April 27, 2018

टला हुआ निर्णय.

टाटा स्काई वाले बार-बार फोन कर रहे हैं. नाम पूछते हैं फिर पूछते हैं क्या आपसे बात करने का ये सही समय है? मैं कहता हूँ नाम सही है और बात करने का सही समय रात नौ बजे के आस-पास होता है. इतना सुनते हुए उधर क्षणांश को चुप्पी छा जाती है. मैं बोल पड़ता हूँ- "फिर भी बताएं क्या कहना चाहते हैं?" एग्जीक्यूटिव कहता है- "आपका लॉन्ग ड्यूरेशन पैक ड्यू हो गया है. क्या आप इसे कंटिन्यु करेंगे?" मैं कहता हूँ- "भाई नहीं करना" 
"क्यों?" 
"महंगा बहुत है." 
"सर कोई दूसरा देख लीजिये." 
"नहीं भाई बड़े पैक लेकर देखे बारह हज़ार में भी सब चैनल पर रिपीट टेलीकास्ट होता रहता है."
"सर आप क्या देखना चाहते हैं" 
"बीबीसी अर्थ देख रहा था दो महीने में ही उनके प्रोग्रेम खत्म हो गए. अब वही रिपीट" 
"सर कंटिन्यु करेंगे?"
"नहीं पैसे ज़्यादा हैं और चैनल बोर हैं"
"सर प्लान तो ये ही हैं" 
"भाई बहुत सारे चैनल बहुत कम पैसों में दिखाओगे तो बोलो"

मेरे इतना कहते ही दुष्यंत मेरी तरफ देखने लगा. एग्जीक्यूटिव ने फोन रख दिया.

मैं दुष्यंत को कहता हूँ ऐसे क्या देख रहे हो? पहले इंटरनेट के एक जीबी के ढाई सौ रूपये देते ही थे न. फिर अचानक पांच रुपया जीबी कैसे हो गया? क्या कोई क्रांति हुई है?

किसी भी डीटीएच सेवा के लिए ट्रांसपोंडर को किराये पर लेने के लिए हर महीने पचास हज़ार से एक लाख डॉलर चुकाना पड़ता है. हम इसके ज़्यादा हिसाब किताब में न जाएँ और मान लें कि पचास लाख रुपया महिना किराया देना पड़ता है. अब बाक़ी को छोड़ दें और टाटा स्काई की ही बात करें तो इनके पास एक करोड़ बीस लाख उपभोक्ता हैं. सेटेलाईट का किराया कितना बना आठ आने से भी कम. इसके बाद सेट टॉप बॉक्स का पैसा हमारी ही जेब से जाता है. रही बात एस्टाब्लिश्मेंट, ऑपरेशन और मेंटेनेंस की तो उसका खर्च आप सेटेलाईट के किराए का पचास गुना लगा दें तो भी हुआ पच्चीस रुपया प्रति उपभोक्ता. अब लाइसेंस फीस, जीएसटी, स्वच्छता, शिक्षा जैसे सब कर जोड़ लें तो पांच एक रुपया और निकल आएगा. माने पचास पैसे जमा पच्चीस रूपये जमा पांच रूपये. साढ़े तीस रूपये. चैनल्स से हम विज्ञापन देखते ही हैं फिर भी उनका कोई एक दो रुपया और निकलता है तो निकाल लें. और भी इस खर्चे को दो गुना कर दें. माने साठ रुपया महिना.

दुशु पूछता है- "तो आप क्या करेंगे?"

मैंने कहा- "मम्मा का डेली सोप ही चूकने वाली चीज़ है. बाक़ी ख़बरें मैं देखता नहीं. फिल्म्स रिपीट हो रहीं. खेल और राजनीति में दूरी खत्म हो चुकी."

आभा कहती है- "मेरे लिए कुछ न सोचिये. मैं तो इश्क़ सुभानअल्लाह देख रही हूँ बस. इसमें भी अब कुछ बचा नहीं है. रिश्ते की फीलिंग्स देखने में अच्छी थी वह खत्म हो गयी. चालबाजी और गुंडे आ गए हैं."

"वो सलमान के डुप्लीकेट जैसा कुपोषित हीरो और दिव्या भारती की नक़ल जैसी हिरोइन वाला सीरियल क्या हुआ? जिसमें फ़िल्मी गीत बजते रहते थे" मैं पूछता हूँ.

"उसका जो होना था हो गया. अभी हम एक महीने यहाँ हैं नहीं. जयपुर से लौटकर आयेंगे तब देखेंगे"

"अच्छा सुनो. ये डीटीएच पर व्हाट्स एप और फेसबुक चल सकते न तो मुकेश अम्बानी कभी का सारा झगड़ा ही खत्म कर देते" 
* * *
Painting image : Bharat Ghate 

April 22, 2018

पोटाश बम

उसकी निकर की जेब में कुछ रखा था. "कंचे है?" ऐसा पूछते ही बोला- "नहीं. उधर चलते हैं."

दोनों लुढ़कती सायकिल पर इस तरह सवार हुए जैसे कड़ी में पाँव फंसाकर घोड़े की जीन पर बैठ रहे हो. ढलान में सायकिल घने बबूलों के पार आबादी से दूर तक जाती थी. सीढियों से घिरे मैदान में पसरी हुई धूप में कोई परिंदा भी नहीं दिखता था.

दोनों वहां आकर सीमेंट के चबूतरे जैसे मंच के पास खड़े हो गए. उसने अपनी जेब से दो छोटी गोलियां निकाली. एक को हाथ से थोड़ा सा सहलाया और फिर ज़मीन पर मारा. छोटा धमाका हुआ लेकिन खाली मैदान में उसकी आवाज़ गूंजने लगी. परिंदे जाने कहाँ छिपे बैठे थे कि अचानक रेत के मैदान पर छायाएं तैरने लगीं. आकाश में बहुत सारे परिंदे उड़ रहे थे.

उसने कहा- "तुम फोड़ो"

कपड़े की बेहद छोटी कंचे जितनी गेंद में कुछ बंधा हुआ था. उसे सीमेंट के फर्श पर पटका तो फिर वही धमाका हुआ.

"ये तुमने बनाया है?"
"हाँ"
"कैसे?"
"पोटाश से" 
"वो क्या होता है?"
"बारूद" 
"बारूद तो बहुत बड़ी चीज़ होनी चाहिए जो सब कुछ उड़ा देती है. मैंने पढ़ा है कि उससे पहाड़ के पहाड़ उड़ जाते हैं."
"हाँ. ये छोटा बारूद है."

दो-चार-दस बार पटाखे की तरह आवाजें सुनी. परिंदे कहीं चले गए थे या वे दो तीन बार उड़ कर कहीं बैठ गए होंगे कि कुछ होने वाला नहीं है. हम दोनों बैठ गए. धूप की चादर में तल्खी कम होने लगी. दूर तक सूना मैदान था. बबूल की सूखी झाड़ियों में कोई हलचल नहीं थी. सीढियाँ तप रही थी. कोई कागज़ हवा के साथ उड़ता तो हम उधर देखते. ऐसे ही बहुत देर बैठे रहे. थकान नहीं थी फिर भी हम सीढियों पर कुछ चक्कर लगा कर लेट गए. रेगिस्तान की भरी गरम दोपहर में छाँव में बनी सीमेंट की सीढियाँ ठंडी थी. दुनिया बहुत पीछे छूट गयी थी.

"ये आवाज़ कहाँ चली जाती है?"
"कौनसी आवाज़?" उसने देखे बिना ही पूछा.
"जो टिकड़ी फोड़ने से आती है"
"वहीं जहाँ काका चले गये."

वो अपने पिता के बारे में बता रहा था. उसके पिता घर में छोटे थे. इसलिए बड़े पापा के बच्चे उनको काका कहते थे. वह भी उनको काका कहने लगा था. एक दोपहर रेगिस्तान में बारिश होने लगी. चार बजे तक बाज़ार में पानी भर गया. पानी जितना निकलता था उससे दुगना आ जाता. काका ने दुकान का शटर नीचे किया. ताला लगाया. सड़क के बीच पैर रखा ही था कि पानी के बहाव ने झोल दिया. वे पास खड़े बिजली के खम्भे से टकराए. बिजली के खम्भे ने उनको गिरने नहीं दिया. लोग देखते रहे. किसी की हिम्मत न हुई कि उन तक जाये. आखिर लाईट कट गयी. फिर उसके काका को एक ठेले पर घर लाया गया.

आसमान में एक चील दिखी. बिना आवाज़ किये पंख हिलाए बिना उडती हुई. गोल चक्कर को धीरे धीरे कम कर रही थी. जैसे किसी कुएं में कोई दीवार के सहारे बनी सीढियों पर उतर रहा हो. वह हमारे सर के ठीक ऊपर आ गयी.

उसने जेब को टटोला. धीरे से खड़ा हुआ दो बम एक साथ मुट्ठी में भरकर ज़मीन पर पटके. धमाका हुआ. रेत उड़ी चील ने ऊंचाई की ओर पंख कर लिए. जब चील को इससे कुछ न हुआ तो हम दोनों ने एक दूजे के मुंह देखे. हम बैठ गए थे.

उसने कहा- "एक दिन किसी को कुछ नहीं होता"
"कुछ नहीं होता मतलब?"
"जैसे वे परिंदे पहले धमाके से डरकर उड़ गए थे न. बाद के धमाकों से उनको उनको कुछ नहीं हुआ."
"तुझे कैसे पता कि कुछ नहीं हुआ, वे डर कर दूर उड़ गए हैं"
उसने कहा- "जब काका को घर लाये थे तब माँ उनको देखकर गिर गयी थी. जैसे कोई बहुत बड़ा धमाका हुआ. उसके बाद माँ कई महीनों तक धमाके से डरी रही."

वह चुप हो गया था.

खाली मैदान में उड़ रही धूल शांत हो गयी थी. सीढियों पर बने टीन के शेड पर कबूतरों के पाँव बजने लगे थे. कबूतरों के पांवों की आवाज़ जिधर जाती, हमारा मन उधर ही जाता. जैसे हम टीन की शेड के उपर चलते हुए कबूतरों का पीछा कर रहे थे.

"देखो कबूतर लौट आये हैं."
इस बार उसने अपनी जेब पर हाथ नहीं फेरा. उसके पास पोटाश के बम बचे हुए थे लेकिन उसमें कोई उत्सुकता न थी. 
"तुमको ये बम बनाना किसने सिखाया?"
"काका के जाने के बाद दिवाली आई तब दादा ने कहा इस बार घर में दिए नहीं जलेंगे. फिर मालूम हुआ पटाखे भी नहीं आयेंगे. कारखाने में बैठा हुआ मैं रोने लगा. दादा चुप बैठे रहे. उनके एक पुराने दोस्त हैं. वे वहीँ काम करते थे. वे मेरी अंगुली पकड़ कर ले गए. उन्होंने मुझे कुछ कपड़े वाले बम बनाकर दिए थे"
"तुम को उन्होंने सिखाया?"
"ना. कोई नहीं सिखाता. ख़ुद सीखना पड़ता है. मैंने चुपके से उनको बनाते हुए देखा था. फिर अगली दिवाली जब सब फटाखे फोड़ रहे थे तब भी मैंने यही बम बनाये."

उसकी आँखों में मुस्कान थी.

उसने मुझे घूरती हुई हंसी को दबाये हुए देखा. "पता है एक बार चार बम मैंने स्कूल में भी फोड़े थे."

एक गिरगिट गरम रेत पर पाँव उठाये भागता हुआ हमारी तरफ आ रहा था. वह बहुत नज़दीक का शिकार हो सकता था. मैंने उसका हाथ पकड़ा. वह हरकत में आया. उसने जेब से एक बम निकाला. गिरगिट ने जैसे हमको देखा ही नहीं हो. वह चार कदम दूर था तभी धमाका हुआ. हल्का धुआँ उड़ गया. गिरगिट उल्टा पड़ा हुआ था. उसका चांदी जैसा पेट चमक रहा था. हम दोनों के चेहरे पर जो प्रसन्नता थी वह उतरने लगी. अपलक उस गिरगिट को देखते हुए दुःख होने लगा. हम दोनों के हाथ आपस में बंधे हुए थे. हथेलियाँ पसीने से भरने लगी थी.

अचानक गिरगिट ने पलटी खाई और वह तेज़ी से दौड़ता हुआ सीढियाँ चढने लगा.

हमने एक बार एक दूजे की हथेली पर दबाव महसूस किया और फिर हाथ छोड़ दिए. ठंडी हवा चलने लगी.

"क्या इसी तरह धमाके से डरकर गिरी तुम्हारी माँ भी उठ खड़ी हुई थी?"
"नहीं"

वह कुछ सोचने लगा. उसे सोचते हुए देखा नहीं जा रहा था इसलिए दूर देखने लगा. बबूलों के बीच से एक खरगोश दौड़ा और कहीं खो गया. मेरे कंधे पर उसका हाथ था. हम सीढियाँ उतर रहे थे. वह दोनों पांव एक साथ करके कूदा. इस तरह हम सब सीढियों पर कूदते हुए उतरे. रेत पर चलते हुए सफेदे के पेड़ों की हल्की छाँव की ओर चले गए. वहां एक नल लगा था. हमने उसे खोला तो गरम उबलता हुआ पानी आया. हाथ झटके से पीछे किया था. उसी हाथ को डरते हुए आगे बढाया. ठंडा पानी आने लगा था.

बूक से पानी पीने के बाद उसको कहा- "पता है इसको ओक कहते हैं" 
"ओक ओक ओक हा हा हा..." 
हम हँसते हुए सायकिलों की ओर दौड़ रहे थे. अचानक रुक जाने पर वह बोला- "क्या हुआ?"

"पापा..."

दूर एक लम्बा आदमी हमारे आगे चला जा रहा था. उसने मेरा हाथ थामा और रुकने को कहा. "तेरे पापा नहीं है, कोई और है"

उसने अपने कलाई को मुंह पर रखा और ज़ोर से बुलकारा भरा. ब ब ब बो ह ह... ये मुकाबला जीत लिए जाने का बाद का ऐलान था. उसने तुरंत सायकिल के पैडल पर जोर से पाँव मारा. उसके पीछे मैं भी घोड़े पर सवार हो गया.

उसने सायकिल के पास आते ही कहा- "काका होने चाहिए भले ही पीटते हो"

उसकी सायकिल पर पैडल सुस्त थे. चढ़ाई ज़्यादा थी. पहले उसका घर आता फिर मेरा. हम पास पहुंचे तब उसने कहा- "बाद में माँ कभी नहीं डरी. जैसे पहले धमाके के बाद परिंदे नहीं डरे थे."
* * *

कहानी का पहला टुकड़ा. शीर्षक है पोटाश बम. ज़िन्दगी को फोड़ खुरच कर देखा तो इससे ज़्यादा कुछ न निकला. अधिकतर प्रेम भी पोटाश बम थे.
* * *

[Pic credit - craftdaddyblog]

April 13, 2018

कांच के टुकड़ों की खेती

एक सहकर्मी थे. उन्होंने रेडियो कॉलोनी में आवंटित मकान के पीछे खाली छूटी हुई ज़मीन पर फल और सब्ज़ी के लिए क्यारियां बना ली थीं. प्रेमपूर्वक देखभाल करते. रेगिस्तान में पानी की कमी के बावजूद अपनी क्यारियों के लिए जितना संभव होता उतना पानी उपयोग में ले लेते.

कभी-कभी कॉलोनी के पड़ोसी कहते कि गर्मी के दिन आ गए हैं अब पानी की सप्लाई कम आती है. आप कम पानी का प्रयोग किया करें. इसके जवाब में वे लड़ने लगते. लोगों ने कहना छोड़ दिया. बाड़ी फलती रही. सात-आठ दिन बाद शहर के साथ आकाशवाणी को पानी की सप्लाई मिलती तो सबसे पहले उनकी बाड़ी का नल खुलता. चिंतित और परेशान कॉलोनी के रहवासी कुढ़ते रहते कि अगली बार जाने कब पानी आये.

एक दिन उनका स्थानांतरण हो गया. वे अपने पैतृक घर के पास जा रहे थे. प्रसन्न थे. उन्होंने ट्यूब लाईट के डंडे और फ्यूज हो चुके बल्ब तोड़े और बारीक टुकड़े किये. खिडकियों के टूटे हुए शीशों को इकठ्ठा किया. उनके छोटे टुकड़े बनाये. अपनी बाड़ी से एक एक पौधा उखाड़ा. मिट्टी खोदी और उसमें कांच के टुकड़े मिला दिया. इसके बाद उनके चेहरे संतोष से भर गए. उन्होंने हल्के मन से विदा ली.

जब हम जा रहे हैं तो ज़रूरी नहीं कि फूल लगाकर जाने में ख़ुशी पायें. हो सकता है मिट्टी में कांच बोने से ही सुख आये कि हमारे बाद कोई यहाँ हाथ भी न डाल सके. अपने-अपने संस्कार हैं.

क्या उनको भी लग गया है कि वे सचमुच जा रहे हैं?

April 11, 2018

उलझन

"सर आपके हाथ मे शायद पूँछ आई है?" केसी
केएसएम - "लेकिन ये खोखली और बेजान लग रही है।"
"संभव है किसी कलावादी की पूँछ है" केसी
केएसएम - "हो सकता है कला मर्मज्ञ की हो।"
"देखिए इस पूँछ में कुछ कौवों और चिड़ियों के पंख भी हैं" केएसएम
केसी- "ये कोई जड़ों से जुड़ा कलावादी होगा"
केएसएम - "आपको क्यों नहीं लगता कि ये जड़ों से जुड़ा कला मर्मज्ञ है?"
"कलावादी जहाँ भी जाता है वहाँ की कला को छीनकर अपनी पूँछ में लगा लेता है" केसी
"सर ज़्यादा साफ फर्क समझ नहीं आ रहा" केएसएम
केसी- "देखिए कलावादी हर जगह उपस्थित रहता है लेकिन वह कला के किस क्षेत्र का प्रतिनिधि है ये समझा नहीं जा सकता"
केएसीएम- "सम्भव है कि ये मर्मज्ञ है।"
केसी- "देखिए मर्मज्ञ वो है जो अपने क्षेत्र विशेष के कलाकारों का शोषण करे और अन्य मंचों पर उन्ही के कसीदे पढ़े।"
केएसीएम- "जैसे?"
केसी- "जैसे ही परिवार के सम्मान की बात हो स्वयं का सम्मान करवा लें, बड़े शहर में कोठी बनाकर रहे मगर पुश्तैनी ज़मीन से अपने हिस्से का एक इंच और एक रुपया न छोड़े लेकिन जब परिवार की बात चले तो वही उनका प्रतिनिधि बने खड़ा हो।"

रेगिस्तान के लोगों के लिए ये एक बड़ी समस्या है कि दिल्ली और जयपुर एक ही रास्ता जाता है। इसलिए मालूम नहीं हो पाता कि वह कहाँ जा रहा है। क्या वह दिल्ली जा रहा कलावादी है या जयपुर जा रहा कला मर्मज्ञ?

केएसएम स्टूडियो से बाहर चले और वह पूँछ ट्रेंच में खो गई। मैं उलझन में आँखें उठाये स्टूडियो की छत देखता रहा।


April 9, 2018

एक रूमानी चीज़

अतीत बुझी हुई, मिटी हुई या गुज़री हुई बात नहीं है। वह हमारे साथ चलता है ठीक हमारे पीछे।

आज सुबह स्वप्न में पिताजी को देखा। उनके साथ हमेशा दो दोस्त होते थे। स्वप्न में भी थे। उनसे बाइक स्टार्ट नहीं हो रही थी। मैं दूसरी कोशिश में उसे स्टार्ट कर देता हूँ।

जैसे प्रेयसियां अतीत हुई, जैसे पिताजी अतीत हुए ठीक उसी तरह आँख खुलते ही स्वप्न अतीत हो गया।

अगर मैं अतीत के दरिया में छोटी डोंगी लेकर उतर सकूँ तो मिल सकता हूँ बेहद हसीन लोगों से। देख सकता हूँ उनकी प्यार भरी आंखें। महसूस कर सकता हूँ कच्ची बाहों के घेरे। होठों पर उतार सकता हूँ गुलाबी सितारे। अपने कंधों को पा सकता हूँ मादक गन्ध से भरा हुआ।

अतीत भी एक रूमानी चीज़ है।
* * *

April 8, 2018

चौथा धंधा - अयोध्या प्रसाद गौड़

नंगे आदमी के गले में टाई 
नंगी औरत के पैरों में जूते।

आँख फाड़कर देखते हैं बच्चे और मर जाता है उनका बचपन।

भयावह हो गए हैं समाचार पत्रों के ई-एडिशन और डिजिटल एडिशन। अख़बार का प्रिंट जिन ख़बरों को प्रस्तुत करता है, वे ख़बरें वेब पोर्टल पर ख़ास महत्व नहीं रखती। वेब पर महत्व रखने वाली ख़बरें प्रिंट में कम ही दिखती हैं। मुझे इससे ये समझ आता है कि हमारे पास टैब या फोन है तो इससे निजता बनती है। इसी निजी स्पेस को सेक्स, कुंठा, शोषण और हत्या से भरा जा सकता है। लेकिन यही सब प्रिंट में नहीं रखा जा सकता क्योंकि छपा हुआ अख़बार या रिसाला परिवार के बीच रखा रहता है।

अर्थात व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को उसकी निजता में घुस कर नष्ट किया जाए और बाहर शालीन और सुसंस्कृत होने के दिखावे को बनाया रखा जाए।

क्या हिचक होनी चाहिए ये कहने में कि लोकतंत्र का चौथा खम्भा अब चौथा धँधा हो गया है। अयोध्या प्रसाद गौड़ की किताब का शीर्षक है चौथा धँधा। ये शीर्षक उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार नारायण बारेठ के उद्बोधन से लिया है।

साल नब्बे इक्यानवें में जोधपुर में कॉफ़ी हाउस से थोड़ा आगे हाई कोर्ट रोड पर पोरवाल सदन में नवभारत टाइम्स के जोधपुर ब्यूरो का दफ़्तर हुआ करता था। नारायण बारेठ ब्यूरो प्रमुख थे। वे मुझसे प्रेम करते थे तो ब्यूरो दफ़्तर में बैठने और ख़बरें लिखना सीखने के लिए बुला लिया था। एक टाइपिस्ट दो तीन घण्टे के लिए आता था बाक़ी समय मैं वहां बैठकर कुछ ख़बरें पढ़ता कुछ प्रेस नोट पर हाथ आजमाता।

बारेठ जी जब पत्रिका के कोटा संस्करण में थे तब उन्होंने कुछ फीचर लिखे थे। उनकी फाइल मुझे सौंप दी गई थी। मैंने उन फीचर को पढ़कर ये जाना कि मैं ऐसी ख़बरें ही लिखना सीखना चाहता हूँ। मुझे उन दिनों की याद से बहुत ख़ुशी होती है। नारायण बारेठ का सानिध्य सुख था।

कुछ महीने दिनेश जोशी, रमेश पारीक, एम आर मलकानी के साथ प्रेस की टेबल शेयर करने का अवसर मिला था। पत्रकार बाबू देवकीनंदन खत्री के रचे ऐयार सा होता है, ये मुझे जोधपुर के पत्रकारों को देखने से समझ आया था। वे लोग जादुई थे मगर मुझे प्रिय थे।

मैं कभी सोजती गेट के पास नवज्योति के कार्यालय चला जाता था। वहाँ रुद्राक्ष की मालाएं धारण किये एक भव्य पत्रकार मिलता था। उसकी आँखों से लुटेरा प्यार झरता रहता था। कभी जलतेदीप जाता तो मुझे अवस्थी दिख जाते। मगर मेरा मन पास की पतली गली में घुसा रहता जहाँ माणक पत्रिका के कार्यालय का बोर्ड टँगा होता। माणक सच्चे अर्थों में ऐसी पत्रिका थी जो रेगिस्तान की दूर बसी ढाणियों में सहेजी, संभाली और प्रेमपूर्वक पढ़ी जाती थी। राजस्थान के लिए राजस्थान की ऐसी कोई पत्रिका होगी ऐसा मुझे नहीं लगता।

अयोध्या प्रसाद गौड़ का नाम मेरे लिए इन्हीं पुराने आकर्षणों और सम्मोहनों के कारण सदा परिचित रहा। उनसे एक दो बार ही मिलना हुआ। अभी जोधपुर में क से कहानी शिविर आयोजित हुआ था। उसमें दूसरी बार उनको बोलते हुए सुना। विषय का गम्भीरता से अध्ययन करना और उस पर सलीके से अपनी बात को रोचक ढंग से कहना अयोध्या प्रसाद गौड़ की ख़ूबी है।

चौथा धँधा के ऑनलाइन होने का मालूम हुआ तो मैंने ऑर्डर कर दिया। मुझे इसके टाइटल के साथ लिखी पंच लाइन से लगा कि जोधपुर के अनेक पत्रकारों को मैं इस किताब में कहीं पा सकूँगा। "पत्रकारिता के क़िस्से" से ये अनुमान लगाना गलत न था। लेकिन मुझे इसमें कहानियां मिली। सच्ची कहानियां।

जैसा कि अयोध्या प्रसाद कहते हैं कि इस किताब का उद्देश्य पत्रकारिता को बदनाम करना नहीं है ठीक वैसा ही है कि ये कहानियां पत्रकारिता को बदनाम करने की जगह पहचानपत्र की लाल पट्टी को उधेड़कर अंदर के संसार को सामने रखती हैं। मैं अख़बार के पाठक के तौर पर कहूँ तो कहना होगा कि ये किताब बदनाम नहीं करती पत्रकारिता को शीर्षक कहानी के माध्यम से नंगा करती है।

पोलीपैक किताब की ये तस्वीर आकाशवाणी के स्टूडियो में ली थी। प्यारे ए पी आपकोबधाई। मज़ा आया पढ़कर।

April 7, 2018

हो रही छिन झिंग छिनिंग झिंग

चादर की सलवटों के नीचे 
थोड़ी सी रात बची रह गयी थी. 
इसी तरह अधेड़ आदमी की उम्र की सलवटों में 
कहीं-कहीं थोड़ा सा लड़का बचा हुआ था.

अधेड़ उम्र की गरदन में बेहिसाब दर्द था. उम्र की सलवटों में बचे हुए लड़के ने इसकी परवाह नहीं की. सुबह पांच बजे का जगा, दीवार का सहारा लिए एक चौकी पर बैठा हुआ अधेड़ निरीह नहीं लग रहा था. वह एक गलत खोल में ठूँसे हुए अकड़े और बेढब बिछावन की तरह दिख रहा था. दर्द की लहर उठती तो उसकी आँखें मुंद जाती. वह अपनी गरदन पर अँगुलियों को सख्ती से घुमाता हुआ अनुमान लगता कि कोई गाँठ है क्या? फिर सोचता कि अगर गांठों वाली बीमारी हुई तो और कितने दिन ज़िन्दा रहेगा?

उतनी ही अधेड़ औरत चाय के दो प्याले चौकी के बराबर रखकर बैठ जाती है. "चाय के साथ कुछ लेंगे?"

आदमी चाय की ओर देख नहीं सकता. वह गरदन के दर्द से हार रहा होता है. जैसे कि गरदन के दर्द ने उसे चित्त कर दिया है मगर अभी तक खेल से बाहर होने का फैसला नहीं सुनाया है. वह सामने की खिड़की की ओर देखा हुआ कहता है- "नहीं कुछ नहीं चाहिए"

"हाँ कभी कभी मेरे साथ भी ऐसा होता है कि पहली चाय के साथ बिस्किट नहीं चाहिए होते और कभी लगता है उनके बिना तो चाय पी ही न जाएगी" औरत ने चाय को सिप करते हुए कहा.

आदमी ने कहा- "हमारे काम पूरे हो जाते हैं और उम्र बची रह जाती है. तब ऐसा होता है"

औरत खिड़की के नीचे बने आले में रखे हुए प्लेयर को चला देती है. पुरुषोत्तम दास जलोटा गाने लगते हैं. ठुमकी चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियां. उनेक पीछे समूह स्वर में यही आवाज़ आती है. कीर्तन चलता रहता है. आदमी सोचता है कि रामचंद्र जब अधेड़ हो गए होंगे तब क्या उनको भी गर्दन में दर्द हुआ होगा? क्या किसी ने उनकी वह पीड़ा देखी होगी?

औरत अपनी आँखें बंद कर आँगन में चल-गिर रहे नन्हे रामजी को सोचने लगती है. उसका हाथ सहसा अपने घुटने की ओर जाता है जैसे गिरे हुए रामजी के घुटनों के धूल झाड़ रही हो. आदमी औरत को देख नहीं रहा. वह ये सब सोच रहा है. आँखें बंद किये हुए औरत उसकी प्रिय छवि है. जब भी औरत की ऑंखें खुली होती हैं तब उनमें से एक लड़की झांकती है. सायकिल पर सवार मोहनपुरा ब्रिज पर चढ़ती हुई पीछे मुड़ देखने का साहस करती हुई. उस लड़की की याद आते ही गरदन का दर्द घुटनों तक आ जाता है. वह सोचता है कहाँ गुमा दिया सबकुछ. पुल पर चढ़ती सायकिल सवार लड़की और उसे देखता हुआ लड़का.

अब बाद बरसों के जब भी औरत आँखें बंद रखती है वह आश्वस्त रहता है की वह लड़की कहीं गुम रहती है.

"बंद कर दूँ या चलने दूँ?" औरत पूछती है.

अधेड़ आदमी अपनी गरदन को घुमाता है. दर्द की एक लहर फिर से दौड़ पड़ती है. उसके चेहरे पर छुपाने में भी कुछ जाहिर हो जाता है. औरत पूछती है- "तबितय ठीक नहीं?" आदमी कहता है- "क्या इस प्लेयर में कुमार गंधर्व नहीं है?"

औरत पूछती है- "चाय और पियोगे?"

कभी-कभी हम खत्म हो चुके होते हैं. जैसे जिम मोरिसन खत्म हो जाता है. जैसे बेल्ली होलीडे खत्म हो चुकी होती है. कभी-कभी हम सिल्विया प्लाथ की तरह खत्म हो चुके होने के बाद सोचते हैं कि अब इस देह में बसे जीव का कुछ करना होगा और फिर उसे सलीके से ठिकाने लगाते हैं. लेकिन अक्सर हम खत्म होने के बाद बच्चों की अँगुलियों में फंसकर बच जाते हैं. किसी सांवली कुदरती सूरत की याद की गिरहों में रह जाते हैं मगर ज़्यादातर हम होते हैं उसी अधेड़ औरत या आदमी के पसीने की गंध सूख जाने के डर से भरे हुए, हम जिसके साथ अनेक बरसों से रह रहे होते हैं.

सुनता है गुरु ज्ञानी 
गगन में आवाज़ हो रही छिन झिंग छिनिंग झिंग छिन

औरत रसोई में जा चुकी थी. वह अधेड़ आदमी भी पीछे गया. उसे कहता है- "वाशरूम जा रहा हूँ" उसे ये कहने की ज़रूरत नहीं है कि औरत जानती है मगर वह इसलिए कहता है कि बरसों तक साथ रहने के बाद बात करने के बहाने बचाए रखने होते हैं. इससे मर जाने के बाद भी जीते रहने में आसनी होती है. 
* * *

रातों में देर तक चुप जागते सोना जैसे ये न कह पाना कि अब तनहा छोड़ दो. मन हो तो इंतज़ार करना. 
* * *

कोई एक पंक्ति कहीं छूट गयी थी. समझ न आया की इसे कहाँ रखूं. "बात करने जैसा हाल बचा नहीं है."
* * *

[Painting image : Ashley Garrett]

April 6, 2018

तुम कुछ नहीं हो.

हिंदी अब असफल और धोखेबाज़ प्रेमियों की भाषा बन गयी है. बिलकुल मीठी. कहना कुछ करना कुछ. इसलिए हिंदी नेताओं की प्रिय भाषा है.

काला पगोडा, कहानी पढ़ते हुए मैं रुक गया. मैंने स्वदेश दीपक की ओर देखा. वे कुछ लिख रहे थे. मुझे लगा कि वे लिख नहीं रहे हैं कुछ बना रहे हैं. क्या? पन्नी और तम्बाकू से एक सिगरेट. मैं एकटक उनको देखने लगता हूँ. इसलिए कि वे क्षणांश को मेरी ओर देखें. ताकि मैं उनको इशारा कर सकूं कि आप इस सिगरेट का कोई कश मेरे लिए भी रखना.

अचानक मेरा ध्यान भटका. जैसे स्वदेश दीपक ने कोई जादू किया. वे सिगरेट लेकर खिड़की के रास्ते बाहर चले गए. सिगरेट के धुएं की गंध खिड़की के आस पास होनी चाहिए थी मगर वह मेरे करीब ही कहीं थी. मैंने अपनी अँगुलियों को सूंघा. उनमें तम्बाकू की गंध थी. मैंने बहुत दिन से सिगरेट को छुआ तक नहीं था. क्या स्वदेश दीपक धुआँ बनकर शब्दों में छुप गये हैं? इसी उधेड़बुन में किताब को पलटा तो पाया कि कवर के पीछे बैठे स्वदेश दीपक सिगरेट सुलगाने वाले ही हैं.

लेकिन इस तस्वीर के सिवा वे जा चुके थे.

मैंने आवाज़ दी- "स्वदेश दीपक सर रुकिए. सुनिए तो... क्या सचमुच भाषा किसी समाज का बिम्ब होती है? क्या भाषा की बदलती हुई सूरत, समाज के साथ-साथ बदलती है."

एक चेहरा खिड़की से झाँका. "ये बात मैंने तेरह-चौदह साल पहले एक पात्र से कहलवाई थी. अब पता नहीं बात सच की ओर जा रही है कि नहीं?" फिर से धुआँ बेतरतीब होकर खिड़की के रास्ते कमरे में आ गया.

वे खिड़की के पास खड़े थे फिर भी मैं जाने क्यों डर रहा था. मुझे लग रहा था कि स्वदेश दीपक सर कहीं जाने वाले हैं. मैंने जल्दबाजी में पूछा- " भाषा से समाज की प्रवृति की ओर इसी प्रकार से संकेत किया जाता है?" मेरे प्रश्न पूछे जाने तक स्वदेश दीपक दूर जा चुके थे. उनकी परछाई का छोटा सा हिस्सा खिड़की की तीलियों पर पड़ रहा था.
* * *
मैं एक नोट लिखना शुरू करता हूँ. सोचा है कि लिखकर इसे खिड़की पर टांग दूंगा. मेरी अनुपस्थिति में स्वदेश सर इस खिड़की के पास से गुज़रे तो इसे पढ़ लेंगे.

"प्यारे स्वदेश सर, मद भरे पात्र कैसे रचे जाते हैं? ये कहीं से भी सीखा जा सकता है किन्तु मैं चुन सकता तो आपकी कक्षा में बैठना चुनता. कृपया जल्दी समय दें"

मैं नोट को खिड़की पर टांग देता हूँ.

स्वदेश दीपक की कहानी से जंगली घोड़ों का टोला भागता हुआ बाहर आता है. खिड़की की तीलियों के बीच से भागते हुए वे घोड़े एक रास्ता बना देते हैं. वर्जनाओं की तीलियाँ टेढ़ी हो जाती हैं. 
* * *

अचानक तीलियों के पास एक आदमी खड़ा दिखाई देता है. वह कमरे में झांकता है. जैसे कुछ खोज रहा हो. मुझे देखकर अभिवादन करते हुए पूछता है- "एक मुर्गाबी इस खिड़की में आकर तो नहीं गिरी?" मैं उसकी बात को सच समझ बैठता हूँ और कमरे में झाँकने लगता हूँ. कमरे में कुछ नहीं था. मुर्गाबी तो क्या एक पंख भी नहीं. वह आदमी भी हैरत से देखता हुआ अपनी दुनाली को कंधे पर ठीक से टांग कर मुड़ जाता है.

वह आदमी मुड़ता है और लौटकर पूछता है- "तुम झूठ तो नहीं बोल रहे? अगर तुम सच कह रहे हो तो ये खिड़की की तीलियाँ मुड़ क्यों गयी है?" मैं कहता हूँ- "यहाँ से जंगली घोड़े भागे थे" वह आदमी कहता है- "वे ज़रूर स्वदेश दीपक के होंगे" मैं हैरत से भर जाता हूँ. उसे पूछना चाहता हूँ कि आप कैसे जान पाए हैं कि वे घोड़े भले ही जंगली थे मगर स्वदेश के ही थे. मेरे कुछ पूछने से पहले ही उस आदमी ने कहा- "एक बात बताओ. जब स्वदेश दीपक के जंगली घोड़े यहां से भाग सकते हैं तो मोपासां का शिकार मुर्गाबी यहाँ से अन्दर क्यों नहीं गिर सकती?" 
* * *

एक जेन दिखाई पड़ता है. मैं पूछता हूँ कि कम शब्दों में कोई ऐसी बात कही जा सकती है जिससे कायाकल्प हो जाये? वह कहता है- "तुम कुछ नहीं हो"

मैं कुछ नहीं हूँ. सचमुच! अहा. अचानक सारे दुःख सूखे पत्तों की तरह झड़ने लगते हैं. जब मैं कुछ नहीं हूँ तो चिंता किस बात की है? 
* * *

अब किसी को नहीं कहना चाहता हूँ कि तुमसे प्रेम है. ऐसा सुनने वाला पास बैठ जाना चाहता है. उसके पास बैठते ही कुछ चिंताएं फिर से उगने लगती हैं.

मैं कुछ नहीं हूँ होना ही अच्छा लग रहा है. शुक्रिया. 
* * *

[Painting image courtesy ; Chris Barnard]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.