December 27, 2012

जी ढूँढता है घर कोई दोनों जहां से दूर

मैंने फेसबुक पर अपनी प्रोफ़ाइल पिक्चर बदल ली है मगर ये शोक और विरोध का प्रतीक काला डॉट नहीं है। इस शर्मसार कर देने वाले अमानुषिक कार्य की भर्त्सना करता हूँ लेकिन मैं काला डॉट नहीं लगाना चाहता हूँ। ऐसा न करने के पीछे कुछ कारण हैं। सबसे पहला कारण है कि मैं बाहरी लक्षणों की जगह मूल व्याधि के उपचार का पक्षधर हूँ। मैं चाहता हूँ कि ज्वर पीड़ित समाज के तापमान को कम किया जाना चाहिए लेकिन उससे भी आवश्यक कार्य है कि ज्वर के कारणों की पहचान कर उनका उचित उपचार किया जाए। समाज की संरचना और उसके चरित्र को बुनने वाले कारकों पर गहन दृष्टिपात किया जाए। चिंताजनक स्थिति में ठहरा हुआ हमारा ये समाज शारीरिक और मानसिक रूप से रुग्ण हो चुका है। इस स्थिति से घबराकर, भयभीत होकर और अनिष्ट की आशंकों से घिर कर हम चिल्ला रहे हैं। इस सामाजिक स्थिति के जो कारण हम गिना रहे हैं, वे इसके वास्तविक कारण नहीं है। इस स्थिति के संभावित उपचार भी वे नहीं है जिनकी हम मांग कर रहे हैं। 

आपकी स्मृति में अब तक यह ठीक से होगा कि जब तक सरकारी विध्यालय नहीं थे, हम पोशालों में पढ़ा करते थे। ये पोशालें क़स्बों, गांवों और गलियों में किसी एक अध्यापक द्वारा संचालित हुआ करती थी, संस्कार,चरित्र और विध्या के सम्मान से भरी हुई। उन दिनों ये भी कहा जाता था कि किस पोशाल का पढ़ा हुआ है यानी इसकी शिक्षा और चरित्र का स्तर क्या है। शिक्षा एक कारगर उपस्करण है। ऐसा माना जाता है कि शिक्षा के अभाव में मनुष्य निरा पशु समान है। वह अज्ञानी, समाज के लिए केवल अनुपयोगी ही नहीं वरन एक खतरा भी है। इसका एक अभिप्राय यह भी है कि शिक्षित करके मनुष्य को संवारा जा सकता है। उसका अपने लिए उपयोग भी किया जा सकता है। जैसे किसी पाने से गाड़ी का पहिया कस कर यात्रा को सरल किया जा सकता है वैसे ही उसी पाने से खोल कर पहिया चुराया भी जा सकता है। अर्थात उपस्करणों का उपयोग दिशा बदल सकता है। संभव है कि इसीलिए अंग्रेजों में भारत में मिशनरीज़ स्कूलों की स्थापना करके उनका एक तंत्र विकसित किया। इस बात को हम सरलता से समझ सकते हैं कि ऐसा करने के पीछे कोई उद्धेश्य अवश्य रहा होगा। अकारण तो हम कोई काज नहीं करते हैं। हिन्दू, मुस्लिम और बौद्ध विश्वविध्यालयों की अवधारणा के पीछे अगर कोई पवित्र दृष्टिकोण रहा भी हो तो भी यह एक धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक समरसता वाले राष्ट्र की नीव में सीलन ही है। मैं अपनी बात को इस मार्ग पर नहीं ले जाना चाहता हूँ। मैं आपका ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ कि आखिर आज क्यों गली गली में निजी शिक्षण संस्थानों का बोल बाला है। अंग्रेज़, मिशनरिज के माध्यम से अपने लिए कुछ चाहते थे तो आज के दौर में हम इन संस्थानों से क्या चाहते हैं? इस तथ्य को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। 

सरकारी शिक्षण संस्थाओं को बलहीन करने का काम अस्सी के दशक से शुरू हुआ। नब्बे के दशक में यह अपने चरम पर पहुँच गया। उच्च शिक्षा के लिए विध्यालय में की गई पढ़ाई और उससे प्राप्त अंकों को कचरा पात्र में डाल दिया गया। जिस शिक्षक को वर्षपर्यंत किसी बालक बालिका को संवारते जाना और इसके पश्चात अपने परिणाम को देखना, एक सुखद और आत्मा को प्रसन्न कर देने वाला कार्य हुआ करता था। हमने किसी षड्यंत्र के तहत उस शिक्षक से ये सुख छीन लिया है। उसके हाथ में एक क्ंठित बलहीन चाक थमा दी। हमने शिक्षक के पढ़ाये हुये को किसी भी रूप में उच्च शिक्षा अथवा रोज़गार के अवसर प्रदान करने वाला मानने से मनाही कर दी। हमने एक नई प्रतियोगिता का आविष्कार किया है, जिसने हमें बताया कि स्कूल में प्राप्त अंकों का आपके भविष्य के किसी आयाम से कोई संबंध नहीं है। अर्थात स्कूल में पढ़ना समय और धन का अपव्यय है। एक अच्छा इंजीनियर और चिकित्सक बनने के लिए या किसी भी सामाजिक विधा में कुशल होने की डिग्री लेने के लिए विध्यालयों की कोई भूमिका नहीं है। शिक्षा के इन संस्थानों को भेड़चाल सीखने की पोशालें बना दिया गया है। इसके बाद शिक्षकों से इतनी ही आशा रखी जाने लगी है कि ये प्रतियोगिता में बैठ पाने का प्रमाणपत्र जारी कर सकें। जिससे आत्म गौरव छीन लिया गया हो, आप उस शिक्षक की मनोदशा को समझ सकते हैं? क्या आपको अनुमान है कि उस शिक्षक-शिक्षिका का क्या हाल होगा जिसे परिणामहीन शिक्षा देने का दायित्व देकर आशा की जाती है कि वह अपना श्रेष्ठ आपके द्वारा संचालित इस समाज को सौपता जाए।

राज्य अपने दायित्व से मुक्त होने के लिए निजीकरण का सहारा लेता है। क्या शिक्षा इतना बड़ा बोझ है कि राज्य इस दायित्व को वहन करने में असमर्थ है। सुदूर गांवों से लेकर शहरों के विध्यालयों में कार्यरत  प्रशिक्षित, कुशल और श्रेष्ठ शिक्षकों से विध्यार्थी छीन लिए गए हैं। गेहूं को निजी संस्थानों में जाने को प्रेरित कर दिया गया और घुन को सरकारी विध्यालयों के हवाले। अच्छे प्रतिभावन बालक बालिकाओं के सामने एक डर रख दिया गया कि जो सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ेगा वही सबसे अच्छा पद पाएगा। इसके लिए विध्यालयों में वर्गभेद का आधार तैयार कर लिया गया है। माता पिताओं ने भी इसी डर को स्वीकार कर लिया और अपने सामर्थ्य से आगे बढ़ कर इसी दौड़ का हिस्सा होना अच्छा जाना। अब शिक्षा इस तरह दो फाड़ हो गयी कि एक तरफ लूट और माल बनाने का व्यवसाय करने वाली दुनिया के लिए आवश्यक प्रतिभाएं गढ़ी जाने लगी हैं और दूसरी तरफ भुखमरी और रोज़गार से वंचित निम्न स्तर का मजदूर वर्ग। यह अनायास नहीं हुआ है। सत्ता में बैठे हुये लोग अदूरदर्शी और विवेकहीन नहीं हो सकते हैं फिर क्या बात है? क्या ऐसे कारण है कि ज्ञान और चरित्र देने वाली संस्थाओं को निजी हाथों में सौप दिया गया है। क्या कारण है कि पढे लिखे और श्रेष्ठता से आधार पर विध्यालयों में चयनित शिक्षकों को खाली कमरे और सूने खेल मैदान दिये गए हैं। आखिर ये कैसी बिसात है? 

मैं शोकाकुल हूँ और काला डॉट लगाना चाहता हूँ मगर मैं ऐसा शिक्षा के निजीकरण के विरोध में करना चाहता हूँ। जो हमारे समाज के भविष्य को एक गहरी खाई में धकेलता जा रहा है। मैं उस शिक्षा के अभाव के लिए लगाना चाहता हूँ जिसने ऐसे कुंठित, बलात्कारी और हत्यारे मस्तिष्क तैयार किये हैं। जब तक आर्थिक और सामाजिक असमानता की पोषक इस शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाकर समरूपता को नहीं बुना जाएगा तब तक चरित्र निर्माण, कानून का सम्मान और राष्ट्रीयता की भावना के बीज अंकुरित नहीं होंगे। समाज के इस हाल और दुख व अफसोस से भरे हुये नौजवानों के प्रदर्शन को देखते सुनते हुये फ़ानी बदायुनी साहब का एक शेर ज़ुबान पर आकार ठहर गया है। "जी ढूँढता है घर कोई दोनों जहां से दूर, इस आपकी ज़मीं से अलग, आसमां से दूर" 
* * *
[Image courtesy : Thehindu]

December 17, 2012

क्रश का फिर से मुझ पर टूट पड़ना

हाय !! ये क्या हाल हुआ? मैं फिर से उसकी सूरत के सम्मोहन में खो गया। इसी साल मार्च में उस पर पहली बार ध्यान गया था। उसके गले में एक चोकोर ताबीज़ बंधा था। चाँदी का चमकता हुआ वह ताबीज़ हल्के सलेटी कुर्ते के रंग को बेहतरीन कंट्रास दे रहा था। उसकी भोंहें धनुष जैसी, दाँत सफ़ेद और रंग गोरा। उसे देखते हुये कल अचानक से याद आया कि हाँ ये वही है। साल भर पहले भी मैं इसी सूरत में खोया हुआ था कि वही लंबा, दुबला और आकर्षक बदन।

मैंने कई कहानियाँ सोची कि कच्छ के पास पसरी हुई नमक से भरी चमकीली धरती पर इसका साया कैसा दिखाई देता होगा। इसके कंधे पर रखा हुआ लाल और काले चेक का बड़ा सा स्कार्फ अगर किसी के गालों को छू जाए तो कैसा लगेगा। काश कि मैं इसके पास बैठूँ और कहूँ कि तुम सबसे सुंदर हो। मुझे प्रिय हो और वह डर कर भाग जाए और मैं प्रणय निवेदन गाते हुये पीछा कर सकूँ। मैं खो ही जाऊँ इसे खोजते हुये।

पिछले साल के इस क्रश का फिर से मुझ पर टूट पड़ना सच एक बड़ा सितम ही है। मैंने रिकॉर्ड करते समय सोचा कि मैं इसका नाम न पूछूंगा कि मेरा क्रश जाता रहेगा। इस तरह जान पहचान बढ्ने से आकर्षण की मृत्यु हो जाएगी। नजदीकी से चाहना का सुख चला जाएगा। लेकिन आखिर उन सबको शीशे के पार इस तरफ मेरे पास आना ही था। मैंने अगले कुछ और महीने तक खुद को इसी हाल में फंसाए हुये नहीं रखना चाहा। पूछ लिया- "आपका नाम क्या है?" उसने कहा- "हबीब ख़ान..." आप बहुत सुंदर गाते हैं। मैं उसे देख रहा था। उसके सिर के बाल बीच से सँवारे हुये थे और वे किसी सुंदर काले पक्षी के पंखों की तरह पीछे जा रहे थे।

उसकी आवाज़ सुनोगे? पहली आवाज़ असकर ख़ान साहब की है ऊंची आवाज़ उनकी पार्टी के दूसरे मेम्बर की है जबकि बीच वाली मीठी आवाज़ हबीब की है।
पागड़ियों रा पेच रे भंवर म्हाने ढीला ढीला लागे रे
किण जी रे आगे शीशड़लो निवायो, ओ हठीला रैण कठे गुमाई रे

आंखड़ियों रो सुरमों भंवर सा फीको फीको लागे रे
किण जी रे आगल नैनड़ला झुकाया रे, ओ हठीला रैण कठे गुमाई रे

मैं तो म्हारी गोरा दे रे, सासु रा जंवाई रे
सासू आगल नैनड़ला झुकाया रे बादीला रैण कठे गंवाई रे

दांतों री बतरिसी भंवर सा फीकी फीकी लागे रे
किण जी रे आगल, हंसने बतायो रे, बादीला रैण कठे गंवाई रे

आपकी पगड़ी के पेच ढीले लग रहे हैं, ओ प्रिय किसके आगे सिर नवा कर आए हो, रात कहाँ खोकर आए हो। आँखों का सुरमा भी फीका फीका लग रहा है, ये आँखें किस के आगे झुका कर आए हो। मैं तो मेरी गोरी का और मेरी सासू का जंवाई हूँ, सासू के आगे ही शीश नवाया है फिर ये आपके दांतों की बत्तीसी का भी रंग फीका फीका क्यों है कह दो किस को अपनी हंसी दिखा कर आए हो ये रात कहाँ बिता कर आए हो।


December 16, 2012

साहेब, इंडिया ले चलो


"जब आप मीरपुर खास के भिटाई कस्बे में पहुंचेंगे तो चौराहे के ठीक बीच में एक तम्बूरा आपका स्वागत करेगा। तंबूरे की विशाल प्रतिमा वाली इस जगह का नाम भी तम्बूरा चौराहा है।" मुझसे ऐसा कहते हुये संगीत के साधक नरसिंह बाकोलिया के चेहरे पर तंबूरे की विशाल प्रतिमा से भी बड़ा सुख उतर आया। 

"मैं मई में पाकिस्तान गया था। शंभू नाथ जी के साथ पंद्रह दिन मीरपुर खास के क़स्बों में उनके शिष्यों की आवभगत में रहने के बाद एक शाम संगीत की बात चल पड़ी। ठीक उसी शाम से उन महफिलों का दौर शुरू हुआ जिनमें भाषा और सियासत की सरहदों के निशान भूल गए। अगले पंद्रह दिन मेरा मिलना ऐसे लाजवाब संगीतकारों और रसिकों से हुआ कि मुझे दिन और रात छोटे जान पड़ने लगे। वे गरीब लोग हैं। मगर बहुत सम्मान देते हैं। इतना सम्मान मैंने कभी अपने घर आए प्रिय से प्रिय को न दिया होगा। उनका जीवन बहुत कठिन है। वहाँ अब भी बरसों पुराने घरों जैसे घर हैं। वैसी ही रेत उड़ती है। वैसे ही घरों में साग छोंके जाने की खुशबू आती है। उनका पहनावा मगर अलग है कि वे सलवार कुर्ता और सर पर टोपी पहनते हैं।

किसी काम में डूबे हुये आदमी या औरत को इंडिया नाम किसी ज़ुबान से सुनाई दे जाए तो सब कुछ भूल कर उसी तरफ चल पड़ते हैं जहां से इंडिया नाम की आवाज़ आई थी। मेरा कोई परिचय करवाता कि ये इंडिया से आए हैं तो सब मुझे आँखों में भर लेने और जिस मुनासिब तरीके से प्यार का इजहार किया जा सके उसी में लग जाते। मेरी आँखें भर आती। मैं सोचने लगता कि आदमी के दुख और उसकी उम्मीदें किस तरह हिलोरें मारती रहती है। मैं हर दोपहर और रात को किसी के घर संगीत महफिल में होता। गरीबों की लंबी कतारों में कुछ एक रईस लोगों के इक्के दुक्के घर भी हैं मगर जो प्यार मिलता है उसमें रत्ती राई का भी अंतर नहीं आता।

पंडित तारचंद, भिटाई कस्बे में रहते हैं। सत्तर साल की उम्र के ये शख्स उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ साहब के शिष्य हैं। संगीत में ही उम्र गुज़ार दी है। आपने शास्त्रीय संगीत की गायिकी के उन पहलुओं और सलीकों को ज़िंदा रखे हुये हैं जिनके बारे में हम कभी ख़याल भी नहीं कर सकते हैं। तारचंद जी ने मेरे साथ मिल कर अपनी गायिकी से रातों को सुबहों में बदल दिया। उनको लोग पंडित तारचंद कहते हैं लेकिन पंडित जी ज़रा सा वक़्त मिलते ही बड़ी नाउम्मीदी से कहते हैं "नरसिंह, मुझे अपने साथ इंडिया ले चलो" उनकी आँखों में कोई खोयी हुई तस्वीर उतर आती है।

नब्बे साल की उम्र के गायक सोम जी भाटिया से भी मैं मिल सका। वे इस उम्र में भी पांचवे सुर पर गा लेते हैं। ऐसा गाना कि जैसे कोई तड़पती हुई आत्मा की पुकार हो। उनकी आवाज़ दबे कुचले गरीब हिंदुओं और मुसलमानों के घरों में उजाला और उम्मीद भरती हुई सब दिशाओं में कूच कर जाती है। वे बेइंतिहा खुश होते हैं इंडिया का नाम सुन कर। कहते हैं ज़िंदगी एक ही लिखी थी और उसके भी नब्बे साल ऐसी जगह चले गए हैं... फिर ज़रा रुक कर अपने बच्चों की ओर आँखें रखते हुये मुझसे कहते हैं। इंडिया ले चलो साहिब, जान वहीं छूटे तो सुकून हो। कच्चे पक्के घरों में ज़िंदगी अपने निचले पायदान पर मगर किसी उम्मीद का दामन थामे हुये चलती रहती है।
अमरकोट में साठ फीसद हिन्दू हैं। बड़ा जिला है। एक तरफ आमों के बाग हैं एक तरफ रेत के टीले। बाज़ार ऐसे जैसे किसी गाँव की हाट में आ गए हों। सड़कें, रास्ते और गलियाँ अब भी किसी पुराने जमाने की धूल को फाँकती हुई। मगर मैंने देखा कि कबीर के भजन हर घर में बजते हैं। कबीर को सुनना पाकिस्तान में भी सुकून की बात है। इतना ही नहीं वहाँ एक शफ़ी फ़कीर नाम के ख्यात गायक हैं, वे कबीर को गाते हैं और वह भी प्रहलाद सिंह टिप्पणिया और साथियों की कॉपी करते हुये, ठीक उसी अंदाज़ में।"

मैंने पूछा- कैसा है उन लोगों का जीवन? 
नरसिंह बाकोलिया के चहरे पर कोई खुशी न आई। उनका चेहरा अचानक से सघन उदासी से भर आया। जैसे कहना चाहते हों कि हम बड़े भाग्य वाले हैं जो इंडिया में पैदा हुये। हमने आज़ादी की साँसे ली। हमने जिंदगी को सुख से जीते हुये कबीर को याद किया। जबकि वे कबीर को गा रहे हैं किसी उम्मीद और किसी संतोष के लिए। मैंने कहा नरसिंह आप मेरे प्रिय गायक हैं। आज लोक संगीत की हमारी राजस्थानी भाषा को ज़रा भूल कर मेरे कुछ दोस्तों के लिए कबीर को गा दीजिये। 


December 14, 2012

वाह वाह गुज़रा फ़कीरां दा...

तुम ठीक हो, मैं खराब हूँ।
मगर गफूर ख़ान मांगणियार और जमील ख़ान की आवाज़ में कुछ सुनोगे?
कुछ सूफ़ी.... जैसा मुझ कमअक्ल को समझ आता है, वैसा अर्थ कर दिया है।

इस दुनिया ने दिखावे में दाढ़ी को सफ़ेद कर लिया है
और पराया माल खाने वालों को सब्जी भी मीठी लगती है।

न कभी मंदिर मस्जिद गया, न ही कभी कब्र का अंधेरा देखा,
बुल्ले शाह कहता है तुझे उस दिन मालूम होगा जब मुंह पर (कब्र की) मिट्टी गिरेगी।

ज्ञान की हजारों किताबें खूब पढ़ी, अपने आपको कभी पढ़ा ही नहीं।
दौड़ दौड़ के मंदिर और मस्जिद गया मगर ख़ुद के मन में घुस कर कभी देखा ही नहीं।

इस तरह लड़ता है शैतान से आदमी, यूं कभी खुद से तो लड़ा ही नहीं।
बुल्लेशाह कहता है आसमान कब पकड़ में आया है कि मन में बसे हुये को छूकर देखा ही नहीं किया।

प्रिय हो प्रिय का सम्मान भी हो, वहीं मित्रता निभाने का सुख भी हो
मित्रता निभाने वाली ऐसी जगहों पर ही पीर और फरीद बसते हैं।

वाह वाह हम फ़कीरों का ज़िंदगी को इस तरह बिताना
वाह वाह हम अमीरों का ज़िंदगी को इस तरह बिताना
कि हम कभी मांग मांग कर रोटियों के टुकड़े खाते हैं, कभी हम अमीरों का भोज करते हैं
कभी हम सर पर छोटी पगड़ी बांधते हैं, कंधे पर दुशाला ओढ़ कर निकलते हैं, कभी हम लीर लीर कपड़ों में भी रह लेते हैं

वाह वाह गुज़रा फ़कीरां दा...

December 13, 2012

के वतन बदर हों हम तुम


मनुष्य की बुद्धि में एक दौड़ बैठी हुई है। वह हरदम इसी में बना रहता है। दौड़ने का विषय और लोभ कुछ भी हो सकता है। इस दुनिया की श्रेष्ठ वस्तुओं को प्राप्त करने की इस दौड़ में दौड़ते हुये को देख कर हर कोई मुसकुराता है। उसकी मुस्कुराहट इसलिए है कि वह दौड़ रहे आदमी के अज्ञान पर एक अफसोस भरी निगाह डाल लेता है। अगर कोई धन के लिए दौड़ रहा है तो दूसरा आदमी सोचता है कि इसके साथ धन कहाँ तक चलेगा। अगर कोई यश की कामना लिए दौड़ रहा है तो विद्वान आदमी सोचता है कि यश एक अस्थायी चीज़ है। एक दिन इसका साथ छोड़ जाएगी। जो आदमी ज्ञान के लिए लगा है उसे देखते हुये कोई आलसी सोचता है कि इसने आराम तो किया ही नहीं ऐसे ही पढ़ते हुये खप जाएगा। इस तरह के अनिश्चित परिणाम वाली एक दौड़ हम सबके भीतर जारी रहती है। हम सब उसके सही या गलत होने के बारे में कोई खास यकीन नहीं ला सकते है। मगर मुझे जब कोई इस तरह दौड़ते हुये रोक लेता है तब थोड़ी झल्लाहट के बाद मैं सुकून पाने लगता हूँ।

परसों रेलवे क्रॉसिंग के पास रोक लिया गया। मुझसे पहले भी बहुत सारे लोग खड़े थे। मैं पुराने शहरों की संकरी गलियों में रास्ता खोजते जाने के अभ्यस्त जीव की तरह लंबी कतार के बीच से रास्ता बनाता हुआ रेलवे क्रॉसिंग के पास तक पहुँच गया। आगे आने में भी एक सुख होता है, आगे आने की ही दौड़ होती है। जहां मैं पहुंचा वहाँ सिर्फ इंतज़ार ही हाथ लगा। मैंने अपने आस पास खड़े लोगों को देखना शुरू किया। सोचा कि अगर कोई दूसरी दुनिया होती है और वहाँ जाने पर कोई हिसाब पूछा जाता है तो कह दूंगा साहब रेलवे क्रॉसिंग पर खड़ा हुआ लोगों को देख कर आया हूँ। मेरे आगे दो सायकिल सवार खड़े थे। एक सायकिल के कॅरियर के साथ सायकिल की नंबर प्लेट लगी थी। उस पर नंबर ऐसे लिखे हुये थे जैसे मशीन से चलने वाले वाहनों पर होते हैं। इसे देख आर चौंकना इसलिए हुआ कि जिन वाहनों पर सही नंबर प्लेट लिखी होनी चाहिए वहाँ लिखा होता है “मुझसे दोस्ती करोगी” जैसा कोई दिल फरेब इन्विटेशन या अपनी जाति, धर्म, पहचान या फिर उस महकमे का नाम जिसके मुलाज़िम हैं। नंबर प्लेट्स अपराध रोकने में कारगर भूमिका निभाती है लेकिन हम इसकी कद्र नहीं करते हैं। हम इसे प्रदर्शन की चीज़ बना देते हैं।

मेरे बचपन से ही रेल की पटरी साथ चल रही है। घर के पास से गुजरती है। रेल की आवाज़ ऐसे आती है जैसे कि पास वाले कमरे से होकर गयी है। स्कूल भी रेलवे का ही था। वहाँ तक जाने के लिए रेल की पटरी पर इंजन बन कर चलते हुये कई साल बिता दिये। रेल की पटरियों में फिशप्लेट या ऐसा ही कुछ कहा जाने वाला एक लोहे का टुकड़ा लगा होता है। यह रेल की पटरी को उसके आधार से कस कर रखने में काम आता है। मेरे मुहल्ले के कुछ बच्चे इस तरह के लोहे के टुकड़ों को निकाल कर कबाड़ी को बेच दिया करते थे। मैं उनकी इस हरकत का गवाह होने से भी डर जाता था कि अगर पापा ने देख लिया तो वे क्या हाल बना देंगे। वे इतिहास के शिक्षक थे और कठोर अनुशासन में यकीन रखते थे। मैं रेलवे क्रॉसिंग के पास खड़ा हुआ सोचने लगा कि उस दौर के माता पिताओं जितना सख्त कानून होना चाहिए ताकि हमारा भय राष्ट्र की उन्नति का कारक बन सके। तुलसी ने किस बात से प्रेरित होकर कहा होगा कि “भय बिनु प्रीत न होत गुसाईं” नहीं मालूम लेकिन अक्सर मुझे ये सच जान पड़ता है कि स्वछंद व्यक्ति अधिक कलाधर्मी तो हो सकता है मगर जिस तरह की समाज व्यवस्था में हम जी रहे हैं उसके लिए हानिकारक होगा।

देश और मिट्टी से प्रेम करने के लिए ऐसे छोटे छोटे कानून कायदों का सम्मान करना ही सबसे ज़रूरी बात है। लेकिन हम देश प्रेम को कोई बड़ी चीज़ समझ कर उस काम के आ पड़ने का इंतज़ार करते हैं। हम रेल की पटरी में लगी फिशप्लेट और गाड़ी के पीछे लिखे नंबर को मामूली जानते हैं और इसका संबंध राष्ट्र प्रेम से नहीं जोड़ पाते हैं। एक प्राचीन यूनानी कथा के अनुसार एंटीयस नामक एक महान योद्धा था। कहा जाता है कि वह समुद्र के देवता पोसेईडन और धरती की देवी गीया का पुत्र था। एंटीयस अपनी माँ से बहुत प्रेम करता था। उसने उसे जन्म दिया था, दूध पिलाया था और पाला पोसा था। दुनिया में ऐसा कोई वीर न था जो एंटियस को परास्त कर सके। उसकी शक्ति इस बात में थी कि जब भी वह मुसीबत में होता अपनी मिट्टी को छू लेता और इससे उसे नयी शक्ति मिल जाती। इस अजेय योद्धा के इस राज़ को हरक्युलिस ने जान लिया था। उसने एंटियस को ज़मीन से अलग कर हवा में उठाए रखा और हवा में ही गला दबा कर मार दिया। इस दंतकथा का अर्थ बहुत गंभीर है कि जिस वक़्त तक हम अपनी मिट्टी की क़द्र करते हैं वह हमें जीवन जीने की नयी ऊर्जा देती रहती है। इसी मिट्टी से प्रेम करना ही सच्चा देश प्रेम है। रेल की पटरी पर लगी फिशप्लेट्स और वाहनों की नंबर प्लेट तो मिट्टी से कहीं ज्यादा कीमती चीज़ें हैं। इन चीजों को हम भारतवासियों ने अपने श्रम से बनाया है। हमें इनकी क़द्र करनी चाहिए।

मैं सोचता रहा कि ऐसा क्यों है कि ये सायकिल वाला नंबर प्लेट लगाने से प्रेम करता है। यानि इसके पास मशीन से चलने वाला वाहन नहीं है तो भी इसने सायकिल के पीछे एक नंबर प्लेट टांग रखी है जबकि जहां ज़रूरी हैं वहाँ जो लिखा होना चाहिए उसके सिवा सब कुछ लिखा होता है। मुझे वे अध्यापक भी याद आए जिनके नाम लेने से भी सब बच्चे डर जाते रहे हैं। आज वैसा कानून क्यों नहीं है। इस नस्ल को जो तहज़ीब दी है वह किसने दी है? क्या ये हम ही लोग नहीं हैं जो अपनी आने वाली पीढ़ी को मौज का पाठ पढ़ा कर जा रहे हैं जबकि हम सब को सलीके और क़द्र से जीने का पाठ पढ़ाया गया था। हम किस दौड़ के चक्कर में लगे हैं और क्या भूलते जा रहे हैं। कहीं ऐसा न हो कि एक दिन पड़ोसी हम पर हँसे कि देखो भारत देश के नागरिक किस रास्ते पर दौड़ते हुये कहाँ पहुँच गए हैं। हम अगर इसी हाल में जीते रहे तो हमें इस मुल्क में रहने का कभी हक़ नहीं होना चाहिए। फ़ैज़ ठीक कहते हैं कि “मेरे दिल मेरे मुसाफिर हुआ फिर से हुक्म सादिर, के वतन बदर हों हम तुम दें गली गली सदाएं”
* * *
राजस्थान खोजख़बर : 13 दिसंबर 2012 

December 12, 2012

आबूझ राजा राज करे...

ख़ुशगवार मौसम। धूप ज़रा सख्त लेकिन छांव सर्द अहसास लिए हुये।

भुट्टा खाँ के कानों में सोने के गोखरू चमकते हैं। मुझे देख कर मुसकुराते हुये अपने कानों को छूते हैं फिर अपने गले पर ऐसे हाथ फेरते हैं जैसे ख़ुद के गले को प्यार कर रहे हों। इशारा ये था कि आज आवाज़ ने धोखा दे रखा है। मैं इशारे से कहता हूँ कि आप फ़नकार हैं आवाज़ को पकड़ लाएँगे, जहां भी होगी। वे फिर मुसकुराते हैं। कल सुबह मैं एक अनचाहा ख्वाब देख कर जागा था। आज के इस वक़्त भी मैं कुछ भूल जाने जैसी कोशिश में था। लेकिन जो अनिश्चय था वह मुझे बरगला रहा था। मुझे नहीं मालूम कि मैं क्या चाहता था और क्या नहीं?

दोपहर के तीन बजे थे। दफ़्तर का काम अपनी लय में डूबा था और मैं अपने ख़यालों की दुनिया में खोया हुआ था। एक डे-ड्रीमर के पास दो दुनिया होती है। उसका निष्क्रमण जारी रहता है। मुझे कुछ चाहिए था। एक सर्द से स्टूडियो में शीशे के उस पार से कोई गरम गुनगुना स्वर आया। मुझे पहला अंतरा सुनते ही लगा कि दवा मिल गयी है। ये इस बेवजह की उदासी को छांट देगी। रेकॉर्ड होते ही मैंने टॉक बैक पर अपनी तर्जनी अंगुली रखी- "आप बहुत खूब गाते हैं। आपने मुझमें गहन सुख भर दिया है" इतना ही कह सका और एक दूसरे को देखते हुये हम देर तक मुसकुराते रहे। लोक गायिकी में शुद्धता के लिए जगह नहीं है, यहाँ सिर्फ आनंद प्रिय है। निर्मल आनंद।

ये निर्गुण भजन का निकटतम सुख है। इसे इसलिए पोस्ट कर रहा हूँ कि शैतान को मालूम है कि इस दुनिया में हर कोई मिस फिट है। जिसे जहां होना चाहिए वह वहाँ नहीं होता है।

बंसी बजावत धेन चरावत रास रचावत न्यारों
राधा जी रो सांवरों सब सखियन रो प्यारो॥

आछी रे पांख बुगले ने दीनी, कोयल कर दीनी काली
करमन की गत न्यारी ऊदा भाई, करमन की गत न्यारी॥

छोटा रे नैण गजअस्ति ने दीना, ओ भूप करे असवारी
मोटा रे नैण मृग नो रे दीना भटकत फिरे दुखियारी॥

नागर बेल निर्फल भई, ओ तुम्बा पसारे पोह भारी
चुतुर नार पुतुर ने झुरके, ओ फूहड़ चिण चिण हारी॥

आबूझ राजा ओ राज करे, रैय्यत फिरे दुखियारी
के आशा भारती सुण रे वशिन्धर दूर कर ए गिरधारी॥

बंशी बजाता है, गायें चराता है और सबसे न्यारा रास रचाता है, ये राधा जी का सांवरा सब सखियों का प्यारा है। सफ़ेद पंख बगुले को दिये और कोयल कर दिया काला, ओ ऊधो करम का हिसाब बहुत अलग है। जिस गजराज की सवारी बड़े महाराज करते हैं उसे छोटी आँखें दी है जबकि बड़ी आँखों वाला हिरण दुखी होकर भटकता फिरता है। सुंदर शोभन बेल पर कोई फल ही नहीं लगता और कड़वे फल तूम्बे वाली बेल फैलती पसरती ही जाती है। बुद्धिमान स्त्री पुत्र की हसरत में जीती रहती है जबकि फूहड़ स्त्री जनम दे दे कर थक जाती है। अयोग्य राजा राज करते हैं और रियाया माने जनता दुखी होकर घूमती रहती है। आशा भारती कहते हैं सुन ओ बंसीवाले ये सब दूर कर दो गिरधारी।

मैं इसे कल से सुन रहा हूँ और आराम है। मेरे बारे में ज्यादा सोचना मत कि मैं ऐसा ही हूँ।

December 11, 2012

दफ़अतन शैतान की प्रेमिका का आना

शैतान ने कई दिनों तक चाहा कि एक तमीजदार आदमी होने की जगह वह सब कुछ भूल जाए। वे सारे शुबहा जो उसे अक्सर रोकते थे मगर वह एक शैतान होने कि ज़िद में उन सब को किनारे करता हुआ रात की बाहों में सर्द अंगारे रख कर सो जाया करता था। उन सब बेतरतीब मगर ख़ूबसूरत रातों में एक हसीन दोशीजा के होने का अहसास साथ बना रहता था। हालांकि उसने कई बार इस बात पर शक़ जाहिर किया था कि तुम नहीं हो मगर उधर से आवाज़ आती कि मैं हूँ। 

आज सुबह होने से पहले के पहर में एक ख्वाब देखा। ख्वाब क्या कहिए कि वह पहली नज़र में किसी हसरत की छाया सा कुछ था। याद के पहले हिस्से में जो बचा हुआ है उसमें लंबे पलंग पर शैतान की प्रेमिका अधलेटी थी। पेंट करने के लिए दो प्याले रखे थे। शैतान उन दो प्यालों में भरे हुये एक ही रंग को देख कर हैरान हो गया। उसने चाहा कि इस बात का खुलासा हो सके इसलिए शैतान की प्रेमिका को अपने हाथ में पकड़ी हुई कूची से कुछ रंग केनवास पर उतारने चाहिए। लेकिन उसने साफ मना कर दिया। उसके चहरे पर एक अजब उदासी का रंग था। यह कोई सलेटी जैसा रंग था। शैतान को याद आया कि क्या उसका प्रिय रंग सलेटी है? 

शैतान की प्रेमिका ने एक निगाह डाल कर देखा कि वह यहाँ किस तरह पहुँच गयी है। उसकी अनमनी उदास आंखो को देख कर शैतान को ख़ुद पर गुस्सा आया कि उसने अपने मन की आवाज़ों को सुना क्यों नहीं? शैतान ने उससे कहा कि प्रेम कोई वस्तु नहीं है। इस बात पर शैतान की प्रेमिका शायद किसी और के बारे में सोचने लगी। शैतान ने उसे अपने ज़रा अधिक पास करते हुये उसके गाल चूम लिए मगर वे गाल भी उदास थे। ऐसे उदास जैसे किसी खोये हुये बच्चे के होते हैं। शैतान ने दोनों प्यालों को अपने हाथों में लिया और कहा- इनमें भरा हुआ रंग हम दोनों के बीच का है। शैतान की प्रेमिका ने कहा- मैंने तुमसे कभी प्यार नहीं किया। शैतान प्रेम करने के लिए नहीं होते हैं। 

ख्वाब में करवट बदलते हुये शैतान ने पाया कि सुबह होने को है और मेरी प्रेमिका को जाना ही होगा। सर्द दिनों की इस सुबह में पसीने से भरा हुआ शैतान बिस्तर पर बैठा हुआ था। उसकी स्मृति के ख्वाब में प्रेमिका के वक्ष खुले थे मगर वह ख़ुद आत्मा तक नंगा हो चुका था। उसने घुटनों के बल बैठते हुये कहा- मैं कोई नहीं बस एक हसरत हूँ या तो बुझा दो या फिर जला दो मुझको.... शैतान की प्रेमिका किसी के खयाल में खोयी थी। उसके पास कुछ देने के लिए नहीं था। 

उसने एक बार के लिए उदास खाली पड़े केनवास, कूची और रंग के प्यालों की तरफ देखा। शैतान ने उसे ऐसा देखते हुये देखने के बाद ख़ुद को हज़ार लानतें भेजी कि वह आदम होने की चाह में अपनी शैतानियत भी भूल जाता है। अगले पल सोचने को कुछ न था जिसे टूट कर चाहा था वह ख्वाब में भी अजनबी और भटके हुये मुसाफ़िर की तरह मिला। 

शैतान ने ख़ुद से आखिरी सवाल पूछा कि वह मरता क्यों नहीं है। इसलिए कि शैतान मरने के लिए नहीं आया है भले ही वह अपने काम भूल कर करने लगा हो प्रेम। 
* * *



ये तस्वीर बाड़मेर के रेलवे क्रॉसिंग के पास ली गयी है। इसमें एक साइकिल पर नंबर प्लेट लगी है। इसे देखते हुये बार बार कोई कह रहा था कि जहां जो चीज़ें होनी चाहिए वे अक्सर वहाँ होती नहीं है। वहाँ होती है जहां ज़रूरत नहीं होती, 

December 7, 2012

गोली मार दो, क्या रखा है?


दोपहर होने तक फरेब से भरे इश्क़ की दास्तां के पहले तीस पन्ने पढे थे। एक गहरी टिंग की आवाज़ आई। फोन की रिंग ऐसे ही बजती है। किसी निर्विकार, निर्लिप्त और संवेदनहीन हरकारे की आवाज़ की तरह। रिंग दोबारा बजने के बीच भी एक लंबा अंतराल लेती है। मैंने रज़ाई से दाहिना हाथ ज़रा सा बाहर निकाल कर बिस्तर को टटोला कि फोन कहाँ रखा है। दोस्त का फोन था। फोन पर हुई लंबी बातचीत में भरपूर गोता लगा आने के बावजूद कहानी जहां छूट गयी थी मैं वहीं पर अटका हुआ था। 

चार बजे एक अखबार के दफ्तर में बैठा था। 
अखबार वाले मुझे एक हज़ार शब्द लिखने के एवज़ में ढाई सौ रुपये देते हैं। मुझे ये न्यूनतम मजदूरी से भी कई गुना नीचे का मामला लगता है। लेकिन इस अखबार के लिए मैं इन चंद रुपयों के लिए नहीं लिखता हूँ। ये दिनेश जोशी का कहा हुआ है, इसलिए लिखता हूँ। "अहा ज़िंदगी" वालों ने एक कवर स्टोरी लिखने के दो हज़ार रुपये दिये थे। मैंने उस चेक को केश करा लिया मगर उस मित्र को खूब सुनाया, जिसने ये स्टोरी मेरी रज़ा के खिलाफ़ मुझसे ही सिर्फ दो दिन में लिखवाई थी। इतनी बड़ी पत्रिका को चार हज़ार शब्दों का मोल आठ आने प्रति शब्द तय करते समय डूब मरना चाहिए था। संभव है कि कुछ बड़े लोग और कुछ बड़े संस्थान कोई मौका दिये जाने जैसे भ्रम में जीते रहते हैं। 

मैं दफ्तर में कहानी नहीं पढ़ सकता था। हमें लोक संगीत की रिकॉर्डिंग का शेड्यूल बनाना था। एक पूरे पखवाड़े तक सुबह दस से शाम छह बजे तक स्टूडिओ में बीजी हो जाने के दिन दस्तक दे रहे थे। कुछ काम किया कुछ प्लान किया। सूरज बुझने को ही था कि घर चला आया। पेज तीस से आगे की कहानी शुरू होने को ही थी कि आभा ने आवाज़ दी। रमेश का एक्सीडेंट हो गया है। भाई साहब उसे लेकर आ रहे हैं। जल्दी अस्पताल पहुँचो। मेरा फोन काम नहीं कर रहा था, अब अचानक से दिमाग ने भी धोखा दिया। मैं हड़बड़ी में अस्पताल की ओर चल रहा था या शायद दौड़ रहा था। सीटी स्केन हो रहा था। किसी भाई ने कहा कि उसको होश है। मैंने सांस ली। 

रमेश सर्जिकल वार्ड भर्ती था। रात के दस बजे मैं भाई को लेकर घर आया। उनको अपने बेटे की चिंता थी। वे खाना नहीं खा सकते थे लेकिन तब तक डॉ सिंघल कह चुके थे कि मेरी आशा से ये ठीक है मगर फिर भी अगले चार घंटे तक पूरा ध्यान रखिए। उन्होने पूछा- आप किशोर हैं न? मैंने कहा- हाँ। वे कुछ और पूछते उससे पहले मैंने बताया कि मेरा भतीजा है। घर आकर हम दोनों भाइयों ने दो दो चपाती खाई। अस्पताल घर से तीन सौ मीटर दूर है। सोचा कि रात भर के लिए क्या चाहिए होगा? कुछ खास नहीं चन्दन पांडे का कहानी संग्रह इश्क़फ़रेब। 

मौसम जितना सुंदर था, रमेश उतनी ही करवटें बदल रहा था। उसको लगी ड्रिप में कई सारी दवाइयाँ थी। रात के दो बजे रमेश ने सही जवाब देने शुरू किए। उसने अपनी पुख्ता पहचान बताई। मुझे अब बहुत आराम हुआ। मैंने पास के पलंग पर बैठे हुये किताब खोल ली। 

प्रेम का विघटन या क्षरण नहीं हो सकता है। इसलिए उसे उसके हाल में ही स्वीकार करना पड़ता है। चन्दन की कहानी रिवाल्वर का मुख्य पात्र गौतम है। वह अपनी कहानी कह रहा है। उसकी बातों में निर्धारित आवृति वाला फ्लेश बैक है। यह क़िस्सागो का बूमरेंग है। जो लौट लौट कर आता है और फिर आगे की बात पीछे की ताकीद करती हुई बढ़ जाती है। नीलू एक वृहद बिम्ब की तरह खुलती है। किसी असीमित आकाश की तरह। धूसर रंग की नीली। प्रथम पुरुष कथा का कोरा पात्र नहीं है वरन इससे बढ़कर वह एक ज़िंदा आदमी का वुजूद है। इतना ज़िंदा कि मैं उस आदमी के सच से बड़े सच को याद नहीं रख पाता हूँ। इस कीमियागीरी में दो ही गहरे रंग हैं। एक है नीला और दूसरा नीले हो जाने की चाह का रंग। 

किताब देखते ही मैं सचमुच डर गया था कि सौ पन्नों की कहानी के लिए मेरे अब्बू मदद करें तो भी मैं पढ़ न सकूँगा। इससे पहले ऐसा गीत चतुर्वेदी कर चुके थे। उन्हीं यादों के साथ बैठे हुये पाया कि अस्पताल के दूसरे माले पर बने सर्जिकल वार्ड में भर्ती कुछ लोगों के पास नोकिया कंपनी के मोबाइल फोन थे। उनमें एक खास तरह का ऐप्प था। वे टूटे फूटे लोग शायद कई दिनों से इस वार्ड में थे और किसी खेल की तरह खेल रहे थे। उस ऐप्प से रह रह कर कोई छेड़खानी करता और आवाज़ आती- समय हुआ है तीन बज कर नौ मिनट... समय हुआ है तीन बज कर सोलह मिनट। सबके फोन में समय भी अलग अलग थे। एक ही टाइम ज़ोन में टाइम के बहाने किसी ने मुझे इतना कभी नहीं पकाया था। 

रमेश करवट बदलता रहा। उसके सर में हल्की सूजन थी। बदन-दर्द, दवाओं के असर से दबा हुआ था। एक बूढ़े मियांजी अपने बेटे के पलंग पर बैठे हुये बूंद बूंद सिंचाई जैसे उपक्रम को देख रहे थे। एक लुहारिन की सोने की नथ चमक रही थी। इसी लुहारिन को सबसे ज्यादा समय सुनने का शौक भी था। इसकी बगल वाले से एक आगे वाले बिस्तर वाला भी इसका ही सिरी (पार्टनर) था। वह ज़रूरी अंतराल देकर इसकी नक़ल उतार रहा था। रात मुसलसल बीतती जा रही थी। मैं अपने चश्मे को उतार कर आँखें पोंछता हुआ एक नज़र भाई पर डाल लेता। भाई गणेश छाप ज़र्दे के साथ चूना मसलते हुये सियासत, एजुकेशन, इंसानी स्वार्थ जैसे रेंडम विषयों पर अपनी कोई बात कह कर चुप हो जाते। मैं फिर इश्क़फ़रेब के चक्कर में पड़ जाता। 

रात का आँचल घना फैला हुआ था। किसी वजह से जगह बदल रहा कबूतर खिड़की के पास देर तक ऊट पटांग फड़फड़ाहट बिखेर कर चुप हुआ ही था कि अचानक से एक कुतिया के पंजों के नाखूनों के बजने की आवाज़ थी। वह कॉरीडोर से होती हुई आई। उसने लोहे की सभी चारपाइयों के नीचे सघन तलाशी ली। इसी वक़्त कहानी का गौतम प्रेम जैसी किसी शे के चोट खाये बदन पर उम्मीदों का मरहम रखते हुये प्रेम किए जा रहा था। तीन और प्रेमी थे। नहीं, वे प्रेमी नहीं थे। उन सभी के व्यक्तित्व बौने थे। वे गौतम जैसे बरगद की छाया में उगे हुये थे। उनसे नफरत ही नहीं हुई। वे कोई कोढ़ न थे, वे ऐपेंडिक्स थे। जिनको रिमूव करने की कोशिशें नाकाम हुई जाती थी। इसी अप्रत्याशा में गौतम उनको बार बार रक़ीब कह कर बुलाता था। 

सुबह चार बजे 
अस्पताल के बाहर हल्की ठंडी हवा थी। मुख्य दरवाज़े के पास चाय वाला था। वह रात की पाली में चाय बेचता होगा इसलिए आधी नींद के अभ्यास से भरा हुआ था। मैंने कहा दो चाय बना दो। आवाज़ सुन कर उसने मुझे पहचान लिया। बोला- कौन भर्ती है? भतीजा। क्या हुआ? एक्सीडेंट। कैसे? कार वाले टक्कर मारी। ज्यादा खराबी हुई? मैंने कहा नहीं सब कुछ बच गया है। वह चाय में डालने के लिए अदरक को किसने लगा। मैं मुस्कुराने लगा कि इसी जगह इसके पापा चाय और आमलेट सर्व करते थे। इसी जगह कितने ही दोस्तों ने हर रात नियम से पव्वे खाली किए थे। इसी जगह शराब से भरने के बाद दोस्त लोगों के दिल अस्पताल आते हुये मरीजों के दुख से भी भर जाया करते थे। शराबियों का खून डॉक्टर लोग लेते नहीं थे। शराबी कहते थे, एक बार लेकर देखो, मरीज का हुलिया बदल जाएगा। लेकिन दुख कायम रहते और आदमी को इन्हें बरदाश्त करने के सिवा कोई रास्ता न था। 

मैं रात भर से जाग रहा हूँ। कल सुबह के बाद से बहुत बीजी हूँ। अब सो जाना चाहता हूँ। मेरी स्मृति में गौतम के पास बहुत सारी पर्याप्त वजहें हैं। जिसकी ज़िंदगी की टहनी से प्रेम का एक परिंदा उड़ता है और चार वापस आ बैठते हैं। ज़िंदगी सदा हरे रहने वाले दुख के बूटे के पास खिले हुये परजीवी नीले प्रेम की परछाई है। 
* * *

Image - A model participates in a 2012 International Bodypainting Festival Asia at Duryu park on September 1, 2012 in Daegu, South Korea. The festival is the largest event in the field of body painting and spreads the art form to thousands of interested visitors each year. 
Photograph by: Chung Sung-Jun Courtsey theprovince.com

December 6, 2012

वो एक तस्वीर थी

एक श्वेत श्याम स्थिर छवि। 

वह गायक इसी लम्हे को जीने के लिए क़ैद कर लिया गया था। मगर वह जा चुका था। उसकी आवाज़ का कौमार्य शेष रह गया था। बार बार आलिंगन में बांध लेने और आवाज़ के होठों पर बोसे दिये जाने के लिए। आवाज़ की खनक से उदासी बुनने के हुनर के कारण कई लोगों ने खिड़की के बाहर देखते कितनी ही शामें बुझा दी होंगी। मुझे आवाज़ की भाषा की रेशमी तारबंदी के पार जाने का मन हुआ। ज़रूरी नहीं था कि पश्चिम के संगीत से ही बड़े खाली कमरों वाले घर की रात को भरा जा सकता हो, उदासी से। मैंने एक कमायचा के उस्ताद की छवि को उसी जगह रखा दिया। आवाज़ फिर भी वैसी ही थी। मन के गहरे से आती कोई पुकार। प्रेम करने का अनुरोध। कोई बिना ज़ुबान के बोलता हुआ कि आओ मेरे बदन को अपनी बाहों में भर लो। मुझे भिगो डालो। अजगर की तरह कस लो उस लम्हे तक के लिए जब तक कि भीतर की सारी हसरतों और दुखो का चूरा न हो जाए। 

वो श्वेत श्याम छवि एक मरे हुये आदमी की थी। वो आवाज़ नहीं थी, संगीत का एक टुकड़ा था, वह एक खूबसूरत दुख था, सफ़ेद काला रंग था। 

वो आवाज़ कुछ नहीं थी। एक नन्ही लड़की को चूम लेने या फिर उसे ऐसे ही जाने देने का प्रयोजन मात्र नहीं। यह उस लड़की के आने से पहले और जाने के बाद के रंग का चित्र भी नहीं। अपनी याद के रोज़नामचे के भीतर अटकी कोई तारीख भी नहीं। स्टुडियो के बाहर पेड़ों के साये बुन रहे लेंपपोस्ट की रोशनी के आस पास चक्कर काटते हुये सुने गए संगीत के दर्ज़ ब्योरों को फिर से मुड़ कर देख लेने की चाह भी नहीं। इसलिए कि मैं मर गया हूँ। जैसे आवाज़ की भाषा को न समझ कर कोई पतंगा रात की कुंडली की गंध के लोभ में मारा जाता हो। मैंने अपने परों को झाड़ लिया इसलिए नहीं कि एक बार और उड़ कर देखूँ, लेंपपोस्ट की रोशनी के आखिरी सिरे तक। यूं ही कि क्या करूँ? 

कमायचा गहरा था। उसकी ज़ुबान चुप हो गयी थी और अन्तर्मन से कोई हूक उठ रही थी। हॉस्टल के सीले कमरे में पड़े हुये ऐसे युद्धबंदी की आवाज़ थी जिसके पास वापसी का रास्ता खो गया हो। जिसने बदन की हरारत को तोड़ देने की अनेक कोशिशों के बाद कहा हो। आओ मुझे बाहों में भर लो। मुझे प्रेम करो। मुझे चूम लो। यह उसकी मुक्ति है। वस्तुतः यह शीशे के इस और उस पार वाला रंग है। पहली मंज़िल के किसी सस्ते बार में नाच रही नवयौवना या आधे भरे और खाली पड़े हुये पैमानों का प्रतिबिंब है। फुटपाथ पर पुरानी जींस और जोगर्स पहने बैठे हुये आधे बूढ़े आदमी के लिए प्रलोभन है। यह अंधेरे की मरीचिका है। यह गला रेतते हुये कसाई की ठंडी अंगुलियों को छूकर जाता हुआ गरम खून है। 

वो एक तस्वीर थी। जिससे एक ही आवाज़ आ रही थी, एक दिन तुम भी तस्वीर बन जाओगे। विस्मृति की बारिश में धुल जाने तक के लिए। 

मैंने अपनी कविताओं और कहानियों पर एक उदास नज़र डाली और उन लोगों को फिर से बहुत सारा प्यार किया जिनके लिए मैंने ये शब्द इकट्ठा किए थे। मैंने खाली पड़ी हुई बोतलों को देखा। करवट लिए पड़े हुये एक बाउल को देखा। मैंने पी जा चुकी शराब के बारे में सोचा। मैंने मटर के उन दानों को याद किया जो काले नमक से भरे हुये थे। मैंने बीते हुये लम्हों के लिए फिर से कोई धुन प्ले कर दी। रेगिस्तान की सर्द रात में बबूल के सफ़ेद लंबे कांटे जैसी धुन। 

श्वेत श्याम तस्वीर अब भी वैसी ही थी। मेरा इंतज़ार कर रही थी कि मैं कब मर कर ऐसा दिखने लगूँगा। मैं सोच रहा था कि ज़रूरी काम क्या है, जो इन जीने के दिनों में कर लिए जाएँ।



December 2, 2012

न आओगे मगर सुना है



जिनके हिस्से में ज़िंदगी बची रहती है, उनके हिस्से में रात भी आ जाया करती है। और रात के ग्यारह भी बजा करते होंगे अगर वे गुज़र न रहे हों किसी के ख़याल से।

मैंने कल की रात
सर्द रातों की आमद की खुशी में ओढ़ ली थी
एक नए गिलाफ़ वाली रज़ाई
जैसे किसी त्योहार पर घर में आते हैं नए कपड़े
और दर्जियों की अंगुलियों की खुशबू के साथ चली आती है, खोये हुये घरवालों की भीनी याद।

कल की रात दायें पाँव के नीचे दबा हुआ
रज़ाई का एक सिरा चुभता रहा कुछ देर ऐसे
जैसे कि शाम हुये घर आया हूँ
और कोई याद का टुकड़ा आ बैठा है किसी असमतल भूगोल की तरह।

सिर्फ दुखों की काली परछाई से नहीं बनी होती कोई रात 
और हर सुबह नहीं खिलती किसी अविश्वसनीय उम्मीद की तरह 
फिर भी हर तरह की शिकायतों और बेसलीका उदासियों के बीच 
मैंने किसी मौसमी चिड़िया की तरह पाया है, तेरी याद को।   

जिस तरह कई साल बीत गए हैं यूं ही
उसी तरह मैंने कर दिया एकतरफ रज़ाई का किनारा, मगर सो न सका
कि दीवार पर हथेलियाँ रखता हुआ कोई आता रहा करीब अंधेरे में
और मैं बेढब रास्ते में चलते हुये हर बार गिरता रहा, चौंक कर खुलती रही नींद। 

और तुम न आओगे मगर सुना है सर्दियाँ आएंगी हर साल गर हम न भी बचे रहे। 
* * *

[Image courtsey : Ary Snyder]

November 28, 2012

निर्मल रेत की चादर पर


किताबें बड़ी दिल फरेब चीज़ होती हैं। मैं जब भी किसी किताब को अपने घर ले आता हूँ तब लगता है कि लेखक की आत्मा का कोई टुकड़ा उठा लाया हूँ। परसों राजस्थान शिक्षक संघ शेखावत के प्रांतीय अधिवेशन के पहले दिन चौधरी हरलाल शोध संस्थान के प्रांगण में तने हुये एक बड़े शामियाने में जलसे का आगाज़ था। मुझे इसे सम्मेलन में एक वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था मगर मैं अपनी खुशी से वहाँ था कि मेरे पापा ने सदैव शिक्षकों के हितों के लिए लड़ाई लड़ी है। इस आयोजन स्थल पर बोधि प्रकाशन की ओर से पुस्तक प्रदर्शनी भी लगी थी।

मुझे दूर से ही किताबें दिख गयी। जिन्होंने कभी किताब को हथेली में थामा होगा वे जानते हैं कि इनकी खशबू क्या होती है। आज कल मेरे कंधे पर एक भूरे रंग का स्कूल थैला लटका रहता है। इस थैले को मानू या दुशु में से किसी ने रिटायर किया हुआ है। मेरे पापा भी ऐसा ही करते थे। वे हम भाईयों की रिटायर की हुई चीजों को खूब काम मे लेते हुये दिख जाते थे। मैं सोचता था कि पापा कितने कंजूस है। अपने लिए एक नयी चीज़ नहीं खरीद सकते। लेकिन अब समझ आता है कि ऐसी चीजों में अपने बच्चों की खुशबू साथ चलती रहती है।

मैंने स्टाल पर किताबों में एक खास किताब को खोजना शुरू किया। वह नहीं दिखाई दी। मैंने पूछा- क्या आपके पास विजया कांडपाल की किताब है? उन्होने कहा कि हम वह किताब नहीं लाये हैं। इस किताब का नाम है प्रेमांजलि। इसमें फिलीपीन्स में जन्मे कवि संतिअगो विल्लाफनिया की कविताओं का हिन्दी अनुवाद है। विजया द्वारा अनूदित कवितायें प्रथम पाठ में एक सुंदर सम्मोहन बुनती हैं। कुछ कवितायें मैंने एक ब्लोग पर पढ़ी थी। इस कविता संग्रह के बारे में मुझे शैलेश भारतवासी ने बताया था इस किताब को न पाकर मुझे एक बार लगा कि ये निराश करने वाली बात हो गयी है लेकिन बोधि प्रकाशन से ही मेरे प्यारे कवि रामनारायण 'हलधर' के दोहों का संग्रह आया है। मैंने उत्साह से पूछा- हलधर जी की किताब है? उन्होने मुसकुराते हुये कहा- हाँ है न।

इसके बाद मैंने बड़े सुकून से कई सारी किताबें देखी। थोड़ी ही देर में मेरे हाथ में कुछ किताबें हो गयी। मैं खुश हो गया।

सरकार में ऊंचे ओहदे रखने वाले सियासत के नामी लोगों के बीच मंच पर मुख्य वक्ता वरिष्ठ लेखक नन्द भारद्वाज जी बैठे थे। उनके पास मैं भी अपना वही थैला लिए बैठा था। इस भूरे रंग के बैग में अब तक ओम पुरोहित कागद, बल्ली सिंह चीमा, माया मृग, और रामनारायण हलधर की किताबों का आनंद भरा हुआ था। मैं सियासत और उसके कामों के बारे में कोई राय देने का हक़ नहीं रखता हूँ इसलिए मैंने अपने उद्बोधन में हंगरी के कुछ शिक्षकों की कहानियों पर बात की। हंगरी की ये कहानियाँ एक मित्र ने पिछले साल दी थी। उस दोस्त ने कुछ और भी दिया होता तो भी वह मेरे साथ होता मगर कहानियाँ मेरे लिए सबसे अद्भुत उपहार है।

माया मृग जी से मेरा परिचय कूल जमा छह महीनों का ही है किन्तु मैं उनको एक ऐसी सोच वाले प्रकाशक के रूप में जानता रहा हूँ, जो किताबों को जन जन की चीज़ बनाने को प्रतिबद्ध है। सौ रुपये में दस किताबें खरीदने की सोचना आपको एक बेतुकी बात लग सकती है। ये सच भी है कि हर एक प्रकाशक ढाई तीस सौ से नीचे एक किताब की बात ही नहीं करता है। ऐसे में पाँच सौ रुपये में भूरे रंग का बैग भर सकना मेरे जैसे मध्यम वर्ग के आदमी के लिए बेहद खुशी की बात है। मैं माया मृग का एक कविता संग्रह भी लाया हूँ... कि जीवन ठहर न जाए।

मैंने जब स्नातक किया था उन्हीं दिनों डॉ आईदान सिंह भाटी ने मुझे कुछ किताबें दी थी। उनमें ओम पुरोहित "कागद" की किताब भी शामिल थी "धूप क्यों छेड़ती है"। ओम जी के बारे में राजेश चड्ढा खूब बात किया करते हैं। वे उनके सुख दुख के अभिन्न साथी हैं। मैं दो साल राजेश चड्ढा के सानिध्य में रहा हूँ। इस बार भी किताबों के बीच "कागद" नाम देखते ही मुझे चड्ढा जी की याद आई। मैंने दो किताबें ली, एक है "पंचलड़ी" और दूसरी "आँख भर चितराम"।

बल्ली सिंह चीमा और रामनारायण "हलधर" मेरे प्रिय कवि हैं। दोनों ही ज़मीन से गहरे जुड़े हुए हैं। इन दोनों की ग़ज़लों और दोहों में ग्रामीण जन जीवन की आर्द्र गंध है। ये दोनों ही हक़ और हक़ीक़त की बात बड़े कायदे से करते हैं। इन दोनों के बारे में सोचते हुए मैंने पाया कि मुझे घर जाने की जल्दी है। मैं इन किताबों को जल्दी से पढ़ लेना चाहता हूँ। मैं बार बार इन किताबों के पन्नों के फेरे लगाना चाहता हूँ। मैंने कई कई बार किसी जल्दबाज़ बच्चे की तरह किताबों को सूंघा और खुश होकर सो गया। आज मेरी गरदन में बेतरह दर्द है। मैं अपनी डॉक्टर दोस्त की बताई हुई दवा को नियम से लेने के बाद भी कोई आराम नहीं पा रहा हूँ। इसलिए इन किताबों की बात करने बैठ गया हूँ।

मैं आलोचक नहीं हूँ। मुझे सिर्फ प्रेम करना आता है।

कागद की एक कविता :

बेकला री चादर माथे
आरी तारी सरीखा
काढ़े कसीदा अचपली पुरवाई कोरे समंदर हबोलो खावतो।

थार कबीर अंगेजै चादर मुरधरी, पण राखे जस री तस।

कविता का टूटा फूटा अनुवाद :

निर्मल रेत की चादर पर
अस्थिर वायु उकेरती है सोनल ज़री का बारीक कशीदा
चित्रित करती है, लहरों से भरा समुद्र।

कबीर सदीठ थार ओढ़ता बिछाता है मरुधर की चादर मगर रख देता है अनछुई।
* * *

मुझे इन्हीं दिनों अपने दादा नन्द भारद्वाज जी से उनका कहानी संग्रह मिला है। आपसदारी। इसकी दो कहानियाँ मैंने राजस्थानी में पढ़ रखी हैं और एक बेहतरीन कहानी "तुम क्यों उदास हो मूरहेन" विगत दिनों व्यापक चर्चा में रही है। फिलहाल मैं उदास तो नहीं हूँ मगर मेरे पास बदन दर्द और हरारत के बीच एक कुछ बेचैन लम्हे हैं।

November 23, 2012

तुम्हारा नाम, किसी तितली की तरह

उस वक़्त कायदे से सुबह जा चुकी थी मगर रात भर न सो पाने की खुमारी में कोई उम्मीद कह रही थी कि वह इसी गली से गुज़रेगा। आपको रुलाने के बाद जाने कौन कितनी दूर से चल कर आता है। कितने ही वायदे और उम्मीदें खत्म कर के... मगर नहीं आता कुछ भी सब्र की तरह सब कुछ आता है ख़लिश की तरह

मैंने हवा में बनाया एक सुंदर किला
उसमें बनाया एक जालीदार झरोखा तुम्हारे नाम का
उसी तरफ छोड़ दिया तीर, एक गुलाबी पन्ने के साथ।

इस मुश्किल जिंदगी में आसान हैं सिर्फ रूमानी ख़याल।
* * *

मैं रोता रहा चार दिन और तीन रात तक

हालात के सिपहसालार बने रहे पत्थर की मूरतें
अदने से कारिंदे भी भीग न सके, आंसुओं की गीली आवाज़ से
इससे ज्यादा उदास करने वाली कोई बात नहीं बीती, मेरे साथ।
* * *

मेरी जान, तुम्हें हर हाल में सोचना चाहिए
उन दिनों के बारे में, जो रोज़ खो जाते हैं, पश्चिम में

कि अभी तक मेरी मुट्ठी में बचा हुआ है, तुम्हारा नाम, किसी तितली की तरह
मगर मैं रहूँगा कब तक।
* * *

November 21, 2012

रात का एक बजा है

भविष्यवाणी के अनुसार
रुक गए बाज़ीगर के हाथ
गुरुत्वाकर्षण के खिलाफ़ हवा में स्थिर हो गयी
काले और सफ़ेद रंग की गेंदे।
समय की परिधि के किसी कोने पर
वक़्त के हिसाब से रात का एक बजा था।

इस ठहरे हुये ऐंद्रजाल में
पाँवों ने पहनी पुरानी चप्पल
अंगुलियों ने अंधेरे में अलमारी से हटाये जाले।
आँखों ने शब्दकोश से झाड़ी धूल
दिमाग ने पढे प्रेम, चुंबन, आलिंगन के अर्थ।

दिल धड़कता रहा कि
विस्मृति की धूल में ढक जाने तक के लिए
उसके नाम का पहला अक्षर
परिधि के पास से गुज़र रहा है, बार बार।

रात का एक बजा है, जाने कब तक के लिए।
* * *

November 19, 2012

किसी हादसे की तरह

सड़क से ज़रा दूर ढलान में पड़ी हुई
एक बरबाद गाड़ी के ठीक बीच में
उग आए कंटीले झाड़
बख्तरबंद लोहा हो गया जंगल का हिस्सा।

कोई चला गया किसी हादसे की तरह
उगते रहे सन्नाटे के बूटे, याद के कोमल कांटे
उदासी के आलम ने रंग लिया, अपने रंग में।
* * *

वक़्त का लम्हा भूल गया उस रिश्ते की मरम्मत करना। एक ने मुड़ कर नहीं देखा, दूसरे ने आवाज़ नहीं दी। इसलिए सफ़र के अनगिनत रास्ते हैं कि कोई भी जा सकता है किधर भी, वादा सिर्फ दिल के टूटने तक का है। रिश्तों की रफ़ूगरी भी कोई अच्छा काम है क्या? 


November 17, 2012

जीने के लिए


वे दोनों भाग सकते हैं उन दीवारों से दूर, जिन पर उन्होने कभी खुशी खुशी लिखा था कि रात के ग्यारह बजे हैं और ये दीवार एक "टाइट हग" की गवाह है। मगर लिखा हुआ हमेशा उनका पीछा करता रहता है।
वे दोनों पर्याप्त नहीं थे एक दूसरे के लिए कि वे अक्सर ख़ुद के लिए भी कम पड़ जाते थे। जैसे चाहते थे कि प्यार कर सकें बहुत देर तक मगर कोई और आ जाता था दोनों के बीच पारदर्शी दीवार की तरह।
वे दोनों हो सकते थे ख़ुद से नाराज़ मगर पर्याप्त वजहें नहीं थीं। उन्होने कई बार अलग अलग अपने प्रेमियों से कहा और सुना था कि तनहाई बहुत है और काश तुम हो सकते यहाँ, मुझे समेट लेते अपनी बाहों में। 
वे दोनों सप्ताहांत की रातें अपने दोस्तों के साथ बिताने के बाद अपने ओरबिट में लौट आते और उनकी भाषा बदल जाती थी। जिस शिद्दत से वे सप्ताहांत का इंतज़ार किया करते थे उसी शिद्दत से कहते थे, आह आपसे बात न हो सकी दो दिन। 
वे दोनों डरते थे इस बात से कि अलग होने का कहते ही दूसरा कहेगा कि आह मैंने सोचा तुम मुझसे ज्यादा प्यार करते थे। हालांकि वे दोनों जा सकते थे एक दूसरे से दूर बाखुशी... 
वे दोनों एक बुरी स्मृति की तरह जीने को मजबूर होने के आखिरी पायदान पर खड़े होने से पहले एक दूसरे से कह रहे थे कि आप जाकर भी कहीं जा नहीं पाते हैं।  

रेत के मैदानों में बिखरे लोकगीतों में बिछोह का दर्द, धरती पर आसमान की तरह खिला रहता है। मौसम आते जाते रहते हैं मगर नहीं बदलती याद की तस्वीर। इन्हीं रेत के धोरों के पास बचे हुये पहाड़ों पर उगे रहते हैं कंटीले थोर किसी की स्मृतियों जैसे हरे। उन पर कभी कभी खिल आते हैं सुर्ख़ फूल, दूर से लगता है किसी ने गूँथ ली है अपनी चोटियाँ। घाटियों की उपत्यकाओं में रह रह कर गूँजती है किसी की आवाज़, मगर आता कोई नहीं। मन का रेगिस्तान भरा हुआ है छलावों से, सब दरख्त, पहाड़, पानी, और प्रेम माया है। न कोई प्रेम करने आता है न कोई प्रेम करके चला जाता है। मृत्यु के आने तक यही भ्रम एक सहारा है, जीने के लिए। 

November 16, 2012

कहाँ है वो माफ़ीनामा



एक कपूर की गोली थी।

पिछली सर्दियों की किसी शाम अचानक उसकी खुशबू आई। किसी पैरहन से छिटकी होगी या किसी सन्दूक के नीचे से लुढ़क कर मेरे पास आ गयी हो। उसका रंग सफ़ेद था। इतना सफ़ेद कि उसे ज़माना सदियों से कपूरी सफ़ेद कहता था। उसका चेहरा चाँद जैसा गोल था, ठीक चाँद जैसा। मैं कई बार खो जाता था कि उसकी आँखें कहाँ और सफ़ेद होठ कहाँ पर हैं। उसके गोल चहरे पर कुछ लटें कभी आ ठहरती होगी बेसबब, ऐसा मैं सोचा करता था। उसकी हंसी में घुल जाती होंगी बंद कमरे की उदासियाँ ये खयाल भी कभी कभी आ जाता था।

एक शाम ऐसे ही छत पर बैठा शराब पी रहा था कि अचानक से कोई तीखा अहसास जीभ के एक किनारे पर ज़रा देर ठहर कर चला गया। मुझे लगा कि उसके मुंह में कोई चोर दांत है, जिसने काट लिया है प्यार से। ये मगर एक बेहद कोरा चिट्टा खयाल था जैसा कि उसका रंग था। वो जो एक कपूर की गोली थी। ऐसे ही एक बार मैंने किसी चीज़ को अलमारी से उतारने के लिए हाथ ऊपर किए तो वही खुशबू चारों और बिखर गयी। कपूर की खुशबू।

दिल्ली गया था। शहर के बीच एक खूबसूरत जगह पर साफ सुथरे कमरे में शाम होने को थी कि मैंने अपना स्वेटर बाहर निकाला। इसलिए नहीं कि ठंड थी, इसलिए कि पहन कर देखूँ कैसा दिखेगा। स्वेटर बहुत नया नहीं है, इसे पिछली सर्दियों से पहले खरीदा था। दो एक बार पहना होगा कि रेगिस्तान की सर्दियाँ बिना अलविदा कहे चली गयी थी। इस बार खोला तो लगा कि कपूर की खुशबू आने लगी है। ऐसे ही, जैसे कोई प्रिय के जाने के बाद लौट आया हो घर में।

मैंने देखा कि सामने की कुर्सी भर गयी है उसी सूरत से, सफ़ेद रंग की गोल सूरत। आप यकीन मानिए कि उसने बचाए रखा खुद को, सफ़ेद चोर दांतों को, गोल चेहरे को और न देखी जा सकने वाली आत्मा को। कि वह डूब नहीं सकती थी किसी रंग में, घुल नहीं सकती थी उसकी खुशबू किसी और रंग में कि वह नहीं थी फटे पुराने वाहियात किस्म के ऊनी कपड़े के लिए। मैंने सोचा कि अगर मेरे पास इस वक़्त कोई बारूद होता तो भी मैं खड़ा होता इस कपूर की गोली के पक्ष में... मैं जला लेता अपनी अंगुलियाँ मगर कोई आग इस कपूर को छू नहीं सकती थी।

आज की रात चाँद कुछ इस तरह खिला है जैसे वह कपूर की गोली थी। मैंने अभी पी नहीं है शराब और मैं ग्रामर का मास्टर भी नहीं हूँ वरना हो सकता है कि मैं मार देता खुद को गोली इस बात के लिए कि मैंने ही लिखा है, एक कपूर की गोली थी। मैं खुद की कनपटी पर रखता रिवाल्वर और कहता कि अभी बात खत्म नहीं हुई है इसलिए लिखो एक कपूर की गोली है। जबकि ऐसा है नहीं।


कहाँ है वो माफ़ीनामा जिस पर लिखा है कि मैंने तुमसे प्यार करने की गलती की है, मुझे मुआफ़ कर दिया जाए। लाओ, मैं लिख दूँ अपने नाम का पहला अक्षर...
* * * 

[ Painting image courtesy : Karla Aron]

ये पोस्ट कल की रात लिखी थी। पीठ में दर्द भरा था इसलिए लेपटोप को छोड़ दिया था। आज पोस्ट कर रहा हूँ मगर कहाँ कायम रहती है सब चीज़ें? देखो चाँद भी कल से बेहतर है। 

November 14, 2012

एक लंबी और बेवजह की बात : हमारी दिल्ली


मैंने यूं ही कहानियाँ लिखनी शुरू की थी। जैसे बच्चे मिट्टी के घर बनाया करते हैं। ये बहुत पुरानी बात नहीं है। साल दो हज़ार आठ बीतने को था कि ब्लॉग के बारे में मालूम हुआ। पहली ही नज़र में लगा कि ये एक बेहतर डायरी है जिसे नेट के उपभोक्ताओं के साथ साझा किया जा सकता है। मुझे इसी माध्यम में संजय व्यास मिल गए। बचपन के मित्र हैं। घूम फिर कर हम दोनों आकाशवाणी में ही पिछले पंद्रह सालों से एक साथ थे। बस उसी दिन तय कर लिया कि इस माध्यम का उपयोग करके देखते हैं।

हर महीने कहानी लिखी। कहानियाँ पढ़ कर नए दोस्त बनते गए। उन्होने पसंद किया और कहा कि लिखते जाओ, इंतज़ार है। कहानियों पर बहुत सारी रेखांकित पंक्तियाँ भी लौट कर आई। कुछ कच्ची चीज़ें थी, कुछ गेप्स थे, कुछ का कथ्य ही गायब था। मैंने मित्रों की रोशनी में कहानियों को फिर से देखा। मैंने चार साल तक इंतज़ार किया। इंतज़ार करने की वजह थी कि मैं समकालीन साहित्यिक पत्रिकाओं से प्रेम न कर सका हूँ। इसलिए कि मैं लेखक नहीं हूँ। मुझे पढ़ने में कभी रुचि नहीं रही कि मैं आरामपसंद हूँ। मैं एक डे-ड्रीमर हूँ। जिसने काम नहीं किया बस ख्वाब देखे। खुली आँखों के ख्वाब। लोगों के चेहरों को पढ़ा। उनके दिल में छुपी हुई चीजों को अपने ख़यालों से बुना। इस तरह ये कहानियाँ आकार लेती रहीं।

दोस्तों को कहानियाँ पसंद आई तो उन्होने कहा किताब चाहिए। संजय भाई ने एक प्रकाशक का नाम बताया। उनसे बात की। मालूम हुआ कि सिर्फ उन्हीं लेखकों की कहानियाँ छप या बिक सकती हैं जो हंस, कथादेश, वागर्थ जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं में छपे हों। जिनके नाम को पाठक जानते हों। मैंने कहा कि मेरे पास ये सब तो नहीं है। फिर भी आप छाप देंगे क्या? उन्होने कहा कि हाँ छाप सकते हैं, पैंतीस से उनचालीस हज़ार रुपयों में काम बनेगा। मेरे पास कुछ रुपये थे मगर वे इस तरह के कामों के लिए नहीं थे।

मैंने शैलेश भारतवासी से बात की, उन्होने कहा कि मैं आपकी कहानियाँ पढ़ना चाहूँगा। मैंने उसी वक़्त सोच लिया कि अब बात बन जाएगी। कहानी पढ़ने का मतलब था कि वे संभवतया इंकार न कर सकेंगे। आखिर ऐसा ही हुआ। उन्होने पूछा कितने लोग खरीद सकते हैं। मैंने कहा- एक आप जो छाप रहे हैं और दूसरा मैं जो लिख रहा हूँ। उन्होने दोबारा, तिबारा पूछा तो मैंने बताया कि शैलेश जी, ये आभासी संसार है। यहाँ लाइक करने, टिप्पणी करने और वास्तविक जीवन में चाहने के बीच का फासला बहुत बड़ा है। इस पर किसी तरह का यकीन नहीं किया जा सकता।

कहानी की किताब छापने का काम शुरू हो गया। मैंने संजय भाई का सबसे ज्यादा फायदा उठाया। साथ ही अनु, प्रतीक्षा, कविता, अमित, आभा, पृथ्वी, स्वाति, अंजलि जी और बहुत सारे दोस्तों को कष्ट दिये। किताब को प्री ऑर्डर पर रखा गया। शैलेश साहब ने कहा कि हस्ताक्षर करने दिल्ली आना होगा। किताब को प्रिन्टर से हम तक आने में अनुमान से ज्यादा वक़्त लग गया। दिल्ली शहर में घूमता हुआ अचरज भरी आँखों से देखता रहा। अच्छा कवि नहीं हूँ मगर लिखने में मजा आता है। इसलिए अपने कुछ अपडेट्स कविता की शक्ल में लिखे। कुछ दोस्तों से मिला। नौ और दस तारीख के बीच की रात को एक बजे दो सौ किताबों पर साइन किए। दो और किताबों पर अगले दिन साइन किए।

आप सबको क्या कहूँ कि दो सौ से ज्यादा प्री ऑर्डर के बारे में जानकार मुझे कैसा लगा होगा। लव यू दोस्तों। किताब आप तक आती होगी, फिलहाल ये कुछ पंक्तियाँ पढ़िये। दिल्ली महानगर की अलग अलग जगहों पर बैठे हुये चार टुकड़ों में लिखी है।

हमारी दिल्ली

कैसा शहर है
इसकी आँखों पे धुंध का चश्मा
इसके बदन पर धूप की तपिश ही नहीं है
बस ओढ़ी हुई है एक पानी की चादर।
लोग उड़े जाते हैं
मखमली फ़ाहों से रुकते ठहरते।

हैरत में हूँ कि इतने बड़े शहर में
इस कदर भीड़ में भी तनहाई का बसेरा।
कोई पीठ थपथपा के कहता है मुझको
आवाज़ों के मेले में भी होता है, चुप्पी का कोना
सरसब्ज ज़मीं में भी छूट जाती है, सूखी मिट्टी।

मैं खोये हुये आदमी की तरह देखता हूँ
इंतज़ार करते हुए गुमशुदा रास्तों को।

इस शहर के पाँवों में बसों की पाजेब
शिराएँ रेल की पटरियों जैसी
और किनारे पर जिगर की तरह बसी हुई कच्ची बस्तियाँ
इसके दिल की सेहत को बाई पास सर्जरी सी मेट्रो की सांसें।

इसकी जेबों में भरी बड़े माल्स की चमचम
कॉफी के प्यालों की खनक के नीचे
ओबामा की बातों के शक्कर के दाने
सड़क के किनारे सिगरेट पीते लड़के
तंग कपड़ों में नुमाया, मिजाज़ इस शहर का।

ये कैसा शहर है
कि इसके माथे में छत्तीसगढ़ के जंगल की ख़ुशबू
मुगलिया ज़माने के दिल फरेब ड्रामे।

श्री राम सेंटर के आगे खड़ा सोचता हूँ
जो तुम होते यहाँ पर तो कितना अच्छा होता।

हर तरफ
सूखे पत्ते पड़े हैं सड़क के किनारे
ख्वाब दौड़े जाते हैं हसरत उठाए
शहर की हक़ीक़त के चाबुक अजब हैं
बरसते हैं ख्वाबों की पीठों पर मुसलसल
मगर वे कभी भी, किसी को दिखते नहीं हैं।

इस शहर में हर तरफ आईने हैं
जिनमें हुक्मरान आदमी को सुखी देखता है।
उन्हीं आईनों में
हुक्मरानों को मसखरा देख कर
रसोई, चूल्हा, रोटियाँ भूल कर, लतीफे सुनाता, अजब ये शहर है।

ये कैसा शहर है कि
इसमें अभी तक हैं ज़िंदा, बँटवारे की यादें
अभी भी बिछड़ी गलियों की महक है बाकी
अभी भी यहाँ लोग प्रेम करना नहीं भूले।

रात में जगमगाता शहर जागता है
मैं वसंतकुंज से लौटता हुआ सोचता हूँ
दिल की जेबों में भर कर क्या क्या ले जाऊँ?

ज़िया सराय के अबूझे रास्तों पर
नई उम्र की नई फसल के ताज़ा चेहरे
गलियाँ मगर फिर वही पुरानी
तवारीख़ के पेच और खम उलझी।

आईआईटी की दूजी तरफ
पश्चिमी ढब के बाज़ार सजे हैं
कहवाघरों के खूबसूरत लंबे सिलसिलों में
खुशबाश मौसम, बेफिक्र नगमें, आँखों से बातों की लंबी परेडें
कोई न कोई कुछ तो चाहता है मगर वो कहता कुछ भी नहीं है।

सराय रोहिल्ला जाते हुये देखता हूँ कि
सुबह और शाम, जाम में अकड़ा हुआ सा
न जाने किस ज़िद पे अड़ा ये शहर है। ये अद्भुत शहर है, ये दिल्ली शहर है।
* * *

हिन्द युग्म से प्रकाशित कहानी संग्रह प्राप्त करने के लिए इस लिंक "चौराहे पर सीढ़ियाँ" पर क्लिक कीजिये। 95 रुपये मूल्य की किताब विशेष ऑफर के साथ इंफीबीम पर उपलब्ध है। 

November 7, 2012

वो जो कहता है, मैं हूँ...

उसने तनहा आदमी को एक बड़ी अच्छी बात कही कि कभी कभी अपने साथ होना कितना सुखद होता है। हम अपनी पसंद से कुछ चेहरों की याद को चुनते हैं। उन्हें अपनी मरज़ी से आने और जाने देते हैं। इधर कोई कुर्सी पर चुप बैठा रहा, जाने क्या सोचते हुये। मैं उसी कुर्सी की ओर देखता हूँ। अब कभी फिर से न ये जगह होगी, न वो होगा, न कोई उम्मीद... कुछ हालात सच में लाजवाब होते हैं। ज़िंदगी फिर से उसी उदासी के दड़बे में लौट आती है। हाथ की लकीरों का रंग नहीं बदलता, बेवजह की बातें, उदासीन होकर टूट पड़ती है, अपने ही ऊपर कि वो जो कहता है, मैं हूँ। वह कहीं नहीं होता।

उस जादुई सड़क पर चलते हुये
की होती कोई भी जंगली कामना
या दिमाग और दिल के बीच बना कर एक मजबूत सेतु
गर लिखी होती कोई दरख्वास्त
तो भी ईश्वर के पास कोई हल नहीं होता तनहाई का।
* * *

जब तक उसने देखा मुड़ कर
रास्ता खत्म हो चुका था
सड़क के उस पार
मंडी हाउस के सामने वाला
मेट्रो स्टेशन अदृश्य हो गया
मैं फिर से खड़ा था, रेगिस्तान के ठीक बीच।

कुछ चीज़ें कभी नहीं छोड़ती हमारा साथ
हम रोकर फिर से सिमट आते हैं उन्हीं के पहलू में।
जैसे रेत सोख लेती है
जगमगाते दृश्यों को, भीड़ को, आंसुओं को,
और अभी अभी यहाँ खड़े महबूब के अक्स को।
* * *

प्रेम करना
नींद में किसी जंगली खरगोश का ख्वाब देखने जैसा है।

इसलिए उसने कहा
मैं नहीं दे सकती हूँ अपनी आत्मा को धोखा
या हो सकता है कि वह कोई बरसाती नदी थी
जिस अजनबीयत से आई थी, उसी से चली भी गयी।
* * *

November 5, 2012

सब अँधेरों के एकांत से परे

अचानक से हवा का एक ठंडा झौंका आया है। खिड़कियाँ जाने कितने ही दिनों से खुली हुई थीं। एक दोस्त ने कहा था कि तुम जानते नहीं तक़दीर के बारे में कुछ। वह अपनी सहूलियत और सीढ़ियाँ खुद चुनती है, मगर तक़दीर है बहुत अच्छी...

उसने रचा यकीन का स्वयंवर
और बुलाये कई योग्य प्रतिभागी

कोई हार गया ये सब देख कर।
***

खरगोश ने किया था उसे प्यार
सब रोशनियों के बीच
सब अँधेरों के एकांत से परे

बतख ने कहा, तुम गुनहगार हो, नेक्स्ट...
***

इसके बाद नहीं सोचा उसने कुछ भी
कि डार्टबोर्ड के ठीक बीच वाले घेरे में लगा सकेगा कोई निशाना

उसने हाथ छोड़ कर कहा, अब लगाओ निशाना।
***

मगर फिर भी
जादूगर लड़की मुस्कुराती है
खता खरगोश की है, कि उसी ने चाहा है।
***

October 25, 2012

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 

भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 

ज़रा पास आओ। 
* * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ  
तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में। 
* * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ। 
* * *

इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो 
मिट सकता है भरम 
कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर 
तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *

कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी अधिक गहरा।

मगर ठीक ठीक नहीं समझ सकता कोई भी।
* * *

मैं इस वक़्त 
अपने भाई के घर में आँगन पर लेटा हूँ
देखता हूँ अपनी बेटी को टीवी पर कोई फ़िल्म देखते हुये
और दिन के तीन बज गए हैं।

बड़े दिनों के बाद
किसी याद से बाहर आया सिर्फ इतना सा ख़याल। 
* * *

प्रेम में एक तस्वीर 
जब ठीक ठीक नहीं बनती आँखों में 
तब अपने बेटे की गुदगुदी से 
खिलखिलाती हुई, औरत याद आती है।
***

मुझे माफ कर दो
इससे सरल रास्ता नहीं था तुम्हारे साथ होने का
इसलिए तुमसे प्रेम कर बैठा।
***

आओ उसको याद करें
कि आंसुओं से भीग सकें दिल के बंजर खेत।
***

हाँ मैं क्यूबा का नागरिक हूँ
मगर राजस्थान के रेगिस्तान में पैदा हुआ हूँ।

हिटलर के लिए भी मनाही नहीं थी, गुजरात में जन्म लेने की।
***

[Image courtesy : Alok Tewari]

October 23, 2012

पत्थर के दरीचों से


काले बुर्के वाली ख़वातीन ने पीछे से आवाज़ दी – “एक मिनट” उनको मेरा एक मिनट नहीं चाहिए था। वे हम दो भाइयों के बीच जगह बनाना चाहती थी। मैंने सोचा कि वे ऐसा भी कहा सकती थी कि थोड़ी सी जगह दीजिये। भाषा का ये कैसा सुंदर उपयोग है कि हम समय की इकाई का उपयोग नाप की इकाई की जगह बखूबी कर लेते हैं। विधान सभा भवन के ठीक सामने सौ मीटर के फासले पर मेला लगा हुआ है। यह मेला मध्यम वर्ग की कम कीमत में अधिक चीज़ें पा लेने की लालसा का बेजोड़ प्रतीक है। मेले में प्रदर्शित चीजों की नुमाईश के लिए टिकट है। हर कोई बड़ी शालीनता से पूरे दाम चुका कर मेले में सलीके से प्रवेश कर रहा था। ये वही लोग थे, जो अक्सर नियम कायदों में चलाने जीने पर नाक भौं सिकोड़ते रहते होंगे। 

मेले में हर स्टाल पर सेल्स गर्ल थीं। उनके चेहरे खास तरह के पाउडर से पुते हुये थे। उनके होठों पर एक समान लाल रंग की गहरी लिपस्टिक थी। पलकों पर गहरे सलेटी रंग का मसकारा था। उनके दांत साफ थे और होठों की लंबाई कई किलोमीटर के दायरे में फैली हुई थी, जिनको वे सप्रयत्न इकट्ठा करने के काम में लगी हुई थीं। वे शक्ल, रंग रूप और पहनावे से एक खास तरह का साम्य बुन रही थी। उनको देखते हुये मुझे ऐसा लग रहा था कि ये किसी अन्य दुनिया से आयातित औरतें हैं। यूं उनको देखो तो साफ लगता है कि वे भी किसी प्रदर्शन की चीज़ के तौर पर इस नुमाइश का हिस्सा हैं, औरत के प्रति असीम सम्मान के कारण मैंने उनको आयातित औरतें कहना पसंद किया है। मुझे जाने क्यों उन सूरतों पर प्यार आने की जगह एक विशेष सहानुभूति आने लगी। मैं उनको देखते हुये उन घरों के बारे में सोचने लगा, जो घर इनके चेहरे के नूर से रोशन रहते हैं। उन घरों में नन्हें मासूम बच्चे इंतज़ार में हैं, जैसे मेरे बच्चे। 

राज्य सरकार ने पोलिथीन को प्रतिबंधित कर रखा है। इसके लिए व्यापक अभियान चलाये गए हैं किन्तु विधान सभा भवन के सौ मीटर के दायरे में लगे इस मेले में रंगीन पेबल्स से लेकर गज़क – रेवड़ी तक सब कुछ पोलिथीन में पैक कर के दिया जा रहा था। यह भी भाषा के उपयोग का बेहतरीन उदाहरण है। जैसे बुर्के वाली ख़वातीन चाहती थी कि मैं थोड़ी जगह दूँ लेकिन वे कह रही थी कि एक मिनट। 

*** 

विध्याधर नगर की एक सोसायटी में दशहरा की पूर्वसंध्या पर नाच-गान और खान-पान का आयोजन रखा गया है। विवाह समारोह जैसा प्रबंध है। लेकिन मुफ्त में कुछ नहीं है। सोसायटी ने विज्ञापन से लेकर स्टाल लगाने वालों तक से रुपये वसूले हैं। जिंहोने रुपये दिये हैं, वे ढाई सौ घरों के स्त्री पुरुष, बच्चों और बड़ों से दोगुनी वसूली की उम्मीद में सक्रिय हैं। शहर का अपना सिस्टम है कि वह सब कुछ तुरंत वसूल लेना चाहता है। गाँव की तरह फसल पकने पर किसी का हिसाब चुकाने का खराब किन्तु आत्मीय तंत्र यहाँ काम नहीं कर सकता। 

बच्चों के मनोरंजन के लिए इस आयोजन में वाल्ट डिज़्नी के पात्रों की वेषभूषा में एक हाथी और एक भालू उपस्थित थे। ये अब कोई अजूबा नहीं रहा है। बच्चे भी इनके इतने आदि हो चुके हैं कि आम तौर पर डरने और बिदकने की जगह इनकी पूंछ खींचने और हाथ मिलने में आगे रहते हैं। अचानक से भालू गश खाकर गिर पड़ा। उस वेश में से एक नन्हा बच्चा बाहर निकला। पसीने से भीगा हुआ। थरथर काँपता। अर्धचेतन हाल में उस नन्हे बच्चे की शक्ल अगर किसी पत्थर दिल पिता ने भी देखी होती तो रोकर उसे सीने से लगा लिया होता। बाज़ार क्रूर है, किसी के लिए भावनाओं से काम नहीं कर सकता है। इसलिए लाल बालों वाले कॉस्ट्यूम के मालिक ने दूसरे लड़के का प्रबंध किया और मेला इस सारे घटनाक्रम से आंखे फेरे हुये बाखुशी चलता रहा। 

हवा भरा हुआ भालू का गुब्बारा फिर से खड़ा हो गया। जैसे आम आदमी मरते हुये भी जीने के सौ प्रबंध करने में उम्मीद से लगा रहता है। उस भालू की भाषा मुंह से नहीं पेट से बोलती है। पेट कहता है इस पसीने में थोड़ा और नाचो कि नाच मेरी बुलबुल तुझे पैसा मिलेगा। 
*** 

जयपुर की शाम में बादलों ने एक फेरा लगाया जैसे मेलों में लगे हुये पंखे हवा के साथ पानी की हल्की फुहारें बरसाते हैं। शोरगुल और रोशनी से घबराया हुआ एक कबूतर खिड़की पर आ बैठा, बेचैन और हतप्रभ। ये उसके लिए शहर में रहने की कीमत है। दीवाली इन कबूतरों से और कीमत वसूलेगी। आतिशबाज़ी के शोर में वे उड़ते-उड़ते और डरते-डरते थक कर गिर जाएंगे। पत्थरों के इस जंगल में मासूम परिंदों को देखते हुये क़तील शिफाई साहब की याद आती है। 

कुछ और भी सांसें लेने पर, मजबूर सा मैं हो जाता हूँ 
जब इतने बड़े जंगल में किसी इंसान की खुशबू आती है। 

October 15, 2012

बेख़बरी है कि मेरी रुसवाई


शाम फैली हुई है। गहरी, इतनी गहरी की रात का धोखा होता है। कोई सागर था सूख गया। कुछ चट्टानें और रेत बची रह गयी। जैसे किसी के जाने के बाद बची रह जाती है स्मृतियाँ। ऐसे ही बचे हुये एक पहाड़ पर रोशनी है। एक हरे रंग की झाईं उतरती हुई इस छत तक दिखाई देती है। मुझे ख़याल आता है कि उस चोटी पर बने मंदिर में माँ जोगमाया... बाढ़ाणे शहर को अपनी गोद में बसाये हुये मुस्कुरा रही होगी। 

रेगिस्तान में सदियों से आंधियों का सामना करते हुये और पानी की दुआ मांगते हुये इन्सानों ने एक औरत से ही पाया होगा जीवन जीने का हौसला। जब भी आदमी की नज़र थक कर बिछ गयी होगी धरती की देह पर, उस औरत ने उसकी पीठ पर हाथ रख कर फिर से खड़ा कर दिया होगा। तुम आदमी हो, जाओ लड़ो। मैं तुम्हारे साथ हूँ। 

अहसान फ़रामोश आदमी ने इतनी बेटियाँ मारी कि पचास सालों तक गाँव में कोई बारात न आई। 
*** 

एक लड़के ने कहा कि देखो मैं तुम्हारे सफ़ेद फूलों के बीच एक लाल गुलाब खिलाना चाहता हूँ। इसलिए कि तुम्हारे सब फूलों का रंग वक़्त के साथ सफ़ेद हो गया है। उसने कहा। हाँ खिलाओ, लाल गुलाब। लड़के ने एक कांटे से उसकी पीठ पर बनाना शुरू किया किन्हीं दो होठों का आकार और वह कहती रही, इसे और बना दो। 

आवाज़ के आखिरी टुकड़े ने बना दिया एक लाल गुलाब। अब उसके बागीचे में एक लाल गुलाब खिल गया था। लड़की घबरा गयी। उसने कहा कि इसे लौटा ले जाओ। मैं अपने मालिक की हूँ। मुझे सफ़ेद फूलों के बीच ये लाल गुलाब एक ‘गिल्ट” की तरह दिख रहा है। 

लड़के के पास आवाज़ के कांटे से बने हुये लाल गुलाब को मिटाने का हुनर न था। उसने “गिल्ट” की उदासी में बुझा दी अपनी आवाज़। 
*** 

मेरे पास एक केसी नाम का शराबी आया बैठा है और उसके किस्से सुन कर अहमद फराज़ साहब का शेर याद आता है। 
खल्क की बेख़बरी है कि मेरी रुसवाई 
लोग मुझको ही सुनाते हैं फ़साने मेरे। 

***
[Image : A still from Titanic]

October 9, 2012

तुम भी कब तक




रात के ग्यारह बजे हैं
और आखिर उसने छोड़ दिया है
इरादा एक और करवट लेने का।

एक टुक देखे जाती है छत के पार
आसमान के सितारों को
उसके पहलू में सोया है बेटा
हरे बिस्तर पर खिले, रुई के कच्चे फूल की तरह।

मैंने अभी अभी, कुर्सी पर बैठे बैठे
फैला ली है अपनी टाँगे कुछ इस तरह
जैसे फैली हो किसी याद की परछाई।

आखिर जाम में घोल लेना चाहता हूँ
रात की नमी में भीगे किसी पेड़ की ताज़ा खुशबू
मगर कुछ दिहाड़ी के मजदूरों ने
बुझा दी है, सोने से पहले की आखिरी बीड़ी।

तुम भी कब तक लेटी रहोगी, बिना करवट लिए हुए
मैं भी कब तक फैलाये रख सकूँगा याद की परछाई।
* * *
[Image courtesy : Manvika]

October 3, 2012

उम्र भर यूं ही...

नीम के दो पेड़ों के आगे की दीवार पर फैली हुई बोगेनवेलिया की टहनियों पर खिल रहे, रानी और गुलाबी रंग के फूलों पर शाम आहिस्ता से उतर रही होगी. मैंने स्टूडियो के भीतर टेप लाईब्रेरी में बैठे हुए सोचा. कोने वाली खिड़की से रौशनी की एक लकीर मेग्नेटिक टेप्स की कतार को छू रही थी. वहीं कुछ ततैये ऐसी की ठंडक के कारण आराम कर रहे थे. आहिस्ता से रौशनी की लकीर गायब हो गयी. ततैयों ने अपना पीला रंग कृष्ण को समर्पित कर दिया. मैं मगर एक घूम सकने वाली कुर्सी पर बैठा हुआ सोचता रहा कि जो शाम आई थी, वह चली गयी है. 

आपको वक़्त नहीं है मुझसे बात करने का... सेल फोन पर दर्ज़ इस शिकायत को पढ़ कर आँखें बंद कर ली. अट्ठारह साल तक अलग अलग शहरों में रेडियो के एक जैसे दफ्तरों में ज़िन्दगी के टुकड़े टूट कर गिरते गए हैं.   मैंने अपनी जेब में एक हाथ रखे हुए कुर्सी को ज़रा और झुका कर सामने रखे ग्रामोफोन रिकोर्ड्स की तरफ देखते हुए चाहा कि काश कोई आये और नीचे से तीसरे कॉलम का पहला रिकार्ड प्ले कर दे. कोई आया नहीं बस एक साया सा लाईब्रेरी के दरवाज़े में लगे कांच के छोटे से टुकड़े के भीतर झांक कर आगे बढ़ गया. 
* * *

घर की छत पर आधे चाँद की रात थी मगर चाँद को आना बाकी था. मैंने अपने प्यालों को कुछ बे-मुहब्बत बोसे दिए. कई बार अपने सेल फोन पर हाथ रखा. कई बार किसी नाम का पहला अक्षर सोचा और आखिर रात के बारह बजे आधी नींद में किसी सूखे हुए दरिया की रेत पर चलने लगा. नीचे गली में कुछ घर दूर कच्ची शराब की महक के बीच गफूर खाँ ने एक छोटे से आलाप के बाद लोकगीत का पहला बंद शुरू किया. मांड गायिका रुकमा के बेटे के गले में भी वही आवाज़, वही सघनता. मेरे आधी नींद के सपने के साथ सुर घुल मिल गए. 

आभा ने मेरे हाथ को छूना चाहा. वह पूछना चाहती थी कि गफूर के साथ ये नया फ़नकार कौन है. मैं सो रहा था और वह पीतल की सबसे छोटी वाली बांसुरी बजा रहा था. सितम्बर महीना डूबने को था. हवा में ठंडक थी. आवाज़ की लहर दूर तक फेरा लगा रही थी. उसने सीधी करवट लेते हुए अपने हाथ एक दूसरे के ऊपर रख लिए. बांसुरी से निकल रहे सुरों के साथ उसके आस पास महबूब, खय्याम, साहिर और मुकेश जैसे कितने ही साहिब लोगों के चहरे हवा में तैरने लगे होंगे. अमिताभ और राखी का भी कोई अक्स याद आया होगा.  

आधी रात जा चुकी थी. चाँद निकल आया था. मैं नींद में सूखे दरिया की रेत पर चला जा रहा था मगर वह सुन रही थी, कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है...
* * *

सुबह आभा ने पहली ही बात कही. रात को आपने उस बांसुरी वाले को सुना. मैंने कहा. नहीं, मैं किसी ख़्वाब में खो गया था. आभा ने फिर पूछा. आपको मालूम है कि वह बांसुरी वाला लड़का कौन है? मैंने कहा. नहीं मालूम, मगर होगा कोई ज़िन्दगी के प्याले को दौलत और शोहरत की जगह शराब से भरे हुए... या शायद किसी की शिकायतों का जवाब न पाकर साहिर के नगमे गाने वाला.


[Painting Image courtesy Vishal Misra]

September 30, 2012

यही रोज़गार बचा है मेरे पास

मेरे कंधे पर शाम की छतरी से टूट कर दफ़अतन गिरा एक लम्हा था। एक चादर थी, चाँद के नूर की और उसकी याद का एक टुकड़ा था। मैं उलटता रहा इंतज़ार की रेतघड़ी। रात के बारह बजे उसने कहा ये मुहब्बत एक जंगल है और तुम एक भी पत्ती नहीं तोड़ सकते। नहीं ले जा सकते अपने साथ कुछ भी...

याद ने खाली नहीं किया बेकिराया घर
मैं उम्मीद की छत पर टहलता ही रहा।

पड़ोस की छतों पर
बच्चे सो गए केले के छिलकों की तरह
रात का कोई पंछी उड़ रहा था तनहा।  
मेरे सेलफोन के स्क्रीन पर
चमकते रहे थे चार मुकम्मल टावर
जैसे किसी कॉफिन के किनारे लगे हुए पीतल के टुकड़े।

और एक वहम था आस पास कि किसी को आना है।
***

पाप की इस दुनिया में
दुखों की छड़ी से हांकते हुए
ईश्वर ने लोगों से चाहा
कि सब मिल कर गायें उसके लिए।

शैतान ने अपना अगला जाम भरते हुए देखा
कि ईश्वर की आँखें, उससे मिलती जुलती हैं
***

तुम ख़ुशी से भरे थे
कोई धड़कता हुआ सा था
तुम दुःख से भरे थे
कोई था बैठा हुआ चुप सा.
***

सब कुछ उसी के बारे में है
चाय के पतीले में उठती हुई भाप
बच्चों के कपड़ों पर लगी मिट्टी
अँगुलियों में उलझा हुआ धागा
खिड़की के पास बोलती हुई चिड़िया।

सब उसी के बारे में है, जो है ही नहीं।
***

वह जो उगता है मेरे सिरहाने
और मेरे ही पैताने डूब जाता है

किसी टूटे हुये ख़याल का नुकीला टुकड़ा है।
***

मुझे प्यार है आती हुई सर्दियों से
कि कुछ फूल इसी रुत में खिला करते हैं
खास कर वह फूल, जो होता है
बैगनी और आसमानी के बीच के रंग वाला।

इसी रंग की एक सायकिल थी उसके पास।
***

उदास शाम को
ज़रा स्पाईसी करने के लिए
खीरे के टुकड़ों के बीच रख लेता हूँ
एक साबुत हरी मिर्च
जैसे शादी शुदा लोग प्रेम जैसी आफत रख लेते हैं दिल में।

फिर मैं नए नए अफ़सोसों को रखता जाता हूँ
बालकनी के कोने में रखी टेबल पर करीने से
और वहीं पर हर शाम लड़ी जाती है एक आखिरी लड़ाई।

और तुम तो वहाँ आना ही मत.. कि यही रोज़गार बचा है मेरे पास।
***

उसने कहा कि तुम्हारे पास
एक सुंदर बीवी, दो बच्चे और अब एक उधार का घर भी है।

शैतान ने इस माया के महल से लगा दी छलांग

इन्द्र के मदिरा भरे प्याले में, पाप और पुण्य एक हो गया।
***



September 28, 2012

आभा का घर


मुझे बहुत सारे बच्चे याद आते हैं। अपनी मम्मा की साड़ी, ओढ़ना, चुन्नी और बेड कवर जैसी चीजों से घर बनाने का हुनर रखने वाले बच्चे। वे सब अपने घर के भीतर किसी कोने में, सोफे के पास, छत पर या जहाँ भी जगह मिलती, घर बनाने में जुट जाते। वे वहीं सुकून पाते। वे सब बच्चे एक बड़े से बिस्तर पर इस बात के लिए लड़ते कि देखो दीदी ने मेरे पैर को छू लिया। भैया से कहो अपना हाथ हटाये। दूर सरक कर सो ना, यहाँ जगह ही नहीं है। वे ही बच्चे अपने बनाये हुए घर में घुटनों को मोड़े हुए ख़ुशी से चिपके रहते हैं। 

मैंने उन बच्चों को देखा लेकिन कभी सोचा नहीं कि एक घर बनाया जाना जरुरी है। पापा ने चार बेडरूम का दो मंजिला घर बना रखा है। यह एक पुराना घर है मगर इसमें कोई तकलीफ़ नहीं है। इसमें बीते सालों की बहुत सारी खुशबू है, बहुत सारी स्मृतियाँ हैं खट्टे मीठे दिनों की, इसमें हमारे गुम हुए बचपन की परछाई है. हम सब इस घर में सुकून पाते हैं। 

आभा मुझसे बेहतर है, वह हर हाल में खुश और सलीके से रहने का तरीका जानती है। उसने कभी कहा ही नहीं और मैंने कभी सोचा ही नहीं कि घर बनाना चाहिए। ज़िंदगी का अप्रत्याशित होना कितना अच्छा है कि एक दिन अचानक से हम दोनों छोटे भाई के साथ बिल्डरों के चक्कर काटने लगे और फिर एक दिन अचानक घर मुस्कुराने लगा। उन बच्चों के लिए जो सिर्फ एक बेड कवर से घर बनाने का हुनर जानते हैं। 

ये सब उन्हीं की नवाज़िशें हैं। लव यू डैड। शुक्रिया मनोज, विजया, महेंद्र, प्रियंका और माँ।
* * * 

एक साल यूं ही दूसरे कामों में गुज़रता गया फिर एक दिन सिद्धार्थ जोशी साहब को संदेश भेजा कि इन दिनों नए घर में प्रवेश करने का कोई मुहूर्त है। उन्होने कहा सितंबर महीने की पच्चीस तारीख मुबारक है। आभा ने मेरी तरफ देखते हुये मुस्कुरा कर कहा। हॅप्पी बर्थडे...

September 20, 2012

तुम्हारे लिए

तुम्हारे लिए 

एक खुशी है 
फिर एक अफसोस भी है 
कि कोई लगता है गले और 
एक पल में बिछड़ जाता है। 

खिड़की में रखे 
सलेटी रंग के गुलदानों में 
आने वाले मौसम के पहले फूलों सी 
इक शक्ल बनती है, मिट जाती है। 

ना उसके आने का ठिकाना 
ना उसके जाने की आहट 
एक सपना खिलने से पहले 
मेरी आँखें छूकर सिमट जाता है। 

कल रात से 
मन मचल मचल उठता है, 
ज़रा उदास, ज़रा बेक़रार सा कि ये कौन है 
जो लगता है गले और बिछड़ जाता है। 

एक ख़ुशी है, फिर एक अफ़सोस भी है।
* * *

मैंने इंतज़ार की फसलों के कई मौसम गुज़रते हुये देखे हैं। उदासी के सिट्टों पर उड़ती आवाज़ की नन्ही चिड़ियाओं से कहा। यहीं रख जाओ सारा इंतज़ार, सब तरफ बिखरी हुई चीज़ें अच्छी नहीं दिखती। 

उसी इंतज़ार की ढ़ेरी पर बैठे हुये लिखी अनेक चिट्ठियाँ। उसने चिट्ठियों पर बैठे शब्दों को झाड़ा और उड़ा दिया खिड़की से बाहर। मैंने दुआ की उसके लिए कि कभी न हो ऐसा कि वह ढूँढता फिरे उन्हीं शब्दों की पनाह।  

September 19, 2012

फिर से आना जरुरी है



एक छोटे से जीवन में कितने तो लोग आते हैं और जाने कितना कुछ टूटता बिखरता जाता है। किसी भी नुकसान की भरपाई कभी नहीं होती। कुछ नुकसान तस्वीरों की शक्ल में पड़े रहते हैं किताबों के बीच या बंद दराज़ों में, बाकी सब दिल की टूटी फूटी दीवारों पर, गीली भीगी आँखों में।

कुछ लोग किसी दुआ की तरह आते हैं और फिर हवा के झौंके की तरह चले जाते हैं। हमारे साथ फिर भी सारी दुआएं चलती ही रहती हैं, बरगद की छाँव जैसे शामियाने की तरह। दुःख बनाये रहते हैं दुआओं के बरगद की जड़ों में अपनी बाम्बी कि ज़िंदगी कभी भी दोनों तरफ़ से एक जैसी नहीं हुआ करती है।

कुछ जो जीवन में आते हैं अचरज और हैरत की तरह, वे ज़िंदगी के मर्तबान से चुरा ले जाते हैं सारे अहसास, बचा रहता है उदासी से भरा हुआ तलछट, सूना और बेरंग। बस ऐसे ही हो जाते हैं सब दिन रात। कोई करता रहता है इंतज़ार कि उन गए हुये लोगों के लिए एक दावत कर सके। मगर ये ख़्वाहिश कभी नहीं होती पूरी कि उसके लिए उनका फिर से आना ज़रूरी है। हैरत और अचरज की तरह। 

September 18, 2012

शगुफ्ता शगुफ्ता बहाने तेरे



मुझे लंबी छुट्टी चाहिए कि मैं बहुत सारा प्रेम करना चाहता हूँ। मैंने सुकून के दिन खो दिये हैं। मैंने शायद लिखने के आनंद को लिखने के बोझ में तब्दील कर लिया है। मैं किसी शांत जगह जाना चाहता हूँ। ऐसी जगह जहां कोई काम न हो। जहां पड़ा रहूँ बेसबब। शाम हो तो कभी किसी खुली बार में बीयर के केन्स खाली करता जाऊँ या फिर कभी नीम अंधेरी जगह पर विस्की के अच्छे कॉकटेल मेरे सामने रखे हों। कभी न खत्म होने वाली विस्की...

सपने में आई उस सुंदर स्त्री के केश खुले हुए थे और वे दोनों कंधों के आगे पीछे बिखरे हुए थे. ऐसा लगता था कि उन केशों को इसी तरह रहने के लिए बनाया हुआ था. सपने में उस स्त्री का कोई नाम नहीं था. उसके बारे में बात करने के लिए मान लेते हैं कि उसका नाम गुलजान था.  
जब उसकी चीखने जैसी आवाज़ सुनी तब मैं स्नानघर में नहा चुका था या शायद नहाने की तैयारी में था. वह आवाज़ हमारे सोने वाले कमरे से आई थी. मैंने तुरंत स्नानघर का दरवाज़ा खोला और एक तोलिया लपेटे हुए कमरे की तरफ आया. जिस जगह पर खड़ी होकर आभा साड़ी बांधती हैं. उसी जगह, उसी अलमारी की तरफ मुंह किये हुए गुलजान खड़ी थी. उसके पास ही एक बलिष्ठ गोरे रंग का आदमी खड़ा था.  
हष्ट-पुष्ट देह वाले उस आदमी ने गुलजान की साड़ी को खींच लिया था और वह शयन कक्ष के पीछे वाले दरवाज़े से भाग कर घर के पिछवाड़े में अपने शरीर को हाथों से ढांप कर खड़ी हुई थी. वह रो नहीं रही थी. उसने अपने हाथों की कोहनियों को पेट से चिपकाया हुआ था. उसके पास खाकी या ऐसे ही किसी रंग के कागज़ का बड़ा टुकड़ा था. जैसे वह अपने शरीर को छुपा रही हों.  
मैंने उस आदमी को गले से पकड़ कर लगभग उठा लिया. उसे किसी तरह घर के पिछवाड़े में उस तरफ ले गया जहाँ गुलाजान खड़ी थी. उसकी आँखें हैरत से भरी थी मगर जैसी मैंने चीख सुनी थी वैसा भय अथवा भय से उपजे बाकी सारे भाव उसके चहरे पर नहीं थे. मैंने उस आदमी को एक छोटी दीवार पर पटक दिया. उसका गला दबाते हुए मैंने एक बार गुलजान की तरफ देखा. वह वैसे ही खड़ी थी. 

मैं इन दिनों बड़े लम्बे समयांतराल के बाद फुरसत जैसे हाल में आया हूँ. मैंने इस साल जनवरी से लेकर सितम्बर के पहले सप्ताह तक बहुत सारे काम किये. बेसलीका जीवन जीया. खूब सारी शराब पी. खूब सारे शब्द लिखे. खूब सारा सोचा... ताज़ा मिली इस फुरसत को बढ़ाने के लिए कल सुबह कुछ दिनों के लिए एक सोशल खाते से अवकाश ले लिया. शाम बिना पावर सप्लाई के चल रहे स्टूडियो में बीती. बंद कमरे में जब वातानुकूलन यन्त्र न काम कर रहे हों तो बैठना मुश्किल हो जाता है. मैं बाहर चला आया. मैंने आती हुई रात के रंग को देखा. मैंने इंतज़ार किया और बहुत सारा सोचा. इसीलिए शायद रात को ऐसे सपने में खो गया था. 

इसके बाद मैं किसी मोर्चे के लिए जमा हुए लोगों के बीच था. वे किसी राजनैतिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आंदोलनरत थे. उस भीड़ के बीच एक विद्यालय की बच्चों से भरी हुई बस बेतरतीब भागने लगी. मैंने देखा तो पाया कि वह बस एक फौजी टैंक जैसे आकार की है. उसमें बैठे हुये बच्चे अगुआ किए जा चुके हैं. उस पर कोई भी गोली असर न करेगी. मैं अपनी जेब पर हाथ रख कर देखता हूँ. वहाँ पर एक छोटा माउजर रखा है. मुझे नहीं मालूम कि उसमें कितनी गोलियां हैं.  
भीड़ के बीच बच्चों की वैन ठीक मेरे पास से गुजरी और मैंने ड्राईवर को गोली मार दी. इसके बाद खाली मैदान में कुछ लोगों की भगदड़ जैसे दृश्य के बीच मैं किसी ओट की तलाश में भागने लगा. एक छोटी चट्टान के पीछे कूद पाने से पहले कई बार गोली चलाई. कुछ गोलियां मेरा पीछा कर रही थी. मैं भयभीत न था. मैं एक जरुरी काम में लगा हुआ नौजवान था. 

अचानक से लगा कि मौसम बहुत सर्द हो चला है. हवा सख्त और बेहद ठंडी है. मैं घर के पहले माले में बने छोटे भाई के बेडरूम में एक लम्बे चौड़े डबल बैड पर सो रहा था. पंख तेज घूम रहा था. मैंने कुछ ओढ़ नहीं रखा था. मैंने देखा कि नीले रंग की जींस और एक बिना बांह वाली सफ़ेद बनियान पहने हुए सो रहा हूँ. मैंने कल शाम को जो जींस पहनी थी, वो ये नहीं थी. यानी मैंने घर आकर दूसरी जींस पहनी और सो गया था. मेरे हाथ की अँगुलियों में हेमंत के लगाये हुए पान की खुशबू थी. ये पान कल रात को एक सहकर्मी ने दिया था. 
* * *

मैं घर से भाग जाना चाहता हूँ। मुझे ये हाल ओ हालत रास नहीं आते। मैं तनहाई चाहता हूँ एक जानलेवा तनहाई। मुझे एक ख़ामोशी चाहिए। मैं इस तरह के सपने देखते हुये नहीं सोना चाहता हूँ। मुझे रास्तों की तलाश है। मुझे कोई पुकार रहा है।

मुझको यारों न करो रहनुमाओं के सुपुर्द
मुझको तुम रहगुज़ारों के हवाले कर दो। "अब्दुल हमीद अदम" 
[rahnumā - guide; supurd = in the care of; rahguzāron - road's, traveller]
***
[तस्वीर घर के बैकयार्ड में एक गमला और उसमें रखे लोहे के टुकड़े]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.