June 26, 2013

तो उसकी दुनिया कहाँ गई?


चाय का प्याला लेकर घर के सबसे ऊपरी कमरे में चला आया हूँ। आसमान पर कुछ एक बादलों के फाहे हैं। मौसम कुछ ऐसा कि जैसे कुछ बरस ही जाए तो बेहतर। मैं इन दिनों खोये हुये होने के दुख से बाहर से खोये हुये होने के सुख की ओर निष्क्रमण चाहता हूँ। जगह वही रहे मगर हाल बदल जाने की उम्मीद हो। जैसे तुम्हारा हाथ दुख में भी नहीं छूटा और सुख के पलों में ऐसी कामना कौन कर सकता है कि तुम्हारा हाथ छूट जाए। 

मेरे दफ्तर जाने का समय सुबह नौ बजकर पचास मिनट का था। उस वक़्त मैं बालकनी में लेटा हुआ चिड़िया की चोंच वाले तिनके को और कभी बिजली के तार पर सुस्ताती हुई गिलहरी को देख रहा था। उस वक़्त के बाद मुझे बारह बजे दफ्तर जाना चाहिए था। लेकिन मैंने पाया कि उमस ज्यादा है और पत्ता गोभी को बच्चे पसंद नहीं करते इसलिए आभा के साथ खड़ा होकर बेसन के गट्टे छौंक लेने के लिए प्याज और मिर्च काटता रहा। 

फिर मैं अगर दो बजे भी पहुँच सकता तो भी दफ्तर मुझे बख़ुशी स्वीकार लेता। लेकिन मैं तब भी वाशरूम में लगी खिड़की से बाहर दिखती हुई जाल पर बैठी एक चिड़िया को देख कर सोचता रहा कि काश कोई मुझे सज़ा देकर इस तरह सलाखों के पीछे रख देता तो मैं उस लोहे की तासीर को जान जाता। मगर इस तरह बिना काम के बेवजह किसी खयाल में पड़े रहना और कहीं जाने की आज़ादी भी न होना कितना बुरा है। 

कल रात मैंने खुद से कहा कि खरगोश की कवितायें क्या हुई? कहा गयी उसकी जादूगर लड़की? क्यों खरगोश ने छोड़ दिया बेहिसाब शराब पीना और लोगों को आवाज़ें देना? मगर सवालों के सिरे हैं, ज़िंदगी का झूला है और बेखयाली की हिलोरें हैं। मगर जाना क्योंकर कोई एक खोयी हुई तस्वीर से उड़ते चूरे के बीच देखता रहे कि वक़्त आ रहा है या जा रहा है। 

मैंने अपनी इस चाय का आखिरी घूंट भर लिया है। सोचता हूँ कि तुम हो या चले गए हो? क्या मैं न पूछूँ तो जवाब भी न दोगे?

* * *

एक चुप्पे शख़्स की डायरी, कात रे मन कात और मायामृग की कवितायें। तीन किताबें है और कल की एक रात थी। वो जो बड़ा चाँद था एक रात पहले वह छोटा हो चुका था। चाँद भी फिर अधूरा रह गया। जैसे कि एक चुप्पे शख़्स की डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा है- हर डायरी की नियति है... अधूरा रह जाना। इसलिए अधूरेपन को माफ कर दिया। 

तुम्हारा अतीत बह गया और मेरा भविष्य। कितना उदास हाल है कि अब तुम मेरे सिवा कुछ न याद कर पाओगे मैं भूल जाऊंगा सब कुछ तुम्हारे सिवा। कात रे मन कात... मगर इस तरह अहसासों की डोर को उदासी की तकली पर और इस कदर कि मेरी उदासियाँ चाहिए तो उम्र लगेगी। 

जिस दुनिया में पैदा हुआ 
वह उसके पिता की थी 
जिसमें बड़ा हुआ 
वह बड़े भाइयों की थी। 
अब जीता है जिसमें वह बेटों की है। 

तो उसकी दुनिया कहाँ गई? 

मायामृग की कविता का टुकड़ा है। एक ऐसी खोयी हुई और अलभ्य दुनिया की तलाश है जिसके धरातल पर खड़ा होकर को कोई कह सके कि ये मेरी दुनिया है।मैंने कल रात एक प्रार्थना को बार बार सुना था। इतनी शक्ति हमें देना दाता कि मन विश्वास कमजोर हो न.... इसलिए कि मेरी दुनिया भी गायब है। मैं उसके बिना कमजोर हो रहा हूँ। मेरे लिए वह अलभ्य है और उसे पुकारने की हिम्मत जवाब दे रही है। 

प्रेम विघटन का नाम है। बिखरते जाने की क्रिया है। प्रेम आच्छादित है बिना तुम्हारे। सर पर तना हुआ है किसी न छूए जा सकने वाले भीगे शामियाने की तरह। जैसे आसमान एक तत्व है जिसे छुआ नहीं जा सकता है, मगर है.... 

शुक्रिया दोस्त इन किताबों के लिए।
* * *

June 24, 2013

तस्वीर अधूरी है मगर मिटी तो नहीं है


मेरे पास तुम्हें देने के लिए बहुत सारे प्रेम के सिवा ये कुछ ऊटपटाँग शब्दों के बेसलीका सिलसिले भर हैं।

तूने रुख फेर कर
रख ली है कूची जेब में
तस्वीर अधूरी है मगर मिटी तो नहीं है।
* * *

कुछ नहीं
बस चार बूंदें गिर रही हैं आसमान से।

मैं तोड़ रहा हूँ इनको
अनेक बूंदों में, अपनी बुरी नज़र लगा कर।

तुम्हारे लिए
हज़ार बार बुरा बन जाऊँ तो भी क्या बुरा है?
* * *

एक दरीचा है
एक दीवार का साया है
जैसे कोई पहरा हो, जैसे कोई बंदिश है।

कोई झाँक नहीं है, कोई आवाज़ नहीं है।

बस एक नाम है
और सुना है कि ज़िंदगी है बरसों लंबी।

अगर सचमुच बरसों चल सके ये ज़िंदगी
तो तुम ज़रूर आना कि इंतज़ार बना रहेगा।
* * *

मैं एक कागज से
काटता हूँ बोतल का गला
और उसे बना लेता हूँ काँच का प्याला।

एक दीवार को करता हूँ बाहों में क़ैद
उसकी पीठ पर लिखता हूँ बेवफाई
और कहता हूँ उसे कि लिखा है, प्रेम।

परछाई के आंसुओं को मिलाता हूँ
गाढ़े होते खून में
जो रिस रहा है मेरे होने की खुशी में
और भर लेता हूँ प्याला गहरे लाल रंग से।

अपनी जेब से निकालता हूँ सिक्का
और उसे बारूद बना कर उड़ा देता हूँ ग्लास का पेंदा।

फिर
ज़मीन पर रगड़ कर पेंसिल की नोक
एक ब्लेक होल बना कर कूद जाता हूँ उसमें।
* * *

बारिश की चार बूंदें, हवा के चंद झौंके
ज़मीं पर पाँवों की दस्तक है तो सही मगर फ़ानी।

लंबी चौड़ी सड़कें, इमारतों की छतें
हवाई जहाजों की आवाज़ें,
आदम के दिमाग ने तामीर की थी,
ये फैल गयी है पूरी दुनिया में।

दिल ने जो एक तस्वीर बनाई थी
वह उड़ गयी उत्तरी ध्रुव से भी आगे।

सीने में दर्द है
और झूठ ये कहते हैं खुद से कि संभल जाएंगे।
मगर तुझको अभी ये इल्म नहीं है कि सचमुच ही मर जाएंगे।
* * *

बदन पे जो खरोंचों के निशान हैं
बचपन के खेलों में बेखयाली के हैं
बाकी सब बचते बचाते, समझदार होने के दिनों में लग गए।

माथे पे जो शिकन की जो लकीरें हैं
कुछ दुनिया के साथ जीने की आफत की है
बाकी कुछ न कहे जा सकने वाले फ़सानों की लहरों की वजह से हैं।

ये जो चेहरे पर एक उदासी है
कुछ तो मौसम के असर में है
बाकी कुछ जो सोचा-चाहा उसकी गैरहाजिरी का नक्शा है।

एक रूह रूह नाम तुम रटा करते थे
जिसे मैंने न देखा न जाना
बाकी के सारे दर्द उसी के नाम कर दिये हैं, तुम्हारी बदौलत।
* * *

सूखी दरारों में रेंगता हुआ वक़्त
और खिड़की के शीशे पर ठहरा हुआ धुआँ।

बस एक विस्की का प्याला है, ज़िंदगी में सीलन भरने के लिए।
* * *

उतरती हुई धूप में
एक साया झिलमिलाता है
तुमसे लंबी तस्वीर बनती है मुझसे आगे।

मुड़ कर देखने में अब लगता है डर
हर बार उदासी का सदमा खाकर बुझ जाता है दिल।

मैं इसी छाया तस्वीर में
चुनता हूँ तुम्हारा बायाँ हाथ और थाम लेता हूँ
कुछ दूर ऐसे ही सही मगर चल सकूँ साथ तुम्हारे।

इस तस्वीर में नहीं मिलते तुम्हारे कान
जिनमें कह सकूँ, आहिस्ता
जाना ! रहा करो मेरे पास, तुम्हारे बिना दुनिया उदास है।

एक चिड़िया
मगर खोज लेती है जाने क्या
कि मेरे सर के पास से गुज़रती हुई,
अकेली ही गाती है, कोई दोगाना।

जैसे मैं अकेला ही चल रहा होता हूँ दो लोगों की तरह।
* * *


June 17, 2013

बीते गुरुवार की शाम

दोपहर कायदे से हुई नहीं थी। मुझे भी जब तक धूप पूरी खिली हुई नहीं दिखती तब तक मेरी कार्बन क्लॉक दोपहर होना मानने से इंकार कर देती है। बारिश की हल्की बूंदे गिर रही थी। वह भी बालकनी में आ गई। मैंने कहा ज़रा मेरे पास दीवार का इधर से सहारा ले लो। वह कहती है देखो तेज़ रफ्तार कारें भागी जा रही है। मैं कहता हूँ- और क्या दिख रहा है। कहती है कुछ पौधे कुछ फूल और कुछ बच्चे। हँसती है क्या कहानी लिखोगे? मैं कहता हूँ- सुनोगी? बेटी भी आ जाती है। उसको कहानी की बेवफाई पर शायद कोई एतराज है। मैं कहता हूँ कि ये गए दिनों की बात है जब एक आदमी में छिपे होते थे दस बीस आदमी। आज कल एक आदमी में छिपी होती हैं हज़ार दुनियाएं। 

बेटी की आँखों में कहानी के कथ्य से नाउम्मीदी है। वह लड़की अगर बेखौफ इतना प्यार करती थी तो बिना कोई मुलाक़ात का वादा लिए चली क्यों गयी? और वह सात साल का फासला उसने क्यों आने दिया? मैं कहता हूँ- देखो तुम्हें क्या दिख रहा है? मुझे मौल्स, बादल और बेहिसाब भीड़। मैंने कहा चलो वहीं चलते हैं। सारे दिन खयाली पुलाव पकाना और झूठी कहानियाँ कहना कोई अच्छा काम नहीं है। 

जवाहर सर्कल, डब्लूटीपी, जीटी, जेपी फ्लायओवर, अक्षय पात्र होते हुये वापस उसी बालकनी में। एक याद का पनियल पर्दा है कभी सूखने लगता है तो कई सारी चीज़ें उसे भिगोने के लिए आ जाती हैं। यही ज़िंदगी है। तुम अपना वादा न भूलना....

कहानी सुनो-

दायें हाथ की तरफ बैठे ड्राइव करते हुये कहा- कितना तो अच्छा है न?

लो फ्लोर की बस को फॉलो करते हुये कार चलती रहती है। मुझे लेखक या कवि होने की ख़्वाहिश नहीं थी। मुझे खूब तनहाई की दरकार थी। वक़्त के सितम से चूर अतीत का आईना और रास्ते पर बेतहाशा भागती हुई ज़िंदगियाँ। तुम्हारी कमीज का ये गोटा किस रंग का है? सवाल ज़ुबान तक नहीं आया।

कुछ बात करो न?

ये फूल देखो। मेरे होठों पर प्यास थी ही नहीं। मोबाइल एक तस्वीर तामीर करता है। स्केट करते बच्चे गुज़र जाते हैं। पंछी खुले मुंह से ताकता है। बागीचे में घूमते हुये लोगों को कहता है- मर गयी सरगोशियाँ।

डिवाइडर को पार करने बाद एक खोयी हुई लड़की और बीच का सात साल का फासला कुछ कदमों में बाकी रह गया। बेसाख्ता दूर से ही अपना हाथ उठाया तो उसने अपने दोनों हाथ मुंह पर रख लिए। कुछ दिन यहाँ हो? उसने कहा- हाँ।

ताज़ा दर्द से भरे हुये दामन में कोई अक्स करवट लेता है इसलिए ये पूछना मुल्तवी कि जिस तरह आज अचानक हम मिले हैं क्या कभी कोई तय मुलाक़ात भी होगी?

व्हाट्स एप पर लिखा स्टेटस मिटाने लगता हूँ। आओ रूमानी हो जाएँ।

इतिहास कुछ नहीं होता, हम जिस रास्ते पर कदम लिख रहे होते हैं उन रस्तों की धूल जब तक जिस शक्ल में याद रहे वही है। तवारीख में लिखा था। तुम एक तीस साल के आदमी से प्यार करती हो। हाँ करती हूँ कोई मेरा क्या बिगाड़ लेगा।

कुछ नहीं बिगड़ा। सड़क दोनों तरफ जाती थी। वे भी अलग अलग दिशाओं में चले गए।
* * *

June 14, 2013

क्या याद दिलाएँगे मुझे मेरे सितमगर

मॉनसून के आने से पहले के बादलों ने ज़मीन पर कुछ फुहारें लिखी थी। गाँव और शहर के बीच का चौराहा भीगा हुआ था। सड़कों के किनारे पानी के आईने उतरे हुये थे। वे बेतरतीब ढंग से जमा पानी से बने थे। हवा बंद थी फिर भी मौसम में बरसे हुये पानी की नमी का ठंडा का अहसास, लोगों के चेहरे पर लिखा हुआ था। मैंने एक छोटी वैन में बैठे हुये तेज़ी से आबाद होते जा रहे शहर के नए मकानों पर कई बार सरसरी नज़र डाली। किन्तु हर तरफ भीग जाने के निशान ही देख सका। शायद मेरे सूखे मन को इन्हीं निशानों के आमद का इंतज़ार था। रेगिस्तान है तो यहाँ गरमी बेहिसाब आती है। वैन में बैठे हुये लोगों से ज्यादा लोग उसके पीछे या दरवाजों पर लटके हुये हैं। उनमें से कुछ विध्यार्थी थे, कुछ दिहाड़ी के मजदूर। शाम होने से पहले का वक़्त था। सूरज नहीं था मगर उसके होने के कई सारे अहसास थे। बादलों की ओट से रोशनी का झरना बह रहा था। इसे सबसे सुंदर मौसम कहा जा सकता था। सड़क के किनारे जमा पानी से गुज़रते हुये वाहन और खुद के कपड़ों को बचाकर चलते हुये राहगीर बरसात के दिनों की तस्वीर को मुकम्मल कर रहे थे।

महल गाँव और जयपुर शहर के बीच का ये चौराहा सात नंबर कहलाता है। ये एक छोटा सा बाज़ार है, जो कहता है। गाँव को शहर में बदले जाने और शहरों को भौतिकता की भूख का पिटारा बनाते जाने का वैश्विक कारोबार कभी बंद न होगा। आपको किसी भी नए बस रहे कस्बे में सात नंबर के चौराहे और वहीं कहीं राहुल सैनी मिल जाया करेंगे। उम्र बारह साल। कक्षा पाँचवीं। स्कूल सन फ्लॉवर इंगलिश मिडियम। एक ठेले पर रखे हुये मिट्टी के तेल से चलने वाले स्टोव के पास खड़े, ऑमलेट बनाते हुये। इस इलाके में निजी विश्वविध्यालयों की कतारें हैं। बहुत सारे बच्चे यहाँ पढ़ते हैं। वे ईयरफोन लगाए हुये, स्पाइक हेयर कट में शॉर्ट या कोई वेस्टर्न केजुयल पहने हुये घूमते मिल जाएंगे।

इन फैशन से पगे हुये लड़के लड़कियों के लिए पाँचवीं कक्षा में पढ़ने वाला राहुल बख़ुशी छील देगा गरम अंडे। एक ही देश में कितनी लेयर है।  एक लड़का कहता है- एक ऑमलेट बना दे। राहुल की नन्ही अंगुलियाँ अंडों की ट्रे से चुन कर दो अंडे हाथ में ले लेती हैं। अचानक से लड़के का मन बदल जाता है। वह कहता है- रहने से चार उबले हुये अंडे ही दे दे। उस लड़के को कहीं जाने की जल्दी है। मैं मुस्कुरा कर राहुल की इस भाव भंगिमा का समर्थन करता हूँ कि भाई जो चाहिए पक्का बोलो न। 

राहुल के हाथ अंडे के कवच को इस तरह आसानी से तोड़ कर अलग कर देते हैं जैसे नौकरों और मजदूरों की दिन भर की कमाई को मंहगाई तोड़ डालती है। कहाँ के रहने वालों हो राहुल? मेरे पूछने पर अपनी आँखों में किसी अनुभव की चाशनी के तार बांध कर कहता है। इधर बयाना के। अच्छा यहाँ कब से हो? पापा जयपुर चले आए फिर हम इधर ही रहते हैं। राहुल को बात करते हुये शायद अच्छा लगा होगा कि उसने स्टील के ग्लास में दो अंडों को फेंटते हुये कहा। पापा स्क्युरिटी गार्ड का काम करते हैं। इसलिए मैं इधर ठेले पर आ जाता हूँ। मैंने पूछा कब से बना रहे हो ऑमलेट? वह कहता है चार पाँच साल हो गए हैं। 


मैं राहुल की तारीफ करता हुआ कहता हूँ तुम बड़े समझदार बच्चे हो। अपने पापा की मदद करते हो घर चलाने में। कितने भाई बहन हो? राहुल के परिवार में मम्मा पापा और चार बहन भाई और हैं। राहुल आधे घंटे में केरोसिन वाले स्टोव पर दो अंडों वाले चार ऑमलेट बनाता है। हर एक के साथ चार ब्रेड सेकता है। शीतल पेय की प्लास्टिक की बोतल के ढक्कन पर छेद किया हुआ है। इसमें खाना पकाने का तेल है। हर बार तवे पर तेल को किसी फव्वारे की तरह लगाता है। मैं पूछता हूँ कि राहुल तुम स्कूल नहीं जाते? वह कहता है जाता हूँ न। अभी मेरी छुट्टियाँ हैं। इसलिए दिन में एक बजे आता हूँ नहीं तो दोपहर चार बजे। अपनी घुटनों तक मोड़ी हुई पेंट की ओर देख कर कहता है। आज बारिश आई और पानी भर गया न इसलिए मैंने अपनी पेंट को घुटनों तक ऊपर कर लिया है। मैं मुसकुराता हूँ। मुझे मुसकुराता देख कर उसके चहरे पर होठों के पास से एक स्माइल किसी तितली की तरह उड़ जाती है। 

वह ऑमलेट बना रहा होता है, मैं सोचता हूँ कि काश इसी तरह जब कभी दुख आए तब हम अपने अहसासों के पैरहन को घुटनों तक उठा सकें। ताकि दुखों से कम देर तक भीगा रहना पड़े। काश हम इसी तरह ज़िंदगी का रुख देख कर खुद को बदलते रहें। हम सीख सकें हालत को हेंडल करने का तरीका। मेरी इस सोच से बेपरवाह बारह साल का बच्चा ऑमलेट बनाता रहता है और सात नंबर पर दुनिया का कारोबार चलता रहता है। एक बच्चा घर चलाने के लिए अंडे बेचता है, एक चार बच्चों का बाप रात भर चौकीदारी करता है। बाप का मालूम नहीं मगर बच्चे के चहरे पर इफ़्तिख़ार इमाम सिद्धिक़ी का शेर लिखा है- क्या याद दिलाएँगे मुझे मेरे सितमगर,  हर नक़्श ए सितम खुद मेरे सीने पर लिखा है।

जाना, इस ज़िंदगी के आईने में कितनी सूरतें नज़र आती हैं। 

June 11, 2013

तुमने देखा ही क्या है?

कीमियागरों से कुछ रसायन उधार लेकर, कुदरत का शुक्रिया कहते हुये एक बूढ़ा आदमी बना लेता है ज़िंदगी का आसव, बेहद कड़वा मगर मद से भरा। एक नौजवान लड़का उदास रहता है। सिर्फ इसलिए कि वह मुहब्बत को किसी दरवाज़े की चौखट की तरह खड़ा करना चाहता है। फिर उस तोरण से बार बार अकेला गुज़रना चाहता है। लड़की कहती है तुम खुश रहा करो और फिर सुनती है, लोकगीत से चुराई हुई उदासी से बना सस्ता लोकप्रिय गीत।

मैं न वो लड़का हूँ न उदासी सुनती हुई लड़की। मुझे उस रसायन के बारे में कुछ नहीं मालूम जिसे बूढ़ा आदमी बनाता है। मैंने अपने हिस्से में जो चुना है वह आला दर्ज़े का इंतज़ार है। कि इंतज़ार में समा सकते हैं अनगिनत लड़के, लड़कियां, बूढ़े और हज़ार रकम की चीज़ें। इसमें समा सकती है इस दुनिया जैसी अनेक जगहें जिनके बारे में अभी तुमने सोचा नहीं है। 

इस वक़्त आसमान में बादल हैं। हवा तेज़ है। पर्दे उड़ उड़ कर बालकनी में लगी लोहे की जाली को चूम रहे हैं। ये एक क्षणभंगुर दृश्य है। मैं इसे देखता हूँ और ये मिट जाता है। मुझे अचानक से एक याद आती है। जैसे हवा में कलाबाज़ियाँ खाता हुआ सिक्का होता है। उसका सच और झूठ एक भ्रम में घुला होता है। उसकी चित्त और पट के बीच का फासला वही मंज़र है जो इस वक़्त पर्दे के चूमने और लौट आने के बीच है।
 
एक आवाज़ सुनना चाहता था। एक अभिवादन के प्रत्युत्तर में कोई संकेत देखना चाहता था। अपने दीवानेपन की जद में कोई सहारा चाहता था। बिस्तर पर पेट दर्द से रोये पड़े हुये बच्चे का हाथ थामे हुये वक़्त से कहना चाहता था कि तुम दो फाड़ हो जाओ। एक तरफ अपने बेटे को प्रेम किया जा सके और एक तरफ जिस ज़िंदगी की ठोकरें हैं, उसी को तमीज़ से बोसे दिये जा सकें। 

शामें वैसी नहीं हैं। बीत गयी हैं। मन वैसा नहीं है, उदास कम और उदासीन ज्यादा है। शहर बदलने से कुछ नहीं बदलता। हर आदमी के पास अपनी एक झोली होती है। खुद को दी हुई बददुआओं से भरी हुई। 

पर्दे की तरह उड़ जाते हैं लड़की की देह से कई मौसम। वे उड़ते ही जाते हैं, जैसे मौसमों का छत्ता उसी की नाभि में लगा हुआ है। एक धुंधली तस्वीर बनाता हूँ। गहरे लाल रंग पर इरेज़र से बनाता हूँ कुछ रोशनी और फिर पेंसिल से बना देता हूँ, अफ्रीकी आदिम लोगों द्वारा बनाया जाने वाला सूरज का निशान। ऐसा निशान जो अपने आस पास कई सारे नन्हें सूरज गोल घेरे में लेकर उगता है। किसी के ख्वाब में उग सकने वाली श्याम स्त्री से अधिक काला और उसकी चाहना के उजले रंग से अधिक गोरा। 

वो एक लम्हा था। मैंने लिखने के हुनर से उसका स्केच बना लिया है। तुमको देखा ही नहीं है। हाथ की कलाई में घड़ी बांधना भूल गया हूँ। इस वक़्त की नब्ज़ को इगनोर करके चलता हूँ। सिक्स्थ सेंस के बारे में सुना है? वही सेंस जब कोई कहता है कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ और हमें लग रहा होता है कि ये इस वक़्त कोई और बात भी सोच रहा है। उसी सेंस ने मुझसे कहा है कि शराब पिया करो। अच्छे, बुरे, भले, कमीने, सुंदर, अमूर्त, कोमल, कठोर, गहरे और छिछले सब पल नाशवान हैं। 

आई लव यू। 

हाँ हवा अब भी चल रही है। पर्दे फिर से उड़ जाना चाहते हैं। तुमने उनको देखे नहीं न? तुमने देखा ही क्या है? अपने पाँवों को ज़रा सूंघ कर देखो कि उनमें मेरी खुशबू बसी है। तुम्हारी ठोकरे बेकार नहीं गयी हैं। तुम्हारे मन ने सुख और पाँवों ने मेरी खुशबू पायी है। वह बूढ़ा आदमी था नहीं बल्कि मैं होना चाहता हूँ। 

June 10, 2013

हवा की नमी चुराना, शराब के लिए

एक दोस्त ने कहा- अच्छा आप मैजिक में घूम रहे हैं। मैं मुसकुराता हुआ हामी भरता हूँ। टाटा कंपनी के बनाए इस पब्लिक ट्रांसपोर्ट व्हिकल का शुक्रिया अदा करते हुये कहता हूँ। देखो न शाम कितनी अच्छी है। हमारे वार्तालाप के बीच एक निर्वात आ जाता है। मैं दोस्त की आवाज़ को सुनने की कोशिश करते हुये इस खालीपन से गुज़रता हुआ सोचता हूँ कि अक्सर अच्छी चीज़ें किसी की याद क्यों दिलाती है। कहो क्यों? मैं ये उससे पूछ लेना चाहता हूँ मगर नहीं पूछता हूँ। इसलिए कि मेरे और उसके निर्वात अलग आकार के हैं। हम दोनों इस ट्रान्स से गुज़रते हुये कभी कभी ही एक दूजे को आवाज़ दिया करते हैं। जब तक आवाज़ का कोई जवाब आता है हम निर्वात के दूसरे छोर तक आ चुके होते हैं। 

मैंने परसों सिटी बस में बैठे हुये कुछ सोचा। वह कुछ भी था। जैसे कि सबसे पहले खयाल आया कि शाम को अगर कुछ बादल आ जाएँ और हवा ठंडी हो जाए। ये सोचते ही मैं मुस्कुराने लगा। ऐसा सोचते ही मौसम में ऐसा मामूली बदलाव आया जिसे सिटी बस के यात्रियों में सिर्फ मैं ही महसूस कर सकता था। यानि कि सोचने भर से मौसम में बदलाव आया। फिर मैंने सोचा कि मैं अच्छी विस्की पीऊँगा। एक बेहद पतली, अदृश्य, बारीक मादक लकीर मुझे छूती हुई गुज़र गयी। मैंने सोचा कि बिना बादलों के ठंडी हवा कैसे महसूस हुई? कैसे बिना पिये एक हल्का सा नशा आँख से गुज़रा। मेरे ख़यालों और तसव्वुर में होने भर से क्या वह चीज़ मेरे पास हो सकती है? 

अब सिटी बस चली जा रही थी और मुझे एक अच्छा काम मिल गया था। मैंने अपने आप से पूछा कि क्या सचमुच अच्छे मौसम के लिए बाहरी चीजों से छुटकारा पाया जा सकता है? क्या बिना बादल के छांव और नमी के बिना ठंडी हवा का अहसास किया जा सकता है। सिर्फ अहसास ही क्यों, उनको वास्तव में भी अपने आस पास पाया जा सके। मेरे मन ने जवाब दिया कि एक सोच के हल्के इशारे भर से अगर अहसास होता है तो सब कुछ हो सकता है। शराब के नशे के लिए शराब की कहाँ ज़रूरत होगी? ये मादकता, ये छांव और ये ठंडी हवा मेरे भीतर है। मैं चाहूँ तो इसको अपने पास बुला सकता हूँ। 

एसकेआईटी से सिटी बस में बैठी हुई चार छात्राएं दुनिया के रंज और ग़म से दूर अपनी टाई को ढीला किए, बाहों को आधा फ़ोल्ड किए, चेहरे पर स्कार्फ बांधे हुये बैठी थी। एक फिल्मी गीत बज रहा था। टूटी हुई मुहब्बत और धोखे की कहानी का गीत। गीत पूछता है कि तुमने ऐसा क्यों किया? एक लड़की अपनी अंगुली से दूसरी की तरफ इशारा करती है। जैसे गायक उसी लड़की के बारे में बात कर रहा हो। इसके बाद हर एक पंक्ति पर वे नन्ही लड़कियां आँखों से मुसकुराती रहती हैं। धूप की तपिश में लू का कारोबार चलता रहता है। मैं अपने बादलों, ठंडी हवाओं और अच्छी विस्की के ख़यालों में खोया हुआ खिड़की से बाहर देखता रहता हूँ। खुद से कहता हूँ देखो सिटी बस जैसा कुछ नहीं है, तुम इस वक़्त हवा में हो और अपने गंतव्य की ओर उड़ रहे हो। हाँ सचमुच वे लड़कियां, दरवाज़े से लटका बस का कंडक्टर और स्टेयरिंग थामें हुये ड्राइवर सभी हवा में उड़ते जा रहे थे। 


सच कहूँ तो मैं इन दिनों अवकाश पर हूँ। मैंने दुनिया के व्यवसाय से छुट्टी ले रखी है इसलिए मेरे पास कुछ भी सोचने का वक़्त है। तुम्हें मालूम है न मैं इस तरह हवा में किले क्यों बना रहा हूँ। मैं किसलिए बिन बादल बरसात और शराब के बिना मादक नशे में डूब जाने के खयाल बुनता हूँ। इसलिए कि एक दिन हम सब दूर दूर रहते हुये पास हो सकें और इसलिए भी कि हमें किसी के आने की ज़रूरत ही न रहे। 

आह ! 
ज़रूरत हमेशा के लिए है, उसके बिना जीकर भी क्या करेगा कोई? 

एक दोस्त ने कहा- कि जो आदमी अपने दोस्तों को आसानी से जाने देता है, वह अच्छा आदमी नहीं है। मैंने कहा- सच है। अगर मैं अच्छा आदमी होता तो दोस्त की बातें मान लेता। मैं इस तरह सोशल साइट्स पर अपना समय बरबाद न करता। मुझमें लिख सकने की संभावना है तो बैठ कर लिखता। अपना वक़्त बच्चों और आभा को देता। अपने लिए चुनता एक सौम्य, शांत और सुकून भरी शाम। हाँ, मैं अच्छा आदमी नहीं हूँ इसलिए बेतरतीबी से जीता हूँ। मगर बुरा आदमी भी तो दिल की गहराई से प्रेम कर सकता है।
* * *
[Painting Image Courtesy -William James Glackens] 

June 8, 2013

लाइट सी ग्रीन रंग पहचानते हो

हम चल सकते थे रेगिस्तान की बालू पर और फिर थक जाने पर लेट सकते थे ऐसे कि कोई रूई का धुनका ले रहा हो झपकी। रेत के बिस्तर पर रेत से ही सना हुआ। मगर हासिल सिर्फ आवाज़ के टूटे रेशे, तनहाई के भारी पर्दे। एक उम्मीद से जगना और एक उदासी से सो जाना। इस अप्रिय चुप्पी में एक डेज़र्ट मॉनिटर ने कच्ची दीवार से सर उठा कर रेगिस्तान की छत पर छाए हुये बादलों को सलामी दी है। एक टिटहरी अपने नन्हे बच्चे के पीछे चलती हुई, कबीर की वाणी गा रही है- 'हिरना समझ बूझ वन चरना।' 

मैं बालकनी से देखता हूँ कि मानसून के आने से पहले की इस सुबह में डेज़र्ट मॉनिटर उसी रास्ते पर बढ़ गयी है। जिस पर उस एक शाम के बाद मैंने घबरा कर चलना छोड़ दिया था।

रात एक सपना कनेर की लचीली टहनी सा मेरी पीठ पर दस्तक देता रहा। जाने क्या था, किसे क्या चाहिए था मालूम नहीं। याद का माँजा इतना कच्चा है कि कोई प्रॉपर्टी, कोई सिचुएशन, कोई डायलॉग या कोई फील पक्का पक्का लिखा ही नहीं जा रहा। अच्छा कि मैं भूल गया, कि याद नहीं, कि कुछ था इतना काफी है। कि रात गुज़र गयी है। कई दिनों से आंधियों का शोर था, आज की सुबह खामोशी है, उमस है और एक अभी अभी एक बारिश की फुहार आई है। 

हम गुज़र कर कहाँ तक जायेंगे? उस रास्ते पर बाद हमारे कौन सोचेगा कि बीते हुये वक़्त की किताब में कितने चेहरे थे। ये वक़्त फ़ानी है। ये दुनिया कोई कारोबार है। हम दिहाड़ी मजदूर की तरह सर पर दस ईंटें उठाए हुये ज़िंदगी को तामीर किए जा रहे हैं। रोज़ इस तरह हम उचक कर जा बैठते हैं अगली टहनी पर मगर तन्हा। 

रसोई में बज रहे एफएम से सुरों में ढली आवाज़ आ रही है- तेरे नाम का दीवाना तेरे घर को ढूँढता है... 

June 6, 2013

इस तरह भी क्या जाना

मैं एक चौबीस पन्नों का अख़बार लिए हुये छोटे टेम्पो के इंतज़ार में था। ये मिनी ट्रक जैसे नए जमाने के पोर्टबल वाहन खूब उपयोगी है। खासकर छोटी जगहों को बड़ी जगहों से जोडने के लिए। पहले डीजल इंजन सेट से तैयार किए गए जुगाड़ जिन रास्तों पर दौड़ा करते थे, आज वहाँ इस तरह के मिनी से छोटे ये ट्रक जुगाड़ को विस्थापित करने में लगे हैं। ऐसे ही एक टाइनी साइज़ के चार पहियों वाले टेम्पो के पीछे लिखा था-“मैं बड़ा होकर ट्रक बनूँगा” मेरे हाथ में जो अख़बार था उसके पहले पन्ने पर जो खबर थी, वह भी बड़े होते जाने और कुछ न बन पाने के डर की दुखद दास्तां से भरी थी। एक दिन पहले सुबह व्हाट्स ऐप पर एक दोस्त का संदेशा आया था। ज़िया खान नहीं रही। उसने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली। मेरे मन में आया कि ये ज़रूर कोई बड़ी हस्ती की बात होगी जिसने समाज पर गहरा प्रभाव डाला होगा। वरना आजकल मौत इतनी मामूली चीज़ है कि लोगों इस पर ध्यान देना बंद कर दिया है। कोई दुनिया से गुज़र जाता है और हमारी आँखों में नमी नहीं आती। हम पल भर के लिए भी इस बात पर विचार नहीं करते कि एक सुंदर और कीमती जान ने इस दुनिया को छोड़ दिया है। 

मैं अख़बार के पहले पन्ने पर एक श्वेत-श्याम तस्वीर में दो चमकती हुई आँखें देखता हूँ। ऐसी आँखें जिनमें हजारों कहानियाँ छुपी हों। इतनी वाचाल आँखों का बुझ जाना मुझे उदास करता है लेकिन मैं अपने याद के रोज़नामचे में देखता हूँ कि असंख्य आँखें जाने कितनी ही वजहों से बुझती जाती हैं। उनका अफसोस और पल भर का मातम ही होता है। जब पहली बार संदेशा पढ़ा तब अचानक से अनगिनत लड़कियां याद आई जिंहोने इस तंत्र की दोगली ज़ुबान से व्यथित होकर आत्महत्या कर ली थी। दोगली ज़ुबान कहने का आशय ये है कि सिस्टम कहता है महिलाओं के ये हक़ और उनके पक्ष में ये कानून हैं। लेकिन अपने साथ गुजरे हादसों पर वे कार्यवाही होते हुये नहीं देख पाती और एक दिन अवसाद और हताशा में जीवन को ठोकर मार देती हैं।

ज़िया खान की मौत बड़े जलसे जैसा मातम इसलिए है कि रोटी और रोज़ी की चिंता से समाज और खबरों को दूर कैसे रखा जाए। हमारे पास पिछले महीनों की खबरों का बचा हुआ कोई असर है तो वह क्रिकेट में सट्टा और उसके अंतर्राष्ट्रीय संबंध हैं। इन खबरों को इस तरह से पेश किया जाता है जैसे भारतवर्ष का भविष्य इसी एक काम पर निर्भर है और यही हमारी उन्नति की सीढ़ी है। चीयर लीडर को लेकर सभ्यता के नाश का रोना रोने वालों के लिए रोटी कोई मुद्दा नहीं है। उनके लिए फैशन से समाज का पतन है किन्तु व्यवस्था में बढ़ते जा रहे भ्रष्ट लोगों से कोई खतरा नहीं है। ज़िया खान का जाना दुखद है किन्तु हर साल शिक्षण संस्थानों में जान देने वाली छात्राओं के लिए भी इसी तरह के नेशनल नेटवर्क पर प्राइम टाइम में कवरेज होना चाहिए। आत्महत्या करने वाली छात्रा के लिए भी यही समाज और इसके लोग उतने ही दोषी ठहराए जाने चाहिए। 


जिस तरह रुपहले पर्दे पर अपनी उम्र से तीन गुना बड़े अभिनेता के सामने एक आराम कुर्सी पर लज्जा और कामना से सिमट रही लड़की का दृश्य देखना हमें पसंद हैं, और जानकारों का कहना है कि यही क्लासिक भी है, तो इस रोशनी के संसार का अंधेरा एक बेजोड़ रूपक है। आपने इसी रुपहले संसार में रोटी और मकान की लड़ाई और सपने की आखिरी फिल्म कब देखी थी? यकीनन आप याद नहीं कर पाएंगे। इसलिए कि सिनेमा एक औज़ार है और इस औज़ार के जरिये वास्तविक सवालों को दरकिनार किया जा रहा है। हमारे सपनों की थाली से रोजगार को चुरा कर उसकी जगह स्विट्जरलेंड के मनोरम दृश्य रख दिये गए हैं। मुझे ज़िया खान की मौत का अफसोस है। उसके लिए अब कोई प्रार्थना नहीं कि जा सकती क्योंकि स्वर्ग और नरक यही दुनिया है। उसने जो मादक खवाब देखे वह उसके स्वर्ग में होने के दिन थे। उसने जो हताशा भोगी वह नरक के काँटों की चुभन थी। अब उसकी देह किसी भी अहसास से मुक्त है और समय के पहिये के साथ उसका क्षय होता जाएगा। एक नाम भर की स्मृति बाकी रहेगी। मैं स्टुडियो में होता तो फ़ैज़ को याद करते हुये रेडियो पर ज़िया के लिए एक गीत ज़रूर प्ले करना चाहता- ये सफर बहुत है कठिन मगर, न उदास हो मेरे हमसफर।
* * *
मैं ख़बरों की दुनिया में काम कर रहे दोस्तों के लिए कुछ लिखता रहता हूँ। ये दीना भा के लिए लिखा है। मित्रों इसका कहीं और उपयोग करने से पहले एक बार मुझसे बात ज़रूर कर लीजिएगा। 

June 5, 2013

तुमने इस तरह चूमना कहाँ सीखा है

कोई ठौर न थी न कोई ठिकाना था इसलिए पंछी ने अपने पंखों को किसी वलय की तरह बनाया और एक ही गुलाची में समा गया खुद के भीतर। वहाँ असीम जगह थी। वहाँ कुछ भी मुमकिन था। वहाँ इस छोटी पड़ती हुई दुनिया से घबराये हुये लोगों के लिए अनगिनत दुनिया बसाये जा सकने जितनी जगह थी। दूर दूर तक देखो तो असमाप्य, दीर्घ और जटिल संसार। सोचो तो, सब कुछ किसी नाशवान प्रेत की तरह राख़ होकर कदमों में गिर पड़े। यही वह जगह है जहां पहुँचने का रास्ता किसी बौद्ध को पहली बार बताया गया होगा। 

मैंने अपने दुखों को उलट पुलट कर सुखा दिया, उसी महबूब की धूप में, जिसके कारण दुख होने का भ्रम मुझे घेरे हुये था। मैंने अथाह शांति के समंदर में डूब जाना चाहा मगर डूब न सका कि मैं खुद उसी पर बहने लगा। मैंने सोचा कि चुप्पी के सघन जंगल में झौंक दूँ खुद को और पाया कि मैं सुन रहा हूँ पंछियों के गीत। जो मैं सुन न सका था। कुदरत के बेजोड़ गान के वृंद में सभी चीज़ें शामिल थी। हर वह चीज़ जिसे आप देख या महसूस कर पाये हो कभी भी... 

अचानक एक साफ आवाज़ फिर से सुनी मैंने- तुमने इस तरह चूमना कहाँ सीखा है। 

रेल के पहियों के शोर में, मैं सोचता रहा आखिर एक बीज को कौन सिखाता है, चटक जाना। कि हम सभी की कुंडली में लिखे हुये शाश्वत कर्म। मैं उनींदा देखता हूँ खिड़की से बाहर और मैं सोचता हूँ कि क्यों नहीं हो तुम? फिर कोई गरम लू का झौंका बना देता है मेरे दिल पर रेगिस्तान का टैटू सुनहरी रेत के रंग का। मैं तुम्हें दिखाना चाहता हूँ। मगर जाने क्यों नहीं हो तुम.... 

दुख है? 
नहीं बस एक कोलाहल है। उन अक्षरों का जिन से नहीं बनता कोई नाम मुकम्मल। 
* * *

एक कोलाहल मद्धम लय में
आँखों से उतरता
तनहाई की दरारों में खो जाता है।

किसी पुरानी सुरमादानी के
स्याह किनारे जैसी
नाज़ुक अंगुलियों पर लहरों की भंवरें
लिखती है कोई शाम उदासी

सब कुछ, हाँ सब कुछ, मिट जाने से पहले।
* * *

चीज़ें अपने आप चटक रही हैं
ना तुम्हारी स्मृति में
ना मेरी प्रतीक्षा को देखकर।

किसी से न कहो
कि ग़म,
जो है ख़ालिस तुम्हारी अपनी चीज़
अगले कुछ वक़्त में हो जाएगी गलत।

बस एक
इस घड़ी मुश्किल है
देखना तुम्हारा हाथ छूटते हुये
चाहे वह जैसा भी है
सत असत के रंगों से भरा
हल्के भारी शब्दों से सना।

बस ये जो एक तिल हैं न
यही बचा है खुशी की अमिट निशानी
देह के पूरे रोज़नामचे में।

हाँ मगर देखो, चीज़ें चटक रही हैं अपने आप।
* * *

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.