July 28, 2010

मैं कब ज़िन्दगी को तरतीब में रखना सीखूंगा, एंथनी !


एंथनी हट्टन होता तो इस समय कोई स्पेशल डिश बना रहा होता. उस डिश को खा चुकने से पहले ही उससे एक साल बड़ी कैली शेपर्ड उसे अपनी बाँहों में कस कर मार डालती या फिर शायद वे देर तक आईस हाकी खेलने जैसा नृत्य करते हुए थक कर चूर हो रहे होते. हो सकता है कि कैली कहती "एंथनी तुम फायर मेन क्यों बन गए हो, तुम उस लाल रंग की कठोर टोपी के नीचे से हरदम जागती आँखों से मेरे सिवा सब के बारे में सोचते ही रहते हो." एंथनी के पास सब बातों के जवाब रहे होंगे, पता नहीं उसने कैली को दिये या नहीं.

एक लाल रिनोल्ट ने उस बीस साल के नौजवान सायकलिस्ट एंथनी हट्टन को कुचल कर मार दिया था. दुनिया में सड़क हादसों में बहुत लोग मरते हैं किन्तु एंथनी अनमोल था.

दो महीने पहले तेरह एप्रिल के दिन सैंतालीस साल के रसेल हट्टन अस्पताल के बाहर खड़े हुए एक टीवी चेनल से बात कर रहे थे. मैं उस हतभागे को सुनता हुआ रोने लगा. एक पिता अपने बेटे की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए खड़ा था. वह अपने बेटे के अंगों का दान किये जाने की कार्रवाही में सहयोग कर रहा था. "वह चाहता था कि अगर मुझे कुछ हो जाये तो मेरे शरीर के सभी उपयोगी अंगों को जरुरत मंद लोगों को दान कर दिया जाये." एक हिचकी के बाद और रुलाई फूटने से पहले उसकी माँ कहती "वह सिर्फ ग्रेज्यूएट ही नहीं वरन अच्छा शेफ था लेकिन उसने इस पढाई के पूरा होते ही फायर सर्विसेज को सेवा देने की ठानी. वह हमारे घर का सबसे योग्य और सुंदर बच्चा था." फिर वह कहती "मैं उससे बहुत प्रेम करती हूँ..." इसके आगे उसके पास शब्द नहीं थे.

वह इस जुलाई के महीने में अपना इक्कीसवां जन्मदिन मना रहा होता और अपनी इस बात पर अडिग रहता " 'I would rather live the life I do for two days than live a long life and be bored." एंथनी ने ज़िन्दगी के लिए सारी तैयारी कर के रखी थी और मरने के बाद की भी... मैंने अभी तक कुछ नहीं किया है.

सोचता हूँ कि बीस साल की उम्र में वह कितना सुलझा हुआ था और मैं ? कल रात से बहुत उदास हूँ. एक पुरानी दोस्त जो किसी सूरत में पिछले दस सालों से दोस्त नहीं है. उसे भूल जाना चाहता हूँ. मेरी चाहतें नास्तिकता की हद से भी आगे की और बहुत असामाजिक है. मैं कुछ ऐसे जीता आया हूँ जिसे ईमान वाले धोखा कहते है, मैं कहता हूँ कि राहत है ... आज एक मित्र ने कहा है, खाली एक दम खाली हो जाना कभी कभी बेहद ज़रूरी... काश ये मेरे पास बैठ कर कहा होता ?

July 20, 2010

शामें सुस्त है मगर बोझिल नहीं

छः दिन हो गए हैं. शाम सात पचास पर सीढियां चढ़ता हूँ, घूम कर मुड़ता हुआ फिर से चढ़ता हूँ और ऐसे मैं अपनी छत पर पहुंचता हूँ. मेरे हाथ में लेपटोप, एक चिल्ड पानी की बोतल, बच्चों टिफिन जैसे प्लास्टिक के पात्र में स्नेक्स और बीवी के गोल लंच बोक्स जैसी बंद होने वाली कटोरी में सलाद होता है. छत पर एक झोंपड़ी की शेप का कमरा है. जिसमे तीन तरफ से हवा आती है. उसके आगे बरामदा और लेट-बाथ है. इस झोंपड़ी में तीन चारपाइयां और छत पर बिछाने लायक बिस्तर रखे हैं. एक सोफा है और तीस - पैंतीस आंग्ल भाषा में छपी हुई प्राणी शास्त्र की पुस्तकें हैं. एक आले में हंस, पाखी, लहमी, वागर्थ, नया ज्ञानोदय जैसी मासिक त्रेमासिक पत्रिकाएं रखी हैं.

जलसा का पहला अंक भी है जिसके कवर पर चिर विवादित, धर्म नाशक, कुंठित और घोर साम्प्रदायिक कहे जाने वाले मेरे प्रिय बूढ़े बाबा का बनाया हुआ चित्र छपा हुआ है. मैं उस पर अधिक ध्यान नहीं देता क्योंकि मेरे यहाँ बरसात सात साल में एक बार होती है और धूप में छाता तानते ही हर कोई व्यंग करता है कि देखो लाट साहब या मेम साहब जा रही हैं इसलिए मेरे दिल में छातों की ख़ास क़द्र नहीं है
लेकिन तस्वीर से याद आता है कोई देश से निकल जाये तो भी वह दिल से कब निकलता है ?

एक निवार से बुनी हुई चारपाई बाहर निकालता हूँ, उसके पास टी टेबल पर लेपटोप रखता हूँ फिर ऊपर के आले में रखी शराब की तीन चार बोतलों में से रेंडमली कोई एक को बिना देखे नीचे खींच लेता हूँ. पहला पेग लेते ही जी मेल का कम्पोज ऑप्शन चुनता हूँ और कहानी लिखने लगता हूँ. तकरीबन बीस लाइन लिखने के बाद उसे ओटो सेव होने के लिए छोड़ देता हूँ... और किस काम की होती है शामें ? शराब पीने की या कहानियां लिखने की.

देर रात पत्नी कहती है तुम क्या हो... फिर पास आती और पूछती है, आज भी ? मैं कहता हूँ तुम मेरी कहानी पढो. मैं अभी नहा कर आता हूँ.

July 14, 2010

एक आत्ममुग्ध बयान और कुछ भड़वे

सेल फोन पर अभी एक मित्र का संदेश आया है. अंग्रेजी में लिखे गए इस संदेश का भावार्थ कुछ इस तरह से है. अल्कोहल का उपयोग कम करने का टिप. अगर आप कुंवारे हैं तो तो सिर्फ उन दिनों पियें जब आप उदास हों और अगर आप शादीशुदा हैं तो सिर्फ उन दिनों पियें जब आप खुश हों. मैं पढ़ता हूँ और मुस्कुराता हूँ. इसमें शादीशुदा जीवन पर तंज है कि वह अक्सर खुशियाँ कम ही लाता है. क्षण भर बाद मैंने उन दिनों के बारे में सोचा जब मैं शादीशुदा नहीं था और शराब से परिचित था.

मेरे परिवार के सभी आनंद उत्सवों में शराब का पिया जाना खास बात रही है. मैं देखता था कि मेरे परिवार के लोग मिल बैठ कर शराब पीते थे. उनके चेहरों पर कोई अवसाद या व्यग्रता नहीं होती थी. घर की औरतें इस काम के प्रति उदासीन ही बनी रहती या फिर इस दौरान वे योजना बना रही होती कि पार्टी के बाद के रात्रिकालीन एकांत में अपने पति को किस तरह से हतोत्साहित करना है. ये कोशिशें अक्सर कामयाब नहीं हो पाती थी क्योंकि दस बीस लोगों में से कोई एक लड़खड़ा जाता या फिर शराब के नशे में नाचने लगता या फिर अपनी माँ और बुआ को दुनिया की सबसे अच्छी औरत बताने के प्रयासों में इस तरह की हरकतें करता कि सब की आँखें शरारत से भर जाती. अब बहके हुए की पत्नी उसके बचाव में उतर आती तो बाकी सब स्त्रियाँ भी अपने सिरमोर को उनसे अच्छा साबित करने लगती. हर बार पार्टियाँ होती रहती और स्त्रियों की सभी योजनायें आपसी फूट से नाकाम भी.

मेरे चचेरे - ममरे भाई और मेरे ससुराल वाले भी इन पार्टियों में मेरे ताऊ - चाचा के साथ बैठते रहे. मैं कभी नहीं बैठा हालाँकि उस दिन मैं भी पीता था. मुझे कई बार बुलाया गया मगर मैं उनकी सेवा में खड़ा रहता और रसोई में बन रहे स्नेक्स लाना, आईस क्यूब्स रखने वाले डिब्बों को भरना और खाली बोतलों को समेटना जैसे काम करता था. मेरे पिताजी को पता था कि मैं पीता हूँ मगर उस दिन मेरे साथ न बैठने पर वे कैसा फील करते होंगे इसको लेकर संशय है फिर भी मैंने हर बार महसूस किया था कि वे मुझे गले लगाना चाहते रहें हैं. पार्टी के विसर्जित होने के समय सब के मन भीतर तक भीगे हुए होते थे. वे तरह तरह का प्यार जताते हुए सोने चले जाते. मैं जिससे बेहद प्यार करता था वे एक न जगाने वाली नींद सो गए हैं. जब भी पीता हूँ उनके लिए दो बूँद छलका ही दिया करता हूँ ताकि मेरी आँखों से उनकी याद शराब बन कर न छलके.

मैंने पहली बार साल चौरासी में शराब पी थी. मेरे से छोटे चचेरे भाई ने पिलाई थी. मेकडोवेल्स की तैयार की हुई रम थी. जाने क्यों अब भी मैं रम को निचले पायदान पर रखता हूँ. कुछ साल कभी कभी पी और साल नब्बे से मैं नियमित पीने लग गया. मेरे पास कोई ग़म नहीं था जिसे गलत करना हो. आमदनी से बड़े ख्वाब नहीं थे. जो मेरी दोस्त थी उनसे सुंदर इस दुनिया में लड़कियाँ न थी. जो मेरे भाई थे उनसे बढ़ कर सहोदर न थे. जो मुझे नौकरी मिली उसमे कुछ पढ़े लिखे लोगों को सुनना और मन हो तो अमल में लाना ही एक मात्र काम था. फिर भी जाने क्यों बिना किसी ग़म के पीता ही रहा हूँ. वैवाहिक जीवन मेरा बहुत मधुर है इसलिए नहीं कि मैं अच्छा हूँ वरन इसलिए कि वह बहुत ही सुंदर और मेरे प्रति 'दयालु' है. उसने कई बार इस बदबूदार पेय को छोड़ देने की गुजारिश भी की और धमकाया भी. लेकिन मैं पीता रहा और मेरी इस धारणा को बल मिलता रहा कि दुनिया को स्त्रियाँ ही बचाती रही है.

शराब पीते ही मेरे अंदर एक नकली किस्म का साहस अंकुरित होने लगता है. मेरी मांसपेशियों और मस्तिष्क के तनाव भले ही दूर न होतें हों मगर मैं उन पर केन्द्रित हुए ध्यान से मुक्त होता महसूस करता हूँ. मैं अपने पास संगीत को बजते हुए सुनना चाहने लगता हूँ. मित्रों के प्रति उनकी सदाशयता के लिए आभार से भरने लगता हूँ. बड़ी मौलिक बातें करता हूँ, ऐसी बातें जिन्हें आप होश में इसलिए नहीं कहते कि आपको अपने प्रेम का क्रेडिट कार्ड आल रेड्डी फ्रीज हुआ दीखाई देता है मगर पीते ही मैं कह पाता हूँ कि 'मैं तुमसे प्रेम करता हूँ' उस समय प्रेम की उत्त्पत्ति का स्रोत महत्वपूर्ण नहीं होता कि ये वासना से है या चाहना से. बस ऐसे ही कई साल बीत गए हैं.

शराब पीने से बड़े कई अफ़सोस है जैसे परसों आईफा एवार्ड्स में तीन मसखरे. जिनमे दो थे बोमन ईरानी और रितेश देशमुख, स्त्री को पहचान नहीं पाया. एक हास्य भरा नाट्य प्रस्तुत कर रहे थे. इसमें थ्री ईडियट्स के जन्म और उससे हुए आर्थिक लाभ को विषय बनाया गया था. स्त्री स्ट्रेचर पर लेटी है. वह प्रसव पीड़ा में है. उसके ऊपर एक सफ़ेद चादर बीछी है. बोमन और रितेश पेन्स आने पर उस चादर में अपना सर डालते हैं और एक बच्चे को बाहर खींच लाते हैं. यही क्रम तीन बार दोहराया जाता है. भारतीय सिनेमा के शीर्षस्थ लोग, एक नैसर्गिक क्रिया प्रसव को भोंडे प्रदर्शन में बदल कर प्रस्तुत किये जाने पर खिलखिलाते हैं और तालियाँ बजाते हैं. मेरा दिमाग कहता है कि ये हमारे विकास से उपजी रूढी रहित सोच से संभव हुआ है कि हम ऐसे विषयों पर इस तरह का सार्वजनिक नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत कर के हंस सकते हैं. दिल कहता है कि तुम साले भड़वे ही हो...

July 11, 2010

कुत्ते, तुम रोते क्यों हो यार ?

साल भर से मेरी स्थिति पंडित श्रीनारायण जैसी हो गयी है.
रांगेय राघव की कहानी रोने का मोल में पंडित श्रीनारायण का किरदार आते ही कहता है "धर्म नहीं रहा वरना दिनदहाड़े कहीं भला सड़क पर कुत्ता रोने दिया जाता है" बड़े लडके गोविन्द ने कहा "चाचा इसकी तो गरदन काट देनी चाहिए" छोटे मनोहर ने कुछ समझा कर कहा "रो लेने दो उसे, उसी ने उस दिन मेहरा के घर से उतरते चोर को पकड़वाया था." माँ ने टोक कर शीघ्रता से कहा "नहीं रे, यह बुरा सौं है. यम दर्शन होते हैं. क्यों मोहल्ले में मारे हैं सबको" श्री नारायण गरज पड़े "मनोहर, अबकी कहियो "
मनोहर उठ कर गंभीर हो गया. अँधेरा स्याह पड़ने लगा था. गोविन्द ने झटके से दरवाजा भेड़ दिया. अन्धकार में से कुत्ते ने सर घुमा कर इधर उधर देखा. दरवाजा बंद था. क्षण भर में वह सड़क पर आया और जोर जोर से रो पड़ा और द्वार खुलने से पहले ही अँधेरे में विलीन हो गया.

मेरे पड़ौसी राणा राम ने अपनी उम्र के अंतिम दिन विक्षिप्तता में बिताये. मैं उनको सुनता और उत्तर दिया करता था इसलिए सदा मुस्कुरा कर मिलते थे. एक सुबह वे घूमने निकले तो बीच रास्ते से एक पिल्ला उठा लाये. अब वे और पिल्ला दोनों परम मित्र हो गए. उनके लिए अपने दो बेटों और पत्नी से बढ़ कर पिल्ला था क्योंकि उसमे हर बात पर प्यार जताने और चाटने का गुण था. वह राणा राम की किसी बात का बुरा नहीं मानता था. उस पिल्लै को लाने के बाद वे एक साल तक जीवित रहे. वे चले गए तो उनकी याद में परिवार वालों ने कुछ महीने कुत्ते की ये सोच कर सेवा की कि पिताजी की आत्मा प्रसन्न रहेगी.

पिल्ला जब कुत्ता बन गया तो हर बात पर अधिकार जताने लगा. घर के आगे से निकलते हुए लोगों को काटने लगा. लोग आते और राणा राम के परिवार को गालियां सुनाते और लौट जाते. कुछ ने कुत्ते की मौका मिलते ही हजामत भी की. मार खाए कुत्ते को परिवार के लोग सहलाते और चाटते किन्तु वह दो दिन बाद फिर अपनी हरकतों पर उतर आता. गली के दूसरे कुत्तों से भय खाने के कारण वह ज्यादा दूर नहीं जाता और पडौसियों के दरवाजों पर अपने मूत की छाप लगाने लगा तो पडौसियों ने भी कुत्ते को राणा राम नाम दे दिया. हर दिन सुबह चाहे किसी और कुत्ते की करतूत हो स्त्रियाँ घर से बाहर निकलते ही एक दूसरे से कहती "ये कौन मरा" उत्तर मिलता "राणा राम..."

अपनी दीवार से लगते पड़ौसी राणा राम कुत्ते से मैं बहुत दुखी हूँ कि ये दिन और रात घर में बंधा हुआ रोता रहता है. इसके रोने से मुझे अब तक हल न हुई मुश्किलें याद आने लगती है और एक पढ़े लिखे आदमी की सारी पढाई हवा हो जाती है और वह सोचने लगता है कि कुत्ते का रोना वाकई बड़ा अपशकुन है.

July 10, 2010

भाई, मैं बहुत प्यार करता हूँ तुमसे अगर मर जाऊं तो ये याद रहे.

बीवी खाना दोगी ? लगता है जैसे उससे पूछ रहा हूँ. अभी वह स्कूल से नहीं आई है मगर भूख तेज लगी है. आँखें खोलता हूँ और सामने टी टेबल पर रखे लेपटोप को देखता हूँ दिन के बारह बजे हैं. नींद का झोंका फिर से आया और भूख जाग उठी. ड्राईंग रूम के सोफे पर लेटा हुआ मैं अपने मस्तक पर उभर आये पसीने को पोंछने के लिए हाथ बढाता हूँ ताजा हरा धनिये की खुशबू आती है. उस खुशबू में विम बार की गंध भी मिली हुई है. याद आता है कि मैं खुद अभी आलू और ग्वार फली की सब्जी बनाने के बाद बर्तन धोकर सींक साफ़ कर के आया हूँ.

बच्चे स्कूल गए हुए, उनके प्रोफ़ेसर चाचा कॉलेज और मेरी माँ गाँव यानि घर में अकेला हूँ. सुबह से उनींदा हूँ कि कल रात बारह बज कर पचास मिनट पर फोन आया. आधी नींद में उसका नाम देख कर भी यकीन नहीं हुआ कि उसने मुझे काल किया है. पिछले दस सालों में हमारी कभी बात नहीं हुई, तो इतनी रात गए ? खैर हाँ.. हाँ और हाँ के बाद उसे यकीन हुआ कि नंबर सही लगा है. सुनों आपके डी एस पी साहब की वाईफ इस समय पुलिस लाइन में चिल्लाती हुई गालियाँ दे रही है. हाँ वह देती है... कहता हुआ मैं पूछता हूँ कि क्या कर सकते हैं ?

उसने मुझे बताया कि सब पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी हैरत में नहीं अफ़सोस में हैं कि आखिर इस पागलपन का अंत कहाँ पर होगा... और मैं उसे सुनता हूँ बस सुनता हूँ. पास की चारपाई पर सोयी पत्नी जाग उठती है. नौ मिनट की बातचीत के दौरान हम इस पर बोलते हैं कि मेरा भाई क्यों बरदाश्त करता है ये अनुत्तरित प्रश्न है. वह कहती है कल पूछो अपने भाई से कि क्यों है ? क्या कहूँ उससे कि वह बड़ा बनना चाहती है, जबकि हम गरीबी में खुश हैं.

फोन रखते ही सीने में दर्द उठा. हर्ट अटेक की प्राईम ऐज़ में जी रहा हूँ तो डर गया कि पिताजी की तरह कहीं मैं भी दिल के दौरे से मर ना जाऊं. बीवी को छोटे भाई का नया नंबर बताया. उसकी चारपाई को नजदीक किया ताकि बेचैन होने पर उसका हाथ पकड़ सकूँ. उसको बताया कि अगर मेरे माथे पर पसीना और शरीर में अकड़न हों और उसके बाद शांत हो जाऊं तो मेरा सीना जोर से दबाना कोई तीन सौ पांच बार. इस दौरान छोटे भाई को फोन करना जो छत पर सो रहा है. इन उपदेशों के बाद भी दर्द नहीं गया. मैंने एक घंटा जागते हुए बिताया. बीवी समझाती रही अस्पताल चलो. मैंने कहा कोई फायदा नहीं मैं पापा को ले गया था मगर वे नहीं बच सके. दर्द को संभालता हूँ. हाथ रख कर देखता हूँ और दिल को दिलासा देता हूँ कि ये अपच के कारण है फिर बीवी को बताता हूँ कि हम अगले सप्ताह जयपुर जा रहे हैं लिपिड प्रोफाईल के लिए.

ज़िन्दगी उतनी ही आसान और उतनी ही मुश्किल है जितना उसे होना चाहिए.

July 4, 2010

ईश्वर, दोस्तों को मुहोब्बत से पहले यकीन दे या पीना सिखा दे

कल शाम से सोच रहा हूँ कि कुछ दिनों के लिए शराब पीना छोड़ दूं और ऐसा आदमी बन कर देखूं जो प्रेम से नहीं हिसाब से दुनिया में जीये. कल दोपहर में अपना लेपटोप खोला. मेल नहीं थे. कुछ दोस्तों के पन्ने देखे, वहां भी उदासी थी. एक मित्र से चेट करने लगा, इसी चेट के दौरान कल दोपहर तीन बज कर चालीस मिनट पर फोन आया.
कहाँ हो...? ऑफिस में हूँ... मैं आपके शहर में हूँ, मेरे पास आधा घंटा है और मैं ऑफिस रही हूँ. मैंने कहा जाओ.
टेबल पर रखी काम्पेक्ट डिस्क को हटाया. कुछ किताबों को अपने लेपटोप केस में डाला. पांव जूतों में डाल कर तस्मे कस लिए. बाहें ऊपर से नीचे करके दो दो बटन बंद किये. आराम कुर्सी से उठ कर ऑफिस चेयर पर बैठ गया. कुछ देर बाद उठा और रिसेप्शन के पास आकर खड़ा हो गया. बाहर नीले आसमान से आग बरस रही थी. इक्का दुक्का बादल किसी उधेड़बुन में इधर उधर हो रहे थे. नीम के नीचे बैठा द्वारपाल किसी आगुन्तुक से बतिया रहा था.

मैं खड़ा नहीं रह सका तो टहलने लगा. अंदर वातानुकूलन संयंत्र से शीतलता बरस रही और बाहर बेचैन कर देने वाली उमस. मैंने एक्वेरियम में मछलियों को देखा वे तैर रही थी. उन्हें भी मेरी तरह कहीं नहीं पहुंचना था. मेरा चार बार तबादला हुआ और मैं फिर से इसी क़स्बे में लौट आया यानि अपने एक्वेरियम में. मेरे जैसे और भी लोग हैं मैं उनसे टकराता हूँ एक आवश्यक तरीके का अभिवादन या क्षमा व्यक्त कर के आगे बढ़ जाता हूँ फिर से घूम कर टकराने के लिए.

बाहर सफ़ेद रंग की लम्बी कार रुकी शायद असेंट होगी. पिछले दरवाजे से सर पर लाल चुन्नी डाले और उसी चुन्नी से एक नन्हीं बची को ढके हुए वह बाहर आई. सफ़ेद कुरता, डेनिम जींस और बैंगनी रंग का जूट का बैग लिए हुए. ऑफिस के मुख्यद्वार में प्रवेश करते ही मैं उसकी ओर बढ़ा. दो कदम चलते हुए हम एक दूसरे के सामने थे. कैसी हैं आप ? फाइन...

ये ? मेरी बेटी है. बहुत सुंदर है... थैंक्स. क्या नाम है ? विदा... विदा ?
हमने एक दूसरे से सवाल दोहराए और उनके वही के वही उत्तर दिये. जैसे सब दिया करते हैं. जया कैसी है ? एकदम मस्त. मैंने पूछा, सुरेन्द्र ? वह चुप हो गई... तो मैं भी चुप. लो मैं आपके लिए सोफ्ट ड्रिंक लाई कि आपने कहा था जंगल में रहता हूँ जबकि ये तो शहर है. उसने तीन ग्लास में खुद सर्व किया. बिटिया चुप थी मगर अपनी उत्सुकता को दबाये हुए थी. उसे बहुत सिखाया गया होगा कि किस तरह पेश आना है.

भीतर नमी अधिक थी. ग्लास के आस पास पानी की बूंदें तैर रही थी. वे सरक कर नीचे आई तो उसने टिश्यू पेपर निकाला. अचानक मेरे मुंह से निकला. रहने दो यार... उसने एक नज़र देखा और सच में रहने ही दिया. पानी ग्लास के चारों और घेरा बनाने लगा. वह फ़ैल जाना चाहता था.
क्या चल रहा है ?
कुछ खास नहीं. उसी कंपनी में ला कंसल्टेंट हूँ इन दिनों कानून एवं मिडिया से जुड़े विषय पर शोध कर रही हूँ. कितना हुआ ? बस समय ही हुआ है काम नहीं... पांच सौ किलो मीटर से हाई कोर्ट तक आई और यहाँ काम भी था, फिर फिर आप भी थे. मैंने उसका आभार व्यक्त किया. मैं उसको देख कर खुश था. ऐसे ही कभी मैं, रज़िया और वह यूनिवर्सिटी की सड़कों के किनारे लगे पेड़ों की छाया तले बैठा करते थे. रज़िया आज कल नवोदय विद्यालय में प्रिंसिपल है. पोस्टिंग कहाँ है पता नहीं ? हाँ उसे मैंने ऑरकुट और फेसबुक पर खोजा पर 'तेरी तस्वीर से नहीं मिलती किसी की सूरत' वाला हाल बना रहा.

विदा के लिए मेरे ऑफिस में कुछ नहीं था मगर उसने ढूंढ लिया. वह काम्पेक्ट डिस्क से घर बनाने लगी.
कभी दिल्ली आते हो ? मैंने कहा नहीं. कभी आना होगा ? पता नहीं. इसके बाद उसने मेरे भाईयों, उनके बच्चों और कुछ पुराने दोस्तों के बारे में पूछा. यही मैंने भी पूछा तो बोली मैंने घर बना लिया है... खूबसूरत घर. उसमें एक मशीन भी जो मेरे आने जाने के मिनटवार ब्योरे दर्ज करती है. मेरे लिए पोस्ट पेड फोन और आउट गोईंग काल्स के नंबर वाले सब नाम याद रखना जरूरी है... सेलेरी हेड की डीटेल्स को हर महीने डिस्कस करने से भी घर मजबूत होता है. बस ऐसे चल रहा है.

सुरेन्द्र ? मैं आश्चर्य से पूछता हूँ.
वह शांत बने हुए कहती है, जाने दो...
शराब पीता है क्या ?
नहीं

वह बेस्ट स्कालर थी. उसने अपनी पसंद से एक प्रतिभावान लड़के से शादी की थी. मुझ पर हंसती थी... बेचारी जया... वह पहले भी कम ही रुका करती थी कल भी पंद्रह मिनट बाद उठते हुए बोली मेरी माँ और बहन मेरे साथ है. वे नक्काशीदार फर्नीचर देख रही हैं. बहन ने नया घर बनाया है. उसके आर्मी ऑफिसर पति को यहीं का फर्नीचर चाहिए था.

चलते हुए...
मैंने विदा से पूछा कि क्या आपको हग कर सकता हूं ? उसने अपनी मम्मा की तरफ देखा. वह मुस्कुरा रही थी. मैंने उसे गोदी में उठाया और बाहर कार तक छोड़ा. वे चले गए, मैं घर गया. शाम को जया ने आवाज़ लगाई फर्स्टफ्लोर के खिड़की दरवाजे बंद करके आओ काली आंधी रही है.

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.