August 23, 2015

सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना- 2

मेरे पास दो रास्ते नहीं है. मेरे पास दो मन नहीं है. मेरे पास दो कुछ नहीं है. मैं रूई का फाहा हूँ. जब तक डाल से बंधा हूँ, डाल का हूँ. जब हवा से मिलूँगा तो उसका हो जाऊँगा. मैं पहले कहाँ था, मैं अब कहाँ हूँ और मैं कल कहाँ होऊंगा, इसकी स्मृति और भविष्य कुछ नहीं है. मैं जब शाख पर खिल रहा था, प्रेम में था. मैं जब हवा से मिला प्रेम में रहा. मैं जब धूल में मिलूँगा तब प्रेम में होऊंगा. मेरा उदय और मेरा अस्त होना एक ही क्रिया की भिन्न अवस्थाएं हैं. 

मैं सुनता हूँ तुम्हारी आवाज़ में एक कोमल धुन. जो इस तरह कोमल है कि फरेब भरी जान पड़ती है. पत्थरों पर पानी तभी तक पड़ा रहता है जब तक धूप का संसर्ग न हो. तुम्हारी भाषा भी कुछ विषयों पर बदल जाती है. मगर मैं जो था वह हूँ, शायद वही रहूँ. कुछ रोज़ से फिर अपनी पढ़ाई के दिन याद आ रहे थे. कुछ रोज़ से एक छूटी हुई पोस्ट याद आ रही थी. आज सुनो आगे की बात.... 
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कितने-कितनों को संदेशे भेजे
कितनों के मन की शाखों पर अपने सुख का झूला, झूला.
कितनों की बुद्धि पर झूठे नेह की कलमें रोपी.

सुनो जाना,

आवाज़ों का रेला आता
कर्म-मल गहराता जाता.

संवर के बारे में ज़रूर भगवान् महावीर ने कुछ कहा होगा. 

मानस व्यापार, नैतिक आचरण 
और कर्म क्रियाओं के बारे में कुछ सुना होगा

तुम एक पदार्थ हो, जो दूजे पदार्थ के उपभोग में लगे हो.

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/24॥
* * *

तुम्हारी श्रद्धा, मित्र के आवरण में
एक जोंक की तरह है.

तुम्हारे धवल दंत
विषधर की तरह अटके हुए हैं अनेक हृदयों में
तुम्हारी जिह्वा इस दंश के सिवा, सहला रही बाकी काल्पनिक दुखों को.

सम्यक चरित्र किसे कहते हैं. वे पञ्च व्रत क्या थे?

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/25॥
* * *

उपहास के रणदे से
संबंधों की छाल को छिलते देख देखकर
कैसी अव्यक्त मुस्कान आती है न तुम्हारे चहरे पर.

निर्जरा, निर्जरा, निर्जरा.

वे जैन साधू कैसे थे
जिन्होंने दर्शन, ज्ञान और चरित्र की रगड़ से कर्म-मल को साफ़ किया.

तुम्हारी देह एक बोरा है
ज़रा एक बार भीतर झाँकों. 

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/26॥
* * *
मुमुक्षु के वरघोड़े के छद्म भेष में
मित्र बनकर तुमने जहाँ कहीं पदार्पण किया.

वहां-वहां खिले हुए उपेक्षा के पुष्प.

क्या लोकाकाश के ऊपर कोई सिद्द्शिला नहीं
भला हुआ कि तुम्हें अब तक कोई तुमसा मिला नहीं.

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/27॥
* * *

तुम्हारी बौनी खिलखिलाहट नाशवान है प्रिय.

वस्तुवाद, वस्तुवाद, वस्तुवाद
अंततः हर एक की सीमा है.

॥सुनो [जा]ना, व्यर्थ अभिमाना/28॥
* * *




August 17, 2015

अपनी अँगुलियों से कह दो

मौसम किसी उदास परिंदे के बदन सा था. थकन से भरा और अनमना. 

विचित्र छायाओं के स्याह-सुफेद चित्र बनाते हुए बादल ठहर-ठहर कर किसी यात्रा में फिर शामिल हो जाते. हवा ख़याल से अचानक बाहर आये बच्चे की तरह टोह लेकर फिर से अपने आप में गुम हुई जाती थी. तन्हाई की स्याही से बदन के कोरेपन पर शाम लिख रही थी- कोई तुमसा नहीं होगा प्यारे. तुम अकेले ही थे. तुमने अपने असल अकेलेपन से घबराकर सम्बन्धों का चुनाव किया. ये भी हो सकता है कि वह एक चुनाव न होकर किसी हड़बड़ी में कहीं छुप जाना भर हो. घर के छज्जे के नीचे शहतीर पर बैठी नन्हीं चिड़िया की तरह ये चुनाव और बाध्यता में से कुछ भी हो सकता है. हो सकता है कि ये दोनों न हों. 

ज़िदगी ने जो लिखा है उसका पाठ सदा अधूरा था. अधूरा ही रहे कि जिस दिन पढ़ लिया गया उस दिन एक विस्तृत और रंगहीन दृश्य क़ैद कर लेगा. जहाँ कोई अनुभूति न होगी. जहाँ कोई आवाज़. कोई परछाई कोई भय कोई चाहना न बुन सकेगी.
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हर किसी के जीवन में कितने ही द्वार खुले हैं. कितनी ही चीज़ों का आकर्षण-विकर्षण बसा हुआ है. न वह तुम्हें बताएगा, न वह सब जानकार कुछ लाभ होगा. कुछ भी कहीं क्यों है? ये जानना एक मीठी चाहत ज़रूर है मगर हर हासिल के आगे एक नयी तकलीफ है. किसी और सिम्त बढ़ जाने, कुछ और जान लेने की. 

मैं एक कोने में रखता हूँ अपना प्याला जिसमें जिंदगी नहीं वरन एक बहाना भरा है. बहाना वक़्त के गुज़र जाने के इंतज़ार का. 
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हल्की नीली रोशनी के कालीन पर बनती हुई आदमकद छायाओं के बेढब पैबंद ठहरे हुए हैं। लोग बार चेयर पर सहारे को पंजे रखे ज़रा सीधे और बहुत से गुम बैठे, उदासियों को तरल में घोलते चुप पी रहे हैं। इत्र की ख़ुशबू में घुला हुआ धुंआ और नीम रोशनी में भी नहीं छुप पाता लोगों की बेख़याली का अक्स।

ड्रेस अप होकर, कोने के सोफ़ा पर बैठा सोचता हूँ कि क्या पहले खत्म हो जाये तो अच्छा. 
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उस रात बहुत देर हो गयी थी।
एक पार्टी में बच्चे लोकसंगीत सुन रहे थे। मैं लॉन में एक मोढ़े पर बैठा था। अचानक उसने कहा- सर वन मोर। मैंने कहा- नो थैंक्यू। उसने जाने क्या सोच कर पूछा- आर यू वर्किंग फॉर केयर्न। मैंने कहा- नो आई वर्क्स फॉर आल इण्डिया रेडियो। उसकी शांत आँखों में पहाड़ की किसी लड़की की सूरत कौंधी होगी। उसने कहा- सर माई फेवरिट सॉन्ग इज लग जा गले के फिर ये हंसी रात हो न हो।
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उसकी वर्दी अच्छी है। उसकी वर्दी से ज्यादा अच्छी उसकी पहाड़ी आँखें हैं। इससे भी अच्छा है कि वह कई साल से रेगिस्तान में है। उसका ये कहना सबसे अच्छा लगता है कि वह यहाँ खुश है। शायद पहाड़ के लड़के भी एक दिन जान जाते हैं कि रेगिस्तान के दुःख पहाड़ों से अलग नहीं है।

वह ज़रा झुका हुआ था, जब उसने कहा- सर, नाइस टू सी यू। मैंने समझा उसने पूछा है- ब्लैक डॉग ऐंड क्लासिक अल्ट्रा माइल्ड।
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उल्फ़त,
अपनी कत्थई अँगुलियों से कह दो
कि वे ज़रा मेरे नाम को छू लें।
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प्रेम कल्पना में भव्य
और असल में
जीने की साधारण ज़रूरत होता है।
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भरे प्यालों में
खत्म होने का इन्तज़ार है,
खाली प्यालों में भरे जाने का।
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हमेशा सुनने का मन रखना।
इससे बड़ा उपकार कुछ नहीं है।
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[Painting by Johnny Morant]

August 8, 2015

कहाँ है तुम्हारी प्रेमिका

लिखना सबसे चिपकू व्यसन है. एक अक्षर मांडो तो पीछे एक कतार चली आती है. एक बार शुरू होने के बाद दिन-रात उसी में रम आते हैं. इसलिए अक्सर शब्दों को छिटक कर रेगिस्तान पर तने आसमान को चुप निहारने लगता हूँ. छत से रेलवे ओवर ब्रिज दीखता है उस पर गुजरते हुए दुपहिया-चौपहिया वाहन मेरी गुमशुदगी पर दस्तक की छेड़ करते हैं. मैं पल भर को आकाश के विस्तृत वितान के सम्मोहन से बाहर आता हूँ और फिर उसी में लौट जाता हूँ.

लिखना बस इतना था कि मुझे नीला रंग प्रिय है.
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आँख भर नीला रंग। 
तुम्हारे कन्धों पर ठहरा हुआ।
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वो जो हम समझे थे 
असल में बात उतनी ही नहीं थी।
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छत, खिड़कियां, दीवार, 
अलगनी और नीम अँधेरा 
जैसे सब आ बैठें हों किसी ख़ामोशी की क्लास में।
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अल्पविरामों से भरी एक ठहरी हुई ज़िन्दगी। 
मगर गुज़रती हुई।
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याद भीगी छत से टपकता है एक ख़याल। 
ज़िन्दगी एक करवट चुप देखती है।

शायद देखती है।
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जितने रंग थे, उन रंगों से अनेक रंग खिलते गए. जितनी आवाजें थी, उन आवाज़ों में अनेक आवाजें झरती रहीं. जितने मौसम थे, उन मौसमों में अनेक मौसम साथ चलते रहे.

हमने ज्यादातर को न देखा, न सुना और न महसूस किया.
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सिगार बुझ गया है सिरे तक आने से पहले
इस बात पर जाने क्यों मोहब्बत का ख़याल आया।
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एक मकड़े ने दुछत्ती से
हवा में लगाया गहरा गोता
और वापस लौट गया।

शैतान को
उसकी अंगुलियां छूने की याद आई
और आकर खो गयी।
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जा चुकी है भीगी रात
उम्र के लिबास से झड़ रहे हैं
बरस आहिस्ता-आहिस्ता।
शैतान तुम कहाँ हो, कहाँ है तुम्हारी प्रेमिका।
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बालकनी को चूमती
पंजों के बल खड़ी है गंधहीन पुष्ष-लता।

उनींदी, रात की याद से भरी।
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ताज़ा खिली घास की ओट से
नन्हे बैंगनी फूल मुस्कुराते हैं।

खुले मैदान के वितान पर बादलों ने लिखी है ज़िन्दगी।
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कुछ चीज़ें जब आपका रास्ता रोक लेती हैं तब उनका इशारा होता है कि सुकून से बैठकर अपने अतीत को याद करो।
***

तलब क्या लिखी और सामां क्या लिखा है। 
अपनी इस लिखावट पर ज़रा झाँक तो डालो ज़िन्दगी।
***
[Watercolor painting; Artist unknown ]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.