दुकान पर खड़े-खड़े जब थक से गए। तब घर लौटे। कभी पीने बैठे तो पीते ही रहे। कभी देखा ही नहीं सूंघा ही नहीं। कभी मिले तो कसकर यू गले लगे जैसे ये आख़िरी लम्हा हो। कभी याद किया तो मुस्काए। कभी सोच लिया तो उठ बैठे कि क्या सबकुछ ऐसे ही चलना है। कभी किसी नई सूरत पे आंखें कुछ देर रही। फिर हंसते हुए सोचा जाने दो।

कैसे भी रहो और कुछ भी करो
वो जो होना है सो होता है।

June 1, 2021

कितना।

मैं एक उड़ती निगाह से उसके चेहरे को कितना पढ़ सकता था?
चेहरे को देखा तो लगा कि शांति पसरी हुई है। उसके होंठ अधखिले बन्द हैं। आंखें मौन से आच्छादित। कुछ लटें जो बढ़कर गालों को चूम लेना चाहती थी, सिखलाए बच्चे की तरह बैठी थी।
पानी मोड़ पर जिस तरह हल्का बल खाते हुए उचकता है मैंने उसी तरह मुड़कर देखा था। सोचा कुछ कह दूं। फिर मैंने मौन की गहराई में तलछट तक झांकना चाहा मगर देख न पाया। स्वयं से कहा- "चुप रहो।"
शायद झिझक थी। पहचान में बची हुई अजनबियत की झिझक। बहुत बरसों से थोड़ा सा जानने की और उस क्षण तक कुछ न कहे जाने की झिझक।
सोच की वनलता पर झूलते हुए मैं बालकनी से बाहर झांकने लगा।
पत्तों के बीच अकेली चिड़िया ने जाने किसके लिए गाया। आस-पास कोई न था। मुझे लगा कि गाना सुख को सींचना होता होगा। या किसी ने कहा होगा कि हम मिलेंगे तुम गाते रहना।
दाएं बाएं दो तीन बार पल भर की निगाह डालकर चिड़िया उड़ गई। क्या सब ऐसे ही बिना किसी इच्छा से बंधे उड़ सकते हैं। कि अभी यहीं थे और अब नहीं हैं।
दोपहर उतर आई है। दूर तक धूप है। आकाश में रेत है। हवा में सरगोशी है। छतें सूनी है। सड़कें खाली हैं। बस एक मेरा मन है, जो भरा-भरा सा है। मैं अतीत की अनगिनत चीज़ों को टटोल रहा हूँ। ऐसा नहीं है कि ये बेसबब है।
सबको कुछ चाहिए होता है। ये नहीं मालूम कि कितना।

April 3, 2021

"शुक्रिया" मैं मुस्कुराया

अगर हम समझ सकें तो हर शै हमसे कुछ कहती है। इस दुनिया के स्थूल कारोबार से बहुत दूर अपने सघन एकांत में कभी हम दीवारों, पत्थरों, रास्तों, पंछियों से अपने मन की कोई बात कह बैठते हैं।

हमें किसी अबोले सजीव या निर्जीव से बात करते हुए कोई देख ले तो वह कह उठेगा "ये दीवानापन है। पागल हो चुका है।"
मैंने लोगों को बातें करते देखा है। मुझे अजीब लगता था। मैंने ऐसे लोगों के बारे में सुना कि वे बड़बड़ाते रहते हैं। मैंने ये मान भी लिया था कि ये केवल नीम बेहोशी में फूट रहे अस्पष्ट शब्द भर है। किंतु किसी रोज़ मैंने थककर दीवार का सहारा लिया। एक बीस साल का लड़का इतना थक चुका था कि पहली बार उसे लगा दीवार ने थाम लिया है। वह साथ खड़ी है।
दीवार के पास बहुत देर खड़े रहने के बाद अचानक लगा कि उसे धन्यवाद कहा जाए। मैंने बोलकर कहा- "शुक्रिया" इसके बाद मैं मुस्कुराया। किसलिए मुस्कुराया? शायद इस बात के लिए दीवार ने थैंक यू सुना है। उसे अच्छा लगा है।
आज सुबह फ़रीबा की कविताएं पढ़ रहा था। उन कविताओं से पहले पांच सात कवियों को पढ़ चुका था। एक साल नब्बे में जन्मी लड़की की कविताएं थी। मैं उनसे कनेक्ट होने की कोशिश करता रहा मगर मूल भाषा से आंग्ल भाषा में किए गए अनुवाद ने एक दीवार खड़ी कर दी थी। फिर भी वे कविताएं आश्चर्यजनक थी। इतनी कम उम्र की लड़की ने भौतिक बिम्बों के माध्यम से हमारे मन और सम्बन्धों को, हताशा और उम्मीद को बहुत सुंदरता से उकेरा था। लेकिन मैंने पाया कि इन कविताओं के बारे में दोस्तों को बताने लायक अभी समझा नहीं हूँ।
फ़रीबा की कविताएं अलग-अलग पन्नों पर पढ़ीं। उनमें से एक कविता शेयर की। कविता की आख़िरी पंक्ति में चमत्कार का भाव है। कविता इस तरह आरम्भ होती है जैसे कोई स्त्री बात कर रही है। अपनी पूर्णता में बात करने वाली एक कब्र मिलती है। सूफ़ी, परालौकिक या फिर जगत से नष्टोमोह की अथवा अपने क्षणभंगुर अस्तित्व की बातें करने वाली चन्द पंक्तियां हमें भेदती हुई भीतर प्रवेश कर जाती हैं।
कभी हम समाधियों और कब्रों के पास बैठे होते हैं। हम वहां लिखे नाम पढ़ते हैं। हम आहिस्ता से उनके भीतर प्रवेश कर जाते हैं। उस काल खंड में जब वे लोग थे। तो क्या हम उनसे मिलने नहीं जा चुके होते हैं? हमारा शरीर वहीं होता है लेकिन हम अतीत में उस व्यक्ति से संवाद कर रहे होते हैं, जिसके होने का प्रमाण उस समय पत्थर और उनपर खुदे शब्दों से अधिक कुछ नहीं होता।
कविता का काम चमत्कार करना भर नहीं होता लेकिन चमत्कार कविता को एक आह देते हैं। कथ्य, बिम्ब और कहन में जब रोचकता और श्रव्य सुख समाहित होता है तब कविता पाठक और श्रोता को बांध कर बैठ जाती है।
मुझे महसूस होता है कि मैं बंध रहा हूँ, तब उस कवि का नाम फिर से पढ़ता हूँ और उसे शुक्रिया कह देता हूँ।

March 14, 2021

अजनबी बने रहने का दांव

एक अरसे तक घुटनों के बल बैठा हुआ व्यक्ति ये जानता है कि उठा कैसे जाता है। उसकी स्मृति और अनुभव में अपना खड़ा होना याद होता है किंतु बैठे रहने की लंबी बाध्यता के बाद खड़े होने की स्मृति ठीक बची रहती है, अनुभव जा चुका होता है। अनुभव को जंग लग सकता है। उसका क्षय हो सकता है।

ऐसे ही मैं रेल गाड़ी में अपनी शायिका पर पहुंचने से पहले कई बार दौड़ चुका था। मैं मन ही मन भाग कर रेल पकड़ रहा था। मैं चाह रहा था कि उस नियत जगह तक पहुंच जाऊं। इसके बाद मुझे अपने गंतव्य तक पहुंचने के दौरान कहीं न जाना पड़े।
चार नम्बर प्लेटफॉर्म वैसा ही है जैसे दूजे होते हैं। लेकिन इस पर आते ही एक घबराहट होती है। मैं मुड़कर पीछे नहीं देखना चाहता हूँ। यही वह जगह थी। जहां से वह मुड़ी मगर उसने अलविदा न कहा था। क्या ये एक स्वप्न है। क्या ये न मिटने वाली याद है। क्या ये ज़रूरी है कि मेरी सब रेलगाड़ियां चार नम्बर से ही छूटे।
पौने छह बजने को थे। रेल आ गई। यात्री जल्दबाज़ी में उतरना चाहते थे कि चढ़ने वालों की जल्दी उतरने वालों से बड़ी थी। मैं संकरे रास्ते में फंसे लोगों को देखता रहा। दोनों तरफ की जल्दबाजी एक दूजे में फंस चुकी थी।
मिडल बर्थ पर कोई सो रहा था। वह शायद अलवर से आ रहा था। ये बहुत अच्छा था कि मैं चुपचाप निचली शायिका पर लेट सकता था। मैंने ऐसा ही किया। चमड़े के थैले से एक उपन्यास निकाला। चद्दर को तकिए की तरह खिड़की के नीचे रखा। अपने लंबे गमछे से खुद को आधा ढक लिया।
दो सौ तीस पन्ने। मैंने अनुमान लगाया कि जोधपुर आने से पहले मैं इसे पढ़ लूंगा। मेरा मोबाइल ऑफ था। चिंता आस पास के यात्रियों की थी। अक्सर मुझे बड़बोले, तेज़ गाने बजाने और मोबाइल पर ऊंची आवाज में कोई वीडियो देखने वाले सहयात्री मिले। मैं उनसे कभी कुछ नहीं कहता। सहयात्री चाहे जैसा उत्पात मचा ले, मैं सिर्फ बर्दाश्त करता हूँ। कभी जब बर्दाश्त के बाहर होने लगता है तो एक बार उनको देखकर करवट बदल लेता हूँ।
तीस पैंतीस की उम्र के तीन यात्री थे। विनम्र थे। एक लड़की और दो लड़के। एक साथ यात्रा कर रहे थे। उनकी बातों से मुझे मालूम हुआ कि वे जोधपुर उतरेंगे। कोच में आते ही मैंने उपन्यास खोल लिया था। इस कारण भी सम्भव है वे धीमे और ज़रूरी बातें कर रहे थे।
उपन्यास का कथानक था। अतीत को पुनः जीते हुए, अतीत से बदला लेना। रेल तेज़ चल रही थी। कहानी भी तेज़। रेलगाड़ी हर स्टेशन पर समयपूर्व आती और कुछ अधिक देर खड़ी रहती। मैं तेज़ी से पढ़ता और रेल की तरह ठहर जाता।
जब भी रेल रुकती एक अधेड़ स्टेशन पर उतरते और बीड़ी सुलगा लेते। बन्द मुट्ठी में रखे सिक्के की तह बीड़ी को पकड़े हुए फूंकते। उनकी मुट्ठी के बीच लाल रोशनी होती और मैं अंधेरी छत पर लाइटहाउस की तरह चमकती लाल रोशनी याद करने लगता। बीड़ी पीते हुए आदमी को देखना संक्रामक था। उस आदमी की नज़र हर बार मुझ पर होती। मैं एक दो बार देखकर फिर किताब में खो जाता।
ये डेगाना जंक्शन था। जहां मैंने सुना "हरामज़ादे मरना है तो मर जा" वही लड़की जो मेरे सामने बैठी हुई थी, अब ऊपर की शायिका पर थी और अपना सब्र खो चुकी थी। उसके सहयात्री ने कहा "सुबह उसका माफी भरा फ़ोन आ आ जायेगा। परेशान मत होवो।" फ़ोन पर उसका पति था जो फुलेरा स्टेशन पर गाड़ी के आने के समय से लगातार बात कर रहा था। लड़की हमारे कूपे से बाहर रेल कोच के दरवाजे पर खड़ी होकर उससे बहस करती आ रही थी। वह जाने कब आकर लेट गई थी। मुझे किताब के कारण ध्यान न रहा।
मेड़ता रोड स्टेशन के निकल जाने के कुछ देर बाद उपन्यास का एक पात्र मर गया। इसके बाद उपन्यास किसी नई कहानी की नीव रखने को बचा रह गया।
अचानक मुझे याद आया कि पोलोटेक्निक कॉलेज में रसायन के अध्यापक पद पर भर्ती की परीक्षा देकर आ रही और औरतों के पार्टनर ने मुझे पूछा था कि क्या आप बर्थ बदल लेंगे। मैं बदलना नहीं चाहता था। इसलिए कि रेल यात्रा मैं भूल चुका था। पिछले एक बरस से बाड़मेर से जयपुर तक की छह सात यात्राएं मैंने अपनी कार में ही की थी।
मैंने उनसे कहा था कि मैं बदल लूंगा लेकिन वे लोग वापस न आए। उनकी आवाज़ें पास के कूपे से आ रही थी। एक बुजुर्ग महिला साइड लोवर पर सो रही थी। मैंने पंखे बन्द कर दिए थे। एक बार सोचा कि उनको अपनी चादर ओढ़ा दूँ।
लेकिन जिस तरह मैं रेल यात्रा भूल चुका था उसी तरह किसी की मदद करने का समय जा चुका था। हम अब अस्पृश्य हो चुके हैं। किसी को छूना, बांटना या पास बैठना असामाजिक और व्यवस्था विरोधी हो चुका है।
मैंने सोचा कि मुझे चार नम्बर प्लेटफॉर्म के अतीत से नहीं घबराना चाहिए। अब हम साथ यात्रा कर रहे हों तो भी अनमने, चुप और उदासीन बैठे रहने के सिवा कुछ नहीं कर सकते।
मैंने सुना कि किसी ने कहा "माँ ये शाल ओढ़ा देता हूँ।" मुझे आराम आया। मैंने अपना लम्बा अंगोछा सर तक खींचा। कभी-कभी रोशनी के छल्ले मेरे अंगोछे पर गिरते। तब मैं सोचता कि किसी स्टेशन से रेल गुज़र रही है।
अब मैं बहुत डरने लगा हूँ मगर समय ने मेरे पक्ष में पासा चल दिया है। अजनबी बने रहने का दांव काफी सुकून भरा है।
शुक्रिया।
* * *

February 26, 2021

किस के होने की याद आई

हवा का झौंका अपने साथ पत्ते उड़ाते गुज़रा। खिड़की बन्द थी बाहर कुछ देखा नहीं जा सकता था किन्तु सूखे पत्तों की खड़बड़ भीतर तक चली आई।

मन औचक एक सूनेपन से भर गया।
मन के भीतर कुछ सूख चुकी अनुभूतियाँ ठहरी थी। वे किसी उदास कर देने वाले झौंके की प्रतीक्षा में थी। जैसे कोई चटक जाने के लिए किसी बहाने के इंतज़ार में हो, ऐसे ही मन था।
बाहर गली से गुजरे सूखे पत्ते मन में भर गए। पहले मन खाली कासे में हवा के आने से बजने वाले एक राग से भरा था। अब मन में खड़बड़ाहट भर गई थी।
गर्मी केवल बाहर गली में नहीं पसरती। वह बंद कमरे के भीतर तक गूंजती है। ठंडी हवा के यंत्र चल रहे हो मगर महसूस होता है कि गर्मी पसर गई है। गलियां सुनसान हो चुकी है। सब कहीं चले गए हैं।
अकेलापन मारक हो गया है।
मैं एक लंबी सांस लेना चाहता हूँ। मैं सोचना चाहता हूँ कि किस चीज़ की कमी है। किस के होने की याद आई।
कुछ नहीं जान पाता। मेरे कान बाहर गली में लगे रहते हैं कि फिर से कोई हवा का झौंका आएगा और उड़ते, ज़मीन से टकराते सूखे पत्तों की आवाज़ आएगी।
आवाज़ आती है। सांस अटक जाती है।
जैसे मैं किसी भय की प्रतीक्षा में था। भय आया और मैं सहम गया। थोड़ी देर बाद ये सब अजीब लगने लगता है। मैं क्यों बाहर की आवाजों से बंध गया हूँ। फिर और अजीब लगता है कि वे जो बाहर की आवाज़ें हैं असल में कहीं मेरे भीतर से तो नहीं उठ रही।
मैं बहुत पीछे उन दिनों को सोचने लगता हूँ। गर्मी में सूनी सड़क पर दूर तक पैदल चलने के दिन। मुझे अफसोस होता है कि मैं मदभरी शामें, बीयर केन्स, धुंए और लंबे आलस्य को नहीं सोच पाता।
तुमको शायद पता है कि ये कैसा हाल है। शुक्रिया।

अलाव की रौशनी में

मुझे तुम्हारी हंसी पसन्द है  हंसी किसे पसन्द नहीं होती।  तुम में हर वो बात है  कि मैं पानी की तरह तुम पर गिरूं  और भाप की तरह उड़ जाऊं।  मगर ...