May 28, 2013

एक कमीज, मेड इन बांग्लादेश

इस कमीज की कोहनियों पर लगा हुआ है, काले रंग का एक क्रॉल पैबंद। इस उम्मीद में कि शायद आने वाले दुख के दिनों में ये पैबंद कुछ ज़ख़्मों से बचा ले। ज़िंदगी अपने प्यारे बच्चों के लिए बेहिसाब चिंता करती है। जब ये पहले से ही तय होता है कि गले लगना है और बिछड़ जाना है। एक कंटीली बाड़ के नीचे से बनाना सुराख और किसी नौसिखिये रंगरूट की तरह कोहनियों के बल चलते हुये नापना है मुहब्बत का रास्ता। 

उन दिनों के लिए इसकी कोहनियों पर लगा हुआ है, काले रंग का कपड़ा। 

मैं कभी कभी शाम होते ही अपने वार्डरोब के पास खड़ा होकर कहता हूँ। मेरे प्यारे दोस्त कोई क्या देना चाहता है इससे इतर ज़रूरी ये है कि तुम अपने लिए क्या चुनोगे? मैं तिरस्कार और ज़लालत से हट कर चुन लेता हूँ उस कमीज की खुशबू हालांकि उसमें किसी बांग्लादेश के गरीब कारीगर के हाथों और अगर किसी औरत ने टांके हों बटन तो दो लोगों की मिली जुली खुशबू होगी। कारीगरों को कहाँ मालूम होगा कि इस कमीज की आस्तीनों के फ़ोल्ड में किस जगह की फाइन डस्ट भरी होगी। उनको ये भी नहीं मालूम होगा कि कोई इसे पहनेगा या ये यूं ही टंगा रहेगा, अजीर्ण स्मृति की तरह।

एक कमीज है 
मेड इन बांग्लादेश।  

मैं अपने दिल की इत्रदानी में तुम्हारी खुशबू रखता हूँ। इस पर किसी देश की जगह तुम्हारी रूह का टैग लगा हुआ है। सुबह की तीसरी चाय का प्याला लेपटोप से गिरते गिरते बचा है, कई बार। मेरी अंगुलियाँ जाने कौनसे अक्षर खोज रही है, तुम्हारे लिए। 
* * *

मैं तक़दीर को सूंघ रहा हूँ, जासूस कुत्ते की तरह। मुझे वहम है कि उसके हिसाब में कुछ और दिल में कुछ और रखा है। इसलिए तक़दीर का रोना मुल्तवी है। ज़िंदगी के इंतज़ार के लिए ज़िंदगी की इज़ाजत की ज़रूरत नहीं है। 

May 26, 2013

सन्यास की चाशनी में वियोग की धुन

ज़िंदगी हमसे चाहती क्या है, बताती क्या 

ये बात उस आदमी के बारे में है
जिसकी महबूबा उसकी पीठ के पीछे हैं
मगर वह मुड़ कर
उसे आइस पाइस नहीं कह सकता।

उसे छिपे रहने में क्या मजा है, इस सवाल की मनाही है।

मेरे खयाल से ये बात
उस औरत के बारे में भी हो सकती है
जो अपने महबूब को आवाज़ देती है
और वह जनाना कपड़ों के ढेर से उठता हुआ
कहता है मैं इधर ही हूँ।

वह अक्सर उधर से ही क्यों नुमाया होता है,
ऐसा पूछते ही ताअल्लुक बोझ बन जाता है।

वास्तव में साबुत करेक्टर होने की
जो बुनियादी बातें
हमें सिखायी जाने की कोशिशें की गई थी
उनका असल चेहरा
किसी कुंठित कारीगर का बनाया हुआ लगता है।

मैं छठे माले के घर से देख रहा हूँ
कि हद दर्ज़े की पहरेदारी में बड़े हुये
एक सफ़ेद फूलों वाले पेड़ के तने में
लोहे के ट्री गार्ड ने अपने दाँत गड़ा रखे हैं
पहले ये दाँत मवेशियों के लिए बनाए गए थे।

लोग पेड़ के फूलों पर एक नज़र डालते हैं
और आगे बढ़ जाते हैं, बिना सुख दुख पूछे।

जिस तरह पीठ पीछे से महबूबा आवाज़ नहीं देती
जिस तरह जनाना कपड़ों से महबूब बाज़ नहीं आता
जिस तरह बुनियादी बातों के पीछे का मकसद कुछ और है
जिस तरह एक ट्री गार्ड अपने ही अपने ही शरणार्थी का फंदा बन जाता है

उसी तरह ज़िंदगी हमसे चाहती क्या है और बताती क्या
ये कोई जान नहीं सकता है।
* * *

सन्यास की चाशनी में वियोग की धुन 

मैं एक सूप बनाता हूँ
हवा की गिरह को खोल कर
समय की तीलियों पर रखता हूँ, अब तक का कमाया हुआ
फिर आहिस्ता से ज़मीन और आसमान के बीच लटका कर
अफसोस और खुशी के पलों को छांटता हूँ, ज़िंदगी की तंग चादर पर।

हवा बन जाती है बच्चों के खेल की उड़न तश्तरी
मैं एक कुत्ते की तरह दौड़ कर
पकड़ लेना चाहता हूँ उसे किसी चिड़िया की मानिंद
मेरे मुंह में बची रह जाती है, सरसराहट बीती हुई उम्र की।

मैं एक महबूबा चुनता हूँ
खुशियों से बेखबर, अक्वेरियम में बंद सुनहरी मछली जैसी
या शायद गरमी के दिनों में रेगिस्तान में
सुर्ख-पीले फूलों से भरे रोहिड़े के खूबसूरत पेड़ की तरह।

हम दोनों उगाते हैं रेत में एक किला ख़्वाहिशों का।

जादू की छड़ी का अभिशाप
एक दिन हमारी बदकिस्मती को बदल देता है सच में
कि हवा बनाती है सबसे मजबूत दीवार में सुराख और बह जाता है सारा सुख।

मैं एक सपेरा बन कर
वियोग की धुन को बजाता हूँ, सन्यास की चाशनी में लपेट कर
और हवा को वशीभूत करके क़ैद कर लेता हूँ पिटारे में।

हवा रूआँसा होकर हो जाती है चुप
जैसे कोई सोलह साल की लड़की, उदास बैठी हो खिड़की में।

इस भारी मौसम को अलविदा कहने के लिए
मैं उठा देता हूँ बेरुखी का ढक्कन ज़ार में क़ैद सीली हसरतों के मुंह से।

हवा अपनी गिरह को खोल कर बनाती है फंदा और चुन लेती है मेरी गरदन।
मैं किसी अरूप प्रेत की तरह गायब हो जाता हूँ जैसे मुट्ठी से रेत फिसल जाती है।

हवा मुझे खोज रही है साँय साँय करती हुई
मैं बुन रहा हूँ कोई नया इरादा उसे छका देने का
महबूबा पता नहीं लगी है किस काम में, ज़िंदगी जाने किस चीज़ का नाम है?
* * *

May 24, 2013

कि मैंने क्या नहीं किया

वह सब कुछ जो आपने कमाया या भुगता है। वह जो सुकून था या हताशा थी। वह जो था या वह जो नहीं था। इस हिसाब बेहिसाब में आप बीती हुई उम्र के कटे फटे, रंग-बदरंग खोल को उतार कर एक तरफ रख देते हैं। जो सीखा उसे भूल जाने की दुआ करते हैं। सब कुछ छोड़ कर चुन लेते हैं किसी एक को। अपने आपको कर देते हैं उसके हवाले। 

अचानक से नील गाय से टकरा कर दो मोटरसायकिल सवार सड़क पर गिर पड़ते हैं। मैं सफ़ेद तलवों वाले काले जूतों को मिट्टी से बचाना भूल कर उन्हें सहारा देकर उठाना चाहता हूँ। लेकिन नील गाय के अचंभित होकर भाग जाने साथ ही वे दोनों सवार भी उठ जाते हैं। उनके कंधे, कोहनियाँ और घुटने छिले हुये। एक का होठ कट गया था। वह अपनी हथेली से बहते खून को रोकने की कोशिश कर रहा था। मोटरसायकिल की हेडलाइट टूट कर बिखर चुकी थी। एक सेलफोन सड़क के किनारे कई हिस्सों में बंटकर गिरा पड़ा था। मैं उन्हें कहता हूँ- भाई देखो, तुम दोनों ज़िंदा हो। इतनी ज़ोर की टक्कर को बरदाश्त करने की ताकत तुम्हारी इस नाज़ुक खोपड़ी में नहीं है। वे दोनों अपने दर्द को भूल कर एक दूजे की चोटों का मुआयना करते हैं। मैं महल गाँव से निकला था और मुझे गौरव टॉवर जाना था। मुझे बीतती हुई शाम के रास्ते को जल्दी तय कर लेना था। इसलिए वहाँ और रुकना मुमकिन न था। उन दोनों को सांत्वना देने के लिए कुछ और लोग आ चुके थे। 

झाड़ियों के बीच से नील गाय ने एक बार मुड़ कर देखा। उसे इस तरह देखते हुये मुझे खयाल आया कि हर किसी के साथ ऐसे हादसे क्यों पेश आते हैं। हम ज़िंदगी को कितना भी संभाल कर रखे एक दिन वह अप्रत्याशित रूप से ठोकर खा बैठती है। मैं भी ऐसे ही टकरा कर गिर पड़ा था। कि मैंने क्या न किया था। मैंने चाहा, मैंने साथ दिया, मैंने प्यार किया मगर ज़िंदगी ने बेरहमी से ठुकराया। वो ज़िंदगी, जिसको ऐक्विटेन्स टाइप के रिलेशन्स को संभालने की गरज रहती है। पैदल चलते हुये एक खयाल का सिरा मेरी पीठ पर थपकी देता जाता है। तुम्हारी पत्नी, तुम्हारे बच्चे और तुम्हारे चाहने वाले सब कोई तो रो पड़ता अगर तुमने ये मूर्ख किस्सा बयान किया होता। इसलिए झूठी कहानियों का सच्चा संसार एक अच्छी जगह है। मैं मुड़ कर देखता हूँ, अक्षय पात्र का गुंबद बहुत पीछे छूट गया है। ज़िंदगी के सफ़र में बहुत कुछ छूटता ही है इसलिए दिल से कहता हूँ कि छूटते जाने को आदत में शुमार कर लो। 

आपने कभी किसी से प्रेम किया है? अगर इस बारे में सही सही चीज़ें याद कर सकें तो पाएंगे कि इससे बड़ी मूरख और इससे अधिक प्रिय बात ज़िंदगी में कोई न थी। अच्छा खासा जीते हुये, सुकून से शामें बिताते हुये, मौल्स और केफे के लकड़ी के पट्टों वाली रेलवे बेंचेज़ पर बैठे कितना समय बेखयाली में बिता दिया था। बिना किसी इंतज़ार और बिना किसी प्लान के दोस्तों से मिलते हुये। बर्गर, पिज्जा, सिगरेट और चाय के साथ लम्हों की छोटी छोटी कतरनें करते हुये जीना, क्या खूब जीना था। बेखयाली थी मगर अफसोस और दुख न था। इंतज़ार था मगर इतना गहरा न कि किसी को याद करें और रो पड़ें। प्यास में तीन ग्लास पानी एक साथ पिया तो लगा जैसे बीयर का पींपा पी लिया है। ज़िंदगी का नशा आंखो तक उतर आया है। लेकिन कभी आप पाते हैं कि शराब पानी हो गयी और बेखयाल और बेलौस ज़िंदगी एक भारी टोकरा बन कर सर पर सवार है। 

मेरे पास एक पिट्ठू बस्ता है। इसमें अच्छी विस्की और वोदका की दो बोतल रखने के बाद जगतपुरा से एक ओटो लेता हूँ। ऑटो वाले से कहता हूँ गौरव टॉवर छोड़ दो। मैं पाँच दिन से इसी शहर में हूँ। मौसम बेहद गरम है। एक एसी और एक फ्रीज़ की ज़रूरत है। वेलेट में पैसे हैं मगर न एसी आता है न फ्रीज़। यही ज़िंदगी है कि कई बार हालत आपको इस कदर मजबूर कर देती है कि हाथ के ग्लास का पानी पीना मुमकिन नहीं होता। सॉफ्ट ड्रिंक की प्लास्टिक की बोतल पर कपड़ा बांध कर उनको पानी से भिगो कर रखता हूँ। ऐसा करने से पीने लायक ठंडा पानी मिल जाता है। मैं शिकायत नहीं करता, ये बड़ी मामूली बात है कि आपको गरम पानी पीना पड़े या झुलसाती हुई लू में जलना पड़े। इस बदन से ज्यादा हादसे इस रूह ने सहे हैं। उसकी जलन और चोटों के निशान आप किसी को दिखा नहीं सकते। रूह की चोट का कोई मरहम भी नहीं होता। उन्हें कोई देख नहीं पाता इसलिए हमदर्दी भी नहीं जता सकता।

एक पूरी ज़िंदगी में इतना काफी होता है कि कोई एक आपका इंतज़ार करता हो। कोई एक आपको आवाज़ देने या सुनने के लिए वक़्त के हिस्से चुरा लेता हो। मैं चमक और चौंध की दुनिया में दाखिल हो जाता हूँ। कारों की लंबी कतारों के बीच से एमएनसीज के ब्राण्ड्स पर नज़र डालता हूँ। वे उकसाते हैं। उनमें भव्यता का गुरूर है। उनमें विलासिता की बू है। वे मुझे धूप और लू की दुनिया से बाहर खींच कर अपने पास बैठा लेना चाहते हैं। मेरे पास मगर बुझे हुये वक़्त का बहता दरिया है और यादों की टूटी फूटी नाव है। इसलिए मैं एक दोस्त का हाथ थाम कर बाहर ही बैठ जाता हूँ। ये एक लेंपपोस्ट के नीचे लकड़ी से बनी हुई गोल सीट है। मैं कहता हूँ- देख कहाँ चला आया हूँ। वे नौजवानी के दिन, वे रेत के टीलों के बीच आंधियों के साथ उड़ती आती धूल के दिन जाने कहाँ छूट गए हैं। वे दिन जो असीम प्रेम और अकूत लज्जा के दिन थे। उन दिनों ऐसे मौल और सेलफोन क्यों न ईजाद हुए। हम किसलिए बूढ़े हो गए हैं। इससे भी बड़ी बात कि इस उम्र में भी अक्ल की कमी है और प्रेम ज्यादा। मैं लेंपपोस्ट से पीठ टिका कर भूल जाना चाहता हूँ, अभी थोड़ी देर पहले बाइक से गिरे दो नौजवान लोगों की चोटों को, नीलगाय के अचंभे को, अपने अतीत को और अपनी रूह के इस कारनामे को कि चोट खाना और चलते जाना। 

अगर ज़िंदगी फिर से किसी अंधेरी सड़क के किनारे कुछ देर के लिए रोक ले अपना सफर तो मैं उसे चूमते जाना चाहता हूँ। कि मैंने क्या नहीं किया तुम्हारे लिए?


May 15, 2013

जिजीविषा के आखिरी छोर पर


काँच के प्याले में
आइस क्यूब्स के गिरने की आवाज़ आती है
जैसे तुम्हारा हेयर क्लिप
अंगुलियों से छिटक कर गिर पड़ता है आँगन पर।

और खुल जाता है, जूड़ा याद का।

मैं इस तीज के चाँद को देखते हुये सोचता हूँ
कि एक टूटा हुआ दिल भी थोड़ा सा चमक सकता है रात में
अगर तुम मुड़ कर देख सको उस अंधेरे की तरफ, मैं जहां हूँ।
* * *

उस तरफ नज़र गई जिधर अरसे से एक उदासी थी। खालीपन की उदासी। समय जैसे घूल के रंग में ठहर गया था। अचानक से चटक गए ख्वाब से जागते ही जैसे हम देखने लगते हैं आस पास की चीजों को वैसे मैंने देखा कि रेगिस्तान के पौधों जाल और आक पर नई कलियाँ मुस्कुरा रही थी। गरमी में लोग ठंडी जगहों पर दुबके हुये दिन के बीत जाने की आशा में वक़्त को गुज़र रहे थे। मगर रेगिस्तान के पौधे, नए पत्ते लिए झूमने की तैयारी में थे। ये गर्मी तकलीफ है, ये ही गर्मी नए खिलने का सुख भी है। प्रेम के बारे में सुना है कभी? प्रेम जो सुख और दुख जैसे मामूली अहसासों से परे, जिजीविषा के आखिरी छोर पर पर साबुत चमकता रहता है। वह जो अजीर्ण है। मैंने कहा- तुम रहना। तुमने मुझे इसके बदले वह दिया जो तुम्हारे पास था। किसी के होने कि दुआ करना और उसके प्रेम में होना कोई दो अलग काम नहीं है।

कल सुबह कोई आस पास था। एक सीला मौसम मेरी आँखों में रख कर छुप गया। मैं नम आँखों से देखता रहा कि दुनिया कायम है। समय की दीवड़ी से रिसता हुआ जीवन का पानी सूख रहा था।किसी सदमे का सौदा फिर से सर पर सवार होने को होता है। मैं उठ कर चल देता हूँ। धूप से गरम हुई हवा अपनी गिरहें बुनती रहती है। लू के झौंके आते जाते हैं। मैं सेल फोन लिए हुये छत से पहले माले और वहाँ से ग्राउंड फ्लोर तक के चक्कर काटता रहा हूँ। देखता हूँ कि बदन झुलस रहा है। सोचता हूँ कि ये बदन किस काम का है?

 
[Painting Image Courtesy : Filomena Booth]

May 12, 2013

परछाई की गंध

आँधी का झौंका
उड़ा देता है, रेत की कच्ची परत
आधी रात को चिंगारी जागती है लंबे अवकाश से।

दो बूंदें भिगो देती है 
स्याही पर चमकती आग की रूह को
रेगिस्तान फिर सो जाता है पिछली रात के ख्वाब में।

मद्धम हवा पुकारती है एक विस्मृत नाम
और फिर रात के लंबे घने बालों में ओढ़ लेती है चुप्पी।

अलसाई गठरी से चुन कर
याद का रेशमी धागा
चिड़िया अपने घोंसले में लिखती है बीते दिनों की परछाई की गंध।

वक़्त की राख़ को पौंछ कर
आसमान में चाँद सजा लेता है एक सितारा अपनी दायीं तरफ।

तुम भी देखो, मैं ज़िंदा हूँ इन सबमें थोड़ा थोड़ा।
* * *


[Painting Image Courtesy - Joan Miro]


May 9, 2013

असमाप्य बिछोह के रुदन का आलाप



हवा के जादुई स्पर्श के बीच असमाप्य बिछोह के रुदन का पहला लंबा आलाप कानों में पड़ता है। मैं डर कर चौकता हुआ जाग जाता हूँ। मैं अपने घर की सीढ़ियाँ उतर कर ग्राउंड फ्लोर तक जाने के दौरान आवाज़ का ये पहला टुकड़ा सुनता हूँ। मेरे मन पर असंख्य आशंकाओं के साँप लोट जाते हैं। मेरी माँ का ये रुदन किसलिए होगा? मेरे मन में पहला खयाल आता है, मेरे बच्चे। एक सिहरन सर से पाँव तक पसर जाती है। मैं खुद से कहता हूँ उनको कुछ नहीं हो सकता। सीढ़ियाँ उतर कर माँ तक जाने से पहले ही देखता हूँ कि मैं उठ कर चारपाई पर बैठा हुआ हूँ। एक बुरा स्वप्न था। सुबह की ठंडी हवा में छत की मुंडेर के पार हल्का उजास घरों की दीवारों को शक्ल दे रहा था। मैंने अपनी आँखें फिर से बंद कर ली ताकि अगर ज़रा और सो सकूँ तो इस दुस्वप्न को भूल जाऊँ। मैं सो जाता हूँ और एक नया सपना शुरू होता है। 

मेरे घर में एक लड़की आई है। उसने तंग और छोटे कपड़े पहने हैं। वह लोहे के सन्दूक में अपना वो सामान खोज रही है जो पिछली बार यहीं छूट गया था। मैं उसे ऐसा करते हुये देख कर महसूस करता हूँ कि वह अजनबी है। एक उदासी घिरने लगती है। नीम अंधेरे में उसे गहरे रंग की वह पोशाक मिल जाती है। वह जैसे आई थी वैसे ही बाहर निकल जाती है। मैं गली में आकर देखता हूँ कि उसके साथ कोई था। जो उसे यहाँ तक लाया था और ले भी गया। मैं एक पुराने महानगर तक उसका पीछा करना चाहता हूँ। मैं उसे कहना चाहता हूँ कि तुम मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकती। मगर मैं बेजान पाँवों से चलने की कोशिश में गिर पड़ता हूँ और रोने लगता हूँ। फिर वही बिछोह के रुदन का राग मेरे गले में आकर अटक जाता है। 

अपने लेपटोप के की-बोर्ड को टटोलता हूँ और कुछ पुराने पते खोजता हूँ। देखता हूँ कि किस तरह उसको रोका जा सकता है। वहाँ कोई उम्मीद नहीं आती। अंधेरे पुराने घर में खिड़की से मद्धम रोशनी आ रही है। वहीं एक मरी हुई मकड़ी पर नज़र रुक जाती है। मैं देखता हूँ कि ज़िंदा मकड़ी की जगह मरी हुई मकड़ी की टांगें ज्यादा कलात्मक मोड़ लिए हुये हैं फिर अचानक से खुद को देखता हूँ। सदियों से एक ही जगह पड़ा हुआ पाषाण हूँ। धूप नहीं है बस एक सीला अंधेरा है। मेरे इस हाल को देखकर फिर से रोना आता है मगर रो सकने लायक हाल नहीं बन पाता। मैं बरबाद तो हूँ मगर दिख रहा हूँ एक साबुत पत्थर की तरह। दुनिया जा चुकी है और मैं अंतहीन प्रतीक्षा में हूँ। 

सवेरे का सूरज तप कर सर पर टंग जाता है। सुबह के आठ बजे हैं। छत पर चारपाई पर सो रहा हूँ। धूप मेरे मुंह को चूम रही है। मैं उस लड़की की शक्ल याद करना चाहता हूँ। सुबह को कहता हूँ कि बुरे ख्वाब अच्छे होते हैं। कोई तुमसे खूब प्यार करने वाला है। तुम्हारे बच्चे खुश रहने वाले हैं। माँ को सुकून आने वाला है। डरो नहीं, उठो और काम पर चलो कि इस दुनिया में एक दिन सबको ही चले जाना है। तुम अकेले होने का अभ्यास करो। सोचो कि इस तमाशे से जितना जल्दी बाहर आया जाए उतना अच्छा। 
* * *

हवा में एक आवाज़ आती है। तुम्हारे शब्द मेरे कानों का प्रिय संगीत है। मैं देखता हूँ कि मेरा महबूब अंधेरे में उचक कर उड़ गयी एक तितली है। मेरी आँखों की हैरत, मेरे दिल की ज़ुबान। उसे आदत है दुनिया के सबसे दूर ठिकाने पर रहने की। मैं रेत के समंदर का मुसाफ़िर हूँ। 

May 6, 2013

मार गिराता हूँ दिन और रात


बम वर्षक विमान गुज़रता है 
रेगिस्तान के ऊपर से
और ढह जाता है रेत का किला
लकड़ी के उम्रदराज़ पुराने लट्ठों के बीच
मकड़ा झूलने लगता है टूटे जाल पर।

मैं घिसटता हुआ आता हूँ बाहर
और सूरज को टटोल कर देखता हूँ
कि समय के घड़ियाल में चल रहा है कौनसा साल।
* * *

एक मरा हुआ आदमी
चहलकदमी करता है अतीत में।

डॉक्टर पौंछता है पसीना
मैं हँसता हुआ कहता हूँ अपने हाथों को सूँघिए ज़रा
इनमें एक लड़की की खुशबू है।

डरा हुआ आदमी नहीं सूंघ सकता अपने हाथ
मगर सच है कि
एक मरा हुआ आदमी चहलकदमी करता है अतीत में।

वही अतीत जिसमें से तुम, सब चीज़ें ले गए बुहार कर। 
* * *

मैं खाने की मेज पर बैठा हुआ
मुस्कुराने लगता हूँ
कि इस कांटे को
काली मिर्च वाली फूल गोभी की जगह
चुभोया जा सकता है आँख में।

मेरी डरी हुई बीवी को
डॉक्टर देता है सांत्वना
मैं डॉक्टर की शक्ल देख कर फिर मुसकुराता हूँ
कि इसको कौन करता होगा प्यार।

डॉक्टर की मेज पर रखा है पेपरवेट
मैं फिर दोबारा मुसकुराता हूँ
कि काश इसे खाया जा सकता पकी हुई फूल गोभी की तरह। 
* * *

मैं एक आभासी दीवार पर बनाता हूँ
सहवास की कामना से भरा मस्तिष्क

फिर

उम्मीद की दुनाली बंदूक में भरता हूँ
गुलाबी, सफ़ेद, पीली, गुलाबी, सफ़ेद, पीली गोलियां
उनको दागता जाता हूँ एक नियत अंतराल से
इस तरह मार गिराता हूँ दिन और रात।

हर सातवें दिन डॉक्टर थपथपाता है मेरी पीठ
मैं ज़िंदगी की लड़ाई के लिए 
लौट आता हूँ अपने सीने पर कारतूसों वाला पट्टा बांधे 
फिर से सात दिन और रात के लिए। 
* * *

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.