October 25, 2012

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 

भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 

ज़रा पास आओ। 
* * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ  
तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में। 
* * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ। 
* * *

इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो 
मिट सकता है भरम 
कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर 
तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *

कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी अधिक गहरा।

मगर ठीक ठीक नहीं समझ सकता कोई भी।
* * *

मैं इस वक़्त 
अपने भाई के घर में आँगन पर लेटा हूँ
देखता हूँ अपनी बेटी को टीवी पर कोई फ़िल्म देखते हुये
और दिन के तीन बज गए हैं।

बड़े दिनों के बाद
किसी याद से बाहर आया सिर्फ इतना सा ख़याल। 
* * *

प्रेम में एक तस्वीर 
जब ठीक ठीक नहीं बनती आँखों में 
तब अपने बेटे की गुदगुदी से 
खिलखिलाती हुई, औरत याद आती है।
***

मुझे माफ कर दो
इससे सरल रास्ता नहीं था तुम्हारे साथ होने का
इसलिए तुमसे प्रेम कर बैठा।
***

आओ उसको याद करें
कि आंसुओं से भीग सकें दिल के बंजर खेत।
***

हाँ मैं क्यूबा का नागरिक हूँ
मगर राजस्थान के रेगिस्तान में पैदा हुआ हूँ।

हिटलर के लिए भी मनाही नहीं थी, गुजरात में जन्म लेने की।
***

[Image courtesy : Alok Tewari]

October 23, 2012

पत्थर के दरीचों से


काले बुर्के वाली ख़वातीन ने पीछे से आवाज़ दी – “एक मिनट” उनको मेरा एक मिनट नहीं चाहिए था। वे हम दो भाइयों के बीच जगह बनाना चाहती थी। मैंने सोचा कि वे ऐसा भी कहा सकती थी कि थोड़ी सी जगह दीजिये। भाषा का ये कैसा सुंदर उपयोग है कि हम समय की इकाई का उपयोग नाप की इकाई की जगह बखूबी कर लेते हैं। विधान सभा भवन के ठीक सामने सौ मीटर के फासले पर मेला लगा हुआ है। यह मेला मध्यम वर्ग की कम कीमत में अधिक चीज़ें पा लेने की लालसा का बेजोड़ प्रतीक है। मेले में प्रदर्शित चीजों की नुमाईश के लिए टिकट है। हर कोई बड़ी शालीनता से पूरे दाम चुका कर मेले में सलीके से प्रवेश कर रहा था। ये वही लोग थे, जो अक्सर नियम कायदों में चलाने जीने पर नाक भौं सिकोड़ते रहते होंगे। 

मेले में हर स्टाल पर सेल्स गर्ल थीं। उनके चेहरे खास तरह के पाउडर से पुते हुये थे। उनके होठों पर एक समान लाल रंग की गहरी लिपस्टिक थी। पलकों पर गहरे सलेटी रंग का मसकारा था। उनके दांत साफ थे और होठों की लंबाई कई किलोमीटर के दायरे में फैली हुई थी, जिनको वे सप्रयत्न इकट्ठा करने के काम में लगी हुई थीं। वे शक्ल, रंग रूप और पहनावे से एक खास तरह का साम्य बुन रही थी। उनको देखते हुये मुझे ऐसा लग रहा था कि ये किसी अन्य दुनिया से आयातित औरतें हैं। यूं उनको देखो तो साफ लगता है कि वे भी किसी प्रदर्शन की चीज़ के तौर पर इस नुमाइश का हिस्सा हैं, औरत के प्रति असीम सम्मान के कारण मैंने उनको आयातित औरतें कहना पसंद किया है। मुझे जाने क्यों उन सूरतों पर प्यार आने की जगह एक विशेष सहानुभूति आने लगी। मैं उनको देखते हुये उन घरों के बारे में सोचने लगा, जो घर इनके चेहरे के नूर से रोशन रहते हैं। उन घरों में नन्हें मासूम बच्चे इंतज़ार में हैं, जैसे मेरे बच्चे। 

राज्य सरकार ने पोलिथीन को प्रतिबंधित कर रखा है। इसके लिए व्यापक अभियान चलाये गए हैं किन्तु विधान सभा भवन के सौ मीटर के दायरे में लगे इस मेले में रंगीन पेबल्स से लेकर गज़क – रेवड़ी तक सब कुछ पोलिथीन में पैक कर के दिया जा रहा था। यह भी भाषा के उपयोग का बेहतरीन उदाहरण है। जैसे बुर्के वाली ख़वातीन चाहती थी कि मैं थोड़ी जगह दूँ लेकिन वे कह रही थी कि एक मिनट। 

*** 

विध्याधर नगर की एक सोसायटी में दशहरा की पूर्वसंध्या पर नाच-गान और खान-पान का आयोजन रखा गया है। विवाह समारोह जैसा प्रबंध है। लेकिन मुफ्त में कुछ नहीं है। सोसायटी ने विज्ञापन से लेकर स्टाल लगाने वालों तक से रुपये वसूले हैं। जिंहोने रुपये दिये हैं, वे ढाई सौ घरों के स्त्री पुरुष, बच्चों और बड़ों से दोगुनी वसूली की उम्मीद में सक्रिय हैं। शहर का अपना सिस्टम है कि वह सब कुछ तुरंत वसूल लेना चाहता है। गाँव की तरह फसल पकने पर किसी का हिसाब चुकाने का खराब किन्तु आत्मीय तंत्र यहाँ काम नहीं कर सकता। 

बच्चों के मनोरंजन के लिए इस आयोजन में वाल्ट डिज़्नी के पात्रों की वेषभूषा में एक हाथी और एक भालू उपस्थित थे। ये अब कोई अजूबा नहीं रहा है। बच्चे भी इनके इतने आदि हो चुके हैं कि आम तौर पर डरने और बिदकने की जगह इनकी पूंछ खींचने और हाथ मिलने में आगे रहते हैं। अचानक से भालू गश खाकर गिर पड़ा। उस वेश में से एक नन्हा बच्चा बाहर निकला। पसीने से भीगा हुआ। थरथर काँपता। अर्धचेतन हाल में उस नन्हे बच्चे की शक्ल अगर किसी पत्थर दिल पिता ने भी देखी होती तो रोकर उसे सीने से लगा लिया होता। बाज़ार क्रूर है, किसी के लिए भावनाओं से काम नहीं कर सकता है। इसलिए लाल बालों वाले कॉस्ट्यूम के मालिक ने दूसरे लड़के का प्रबंध किया और मेला इस सारे घटनाक्रम से आंखे फेरे हुये बाखुशी चलता रहा। 

हवा भरा हुआ भालू का गुब्बारा फिर से खड़ा हो गया। जैसे आम आदमी मरते हुये भी जीने के सौ प्रबंध करने में उम्मीद से लगा रहता है। उस भालू की भाषा मुंह से नहीं पेट से बोलती है। पेट कहता है इस पसीने में थोड़ा और नाचो कि नाच मेरी बुलबुल तुझे पैसा मिलेगा। 
*** 

जयपुर की शाम में बादलों ने एक फेरा लगाया जैसे मेलों में लगे हुये पंखे हवा के साथ पानी की हल्की फुहारें बरसाते हैं। शोरगुल और रोशनी से घबराया हुआ एक कबूतर खिड़की पर आ बैठा, बेचैन और हतप्रभ। ये उसके लिए शहर में रहने की कीमत है। दीवाली इन कबूतरों से और कीमत वसूलेगी। आतिशबाज़ी के शोर में वे उड़ते-उड़ते और डरते-डरते थक कर गिर जाएंगे। पत्थरों के इस जंगल में मासूम परिंदों को देखते हुये क़तील शिफाई साहब की याद आती है। 

कुछ और भी सांसें लेने पर, मजबूर सा मैं हो जाता हूँ 
जब इतने बड़े जंगल में किसी इंसान की खुशबू आती है। 

October 15, 2012

बेख़बरी है कि मेरी रुसवाई


शाम फैली हुई है। गहरी, इतनी गहरी की रात का धोखा होता है। कोई सागर था सूख गया। कुछ चट्टानें और रेत बची रह गयी। जैसे किसी के जाने के बाद बची रह जाती है स्मृतियाँ। ऐसे ही बचे हुये एक पहाड़ पर रोशनी है। एक हरे रंग की झाईं उतरती हुई इस छत तक दिखाई देती है। मुझे ख़याल आता है कि उस चोटी पर बने मंदिर में माँ जोगमाया... बाढ़ाणे शहर को अपनी गोद में बसाये हुये मुस्कुरा रही होगी। 

रेगिस्तान में सदियों से आंधियों का सामना करते हुये और पानी की दुआ मांगते हुये इन्सानों ने एक औरत से ही पाया होगा जीवन जीने का हौसला। जब भी आदमी की नज़र थक कर बिछ गयी होगी धरती की देह पर, उस औरत ने उसकी पीठ पर हाथ रख कर फिर से खड़ा कर दिया होगा। तुम आदमी हो, जाओ लड़ो। मैं तुम्हारे साथ हूँ। 

अहसान फ़रामोश आदमी ने इतनी बेटियाँ मारी कि पचास सालों तक गाँव में कोई बारात न आई। 
*** 

एक लड़के ने कहा कि देखो मैं तुम्हारे सफ़ेद फूलों के बीच एक लाल गुलाब खिलाना चाहता हूँ। इसलिए कि तुम्हारे सब फूलों का रंग वक़्त के साथ सफ़ेद हो गया है। उसने कहा। हाँ खिलाओ, लाल गुलाब। लड़के ने एक कांटे से उसकी पीठ पर बनाना शुरू किया किन्हीं दो होठों का आकार और वह कहती रही, इसे और बना दो। 

आवाज़ के आखिरी टुकड़े ने बना दिया एक लाल गुलाब। अब उसके बागीचे में एक लाल गुलाब खिल गया था। लड़की घबरा गयी। उसने कहा कि इसे लौटा ले जाओ। मैं अपने मालिक की हूँ। मुझे सफ़ेद फूलों के बीच ये लाल गुलाब एक ‘गिल्ट” की तरह दिख रहा है। 

लड़के के पास आवाज़ के कांटे से बने हुये लाल गुलाब को मिटाने का हुनर न था। उसने “गिल्ट” की उदासी में बुझा दी अपनी आवाज़। 
*** 

मेरे पास एक केसी नाम का शराबी आया बैठा है और उसके किस्से सुन कर अहमद फराज़ साहब का शेर याद आता है। 
खल्क की बेख़बरी है कि मेरी रुसवाई 
लोग मुझको ही सुनाते हैं फ़साने मेरे। 

***
[Image : A still from Titanic]

October 9, 2012

तुम भी कब तक




रात के ग्यारह बजे हैं
और आखिर उसने छोड़ दिया है
इरादा एक और करवट लेने का।

एक टुक देखे जाती है छत के पार
आसमान के सितारों को
उसके पहलू में सोया है बेटा
हरे बिस्तर पर खिले, रुई के कच्चे फूल की तरह।

मैंने अभी अभी, कुर्सी पर बैठे बैठे
फैला ली है अपनी टाँगे कुछ इस तरह
जैसे फैली हो किसी याद की परछाई।

आखिर जाम में घोल लेना चाहता हूँ
रात की नमी में भीगे किसी पेड़ की ताज़ा खुशबू
मगर कुछ दिहाड़ी के मजदूरों ने
बुझा दी है, सोने से पहले की आखिरी बीड़ी।

तुम भी कब तक लेटी रहोगी, बिना करवट लिए हुए
मैं भी कब तक फैलाये रख सकूँगा याद की परछाई।
* * *
[Image courtesy : Manvika]

October 3, 2012

उम्र भर यूं ही...

नीम के दो पेड़ों के आगे की दीवार पर फैली हुई बोगेनवेलिया की टहनियों पर खिल रहे, रानी और गुलाबी रंग के फूलों पर शाम आहिस्ता से उतर रही होगी. मैंने स्टूडियो के भीतर टेप लाईब्रेरी में बैठे हुए सोचा. कोने वाली खिड़की से रौशनी की एक लकीर मेग्नेटिक टेप्स की कतार को छू रही थी. वहीं कुछ ततैये ऐसी की ठंडक के कारण आराम कर रहे थे. आहिस्ता से रौशनी की लकीर गायब हो गयी. ततैयों ने अपना पीला रंग कृष्ण को समर्पित कर दिया. मैं मगर एक घूम सकने वाली कुर्सी पर बैठा हुआ सोचता रहा कि जो शाम आई थी, वह चली गयी है. 

आपको वक़्त नहीं है मुझसे बात करने का... सेल फोन पर दर्ज़ इस शिकायत को पढ़ कर आँखें बंद कर ली. अट्ठारह साल तक अलग अलग शहरों में रेडियो के एक जैसे दफ्तरों में ज़िन्दगी के टुकड़े टूट कर गिरते गए हैं.   मैंने अपनी जेब में एक हाथ रखे हुए कुर्सी को ज़रा और झुका कर सामने रखे ग्रामोफोन रिकोर्ड्स की तरफ देखते हुए चाहा कि काश कोई आये और नीचे से तीसरे कॉलम का पहला रिकार्ड प्ले कर दे. कोई आया नहीं बस एक साया सा लाईब्रेरी के दरवाज़े में लगे कांच के छोटे से टुकड़े के भीतर झांक कर आगे बढ़ गया. 
* * *

घर की छत पर आधे चाँद की रात थी मगर चाँद को आना बाकी था. मैंने अपने प्यालों को कुछ बे-मुहब्बत बोसे दिए. कई बार अपने सेल फोन पर हाथ रखा. कई बार किसी नाम का पहला अक्षर सोचा और आखिर रात के बारह बजे आधी नींद में किसी सूखे हुए दरिया की रेत पर चलने लगा. नीचे गली में कुछ घर दूर कच्ची शराब की महक के बीच गफूर खाँ ने एक छोटे से आलाप के बाद लोकगीत का पहला बंद शुरू किया. मांड गायिका रुकमा के बेटे के गले में भी वही आवाज़, वही सघनता. मेरे आधी नींद के सपने के साथ सुर घुल मिल गए. 

आभा ने मेरे हाथ को छूना चाहा. वह पूछना चाहती थी कि गफूर के साथ ये नया फ़नकार कौन है. मैं सो रहा था और वह पीतल की सबसे छोटी वाली बांसुरी बजा रहा था. सितम्बर महीना डूबने को था. हवा में ठंडक थी. आवाज़ की लहर दूर तक फेरा लगा रही थी. उसने सीधी करवट लेते हुए अपने हाथ एक दूसरे के ऊपर रख लिए. बांसुरी से निकल रहे सुरों के साथ उसके आस पास महबूब, खय्याम, साहिर और मुकेश जैसे कितने ही साहिब लोगों के चहरे हवा में तैरने लगे होंगे. अमिताभ और राखी का भी कोई अक्स याद आया होगा.  

आधी रात जा चुकी थी. चाँद निकल आया था. मैं नींद में सूखे दरिया की रेत पर चला जा रहा था मगर वह सुन रही थी, कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है...
* * *

सुबह आभा ने पहली ही बात कही. रात को आपने उस बांसुरी वाले को सुना. मैंने कहा. नहीं, मैं किसी ख़्वाब में खो गया था. आभा ने फिर पूछा. आपको मालूम है कि वह बांसुरी वाला लड़का कौन है? मैंने कहा. नहीं मालूम, मगर होगा कोई ज़िन्दगी के प्याले को दौलत और शोहरत की जगह शराब से भरे हुए... या शायद किसी की शिकायतों का जवाब न पाकर साहिर के नगमे गाने वाला.


[Painting Image courtesy Vishal Misra]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.