December 30, 2013

तुम जो बिछड़े भी तो खुशी है

इस लेख को कहीं भी 
प्रकाशित किये जाने की 
अनुमति नहीं है. 
ये मेरे जीवन का निज हिस्सा 
और अपनी सोच का अक्स है.


हम अगर कर पाते संभावित दुखों की मामूली सी कल्पना तो जान जाते कि ज़िंदगी का शुक्रिया अदा करने की वजहें बहुत सारी हैं. इस साल के बीतने में एक दिन बाकी है. साइबेरिया से उड़े पंछी रेगिस्तान की ओर आने के रास्ते में हैं. इधर मगर ठण्ड बढती जा रही है. मैं और ज्यादा बर्फ हुआ जाता हूँ कि दिल्ली जो मेरे देश की राजधानी है, वह एक डरावनी बहस में घिरी है. दो प्रमुख दल एक बात बड़े विश्वास से कह रहे हैं कि सस्ती बिजली और ज़रूरत का पानी उपलब्ध नहीं कराया जा सकता है. मैं घबराया हुआ हूँ कि ‘ख़म ठोक ठेलता है जब नर, पत्थर के जाते पाँव उखड़’ वाली जिजीविषा वाले मनुष्य ने अपने हौसले को खो दिया है. या फिर ये आदमी के खिलाफ आदमी की ही साजिश है. दोनों में से जो भी सत्य है वह नाउम्मीदी से भरा है.

रामधारी सिंह दिनकर और रश्मिरथी, डूबते साल में हतप्रभ हों शायद. लेकिन ऐसा नहीं है. हम अक्सर अच्छी बातों को भूल जाते हैं और दुखों के सांप गले में लपेटे हुए, ज़हर पिए शिव बने रहने को याद रखते हैं. मैं रात के अँधेरे में घर की छत पर बने कमरे में बैठा हुआ चिन्हित करता हूँ उन रश्मियों को जो हमारे जीवन में दुखों के अंधकार के बीच आशा का उजास भर रही है. किसने सोचा था कि मध्यप्रदेश की विधानसभा पालथी मार कर जिस नकली संत को भाव विभोर होकर सुन रही हो, जो मंच पर राम लला की ईंट से देश को झकझोर देने वाले चमत्कारी राजनेता के पास बैठा हो, उसके विरुद्ध कुछ किया जा सकेगा. उनकी यौन कुंठाओं और कृत्यों पर भारतीय अदालत में मुक़दमा चल सकेगा और धर्म के रथ पर विकास नाम का वर्क चढ़ाये हुए प्रधानमंत्री पद की ओर दौड रहा उम्मीदवार बिना नफा नुकसान सोचे, ऐसे व्यक्ति के अनुयायियों की संख्या से घबराए बिना साफ़ पल्ला झाड लेगा. ये इस नए दौर का संकेत है कि वह कई महीनों से जेल के सींखचों में कैद पड़ा है. जबकि हमारे यहाँ गांव के सरपंच तक के खिलाफ़ किसी अबला की पुकार न सुना जाना एक आम बात रही है. इसी तरह तहलका और न्याय के लिए आँखों पर पट्टी बंधी हुई माननीय मूरतों के आचरण पर प्रसंज्ञान लिए जा रहे हों, कार्रवाही हो रही हों. साल उदास तो नहीं है.

पिछली बार हम सुनामी में तबाह हो गए थे, इसबार उड़ीसा के महलों से लेकर कच्चे झोंपड़ों तक, तूफ़ान की हर संभव खौफनाक तबाही बरसी मगर जान को बचा लिया गया. उत्तराखंड में आसमान से जो आफत उतरी उससे उबरने में वक्त ज़रूर लगा, जान खूब गवाईं मगर जिस सेना के दम पर हम देश की सुरक्षा सोचते हैं उसने खुद को साबित किया. ये जान लेने की जगह जान बचने का कठिन युद्ध था. रोटी के लाले थे मगर हिम्मत की कमी न थी. इसी साल मैं अपनी एक शाम ऐसे पायलट के साथ बिता सका जो नए लड़ाकू विमानों की सफल उड़ान का परीक्षण करता हो. आप जानते हैं कि हम सब अपने बच्चों और पत्नी या पति के साथ सुख से रहना चाहते हैं. हमें जब कहीं लाखों के पैकेज मिल सकते हों उसके बीच भी जान जोखिम में डाल कर सेवानिवृति के बाद भी देश के लिए खतरों से भरी उड़ानें भर कर खुद को ज़िंदा होने का अहसास दिलाते हैं. ऐसे इंसान के साथ दो बीयर और पीने का जी, मुझे ज़िंदगी में आगे की ओर धकेलता है. तो उदासी का साल नहीं है.

इस साल की शुरुआत ही खूबसूरत थी. मैं और आभा गुलाबी शहर की सड़को, गलियों और छतों पर मंडराते हुए परिंदों के पंखों की छाँव तले बिता रहे थे. दुनिया इस तरह तेज़ रफ़्तार है जैसे किसी ब्लेक होल की तरफ खींची चली जा रही हो, ऐसे वक्त में हम दोनों सेन्ट्रल पार्क में सुस्ता रहे थे. एक गोरा आदमी फल खाते हुए तोतों की तस्वीरें उतार रहा था और हम देख रहे थे एक भव्य तिरंगा शान से पार्क के बीच फहरा रहा था. राजपथ जैसी सड़क के किनारे छोले कुलचे, राजापार्क में पानी पताशे, विद्याधर नगर की चौपाटी में चाट वाले और हवामहल की अनूठी छवि के आगे ज़िंदगी के विस्तार पर ठहरा हुआ एक लम्हा. दिल्ली के प्रगति मैदान में किताबों से रचे अद्वितीय संसार में दोस्तों के साथ कॉफी से भरे प्याले लिए हुए धूप की आमद का इंतज़ार करते जाने के दिन. जयपुर के पास महल गाँव में अपने घर की बालकनी में बैठकर काली ऊदी घटाओं के स्याह रंग से भीगे हुए, अपने बच्चों के लिए सुखद भविष्य की कामना में देश की मिटटी को निहारते जाने की स्मृतियों से बना हुआ साल. कैसे कह दूं कि उदास है.

इसी साल आस्था के चरणों में घी की बहती हुई नदी सडकों पर उतर आई. देश भर ने उसे जी भर कर कोसा. असीम सुख हुआ. गड़े खजानों की खोज में रत इस दुनिया में कुछ नहीं बदला. विज्ञान के घोड़े पर चढ़े हुए हमारे देश के ज्ञानी लोगों की अक्ल भी एक साधू ने निकाल ली. हमने उनको भी खूब कोसा. उनकी सार्वजनिक खिल्ली उड़ाई. मेरा जी खुश हुआ. क्रिकेट के भगवान की विदाई में स्टेडियम की दर्शक दीर्घाएं आंसुओं से भर गयी. इस विदाई के समय, अब्दुल क़ादिर की घूमती हुई बाल पर एक घुंघराले बालों वाले लड़के के बल्ले से उड़ते हुए चौके चोके छक्के, जो हाई स्कूल वाली गली में एक दुकान के बाहर खड़े होकर देखे थे, उस लम्हे की याद भी इस साल साथ रही. लड़कियों को स्मैश करते हुए देखा, दुनिया को अपने खेल का लोहा मनवाते देखा. परिवार कल्याण के बेटी बचाओ वाले बेअसर पोस्टरों के बीच ऐसी बेटियों पर फख्र करता और उनके अपने घर में होने की कामना करता हुआ देश देखा. निर्भया की शहादत के बाद सबको स्त्री सम्मान के लिए एकजुट देखा. बीत गया है ऐसा साल. कहो कैसे कह दूं कि उदास है.

इस साल मैं एक मकड़ा था, स्वस्थ और मनोरोगी होने के बारीक तार पर झूलता हुआ. कुछ महीने दीवानेपन में गुज़रे, कुछ दवा खाते हुए. एक घर-संसार वाला मकड़ा, जिसे न आता हो कोई जाल बुनना. जिसकी कामना में सिर्फ मुक्ति हो. जिसके रेगिस्तान वाले घर के ऊपर उड़ते हों लड़ाकू विमान. जिसने दोस्तों के हिस्से में रखा हो आवाज़ देने का फ़ैसला. जिसने चुना हो बच्चों के लिए उनकी पसंद का रंग. जिसने पत्नी से कहा कि तुम घर के कामों और स्कूल के बीच याद रखो कि यही एक ज़िन्दगी है. हमें इसी को जीना है, इसलिए वक्त चुरा कर अपनी पसंद के काम करते जाओ. इतना कह कर मकड़ा शाम होते ही खो जाता अँधेरे की रहस्यमयी दुनिया में. अँधेरा जादू का घर है. आपने कभी सोचा है कि एक बीज में एक पेड़ कैसे छुपा होता है. मैंने सोचा. इसलिए शब्दों में से उगा ली कई किताबें. कभी अचानक खयाल आया कि एक तवील बोसे में छुपी हो सकती है कोई दूसरी दुनिया की झलक. ऐसे करने पर सुना कि ये सब कहाँ से सीखा तुमने?

मैं कल की शाम कैसे बिताऊंगा, ये नहीं मालूम. मौसम सर्द है. हवा में बर्फ की तल्खी है. दुनिया गोल नहीं, आयताकार है. फोन, टेबलेट और कंप्यूटर के स्क्रीन जैसी. आम आदमी से डरे हुए हैं सब केसरिया आदमी. लाल झंडे बौद्धिक बहसों से परे जंगलों में अलाव ताप रहे हैं. चरखे के निशान से पंजे तक पहुंचे लोग अपने घर जाने की बारी के इंतज़ार में हैं. कुल मिलाकर मौसम मस्त है. बीते कल की रात महबूब के लिए कवितायेँ लिख रहा था. आने वाले कल की रात समय की सुराही से टपकनी बाकी है मगर कौन कहता है साल उदास है. ये इस प्रतिबद्धता का भी साल है कि छींके में अंडे की तरह सुख से लटके रहना भी कोई ज़िंदगी है? कभी हमें उठाना चाहिए कौम के लिए भी अपना हाथ, कभी हम डालें हाकिम के गिरेबान पर भी बुरी नज़र.

प्रेम हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत और ताकत है. रूमानी ख़यालों में जीना और हादसों से भरा वक्त का फटा हुआ चादर ओढ़े आगे बढते जाना मनुष्यता का सबसे सुन्दर प्रतीक है. जो बिछड गए उनका इंतज़ार और जो साथ हैं उनकी अँगुलियों के पोरों पर बैठी हुई गर्मी को साझा कर लेने की उम्मीद सबसे सुन्दर उम्मीद है. दुखों के अंधे कुंए में या रास्तों के बीहड़ में खो गए लम्हों की स्मृतियाँ, एक दिन हमारी देह के साथ बुझ जायेगी. मगर उससे पहले एक दिन हम देखेंगे कि सोने की चिड़िया कोई कहावत नहीं है. एक दिन हमारी जींसों की खाली पड़ी हुई गोल्ड कोइन जेबें भर जाएँगी. एक दिन हम हांक देंगे, सब दुखों की परछाइयों को पहाड़ की तलहटी, रेगिस्तान के धोरों की पीठ या समंदर के गर्भ की ओर. उस दिन तक के लिए, इस साल का बहुत शुक्रिया, नया साल आप सबके लिए मुबारक हो. आने वाले मौसमों में खूब अच्छी विस्की और खूब सारा सुकून बरसे.
* * *

इस पोस्ट के साथ लगी तस्वीर टाइम मेगजीन से ली गयी है. बच्चों के अस्पताल की खिड़की को एक कर्मचारी साफ़ कर रहा है.

December 18, 2013

कोई चरवाहा भी न रखे

लोग पड़े हैं जाने कहाँ और जाने कहा अपने दिलों को छोड़ आये हैं.
समझते हैं खुद को दिल के बादशाह और सोचो तो ऐसे लोगों को कोई चरवाहा भी न रखे.
* * *

अनजाने अँधेरे की गिरहों से बेढब, बेहोशियारी की बातें करके रात कहीं चली गयी है. पुल नीचे, एक पिलर के पास उसका बोरिया समेट कर रखा हुआ है.

पुरानी ज़िंदगी की कलाई में फिर एक नया दिन है, रात की तलाश में निकला हुआ.
* * *

जिनको जीवन ने अस्वीकार कर दिया था हमारे हाथ के उन चार दानों को मृत्यु कैसे स्वीकार कर सकती है. इसलिए तुम दुनिया में कहीं भी रहो, मैं तुम्हारे पीछे हूँ.
* * *

पहाड़ो में रहने वाले चूहों से अलग हैं रेतीले मैदानो के चूहे, बाज़ की चोंच मगर असफल है उनके स्वाद को अलग अलग परख पाने में.
मैं कैसे भी भूगोल पर चला जाऊं एक याद बीनने लगती है, मेरा रेशा रेशा.
* * *

कुछ दिन पहले उन्होंने ईश्वर के बारे में कुछ पता करने को सदी का भयानकतम प्रयोग किया था. कुछ दिन बाद एक नन्हीं लड़की रेल में सफ़र कर रही थी.
कुछ दिन बाद नहीं, ठीक उसी दिन कवि ने कविता लिखी.
* * *

धूप ने दीवारों को साये खिड़कियों को रौशनी के फाहे बख्शे हैं. हवा में बर्फ की खुशबू है.
एक उसका नाम न हो तो तन्हाई कुछ नहीं होती.
* * *

हमने तो आवाज़ों को फूलों की गंध में पिरोया
प्रेम का दरवाज़ा बनाया जो खुलता हो उदासी के आँगन में
* * *

स्वप्न, प्रेम की धूसर परछाई है.

सोते हुए बच्चे की बंद आँखों के नीचे होठों पर मचल कर बिखर जाती खुशी की तरह. जवान होने की बारीक रेखा के आस पास किसी सीढ़ी से पैर चूक जाने पर नींद में ही औचक संभल जाने की तरह.

सीवान, सिलीगुड़ी, कोलकाता, कानपुर, बाड़मेर जैसे किसी शहर की यात्रा पर गए बिना ही उस शहर के रास्तों की यात्रा पर होना प्रेम है.

प्रेम, खुशी और भय से भरा हुआ स्वप्न है.
* * *

स्मृति एक पारदर्शी आईना है. विगत को आगत के बीच उकेरता है.
* * *

कच्ची धूप उस जानिब पांवों से लिपटी पड़ी है, इस तरफ रेगिस्तान में, मगर सर पर खड़ी है.
हम ही नहीं, मौसम का हाल भी है जुदा जुदा.
* * *

December 17, 2013

करमण री गत न्यारी

क्ल केह मैं सबसूं बड़ी, बीच कचेड़ी लड़ती
दौलत केह मैं सबसूं बड़ी, मेरे हर कोई पाणी भरती
सूरत केह मैं सबसूं बड़ी, मेरे हर कोई जारत करते
तकदीर केह तुम तीनों झूठे, मैं चावूँ ज्यों करती.


ऊदा भाई करमण री गत न्यारी
टर सके नहीं टारी

आछी पांख बुगले को दीनी, कोयल कर दीनी काली
बुगलो जात बाभण को बेटो, कोयल जात सुनारी

छोटा नैण हाथी ने दीना, भूप करे असवारी
मोटा नैण मृग को दीना, भटकत फिरे भिखायारी

नागर बेल निर्फल भयी, तुम्बा पसरिया भारी
चुतर नार पुत्र को झुरके, फूहड़ जिण जिण हारी

अबूझ राजा राज करे, रैय्यत फिरे दुखियारी
कहे आशा भारती दो दरसण गिरधारी.

मैं लंबे समय से इस प्रतीक्षा में था कि गफ़ूर खां मांगणियार और साथियों की आवाज़ों में इस रचना को रिकार्ड किया जा सके. अभी एक खुशखबरी मिली कि इन बेहतरीन गायकों को आकाशवाणी ने ए ग्रेड के कलाकारों में शामिल कर लिया है. इस ऑडिशन के लिए भेजी जाने वाली रिकार्डिंग करके भेजते समय मैंने चाहा कि बीस सालों की सबसे बेहतरीन रिकार्डिंग हो सके. उस रिकार्डिंग से कोई रचना कभी ज़रूर आपसे बांटना चाहूँगा मगर फ़िलहाल इसे सुनिए.

अक्ल कहती है मैं कचहरी में खड़ी होकर लड़ती हूँ इसलिए सबसे बड़ी हूँ. दौलत कहती है मेरे लिए हर कोई सेवादार होने को आतुर है इसलिए मैं सबसे बड़ी हूँ. सुंदरता कहती है हर कोई मेरे लोभ की चाहना में लगा हुआ है इसलिए मैं सबसे बड़ी हूँ. लेकिन तकदीर कहती है तुम तीनों झूठे, मैं जैसा चाहती हूँ वैसा करती हूँ.

ऊदा भाई, करम की चाल सबसे न्यारी है, इसे टाल कर भी नहीं टाला जा सकता है.

बगुले को सफ़ेद रंग के पंख दिए, कोयल को  काला रंग दे दिया. बगुला किसी ब्राहमण की तरह साफ सुथरा उड़ता रहता है और कोयल सुनार की तरह श्याम हुई, बारीक काम करती जाती है. हाथी को छोटी छोटी सी आँखें दी है जिसकी सवारी राजे महाराजे करते हैं और जिस मृग को बड़ी बड़ी आँखें दी वह भिखारी की तरह वन में भटकता फिरता है. नागर बेल यानी पान की बेल जो औषधीय है उस पर पर कोई फल नहीं खिलता है, कड़वे तूम्बों की बेल खूब फैलती जाती है. विदुषी पुत्र की कामना में रहती है, फूहड़ स्त्री बच्चे जनती ही जाती है. मूर्ख राजा राज कर रहे हैं और जनता दुखों से भरी घूम रही है.  हे गिरधारी, आशा भारती निवेदन कर रहे हैं कि एक बार फिर दर्शन दो.


December 16, 2013

मंडेला मंडेला

नौजवान दिनों के दो ही क्रश यानि पहले सम्मोहन हुआ करते हैं, प्रेम और क्रांति. मैं जिस साल कॉलेज से पास आउट होने वाला था उसी साल यानि उन्नीस सौ नब्बे में अफ़्रीकी जन नेता नेल्सन मंडेला को सत्ताईस साल की लंबी क़ैद से मुक्त किया गया था. नए साल के फरवरी महीने की ग्यारह तारीख को दुनिया का ये दूसरा गाँधी विश्व को अपने नेतृत्व और अकूत धैर्य के जादू में बाँध चुका था. दुनिया भर में नेल्सन मंडेला की रिहाई के जश्न मनाये गए थे. बहत्तर साल की उम्र के इस जननायक को बाईस साल के नौजवानों ने अपने दिल में बसा रखा था. हर कहीं अखबारों, रेडियो और टीवी पर इसी महान शख्स के चर्चे होने लगे थे. मंडेला के साथ होना एक ऐसी क्रांति का प्रतीक था जो श्वेतों के विरुद्ध रक्तहीन क्रांति थी. हालाँकि इस क्रांति की नींव में रंगभेद का शिकार हुए अनगिनत काले लोगों की लहुलुहान आत्माएं थीं. हम उम्र के उस पड़ाव पर थे जहाँ से सभी मंज़िलें फतह कर लिया जाना चुटकी भर का काम था. देश में राजनितिक बदलाव की सुगबुगाहट थी लेकिन असल में हर युवा एक ऐसी क्रांति की उम्मीद करता था जो देश की व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तनकारी सिद्ध हो सके. नौकरशाही की जड़ों ने भ्रष्टाचार की और कदम बढ़ा लिए थे. नौवें दशक की शुरुआत तक सियासत और नौकरशाही के बीच का गठबंधन विलासी हो चला था और जनता के काम न करने का अपराधबोध भी विदा होने लगा था. जो समाज सत्य और अहिंसा के रास्ते देश को आगे बढ़ाये जाने का ख्वाब देख रहा था उसमें ज़बरदस्त निराशा छाने लगी थी. लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ऐसी कोई व्यवस्था न थी जो किसी दूसरे दल को वैचारिक रूप से इतना सक्षम बनाये रख सके कि जनता के पास विकल्प बचा रहे. कच्चे और तात्कालिक गठजोड़ों ने इसी टूटी और निराश होती जा रही जनता को और अधिक भयभीत किया. हम देश भर में समान कानून, सबके लिए शिक्षा और भोजन का अधिकार मांगने वाली जन-छात्र रेलियों में सड़कों पर उत्साह से भरे हुए फिरते थे. इसी उत्साह को नेल्सन मंडेला की रिहाई ने नयी उर्जा दी. बुद्धिजीवियों, कामगारों और मजदूरों ने अपने आंदोलनों के बीच पहली बार कोई ऐसा अवसर फिर से पाया था जिस पर मुंह मीठा किया जा सकता हो. खुद को और साथियों को यकीन दिलाया जा सकता हो कि कोई लड़ाई कभी बेकार नहीं जाती.

मंडेला की रिहाई से साढ़े तीन दशक पहले हम आजाद हो चुके थे. हमारे गाँधी की हत्या की जा चुकी थी. देश आजाद तो था मगर इतने बड़े राष्ट्र के समक्ष असंख्य मुश्किलें थी. आज़ादी जीत लेने के बाद एक पीढ़ी आराम करने लगी थी या उन्होंने काम अगली पीढ़ी को हस्तांतरित कर दिया था. अगली पीढ़ी के पास अनगिनत ख्वाब थे जो कि आज़ादी जिस सिरे पर मिली उसी सिरे से आगे बंधे हुए थे. योरोप और अन्य विकसित देशों की जीवन शैली लुभा रही थी. सुख बेहिसाब चाहिए थे मगर काम का कोई हिसाब न था. सिस्टम में ऐसे लोगों और धाराओं ने सेंध लगा ली थी जिनके हित निश्चित लोगों और वर्गों के लिए थे. समाज में धार्मिक विविधता तो थी ही लेकिन एक बड़ी तकलीफदेह बात थी समाज में उपस्थित जातिवाद. अफ्रीका के लोगों ने रंग भेद के विरुद्ध जो लड़ाई लड़ी, वैसी ही लड़ाई की ज़रूरत हम सबको जातिवाद के विरुद्ध लड़े जाने की है. हम अभी भी एक तीसरे गाँधी के इंतज़ार में हैं जो देश के मौजूद जातिगत व्यवस्था की बीमारी के विरुद्ध व्यापक जनजागरण का अभियान चला सके. हम सब मिलकर एक ऐसी शासन व्यवस्था बनाने में नाकाम रहे हैं जो कि जातिगत भेदभाव को खत्म कर सके. कड़े कानून तो बने हैं लेकिन उन कानूनों के बल से मनुष्य का मन नहीं बदला जा सका है. आज जिन कानूनों के सहारे हम दबी-कुचली और उपेक्षित जातियों के उत्थान के प्रयास कर रहे हैं उसका फायदा भी कुछ एक परिवारों या जातियों में किसी एक आध खास जाति तक सिमट कर रहा गया है. हम लीक पर चलने के आदी हैं. किसी ने कहा कि ऐसे चला जायेगा तो चलते ही जाते हैं. ये नहीं सोचते कि वक्त के साथ क्या बदलाव अपेक्षित हैं.

नेल्सन मंडेला नहीं रहे. उनकी प्रासंगिकता सदैव रहेगी. शांति के नोबेल पुरुस्कार से नवाजे गए मंडेला मुझे असल में किसी भारतीय से भिन्न नहीं लगते हैं. यही वजह है कि दुनिया भर के सभी देशों ने उनको अपने सम्मानों ने नवाजा है. भारत ने अपना सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न दिया और पाकिस्तान ने उनको निशान ए पाकिस्तान अर्पित किया है. सम्मान देना अपने आप में व्यक्ति के द्वारा किये गए कार्यों की महानता की और संकेत तो करता ही है, साथ ही हम अपने देश में इसी तरह के खास लोगों के होने के आदर्श को स्थापित करते हैं. तीसरी दुनिया के देशों में मंडेला समान रूप से प्रिय हैं. आर्थिक विषमताओं वाली दुनिया में मनुष्य के एक समान मोल और बराबरी की इज्ज़त का हक सबसे पहली ज़रूरत है. हम जब कॉलेज से निकले तब हमारे सामने मंडेला जैसी एक ज़िंदा शख्सीयत थी. हम उसके कारनामों के बारे में पढ़ रहे थे. उनके भाषण को सुन रहे थे. संयुक्त राष्ट्र संघ उस नेक इंसान के लिए उसके जन्मदिन को रंगभेद विरोधी जागरूकता को बढ़ाने के लिए मंडेला दिवस के रूप में मना रहा था. ये हमारी खुशनसीबी है कि एक जीते जागते लोक नायक को हमने हमारे जीवन में देखा. आने वाली पीढ़ी के लिए कोई नायक आयात थोड़े ही किया जायेगा. हम में से ही किसी को इस समाज के उत्थान के लिए संघर्ष को चुनना होगा. नेल्सन मंडेला के लिए ये सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम अपने समाज में व्याप्त कुरीतियों और जाति प्रथाओं के विरुद्ध संघर्ष करें. अपने देश में मनुष्यता के परचम को फहरा सकें. हाँ सचमुच हर नौजवान पीढ़ी का क्रश प्रेम और क्रांति होना चाहिए.

December 11, 2013

साजन गुडी उडावता

रात को आती है आवाज़ खाली कांच के प्यालों की मगर बिल्ली शराब नहीं पीती. गाय मुतमईन है शहर में प्लास्टिक में बचा कुछ भी खाते हुए उसे क्या गरज होगी ढोल बजाने की मगर आती है लोहे चद्दरों से किसी के टकराने की आवाज़. बूढ़े खुजियाये कुत्ते ने कर ली आत्माओं के रंग और लक्षणों से मित्रता, रोना बंद है उसका इन दिनों मगर मैं जाग उठता हूँ बार बार अचानक.

कि आवाजें ज़बरन बुनती है भय के बारीक रेशे.

नीम नींद में उठकर बीवी भी बदल लेती है कमरा किसी अच्छी गहरी नींद की तलाश में. सुबह के साढ़े तीन बजे दर्द के बेहिसाब बेशक्ल लिबास में सही जगह की तलाश भटक जाती है अपनी राह से और कोई कारण नहीं मिलता कि दर्द कहाँ और किस वजह से है.

सुबह जो लड़का पतंग उड़ा रहा था उसके मांझे पर क्या बारीक कांच पिसा हुआ होगा? क्या अंगुलियां गरम दिनों के आते आते कट न जायेगी कई जगहों से. ऐसे ही खुद को बचाने के लिए हम छिलते जाते हैं. हम खुद खरोंच से कहते हैं आ लग जा मेरे सीने से कर्क रेखा की तरह. ज़िंदगी के मानचित्र पर कुछ जो रेखाओं सा दीखता है वह वास्तव में कट जाने के निशान हैं. हम काफी उम्रदराज़ हो चुके हैं.

आ मेरी बाहों में मगर बता कि तेरी उम्र क्या है? उम्र का हिसाब आसान करता है, दर्द की किस्म को समझने के काम को...

जब कोई आ रहा होता है उसकी तरफ तब हर बूढ़ा आदमी अक्सर लिख लेता है दिल की पर्ची पर आने वाले आदमी की सीरत और उसके दुखों को, उस तक पहुँचने से पहले. मगर एक अफवाह मैंने सुनी थी कि बेटों ने ठग लिया अपने माँ बाप को. यकीन अब भी नहीं है.
* * *

साजन गुडी उडावता लोम्बी दैवता डोर, झोलो लागो प्रेम रो कहाँ गुडी कहाँ डोर.

सजन पतंग उड़ाते हुए खूब ढील देते थे, प्रेम का एक झोंका लगते ही जाने कहाँ तो पतंग गयी और कहाँ गयी डोर. सुबह सात बजे से एक लड़का ओवर ब्रिज पर खड़ा हुआ पतंग उडा रहा है. मौसम सर्द है और धूप नन्हे पिल्ले की तरह अलसाई आँख से देख रही है रेगिस्तान को.
* * *

शोर आता है दसों दिशाओं से
ज़िंदगी के हर कोने तक
मन की कच्ची दीवारों पर जैसे कोई चोट करता हो.

आदमी यूं जीए जा रहा है जैसे भुला दिया है खुद को.
दुनिया नए औज़ार खोज रही है कुछ इस तरह
जैसे आवाज़ें ही घोट डालेंगी आवाज़ों का गला.

शोर के बीच हम भूल चुके हैं नाम जाने कितने
एक दोस्त रूह रूह जपा करता था पिछले मौसम
कभी उससे मिलेंगे तो मुमकिन है हादसे सारे भूल जायेंगे.

December 8, 2013

ज़िन्दगी रात थी, रात काली रही

लोकतन्त्र और चुनावों के बारे में एक प्रसिद्द उक्ति है कि चुनावों से अगर कुछ बदला जा सकता तो इनको कभी का अवैधानिक क़रार दे दिया जाता. इसे याद करते हुए हमें लगता है कि दुनिया भर के लोकतान्त्रिक देश निश्चित अविधि के बाद नयी सरकारें चुनते हैं किन्तु वे जिस उद्धेश्य और सोच से प्रेरित होकर वोट करते हैं वह कभी पूरा नहीं हो पाता है. हम ख़ुशी से भरे होते हैं कि इस बार ज़रूर कुछ बदलने वाला है लेकिन सिर्फ चहरे और नाम बदल जाते हैं. व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं आता. आम आदमी के जीवन को आसान करने वाले काम की जगह नया शासन उसी ढर्रे पर चलता रहता है. इस सदी का सबसे बड़ा रोग भ्रष्टाचार है. ये रोग हर बार नए या फिर से चुनकर आने वालों का प्रिय काम बन कर रह जाता है. वे ही लोग जो कल तक इस बीमारी के कारण हुए राष्ट्र के असीमित नुकसान का हल्ला मचाते हुए नए अच्छे शासन के लिए बदलाव की मांग करते हैं इसी में रम जाते हैं. आप अगर कुछ नेताओं के जवानी के दिनों की माली हालत को याद कर सकें तो एक बार ज़रूर करके देखिये. ऐसा करते हुए आप असीम आश्चर्य से भर जायेंगे. ये अचरज इसलिए होगा कि ऐसे अनेक नेता पक्ष और विपक्ष में बराबरी से मौजूद हैं. वे बारी बारी से सत्ता की कुर्सी पर विराजते हैं और अपनी संपत्ति बढाते जाते हैं. यही हाल अपराधों का है. अपराधमुक्त राजनीति की बात करने वाले दल, हर चुनाव में आरोपित नेताओं को टिकट बाँटते हैं. हम इस दोमुंहे आचरण को पढ़ते, देखते, जानते और समझते हैं मगर चुप ही रहते हैं. हम दूसरे दल को ज्यादा भ्रष्ट बताकर अपने कम दागियों के बचाव में उतर आते हैं. इस तरह चुनावों के बरस बीतते जाते हैं. व्यवस्था में कोई फर्क नहीं आता. हम कोसते रहने के काम में लगे रहते हैं.

हाल ही में पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए हैं. इनमें किसी तरह का आदर्श न राजनैतिक दलों ने प्रस्तुत किया है, न मतदातों ने ऐसा करने के बदले किसी को मतदान के माध्यम से दण्डित किया है. आर्थिक और सामाजिक अपराधों के आरोपों से घिरे हुए नेता हमारे बीच वोट मांग रहे थे. अगर कोई नेता जेल में बंद है या किसी तरह से जमानत पर रिहा है तो वह या उसका कोई परिजन उसी दल का उम्मीदवार है. इतने गिरे हुए हाल में भी मतदाता किसी न किसी वजह से उत्साहित रहता है. वह सुबह सवेरे वोट डालने के लिए कतारों में खड़ा हुआ अपनी बारी का इंतजार करता है. एक दिसंबर की सुबह नौ बजे के आस पास मैं आकाशवाणी के दफ्तर से निकला और अपने पोलिंग बूथ पर पहुंचा. इस पर कुल पंद्रह सौ वोटर चिन्हित हैं. इनमें से कोई सत्तर फीसद वोटर दिहाड़ी मजदूर हैं. वे रोज़ कुआं खोदते और रोज़ पानी पीते हैं. उनके जीवन में अवकाश के दिन सिर्फ तब आते हैं जब उनका शरीर काम करने से मना करने लगता है. इस बूथ पर सुबह दस बजे तक पच्चीस फीसद वोट पड़ चुके थे. मेरे पास भारत निर्वाचन आयोग का मिडियाकर्मियों के लिए जारी प्रवेश पत्र था. मैंने पीठासीन अधिकारी से पूछा कि कैसा चल रहा है. उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा- शांतिपूर्ण और तेज. मतदाता शांत थे मगर जल्दी में भी थे. उनके लिए सरकार चुनने को मतदान करना ज़रूरी था लेकिन उससे भी ज्यादा ज़रूरी कोई काम उनको तेज़ी से आगे धकेल रहा था. उस बूथ के बाद दोपहर के दो बजे तक कई संवेदनशील और सामान्य मतदान केन्द्रों पर मैंने लोकतंत्र के उत्सव का आनंद लिया. मैंने कई लोगों से बात की. आज का मतदाता बहुत समझदार हो गया है. वह अपने पत्ते नहीं खोलता और अक्सर ये भी कह देता है कि आप कहो किसे वोट देना है? मैं उसी को दे दूंगा. इस बार की गयी बातचीत में यही सामने आया कि मतदाता हर तरफ से घिरा हुआ महसूस करता है. उसके पास चुनने के लिए जो विकल्प हैं वे उसे सीधे उत्साहित नहीं करते वरन वह इस उम्मीद में वोट कर रहा है कि शायद कुछ बदले. उसके अपने अनुभव निराशाजनक हैं. लेकिन उसकी आशाएं अभी अक्षुण हैं.

इस बार नोटा यानि उपरोक्त में से कोई नहीं का विकल्प उपयोग में लाया गया. इससे क्या फर्क हुआ इसके परिणाम अभी आने शेष हैं. मतदान के प्रति मतदाता की रूचि शायद इस बात से जगी हो कि वह मतपेटी में सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करने मत डाल सकेगा. वास्तव में नोटा एक प्रकार के असहयोग का प्रतीक है कि जो सरकार बनती हैं उसमें हमारी सहमति नहीं है. काश नोटा एक कारगर हथियार की तरह होता कि सबसे अधिक मत मिल जाने पर सभी चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों को हारा हुआ मान लिया जाता और नए उम्मीदवारों के साथ नया चुनाव होता. ये बहुत कारगर हो सकता है मगर इस प्रक्रिया को अपनाये जाने पर भी वैसे ही खतरे उपस्थित हैं जैसे वर्तमान में हाल में हैं. मुझे एक परिवार के मुखिया मिले वे दो कार लेकर पूरी रात भर का सफ़र करके वोट डालने आये थे. उत्साह में कहते हैं- साहब अपने परिवार के बारह लोगों को वोट दिलाने के लिए साढ़े पांच सौ किलोमीटर दूर आया हूँ. मैं सोचता हूँ कि इस परिवार के लोग भले ही राजनितिक लक्ष्य के लिए या अपनी जात पांत के चक्कर में वोट डालने आये हैं मगर ये एक सच्ची प्रतिबद्धता है. इस बार के चुनाव हर बार की तरह देश के लिए बेहतर सरकार को चुनेंगे इसमें कोई संदेह नहीं है. लेकिन व्यवस्था का भ्रष्टाचार सिर्फ वहीँ तक सिमित नहीं है. रेगिस्तान के इस सदूर स्थित भूगोल पर बसे हुए लोगों ने राजनितिक रेलियों में भाड़ोत्री बनकर जाने को अपना लिया है. क्या हमारी समझ और पेट के बीच यही एक भूख का ही सिद्धांत शेष है. और क्या कभी भूख से बाहर आकर नए राष्ट्र के निर्माण के लिए हम खुद को तैयार कर पाएंगे. साइमन सेनेक का कहना है कि नेतृत्व अगले चुनाव के लिए वरन अगली पीढ़ी के लिए है. हमें भी याद रखना चाहिए कि हम जिनको चुन रहे हैं उनका असर सिर्फ अगले पांच साल पर ही नहीं होगा, ये असर हमारी नयी पीढ़ी पर दिखाई देगा. हम एक दिन ज़रूर कामयाब होंगे मगर तब तक के लिए बशीर बद्र साहब का एक शेर है- चाँद तारे सभी हमसफ़र थे मगर/ ज़िन्दगी रात थी, रात काली रही.

[ये लेख विगत शुक्रवार को दैनिक राजस्थान खोजखबर में प्रकाशित हो चुका है. ]

November 30, 2013

ज़ुबानदराज़ होकर भी बेज़ुबान

लालकुर्ती बाज़ार का नाम लो तो जाने कितने शहर एक साथ याद आते हैं. पेशावर से लेकर मेरठ तक. ये लाल कमीज यानि अंग्रेज फौज़ की पोशाक बेचने वाले बाज़ार हर उस छावनी के आसपास हैं जिनको अंग्रेजी उपनिवेश काल में स्थापित किया गया. उस ज़माने के ये छोटे से बाज़ार अपनी तंग सर्पिल गलियों में भीड़ से आबाद रहते हैं. एक पुराना मौसम है जिसकी गंध यहाँ की हर छोटी बड़ी दुकान में समाई रहती है. ऐसा लगता है कि हाथ ठेले वालों से लेकर खुले दरवाज़ों के पीछे लगे हुए ऐ सी वाली दुकानों तक में कोई समय का साया ठहरा है. बारहों महीनों के हर मौसम में इतनी ही भीड़ इतने ही खरीदार और ऐसी ही रवानी. पाँव को आँख उग आती है कि वह हर क़दम पर ठिठक जाता है. सामने कोई अड़ा हुआ दिखाई देता है. भीड़ किस बात की है. भीड़ का ऐसा आलम क्यों है. लोग इतना सामान कहाँ रखेंगे अगर यहाँ से सबकुछ खरीद लेंगे तो नया नया सामान आने में कितना वक़्त लगेगा. इन बाज़ारों और मेरठ की गलियों में पुरातन और ऐतिहासिक यादों के साये में घूमता हुआ सोचता हूँ कि वक़्त अपने साथ क्या ले गया? कुछ ज़िन्दा लोगों की सांसें, कुछ उम्मीदें टूटी हुई. अब भी मगर पौराणिक कथाओं के ग्रंथों से कई चेहरे अचानक घनी भीड़ से सामने आ जाते हैं. शिवभक्त रावण के श्वसुर या युधिष्ठर के वास्तुकार मयासुर की नगरी के लोग सोमवार के दिन छुट्टी पर बैठे हुए. हर शहर का अपना अवकाश का दिन हुआ करता है. मुझे सोमवार के नाम पर हिन्दुओं के आराध्य शिव याद आते हैं और देखता हूँ कि दुकानों की कतारों में खासे शटर गिरे हुए हैं. जो शटर अप हैं वे मल्टी नेशन स्टोर्स की चैन मार्केटिंग वाले हैं. यहाँ धूप जब जाड़े की सुबह से आँखें मिलाती है तो बड़ा सुकून आता है. रेगिस्तान की तरह सूखे मौसम की जगह ओस और धुंध से भीगी हुई सुबह खिली हुई थी. एक धुंधली चादर के नीचे शहर की सड़कों पर लोग अपनी मंज़िलों की ओर दौड़े जा रहे थे. आहिस्ता क़दमों से चलते हुए देखता हूँ कि इस शहर में सड़कों के बीच पार्किंग की अनूठी रवायत है. सड़क के ठीक बीच में आप अपना वाहन खड़ा कर सकते हैं बाकी दोनों तरफ दुकानों के आगे खाली जगह कुछ ऐसे जैसे कोई रूठा हुआ महबूब ज़िद अपर अड़ कर कोई लकीर खींच गया हो कि तुम उस तरफ, हम इस तरफ. इस शहर को देखते हुए याद आता है कि इस दुनिया में सब कुछ मिटता नहीं है. कुछ बचा रह जाता है, तंग गलियों में नई नस्लों में.

दिल्ली की ओर लौटती हुई रेलगाड़ियाँ अपने पायदानों तक यात्रियों से भरी होती हैं. दिल्ली की ओर कूच के अनेक किस्सों में कोई हसरत, कोई लोभ समाया ही था. आजाद राजधानी की ओर जाने वाले असंख्य यात्रियों को रोज़गार खींचता होगा. वे हर रंग रूप और हाल में दीखते हैं. मैं एक डीएमयू में दरवाज़े के थोडा आगे जगह तलाश कर खड़ा होता हूँ. दुआ का कारोबारी अपनी आवाज़ लगाता हुआ, मेरी ओर बढ़ता हुआ आता है. कहता है अल्लाह तुम्हारी हर जायज मुराद पूरी करे. मैं अपनी मुरादों के बारे में सोचता हूँ तो लगता है कि जायज मुरादें तो पूरी ही हैं. असल रोना जिन मुरादों का हम ढोते हैं वे सब नाजायज ही हुआ करती हैं. अचानक मुझे दुआ के इस कारोबारी पर शक हुआ. क्या ज़रूरी है कि इसकी दी हुई दुआ काम करे. इसकी खुद की जायज दुआ कि काश दो आँखें होती, वह भी अधूरी पड़ी हुई है. जिसको मेरी जायज दुआ पूरी करनी है उसी ने इसके साथ नाजायज किया हुआ है. फिर लगा कि शायद दुआदार देख सकते हों और सिर्फ अपने गुज़ारे के वास्ते इस तरह का कारोबार अपना लिया हो. रेलगाड़ी के दोनों तरफ गन्ने की नन्हीं पौध धरती को हरा रंग दे रही थी और अचानक मुझे मेरी एक नाजायज मुराद की याद आई, काश कहीं भाग जाओ. जाने कैसे ख्यालों में मैं दिल्ली की सड़कों तक चला आया. मेरे पांवों के नाखून बढ़ गए थे शायद या सर्द मौसम की आमद से जूते सिकुड़ गए थे. पंजों में बेहिसाब दर्द समां गया था. ऐसे में चुप अकेले चलते जाना और दिल्ली के पुराने रेलवे स्टेशन से आगे कपडा बाज़ार की तंग गली में चर्च मिशन मार्ग पर इकलौते दवा बेचने वाले से कहना कि कोई ऐसा साल्ट दे दो जिससे पेट की आँतों में हो रहा दर्द कम हो जाये और फिर सोचना कि काश साल्ट कुछ और बातों के लिए भी बने होते. मेरे आस पास सायकिल रिक्शे वाले हैं, उनकी शक्ल ओ सूरत किसी खानाबदोश और मज़लूम जैसी ही दिखती हुई. ये ज़िन्दगी किसके लिए बोझा ढो रही है? कुछ समझ नहीं आता. सोचता हूँ कि पूछूं लेकिन कोई नहीं समझता किसी को, न साथ रह कर न दूर रह कर. आदमी ज़ुबानदराज़ होकर भी बेज़ुबान हैं.

सब कुछ वैसा ही है बस जो ज़िन्दा हैं वे भरे हुए हैं ख़ुशी और रंज के असर से. कहाँ बदलता है कुछ कि उम्र के आख़िरी छोर तक कई लोग बचा कर ले जाते हैं हिचकियाँ दुखों वाली. किसी तनहा सिरे पर बैठ कर सोचते हैं कि क्या अच्छा होता गर इनको बाँट लिया होता इसे दुनिया में किसी से. आंसुओं का एक मौसम होता है. बड़े कच्चे रंग वाला मौसम. इस तरह बिखरता है कि न रंग आता न यकीन होता है कि सब पहले सा ही है. मेरे पास ही बैठा हुआ एक नौजवान जोड़ा किसी उलझन में एक दूजे को देखता है और फिर नज़र नीचे कर लेता है. लड़की शाम के वक़्त जागने का बहाना लेकर अपनी हिचकियों को पोंछते हुए सामने वाले को कहती है कि सब ठीक है. मुझे लगता है कि ऐसा कहते हुए वह भीतर से कितना बिखर रही होगी. मैं उन दोनों से कहना चाहता हूँ कि तुमने कभी याद किया है कि दुख आये और चले गए हैं. शायद वे इस बारे में जानते होंगे मगर ये सलाह अक्सर खुद के लिए काम नहीं आती. सफ़र अपने आप में ज़िन्दगी का हासिल है. हम दुःख और सुखों के अचरज को देखते हैं सांस लेते हुए.

November 16, 2013

आखर पोटली वाले बातपोश की विदाई

किसी भी लोक की कहावत को अगर हम किसी ख्यात व्यक्ति के नाम से उद्धृत कर दें तो उस पर कोई संदेह नहीं किया जाता कि ये उन्होंने कहा है या सदियों की मानव सभ्यता के अनुभव से जन्मी कोई बात है. ऐसे कहा जाता है कि गुलाब के फूल बांटने वाले के हाथों में गुलाब की खुशबू बची रह जाती है. अचानक सुना कि लोक कथाओं की खुशबू से भरी हुई अंगुलियाँ विदा हो गयीं. अचानक ही याद आया कि एक मित्र ने दस साल बाद भी अभी तक एक किताब नहीं लौटाई है. किताब का शीर्षक है अलेखूं हिटलर. ये किताब उसी लोक गंध से भरी है जिसके कारण बिज्जी यानि विजयदान देथा को जाना जाता है. बिज्जी चले गए हैं या वे कहीं नहीं गए अपने शब्दों के माध्यम से रेगिस्तान की हवा में घुल मिल गए हैं. अदीठ किन्तु हर वक़्त साथ. उस जादुई प्रेत की तरह जो नवविवाहिता पर मोहित होकर एक दुनियादार बन जाने को उकस जाता है. दुनिया में न होते हुए भी साकार दुनिया में उपस्थित. वे कहीं नहीं जा सकते हैं. वे हमेशा हमारे बीच रहेंगे. वे कुछ दोस्त थे. ऐसे दोस्त जिनको लगता था कि राजस्थान की इस बहुमूल्य लोक निधि को संरक्षित करने का काम किया जाना चाहिए. आज़ादी के बाद के पहले तीन दशकों में देश सेवा का जज़्बा इसी तरह के काम करने का हौसला देता था. उनमें से दो दोस्त अपने काम के कारण खूब जाने गए. एक दोस्त ने लोक कथाओं का संग्रहण किया, दूजे ने लोक संगीत को दुनिया के कोने कोने में पहुँचाने का काम किया. वे दूसरे दोस्त कोमल कोठारी थे. वे राजस्थान की घुमंतू, ख़ानाबदोश लोक गायकों की गायिकी को सबके सामने लाने के काम में जुटे रहे. आज भी लंगा, मांगनियार, मिरासी, ढाढ़ी और ढोली कलाकारों के मुख पर कोमल कोठारी का नाम मौजूद रहता है. लोक संगीत और उसके व्यापक फलक को कोई एक इन्सान किसी दिशा में नहीं बढ़ा सकता है. ये लोक जीवन की सामूहिक रचना है. इसमें सारा लोक किसी न किसी रूप में समाया हुआ है. सुर और शब्द कण कण में रचे-बसे-घुले हुए हैं. लेकिन जिस तरह के प्रयास कोमल कोठारी ने किये वे इन जिप्सी गायकों में पीढ़ी दर पीढ़ी याद किये जायेंगे. वैश्विक स्तर पर जो सम्मान राजस्थान की सीमान्त गायिकी को मिला उसका श्रेय भी कोमल कोठारी को ही दिया जायेगा.

बोरुन्दा गाँव में इन दो मित्रों ने जो अतुल्य धरोहर खड़ी की उसका नाम रूपायन संस्थान है. इसी संस्थान ने राजस्थान के लोक की सांस्कृतिक पूँजी को संरक्षित करने का काम शुरू किया था. बातपोश कला को लिखित रूप में सामने लाने और संग्रहित, संरक्षित करने का जो बीड़ा उठाया वह राजस्थानी भाषा की अद्वितीय धरोहर बन कर हमारे सामने आया. ये लोक कथाएं हमारे जीवन में गली कूचों में बिखरी पड़ी थीं. इनका वाचन हर जमावड़े में किया जाता रहा है. कहीं पांच लोग मिल बैठे तो सदियों पुरानी लोक द्वारा रची और संवारी गयी कहानियां हवा में बिखरने लगी. ये बेहद छोटे चुटकलों से लेकर लोक गाथा के रूप में उम्रदराज़ होती गयी थी. समय की गति के साथ आते हुए बदलावों में यकीनन इन कथाओं का लोप हो जाता. बातपोश नहीं रहते तो बातें भी ख़त्म हो जाती. सुनने वाले के पास मन बचा रहता किन्तु सुनाने वाला कहीं खो जाता. इन लोक कथाओं का संग्रहण और पुनर्सृजन कोई आसान और हर किसी के बस का काम न था. इसके लिए बेहिसाब जज्बे की और दीवानगी की ज़रूरत थी. ये सब कुछ विजयदान देथा के पास ही था. मुझे इस बात पर पूरा यकीन है कि जो सामर्थ्य और लेखन के तत्वों की समझ बिज्जी में थी वह अतुलनीय है. हालाँकि रानी लक्ष्मी कुमारी चूड़ावत का नाम ज़रूर मेरे मन में बिना किसी भूल के आता है. रेत के कण कण की गाथा को अक्षरों का बाना पहनाने में उनका भी योगदान अविस्मर्णीय है. मिठास से भरी हुई इन लोक कथाओं में नीति, ज्ञान, कष्ट, सुख, प्रतीक्षा और दुरूह जीवन की सच्ची झांकियां हैं. लोक मिलकर जिसकी रचना करता है वह किसी एक का गुणगान न होकर पूरे समाज का रूपक हुआ करता है. इसी रचना प्रक्रिया में सशक्त लोगों की चापलूसी के सूत्र भी बिखरे रहते हैं. सामंतों के गुणगान में सच्चाई अक्सर परदे के पीछे चली जाती है लेकिन आज़ादी के बाद शुरू हुए इस काम और प्रगतिशील विचारधारा की समझ के कारण ही लोक कथाओं के लिपिबद्ध होते समय राजस्थान की कथाओं का सच्चा दस्तावेजीकरण हो सका है.

उनके राजस्थानी भाषा को दिए योगदान को ये रहती दुनिया कभी न भूल पायेगी. बातां री फुलवाड़ी से फुलवाड़ी और उसके आगे अपने खुद के लेखक हो जाने तक के सफ़र में बिज्जी की वही किताब मुझे फिर से याद आ रही है. हालाँकि मैंने बातां री फुलवाड़ी के संग्रहकर्ता से लेखक होते जाने के पूरे काम को पढ़ा है. मैंने ये भी इसलिए स्वीकार कर लिया कि बिज्जी सचमुच ऐसा काम न करते तो ये कथाएं इतना सम्मान न पा सकती थीं. विजयदान देथा एक कुशल संग्रहकर्ता, राजस्थान के लोक जीवन के तत्वों के गहरे ज्ञाता और अपनी जुबान को खूब प्यार करने वाले थे. अलेखूं हिटलर, दुविधा और अदीठ जैसी जिन किताबों को मैंने पढ़ा है, उनमें संग्रहित कहानियों के तत्व और ढांचा राजस्थान की लोक कथाओं का है. मैंने चरणदास चोर यानि खांतीलो चोर को पढ़ा और देखा भी है. वह भी मुझे लोक कथा का नाट्य रूपांतरण ही लगता है. अगर ये लोक कथाएं न होकर ओरिजनल काम है तो ये कुछ ऐसा है जैसे गेंदे के फूल की खेती हो और उसमें से गुलाब की खुशबू आ रही हो. इस अनूठी खेती के लिए भी विजयदान देथा कभी विस्मृत न किये जायेंगे. लोक कथाओं पर बुनी गयी उनकी कहानियों को मैंने इसलिए बार बार पढ़ा कि उन कहानियों में मेरे आस पास की दुनिया झांकती है. ये कहानियां मुझे याद दिलाती हैं कि इस सदी के गुणसूत्रों में हिटलर प्रवृतियाँ रच बस गयी हैं. हम उसका गुणगान किये जाने से ज़रा भी शर्मिंदा नहीं होते. हम हिटलर प्रवृति के लोगों के लिए निर्विरोध समर्थन जुटाने के काम में लगे हुए हैं. बिज्जी राजस्थान के साहित्य ही नहीं वरन दुनिया भर में लोक रचनाओं के संरक्षण का काम करने वालों में सिरमौर गिने जायेंगे.

November 13, 2013

आतिशदान के भीतर की गंध

आले में रखी
प्रिय की अंगुली से उतरी
अंगूठी को छूकर आ रही
हवा की खुशबू से भरा कमरा.

चित्रकार की
आँखों में रंग करवट लेते हुए.
* * *

रात भर
लालटेन की रौशनी में
स्मृतियाँ बुनती हैं
स्याही पर सुनहरे पैबंद. 

दिन के उजाले में
घर की बालकनी पर
ज़र्द होकर झड़ते हैं मुसलसल
पिछली रुत में खिले बोसे.

ज़िन्दगी जिसे कहते हैं
पड़ी हुई है एक खराबे में.  
* * *

प्रेम के अतुल्य शोर के बीच
प्रेम का अपूर्व दुर्भिक्ष.
* * *

आतिशदान में बचाकर रखी हैं 
अधेड़ प्रेमी-प्रेमिकाओं ने कुछ मुलाकातें.

जाने कब
उसे आख़िरी बार देख लेने का मन हो
और वह आख़िरी बार न निकले.
* * *

उदास ही सही
मगर चुप बैठे हुए,
भेजते हैं कुछ कोसने खुद को.

तुम न रहो तो
ज़रूरी नहीं कि न रहे कोई काम बाकी.
* * *


हर रुत एक सी कहाँ होती है. कई बार कल की कोई बात पीछे कहीं छूट जाती है. उसी विस्मृति की खोज में उदासी की अंगुली को थामे रहना कैसी मजबूरी होती है. ये सोचना कि किस तरह बदल जाता है सब कुछ. सीली भीगी बारूद की तरह जल ही नहीं पाते. ठहरे हुए वक़्त की गंध सघन होती जाती है. भीगी हुई माचिस की तीलियों को रगड़ कर फैंक देने या धूप का इंतज़ार करने की दुविधा के साथ... 

[Painting Image Courtesy : Jane Beata]

November 11, 2013

बात, जो अभी तक न सुनी गयी हो.

घर के बैकयार्ड में लोहे का एक मोबाईल चूल्हा है. इस पर माँ बाजरे की रोटियां बनाया करती हैं. कभी इस पर काचर का साग पक रहा होता है. अब सर्दियाँ आई तो हर सुबह नहाने के लिए पानी गरम होता रहेगा. आज माँ गाँव गयी हुई है. मैं पानी गरम करने लगा था. चूल्हे की आंच के सम्मोहन में गुज़रे मौसम में टूटा हुआ एक सूखा पत्ता दूर से उड़ कर आग की परिधि में कूद पड़ा.

मुक्ति सर्वाधिक प्रिय शब्द है.
* * *

रौशनी का एक टुकड़ा दरवाज़े से होता हुआ कच्चे आँगन पर गिर रहा है. हवा भी उतनी ही ठंडी है जैसे बरफ की गठरी की एक गाँठ भर ज़रा सी खुली हो. प्लास्टिक की मोल्डेड कुर्सी पर बैठा हूँ. पांवों के पास अँधेरा आराम बुन रहा है.

छोले.

गाँधी चौक स्कूल के आगे पहली पारी की रिसेस से दूसरी पारी की रिसेस तक. आलू टिकिया के सिकने की खुशबू. और सर्द दिनों में छोलों की पतीली से उड़ती हुई भाप की दिल फरेब सूरत याद आ रही है. रात के वक़्त उजले दिन की याद जैसे कोई पीछे छूटे हुए शहर को बाँहों में भरे बैठा हो.

टीशर्ट.

उम्रदराज़ होने के बावजूद अपने नीलेपन को बचाए हुए. दूसरे सहोदर, समान रंगी अनगिनत टीशर्ट में से एक. ये रंग और पहनावा किसी पुरखे ने उस वक़्त मेरे कान में फूंक दिया होगा जब माँ को ज़रा सी झपकी आई होगी और मैं नवजात, सर्द रात के किसी पहर अपने हाथ और पाँव आसमान की ओर किये कुछ मंत्र बुदबुदा रहा होऊंगा.

विस्की.

बचपन में जैसे किसी ने कहा हो कि वह एक ऐसी बात बताएगा जो अभी तक न सुनी गयी हो. उसी बात के इंतज़ार में प्याले में भरी हुई.

मैंने कुछ कहानियां लिखी थीं. उनका किताब की शक्ल में आने का इंतज़ार कर रहा हूँ.

चीयर्स !!
* * *

अपनी ही अँगुलियों को छू रही है अंगुलियां, बाद मुद्दत के मिले बिछड़े यार की तरह. लौट के फिर से नज़दीक होके चलने का मौसम आया है.  

 

November 8, 2013

मौत से भी ख़त्म जिसका सिलसिला होता नहीं.

अभी कुछ दिन पहले पेरू की राजधानी लीमा से कुछ ही दूरी पर एक बस पहाड़ी से नदी में गिर गई. जिससे तेरह बच्चों सहित बावन लोगों की मौत हो गई. ये बस पिछले शनिवार की रात सांता तेरेसा की प्रांतीय राजधानी से चला थी. अपने गंतव्य तक पहुँचने से पहले नदी में करीब छः सौ पचास फीट की गहराई में गिरी. इस दुखद समाचार को पढ़ते हुए मुझे सिलसिले से अनेक दुर्घटनाएं याद आने लगी. हमारे देश में हर महीने कहीं न कहीं इसी तरह बस खाई या नदी में गरती है और बड़ी जनहानि होती है. हम हादसे के समय उदास और दुखी हो जाते हैं लेकिन आदतन उसे जल्दी ही भूल भी जाते हैं. पेरू में जो बस नदी में गिरी थी उसमें सवार कोई भी यात्री ज़िन्दा नहीं बच सका. पेरू और हमारे देश सहित दुनिया भर के गरीब और विकासशील देशों के लोग बेहतर सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था न होने के कारण ज्यादातर ट्रक और ट्रेक्टर में सफर करते हैं. इन वाहनों से भी इसी तरह की दुर्घटनाएं होना आम बात है. गाँव के गरीब लोग ब्याह शादियों जैसे अवसरों के लिए भी अच्छे वाहनों का बंदोबस्त नहीं कर पाते हैं. उनकी बारातें ट्रेक्टर ट्रोलियों और जुगाड़ जैसे साधनों से सफ़र तय करती हैं. यात्री परिवहन के लिए अनुपयुक्त इन साधनों के साथ हादसे और मौत भी सफ़र करते रहते हैं. हम अपनी सीमित और बेदम परिवहन व्यस्था की बड़ी कीमतें चुकाने को मजबूर हैं.
 
धार्मिक यात्राओं पर जाने के दौरान इस तरह के हादसों की झड़ी लग जाती हैं. बहुत सारे हादसे इसलिए भी होते हैं कि यात्रियों के भारी दबाव में टूर ओपरेटर अपने ड्राइवरों के लिए पूरी नींद का इंतजार नहीं करते. वे ज्यादा मुनाफे के फेर में सीजन के हर दिन को कैश करना चाहते हैं. ईश्वर की आराधना के लिए कोई खास वक़्त का होना मुझे कभी समझ नहीं आता है. जो आपका प्रिय है, जो आपका आराध्य है उसका स्मरण हर समय किया जाना चाहिए. वह सर्वशक्तिमान कोई आम आदमी थोड़े ही है कि जिन दिनों उसका मूड अच्छा होगा तभी आराधना करने से प्रसन्न हो सकेगा. वह को सर्वव्यापी है, सभी कुछ उसी का है. हर क्षण भी. फिर क्यों हम कभी इस बात को नहीं समझ सकते कि उसकी हाजिरी के लिए खास वक़्त की दौड़ एक गैर ज़रूरी काम है.

लेकिन हमारा आराध्य हमारी परवाह नहीं करता है कि सुबह का अख़बार पढ़ते हुए और भयावह ख़बरों से निरंतर सामना होता रहता है. आन्ध्र प्रदेश के महबूबनगर जिले में एक निजी लग्जरी बस में आग लग जाने के कारण यात्री जिंदा भस्म हो गए. इस बस से पैंतालीस लोगों के जले हुए शवों को निकाला गया. हैदराबाद से करीब एक सौ चालीस किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या चौवालीस पर तड़के पांच बजकर दस मिनट पर बेंगलूर से हैदराबाद जा रही यात्री बस के ईंधन की टंकी पलेम गांव के समीप एक पुलिया से टकरा जाने के कारण फट गई. जिसके बाद उसमें आग लग गयी. इस आग ने कुछ ही क्षणों में पूरी बस को अपनी चपेट में ले लिया. हादसे के समय इस बस में पचास यात्रियों समेत कुल बावन लोग सवार थे. शव इस कदर जल चुके थे कि उनकी पहचान कर पाना मुमकिन न था. यह पता लगाना मुश्किल हो गया कि पीड़ित महिला है या पुरूष. इस तरह की ग़मगीन कर देने वाली खबर को पढ़ते जाते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं. हम कल्पना नहीं कर सकते कि बस की सीट पर सोया हुआ आदमी अचनाक से आग के फंदे में फंस जाये. वह असहाय इस हादसे में ज़िन्दा भुन जाये.
 
साल उन्नीस सौ अठ्ठासी में अमेरिका के केरोल काउंटी अंतरराष्ट्रीय सड़क मार्ग पर महबूबनगर वाले हादसे जैसा ही हादसा घटित हुआ था. इस बस हादसे का कारण था सामने से एक शराबी द्वारा अपनी गाड़ी भिड़ा देना. इस बस में सवार आधे से अधिक यात्री दुर्घटना स्थल पर ही मृत्यु के ग्रास बन गए थे. सामने से गाड़ी टकराने के कारण बाहर निकलने के लिए आगे का दरवाज़ा क्षतिग्रस्त होकर बंद हो गया था. इस बस में एक आपतकालीन निकासी की खिड़की थी. उसी खिड़की से बच्चों को बाहर निकला जा सका था. बचाए गए चौतीस यात्री भी बाकि यात्रियों की तरह ज़िन्दा जल कर खाक हो जाते अगर ये निकासी द्वार न होता. महबूबनगर की घटना और इस घटना में बड़ा सामंजस्य है. दोनों ही बसें इंधन की टंकी फटने के कारण लगी आग में भस्म हुई. इस बार की दुर्घटना सबसे भयानक है. सभी यात्री अपनी जान से हाथ धो बैठे. ये कैसी मृत्यु है, इसके दुःख को सोचना भी असंभव है. अमेरिका के बस हादसे के बाद एक संगठन से जन्म लिया. उसका नाम है मदर्स अगेंस्ट ड्रंक ड्राइविंग. इस संगठन को बनाने वाले सभी लोग बस हादसे में मारे गए लोगों के परिजन हैं. ये संगठन शराब पीकर गाड़ी चलाने के विरुद्ध सक्रियता से काम करने लगा. मेरी जानकारी के अनुसार इस हादसे के जिम्मेदार को दस साल और ग्यारह महीने जेल में बिताने पड़े. लेकिन हमारे देश में माना जाता है कि सड़क दुर्घटना का कानून बहुत लचीला है. अक्सर सड़क हादसों के दोषियों को उतनी सख्त सजा नहीं मिलती जितनी कि इन्सान की जान लेने वाले अन्य अपराधों के लिए दी जाती है. हमारी जान बहुत कीमती हैं. नागरिक राष्ट की धरोहर है. राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी भी. इनकी सुरक्षा राष्ट्र का सबसे बड़ा ज़िम्मा है. जिगर मुरादाबादी कहते हैं- ज़िन्दगी एक हादसा है और ऐसा हादसा/मौत से भी ख़त्म जिसका सिलसिला होता नहीं.

November 2, 2013

उधर बकरे क़ुरबान, इधर बारूद

यहाँ से रेलगाड़ी मुनाबाव और फिर उससे आगे पाकिस्तान जाती है. मैं रेलवे स्टेशन पर एक लम्बे सन्नाटे के बीच दुबका हुआ बैठा था. एक काले रंग का कुत्ता किसी जासूस की तरह रेलवे ट्रेक की छानबीन करके एक ही छलांग में स्टेशन के प्लेटफार्म पर चढ़ आया. उसने मुझे पूरी तरह इग्नोर किया और पास से गुज़र गया. इसी तरह एक बच्चे ने छलांग लगायी और मेरी तरफ बढ़ने लगा. मैं उसे अपलक देख रहा था. बच्चे को ये अच्छा नहीं लगा इसलिए उसने इशारे से पूछा क्या?

एक ही छलांग में प्लेटफोर्म पर कैसे चढ़ जाते हो?
आराम से

मैं उसकी शान में ऐसा मुंह बनाता हूँ जैसे उसने कोई बहुत बड़ा काम कर लिया हो. वह मेरे पास रेलवे स्टेशन की बैंच पर बैठ जाता है. स्टेशन खाली. रेल महकमे के कामगार टहलते रहते हैं. पुलिस का जवान आधी नींद में स्टेशन को नापता हुआ गुज़र जाता है.

क्या नाम है?
मोहम्मद शोएब अख्तर
किसको लेने आये?
बकरे को
अच्छा कहाँ से आ रहा है?
नागौर से

मैं उसके हुलिए को देखने लगा. वह मेरे बेटे की उम्र का था. उसकी पेंट पर चीकट लगा हुआ था. उसके हाथों पर खुश्की थी. बाल उलझे हुए थे. पाँव के स्लीपर घिसे हुए थे.

तुम कैसे आये?

मैं चौंक गया कि एक बारह साल का लड़का मुझको तुम कहते हुए बात करता है. मैंने अपनी चौंक को छुपा लिया और कहा- मैं अपनी माँ को लेने आया हूँ.
और कौन आ रहा है ?
कोई नहीं
अकेली है?
हाँ अकेली
डोकरी को अकेले क्यों आने दिया, कहीं खो जाएगी

मैंने चाहा कि उसे बताऊँ इस डोकरी के बेटे पुलिस में अफ़सर, विश्वविध्यालय में अध्यापक और रेडियो पर बोलने का काम करने लायक हैं. ये इसी डोकरी के जाए हुए हैं. लेकिन मैं बात को बदलते हुए पूछता हूँ.

आप स्कूल जाते हो?
हाँ
कौनसी क्लास में
छठी
कौनसी स्कूल
राय कॉलोनी में पांच बत्ती के पास
खूब पढ़ते हो?
मैं सुबह दुकान जाता हूँ, फिर वापस घर, फिर स्कूल और शाम को फिर दुकान
इतना काम क्यों करते हो
मेरे पापा दारू बहोत पीते हैं इसलिए चाचा उनको दुकान पर नहीं आने देते तो मैं जाता हूँ
दारू पीना बुरा है?
ख़राब ही है
कैसे
पैसा डुबो देते हैं और काम करते नहीं
आप पियोगे
नहीं मैं नहीं पियूँगा... तुम पीते हो
हाँ मैं पीता हूँ
मत पिया करो घर बरबाद हो जाता है

मैंने सोचा कि बीवी की आत्मा इस नन्हे लड़के में प्रवेश कर गयी है. लेकिन तुरंत ही इसे ख़ारिज कर दिया कि बीवी कैसे किसी को हलाल करने का ख़याल लिए हुए, रेल में आ रहे बकरे का इंतज़ार कर सकती है. ये शोएब अख्तर ही है.

जोधपुर से आने वाली लोकल रेल आई. कुछ चहल पहल हुई और ज़रा सी देर में बुझ गयी. हम जिस रेलवे की बैंच पर बैठे थे उसकी पीठ वाली साइड में दो नार्थ ईस्ट के बीएसएफ के जवान आकर टिक गए. उनको रात ग्यारह बजे की गुवाहाटी जाने वाली रेल पकड़नी थी. उनके लिए ये रेगिस्तान अजूबा रहा होगा. इसी रेगिस्तान के रेलवे स्टेशन पर रेगिस्तान के दो लोग बातें कर रहे थे. एक मैं और दूसरा शोएब अख्तर.

दुकान में क्या करते हो ?
मुर्गा और मटन बेचता हूँ
आप मुर्गा काट लेते हो?
हाँ इसमें क्या है
इसमें एक बेक़सूर की जान चली जाती है
ये सब सोचने की चीज़ है, उसको खुला छोड़ो तो बिल्ली खा जाएगी

इसके बाद मैं चुप हो जाता हूँ. मैं उससे दूसरी तरह के सवाल करता हूँ. जैसे बहन अलग स्कूल में क्यों पढ़ती है. पापा जब काम नहीं करते तो क्या करते हैं. माँ कैसी है. वह कितना काम करती है. तुम जानते हो कि अच्छा पढने लिखने से मुर्गा काटने से आज़ादी मिल सकती है. अच्छे नए साफ कपड़े पहने जा सकते हैं.

वह कहता है मेरे नाना नागौर में रहते हैं. वहां पर पाडे यानि भैंसे काटने का बाज़ार है. मैं उधर जाता हूँ तो खूब मजा आता है. फिर ज़रा देर रुक कर कहता है.

हम बक़रीद पर एक क़ुरबानी करेंगे
अच्छा, कितने का बकरा
ये तीन हज़ार का होगा
तीन हज़ार तो बहुत बड़ी रकम है
अरे, तुमको नहीं मालूम, आज जो दो बकरे आ रहे हैं वे तीस तीस हज़ार के हैं

रेल आ नहीं रही थी और मैं खूब बेचैन हो गया. याद की अपनी सघनता होती है. हर याद का अलग वजन होता है. उसकी याद आते ही ऐसा लगता है जैसे कोई पत्थर सीने पर आ पड़ा है. इसी याद से बाहर आने के लिए मैंने कहा शोएब अख्तर साहब खूब पढ़ते जाना. ऐसा करने से ईद के दिन आप साफ कपडे पहने होंगे. आपका घर किसी कूड़े और बदबू वाली गली से दूर साफ़ जगह पर होगा. ज्यादा इत्र लगाने से गंदगी दूर नहीं हो जाती. गन्दगी को हटाने से ही गंदगी दूर होती है.

रेलगाड़ी आ गयी. आह प्यारी कालका एक्सप्रेस. इसका मुंह जब गाँधी नगर वाले फाटक को चूम रहा होता है तब कहीं जाकर ये अपनी पूँछ को रेलवे स्टेशन के भीतर तक समेट पाती है. मैंने माँ से कहा कि एक बारह साल का लड़का कहता है, डोकरी को अकेले न आने दिया करो. माँ कुछ नहीं कहती हंसती है. माँ को लगता है कि वह वाकई बूढी हो गयी है. मेरे पापा नहीं रहे वरना कितना सुख कायम रहता न? हर किसी के पापा होने चाहिए चाहे शोएब के शराबी पापा की तरह ही हों.

इसके बाद क्या हुआ मालूम है? गरीब भारत में लाख लाख रुपये कीमत वाले नीरीह बकरों की कुरबानी दी गयी. आज पता है, गरीब भारत के लोग धन को दुकानों में लुटा रहे हैं. सबकी मुंडेरों पर दीयों की जगह बिजली के बल्ब सम्मोहन बुन रहे हैं.

मैं ख़ुद को यकीन दिलाना चाहता हूँ कि एक गरीब देश का नागरिक हूँ. मगर हर तरफ पैसा है, तमाशा है. ईद चली गयी दिवाली भी चली जाएगी. उधर बकरे क़ुरबान हुए, इधर बारूद क़ुरबान हो जायेगा.

बधाई हो !!!

October 31, 2013

दिल के कबाड़खाने में

जोधपुर रेलवे स्टेशन से सोजती गेट और वहां कुंज बिहारी मंदिर की ओर के संकरे रास्ते पर नगर निगम के ट्रेक्टर अपनी हैसियत से ज्यादा की सड़क को घेर कर खड़े होंगे. नालियों से बाहर सड़क पर बह रहे पानी से बचते हुए दोनों तरफ की दुकानों पर हलकी निगाह डालते हुए चलिए. एक किलोमीटर चलते हुए जब भी थोड़ी चौड़ी सड़क आये तो उसे तम्बाकू बाज़ार की गली समझ कर दायीं तरफ मुड़ जाइए. ऐसा लगेगा कि अब तक ऊपर चढ़ रहे थे और अचानक नीचे उतरने लगे हैं. कुछ ऐसी ही ढलवां पहाड़ी ज़मीन पर पुराना जोधपुर बसा हुआ है. तम्बाकू बाज़ार एक भद्र नाम है. घास मंडी से अच्छा. गिरदीकोट के आगे बायीं तरफ खड़े हुए तांगे वाले घोड़ो की घास से इस नाम का कोई वास्ता नहीं है. ये उस बदनाम गली या मोहल्ले का नाम है जहाँ नगर की गणिकाएँ झरोखों से झांकती हुई बड़ी हसरत से इंतज़ार किया करती थीं. त्रिपोलिया चौराहे को घंटाघर या सरदार मार्केट को जोड़ने वाली सड़क तम्बाकू बाज़ार है. नयी सड़क और त्रिपोलिया बाज़ार के बीच की कुछ गलियां घासमंडी कहलाती रही है. घासमंडी और तम्बाकू बाज़ार के बीच एक सड़क का फासला है जिसको 'सिरे बाज़ार' कहा जाता है.ऐसी ही ढलवां, संकड़ी और टेढ़ी मेढ़ी गलियों में घरों के आगे बने चौकों पर दल्लों की निगाहें बदन की भूख के मारों के लिए गली के आर पार देखती रहती थी.

हमें शर्म आती थी. अब भी आती है. इसलिए घास मंडी जैसा शब्द नहीं बोलते. हमें उस इलाके को तम्बाकू बाज़ार कहते हुए अच्छा लगता है. अब वे गणिकाएँ शहर के बाहरी हिस्सों में चली गयी हैं. यहाँ से गुज़रते हुए आपको सिर्फ तम्बाकू की गंध आएगी. ये खुशबू इसलिए है कि आप छींक लें या फिर मेरे जैसे आदमी इसे सूंघने के लिए ज़रा आहिस्ता चल सकें. मैंने साल सत्तासी में पहली दफ़ा तम्बाकू का इस्तेमाल किया था. उसके बाद ये प्यार सालों साल चलता रहा. इतना चला कि डॉक्टर ने कहा देखिये आपके फेंफडों में काला टार जम चुका है. इस हाल में आपके फेंफडे कितने दिन तक ये काम करेंगे इसकी कोई गारंटी नहीं है. मैं हांफ जाता था. चलते हुए, बोलते हुए और बिना कुछ किये हुए भी. साल दो हज़ार छः की एक सुबह पापा ने कहा किशोर साहब बुरी आदतें छोड़ने के लिए हर दिन शुभ दिन है. उन दिनों विल्स नेविकट का पेकेट शायद चौबीस रुपये में आता था. मैंने जब इसे पीना शुरू किया था तब इसकी कीमत बारह रुपये हुए करती थी. अच्छा ऐसा करते हैं सिगरेट पीना छोड़ देते हैं. रोज़ के तीस रुपये बचा करेंगे. सेहत भी हो सकता है बेहतर होने लगे. तो मैंने उस प्यार को अलविदा कह दिया. हिसाब लगाऊं तो याद आता है कि कोई सात साल हो गए हैं किसी तरह के तम्बाकू को छुए हुए. एक रात मैंने सपना देखा. मैं बेहिसाब दीवानगी के साथ सिगरेट पी रहा हूँ. मैं चौंक कर उठ बैठा. मैंने अपनी अँगुलियों को सूंघा. वहां वह उत्तेजक गंध नहीं थी. प्यार को अलविदा कहने के बाद भी सपने में उसका लौट आना कोई नयी बात नहीं है.

मैं अक्सर जोधपुर आता हूँ तो पैदल ही इस शहर की तंग गलियों में भटकना ज्यादा पसंद करता हूँ. तम्बाकू बाज़ार वाली गली नीचे उतरते हुए गिरदीकोट पर ही ख़त्म होती है. इसे ज्यादातर लोग बोलचाल की भाषा में घंटा घर कहते हैं. घंटाघर गिरदीकोट के अन्दर बना हुआ है. वैसे ये सरदार बाज़ार है. घंटाघर के चारों ओर लगभग गोलाकार बाज़ार में दुकानें बनी हुई हैं. इनके आगे हाथ ठेले वाले खड़े रहते हैं. उनके भी आगे कुछ ज़मीन पर बैठकर सामान बेचने वाले. मेरे ताउजी इसी गिरदीकोट पुलिस चौकी में इंचार्ज हुआ करते थे. इसके बाद जब मैं अपने छोटे भाई मनोज के साथ जोधपुर विश्वविध्यालय में पढता था तब हम सिटी बस से कभी इस जगह तक आते थे. घंटाघर के पास खड़े होकर जोधपुर के किले को देखने का जो अतुल्य सुख है वह मुझे किसी और जगह से कभी नहीं मिला. यहाँ से ऐसा लगता है जैसे किले की प्राचीर से कोई एक बेहद छोटे से सुन्दर बाज़ार को देख रहा है. इसी दृश्य को मैंने किले के ऊपर जाकर भी देखा. ये अद्भुत है. लाजवाब है. नीले रंग के शहर के बीच एक लाल झाईं लिये हुए बाज़ार. परकोटे में घिरा कई सारे सोजत-मेड़तिया दरवाजों वाले इस शहर की ज़ुबान दिल फरेब है. तांगे वाले घोड़े की टापों को वक़्त का पहिया अभी तक कुचल नहीं पाया है. एक तरफ पेरिस की सड़कों जैसा हाल दिखाई पड़ता है कि पुलिस वाले सायरन की आवाज़ वाली मोटरसायकिल नई सड़क पर गश्त में लगी हुई है दूसरी तरफ रेगिस्तान के मजदूरों के बचे हुए घोड़े टप टप किये दौड़े जाते हैं. मैंने और मनोज ने इसी जगह पर पैदल चक्कर काटे और बाद में वह पुलिस ऑफिसर हुए तो जोधपर में पहली पोस्टिंग एसीपी सिटी रही. ये शहर की तंग गलियों वाला असल जोधपुर ही है जिसमें कभी भूरी जींस और सफ़ेद कमीज में घूमने वाला भाई खाकी वर्दी में नीली टोपी पहने घूमता रहा. मुहब्बत जिस शहर से हो वह अपने पास किसी न किसी तरीके से बुला लेता है.

गिरदीकोट के आगे की ढलान में पुलिस वाले धूप में खड़े थे. केमरा होता तो ये तस्वीर एक ऐसे नगर की यादगार बन जाती जो इक्कीसवीं सदी में भी भरे बाज़ार ऐसा दीखता है जैसे कोई अट्ठारहवीं सदी का का मंज़र है. मैं ज़रा ऊँचाई से देखता हूँ और मुझे मंदिर वाली प्याऊ के आगे इतिहास की गोद में बैठा हुआ जोधपर का एक सबसे पुराना चौराहा दीखता है. काल और क्षय से परे अपने पुरातन रूप में, नए चटक रंगों के साथ. यहीं एंटीक आइटम्स की दुकाने भी हैं. मैं एक दोस्त के इंतज़ार में सोचता हूँ कि सारा शहर ही एंटीक है क्या क्या न दिल में रख लो. पूर्वी टापुओं पर बसे हुए देशों में चलने वाले इको फ्रेंडली तीन पहिया वाहनों जैसा एक रिक्शा नई सड़क के किनारे पर खड़ा सवारियों का इंतजार करता है. सिटी बसें मौज में आई बछडियों की तरह बेढब भागी जाती हैं. लगता है कोई अब नीचे आया कि अब आया. खाकी वर्दी पहने कंडक्टर हर किसी को आखलिया चौराहे तक ले जाने को ज़िद में अड़ा रहता है. मैं अपनी दोस्त से कहता हूँ इस पुराने जोधपुर से सिर्फ प्रेम किया जा सकता है सुकून से बैठने के लिए किसी सीसीडी में चलते हैं.
* * *

कल मेरे बेटे का जन्मदिन था. बीते हुए कल के दिन बहुत सारे प्यारे लोग जन्मदिन मनाते हैं. जैसे दुष्यंत की दो चाचियाँ, मेरा दोस्त संजय और सत्तावन साला नौजवान कवि कृष्ण कल्पित भी. दिल के कबाड़खाने में सिर्फ बरबादी ही नहीं कुछ अच्छे लोग और शहर भी बसे हुए हैं.

October 25, 2013

वो दुनिया मोरे बाबुल का घर

ज़माना बदल गया है. जिंदा होने का यही सबसे बड़ा सबूत है. किताबें भी बदल गयी हैं. आजकल बहुत कम लोग अपने थैले में किताबें लेकर चले हुए मिलते हैं. कई बार मुझे ये लगता है कि किताबों से हट कर कुछ लोग अपने मोबाईल में खो गए हैं. जैसे मोहल्ले भर की हथाई को सास-बहू के सीरियल चट कर गए हैं. अब हथाई पर आने वाली गृहणी सिर्फ सास बहू सीरियल का संवाद लेकर ही हाजिर हो सकती है. जैसे पहले के ज़माने में किसी का अनपढ़ रह जाना कमतरी या बड़ा दोष गिना जाता था. उसी तरह आजकल हर जगह की हथाई में हाजिर गृहणी के लिए सास बहू सीरियल का ज्ञान और ताज़ा अपडेट न होना कमतरी है. उसकी जाहिली है. इसी तरह का कानून सोशल साइट्स पर भी लागू होता है. अगर किसी के पास फेसबुक, ब्लॉग या ट्विटर जैसा औजार नहीं है तो वे कमतर हैं. लेकिन कुछ चीज़ें कभी भी अपना रस और आनंद नहीं छोड़ती. वे सुस्त या खोयी हुई सी जान पड़ती है मगर उनका रस कायम रहता है. चौबीस अक्टूबर का दिन और दिनों के जैसा ही होता होगा मगर कुछ तारीखें कुछ लोगों की याद ज़रूर दिलाती है. जैसे उर्दू की फेमस अफसानानिगार इस्मत चुग़ताई का इसी दिन गुज़र जाना. ये पिछली सदी के साल इकानवे की बात है जब उर्दू कहानी का ये बड़ा नाम हमसे विदा हो गया था. वह अपने पीछे ऐसे अफसाने छोड़ गया जो हमें गुदगुदाते हुए रुलायेंगे. हम जब भी उनकी व्यंग्य भरी चुटीली भाषा को पढेंगे तो पाएंगे कि रसीले आमों कि टोकरी सदा भरी भरी है. उन्हीं आमों के बीच कडवे करेले भी रखे हैं. जिस समाज को आप और हम इस्मत चुग़ताई के अफसानों में पढ़ते आये हैं वह भी अपने हाल से अभी तक टस से मस नहीं हुआ है. हमारी आदतें और लालची प्रवृतियाँ, हमारी छुपी हुई हसरतें और ओछी हरकतें और हम सब का अपनों के लिए है नहीं वरन परायों के दुःख से भी दुखी हो जाना. हम ऐसे ही हैं. हम कभी बदलने वाले नहीं है. हम सन्यास से लेकर भोग के बीच के हर हिस्से में समाये हुए हैं.

मैंने परसों जोधपुर की यात्रा की थी. सुबह रेलगाड़ी से जाना था और वापस शाम को उसी कालका से लौट आना था. बड़ी भव्य रेल है. मैं इसके सम्मोहन में हमेशा घिरा रहता हूँ. अक्सर घर की छत पर होता हूँ तब गर्मी के दिनों में धुंधलका होने और रात के घिर आने के बीच ये शानदार गाड़ी मेरे सामने से गुज़रती है. सर्द दिनों में इसकी रौशनी मेरे दिल से होकर गुज़रती है. इसका पहला सिरा जब रेल स्टेशन को छू रहा होता है तब इसकी पूँछ कोई आधा किलोमीटर पीछे कुछ बिल्डिंग्स के पिछवाड़े में दबी होती है. इसी ट्रेन से लौटते हुए आप सचमुच बेहिसाब आनंद ले सकते हैं. खाली डिब्बों में एक रहस्यमयी वातावरण पसरा रहता है. रेल के चलने की आवाज़ इस जादू को और गहरा करती है. मैंने यात्रा के लिए अपने साथ इस्मत चुग़ताई का कथा संग्रह ले लिया. ये कहानियां ऐसी हैं कि आप इन्हें बार बार पढ़ सकते हैं. लिहाफ कहानी के बारे में ज्यादा लोग जानते हैं. इसी कहानी की वजह से इस्मत पर मुक़दमा चलाया गया था और इसके सिवा पांच पांच मुकदमे वाले सिर्फ मंटो थे. इस्मत चु’ग़ताई का जन्म बदायूं में हुआ लेकिन वे पली बढ़ी जोधपुर में. इसलिए जोधपुर जब भी जाओ कहीं किसी कोने से इस्मत के अफ़साने का एक किरदार बच्छू  फूफी हर कहीं दिख जाता है. मीठी मीठी गालियाँ देता हुआ. मैंने उनके अनेक किरदारों को रेलगाड़ी और जोधपुर की गलियों में पाया है. बम्बा मोहेल्ले में चले जाओ तो हर अक्स कुछ वैसा ही दिखाई देता है. बम्बा रुई को कहते हैं और ये रुई धुनने वाले गद्दे भरने वाले लोग अपनी शक्ल सूरत से इस्मत आपा की रची हुई दुनिया जैसे हैं.

सुबह मालूम हुआ कि प्रबोध चन्द्र डे नहीं रहे और वही चौबीस अक्टूबर का दिन. वैसे हम सब उनको मन्ना डे के नाम से ही जानते हैं. पहला ख्याल आता है कि कोई गा रहा है- ऐ मेरे प्यारे वतन, ऐ मेरे बिछड़े चमन... बस और दिल भर आता है. उनकी पहचान उनकी आवाज़ है. हमेशा कायम रहने वाली दिलकशी गायकी उनकी पहचान है. मैंने साल तिरानवे में चूरू एफएम पर काम शुरू किया था. वहां जिस दुकान से किराणा का सामान आता था उसके मालिक सलीम साहब थे. वे एक दिन बड़ी हसरत से बोले कि एक काम कर देंगे आप? मैंने कहा कहिये. वे बोले मन्ना डे साहब के जितने भी गीत आपकी इस आकाशवाणी में हैं सब रिकार्ड कर के दे दीजिये. वे पहले इन्सान थे जिनसे मेरा इस दीवानगी से सामना हुआ. बाद के सालों में मुझे मालूम हुआ कि मन्ना डे के चाहने वालों के बारे में जानने के लिए मेरी उम्र बहुत कम है. बस, लागा चुनरी में दाग में छुपाऊं कैसे की तरह इस आवाज़ की गिरहें हर किसी को अपने पास बाँध कर रख लेती थी. मुझे शास्त्रीय संगीत की समझ नहीं थी और शास्त्रीय संगीत पर आधारित फ़िल्मी गीतों का एक विशेष कार्यक्रम हर सप्ताह हुआ करता था. मैं अपनी नासमझी से बचने के लिए हर बार मन्ना डे की शरण में चला जाया करता. उनका गाया हुआ हर गाना मेरे लिए शास्त्रीय संगीत आधारित था. यूं सभी गायक गायिकाएं रागों पर ही आधारित कम्पोजीशन में गाया करते हैं. मगर जो बात मुझे इस आवाज़ में लगती रही वह और कहीं न थी. चौबीस अक्टूबर के ही दिन इस्मत आपा की तरह हमारे प्यारे मन्ना दादा भी गुज़र गए. उनके संगीत को दिए योगदान के बारे में बात करते हुए कई ज़माने और गुज़र जायेंगे. हिंदी और बंगाली भाषा के पास आज उनकी आवाज़ अतुल्य पूँजी है. आपने भी शायद कभी साहित्य और संगीत के रस की एक अनूठी मिसाल देखी हो. मुझे लगता है कि वह आपके ख़ुद के पास होगी ही. हरिवंश राय बच्चन की मधुशाला, मन्ना डे की आवाज़ में. हमारे बस में अगर कुछ होता तो हम सब कुछ बचा कर अपने पास रख लेते लेकिन सच है कि जिंदा चीज़ें यकीनन गुज़र ही जाती हैं. लेकिन कुछ फनकार ऐसे होते हैं जो हमारे लिए ऐसी विरासत छोड़ जाते हैं कि वे हमेशा हमारे बीच जिंदा रहते हैं. उनके शब्द, उनकी आवाज़ हमेशा कानों में शहद घोलती रहेगी. कोरी चुनरिया आत्मा मोरी, मैल है मायाजाल, वो दुनिया मोरे बाबुल का घर, ये दुनिया ससुराल.

October 18, 2013

ये धुंआ सा कहाँ से उठता है.

जीवन सरल होता है. वास्तव में जीवन परिभाषाओं से परे अर्थों से आगे सर्वकालिक रहस्य है. युगों युगों से इसे समझने की प्रक्रिया जारी है. हम ये ज़रूर जानते हैं कि हर प्राणी सरलता से जीवन यापन करना चाहता है. मैं एक किताब पढते हुए देखता हूँ कि कमरे की दीवार पर छिपकली और एक कीड़े के बीच की दूरी में भूख और जीवन रक्षा के अनेक प्रयास समाये हुए हैं. जिसे हम खाद्य चक्र कहते हैं वह वास्तव में जीवन के बचने की जुगत भर है. एक बच जाना चाहता है ताकि जी सके दूसरा उसे मारकर अपनी भूख मिटा लेना चाहता है ताकि वह भी जी सके. जीवन और मृत्य की वास्तविक परिभाषा क्या हुई? कैसे एक जीवन के मृत्यु के प्राप्त होने से दूसरे को जीवन मिला. इस जगत के प्राणियों का ये जीवन क्रम इसी तरह चलता हुआ विकासवाद के सिद्धांत का पोषण करता रहा है. विज्ञानं कहता है कि हर एक जींस अपने आपको बचाए रखने के लिए समय के साथ कुछ परिवर्तन करता जाता है. कुछ पौधों के ज़हरीले डंक विकसित हो जाने को भी इसी दृष्टि से देखा जा रहा है. ऐसे ही अनेक परिवर्तन जीवों में चिन्हित किये गए हैं और उन पर वैज्ञानिक सहमती बनी हुई है. क्या एक दिन कीड़ा अपने शरीर पर ज़हर की परत चढा लेगा. क्या छिपकली को अपने पाचन तंत्र में उसी ज़हर का असर खत्म करने का हुनर चाहिए होगा? बस ऐसे ही ख्यालों में मनुष्य के श्रेष्ठ होने की याद दिलाती हुई कहानियां मनुष्य के शोषण, उत्पीडन और पतन की भी याद दिलाती हैं. अमेरिका साम्राज्यवाद का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है. इसी अमेरिका के दो लेखक मार्क ट्वेन बीहड़ों के जीवन और मनुष्य के जीवट को उकरने वाले रहे हैं. उन्हीं के समकालीन थे जैक लंडन. अट्ठारह सौ छिहत्तर में जन्मे जैक लंडन को जिजीविषा का कथाकार कहा जाता है. जिजीविषा का अर्थ होता है जीवन जीने की इच्छा. जीवन को मिटने से रो़कने के सतत प्रयास करने की कामना. एक मामूली कीट-पतंगे से लेकर एक जंगल के राजा कहलाने वाले जीव शेर को भी अपने जीवन की रक्षा के लिए अंतिम समय तक प्रयास करते हुए देखा जाता है. हम सब जीवों में कुदरत की दी हुई एक जैविक क्रिया होती है कि हम अपने जीवन की रक्षा करें. लेकिन अब हमारा मन हार मानने से इंकार करे वाही वास्तव में जिजीविषा है.

किसी आदमी को मारना, जैक लंडन की एक कहानी है. ये कहानी कई अर्थों में साम्राज्यवाद के उदय और उसकी नीयत के बारे में बात करती है. कथा का नायक एक अच्छे खाते पीते घर में घुस आया है. रात के वक्त इस हवेलीनुमा घर में हल्के अंधियारे में वह मकान मालकिन से टकराता है. अजनबी को सामने पाकर ज़रा डर गयी मालकिन उससे पूछती है तुम कौन हो और यहाँ किस तरह आये? मैं इस भूल भुलैया में भटक गया हूँ और अगर आप कृपया करके मुझे बाहर का रास्ता दिखा दें तो मैं कोई गदबा नहीं करूँगा और चुपचाप फूट लूँगा. महिला ने उससे पुछा कि तुम यहाँ कर क्या रहे थे? वह आदमी कहता है- चोरी करने आया था मिस जी और क्या? देख रहा था कि यहाँ से क्या क्या बटोरा जा सकता है. इसके बाद चोरी करने के लिया आया आदमी और घर की मालकिन के बीच कई तरह की चालबाजियां और बातें होती हैं. मालकिन अपने ही घर में हैं और चोर को दयालु पाकर ज़रा अकड जाती हैं. वे हर समय एक ही सपना देख रही होती हैं कि इस चोर को पकडवा देने से कल उनका नाम बहादुर और श्रेष्ठ महिला के रूप में लिया जायेगा. इसलिए वे हर संभव प्रयास करती हैं कि चोरी करने आये आदमी को पकड़ा जा सके. आदमी के हाथ में एक रिवाल्वर है. लेकिन आदमी के दिल में अभी भी स्त्रियों के प्रति सम्मान है. जब मालकिन पूछती है कि क्या तुम मुझे गोली मार दोगे तब वह कहता है नहीं मुझे आपकी ठुकाई करनी पड़ेगी. आदमी अपनी जान को बचाने के लिए उसकी जान लेने तक नहीं जाना चाहता है. औरत पूछती है क्या तुम एक स्त्री पर हाथ उठाओगे? वह कहता है इसके सिवा कोई रास्ता नहीं है कि मैं आपका मुंह कसकर बंद कर दूं.

इसी कहानी में आगे मकान मालकिन उसको शराब पीने का ऑफर देती है और उस बहुत सारी बातें करते हुए समय को गुज़ारती हैं ताकि आलसी नौकर या पुलिस तक खबर की जा सके. वह आदमी अपने बारे में पूरा अहतियात बरतते हुए वाहन से निकल पाने के बारे में सोचता रहा है. इसी बातचीत में वह आदमी कहता है कि मैं कोई चोर नहीं हूँ वरन सताया हुआ आदमी हूँ. कहानी का एक संवाद कुछ इस तरह है- देखिये मैम, मेरे पास एक छोटी सी खदान थी. ज़मीन में ज़रा सा छेद भर समझ लीजिए. एक घोड़े से चलने वाली मशीन थी. उस इलाके में इस्पात की भट्टियों का सारा कारोबार काबू में कर लिया गया और उसी जगह पर एक कारखाना बैठा दिया गया तो मैं चें बोल गया. मुझे घाटे से जूझने और बचने की कोशिश का मौका ही नहीं मिला. इस कहानी में सत्य कितना और कल्पना कितनी है ये समझ पाना कठिन है. लेकिन हम ये समझ सकते हैं कि लघु उद्योगों पर बड़े कारखानों की मार किस तरह एक आदमी को तोड़ देती है. किस तरह हम आने जीवन यापन के साधनों को खो देने से बदहवास हो जाते हैं. हमें ये भी समझ आया है कि ज़मीन और जंगल से बेदखल किये हुए लोग किस रास्ते को चुनने को मजबूर किये जा रहे हैं. आज जंगल में कानून को चुनौती देने वाली आवाजें हैं. उन आवाजों के पीछे भी एक हारे हुए टूटे हुए आदमी की व्यथा को सुना जा सका है. जैक लंडन आज से सौ साल पहले के कथाकार हैं. हम आज जिस हाल में जी रहे हैं वह सौ साल बाद भी वैसा ही है. शोषण और उत्पीडन का सिलसिला कुछ ऐसा है कि लोग अपने ही घर, ज़मीन और जंगल से बेदखल कर दिए जा रहे हैं. किसी आदमी को मारना, कहानी का नायक उस औरत को इसलिए नहीं मारता कि वास्तव में वह इंसान होने की कद्र करता है. बाहर जाते हुए उस आदमी पर वह औरत इसलिए गोली नहीं चलाती कि एक जान लेते हुए उसके हाथ कांपने लगते हैं. लेकिन अब किसी के हाथ नहीं कांपते. मीर तकी मीर कहते हैं- देख तो दिल की जां से उठता है, ये धुआं सा कहाँ से उठता है.

October 17, 2013

साये, उसके बदन की ओट किये हुए

लड़की एक अरसे से
जो जी रही है, उसे नहीं लिखती
वजह कुछ भी नहीं है.

लड़का एक अरसे से
जो नहीं जी रहा है, उसे लिखता है
वजह कुछ भी नहीं है.

हो सकता है ये दोनों बातें उलट ही हों.

मगर ये सच है कि
हर एक कंधा गुज़रता है धूप की चादर से
साये उसके बदन की ओट किये चलते हैं.

* * *

कोई फिक्रमंद होगा
सुबह के वक्त की पहली करवट पर
की होगी उसने कोई याद.

बुदबुदाया होगा आधी नींद में
कि जिसको धूप की तलब है उसी बिछौने
उतरे आंच ज़िंदगी की अहिस्ता.

जो पड़े हुए हैं रेत की दुनिया में
उन पर बादलों की मेहर करना.

हिचकियाँ बेवक़्त आती हैं अक्सर, उलझी उलझी.

* * *

जिस जगह अचानक
छा जाता है खालीपन
हरी भरी बेलों के झुरमुट तले
चमकती हो उदासी.

जहाँ अचानक लगे
कि बढ़ गयी है तन्हाई
बाद इसके
कि बरसों से जी रहे थे तनहा
तुम समझना कि
कुछ था हमारे प्रेम में और टूट गया.

मैंने सलाहों और वजीफों से इतर
एक दुनिया सोची है
जहाँ जी लेने के लिए
एक अदद जिंदगी भर की ज़रूरत होती है
वहाँ प्रेम हो सके तो समझना
कि जो टूटा वह एक धोखा था.

उसका नाम
कुछ भी लो तुम
मगर असल सवाल होता है
कि क्या तुमको
सचमुच इल्म है मैंने किस तरह चाहा है तुम्हें.




October 11, 2013

फ्रोजन मोमेंट

फोटो के निगेटिव जैसे फिल्म के सबसे छोटे फ्रेम में जादू के संसार की एक स्थिर छवि कायम रहती थी। गली में अंधेरा उतरता तो उसे लेंपपोस्ट की रोशनी में देखा जा सकता था और दिन की रोशनी में किसी भी तरफ से कि नायक नायिका हर वक़्त खड़े रहते थे उसी मुद्रा में।

ये फ्रोजन मोमेंट बेशकीमती ख़जाना था। बस्ते में रखी हुई न जाँचे जाने वाली कॉपी में से सिर्फ खास वक़्त पर बाहर आता था। जब न माड़साब हो न कोई मेडम, न स्कूल लगी हो न हो छुट्टी और न जिंदगी हो न मृत्यु। सब कुछ होगया हो इस लोक से परे।

रास्ते की धूल से दो इंच ऊपर चलते हुये। पेड़ों की शाखाओं में फंसे बीते गरम दिनों के पतंगों के बचे हुये रंगों के बीच एक आसमान का नीला टुकड़ा साथ चलता था। इसलिए कि ज़िंदगी हसरतों और उम्मीदों का फोटो कॉपीयर है। बंद पल्ले के नीचे से एक रोशनी गुज़रती और फिर से नयी प्रतिलिपि तैयार हो जाती।

रात के अंधेरे में भी नायक और नायिका उसी हाल में खड़े रहते। ओढ़ी हुई चद्दर के अंदर आती हल्की रोशनी में वह फ्रेम दिखता नहीं मगर दिल में उसकी एक प्रतिलिपि रहती। वह अपने आप चमकने लगती थी।

बड़े होने पर लोग ऐसे ही किसी फ्रेम में खुद कूद पड़ते हैं। आँसू भरी आँखें लिए फ्रीज़ हो जाते हैं। उस वक़्त तक के लिए जब तक कच्चे रास्तो पर कोई डामर न कर दे। पेड़ों की शाखाओं को मशीन छांट न दे। आसमान और आँख के बीच गगनचुंबी इमारतें खड़ी न हो जाए। जब तक कि ठोकर मार कर चला न जाए महबूब या ज़िंदगी का फोटो कॉपीयर नष्ट न हो जाए।

प्रेम असल में एक लंबी ज़िंदगी का सबसे छोटा फ्रेम है।

[जिन बातों पर तुमको यकीन नहीं है, वे सब बातें मैं वापस लेता हूँ। मैं मुकर जाता हूँ। मुझ पर आरोपित कर दो जो भी करना है। दो कहानियाँ पूरी करके देनी है और दिल इस काम में लग नहीं रहा।]

* * *


धूप एक तलब नहीं मजबूरी है और मुसाफ़िर चलता रहता है रास्तों पर तन्हा। कि सिले हुये हैं उसके होठ रेत के पैबंद से और जाने कौन कब से गैरहाज़िर है ज़िंदगी से।

* * *

चुप्पी, अबोला नहीं है। न बतलाना या आवाज़ न देना तिरस्कार नहीं है।
मेरे भीतर कुछ टूट जाता है लेकिन क्या करूँ कि शिकायत करने की आदत कुदरत ने दी नहीं। हम सबके भीतर कुछ न कुछ टूटता रहता है। जैसे आज ऑफिस जाते समय रास्ते के नीम से पीली पत्तियाँ झड़ रही थी। ये उनका खत्म हो जाना नहीं वरन पूर्ण हो जाना था। इसी तरह कई बार संवाद का कोई हिस्सा पूरा हो जाता है। उसके बाद निर्विकार चुप्पी होती है। चुप्पी ही निर्विकार हो सकती है इसलिए कि संवाद खूब सारे विकारों से ग्रसित होते हैं। अच्छा है कि चुप्पी है, अच्छा है कि ये अबोला नहीं है।

प्रेम सिर्फ अनुभूत करने के लिए बना है।

* * *

किसी के पास नहीं है दुखों का मरहम मगर सबके पास है इस लम्हे को खुशी से बिता देने का सामान।
जैसे मैंने तुम्हारे बारे में सोची एक ज़रा सी बात और मुस्कुरा उठा।


[Water color by   Kris Parins]

October 7, 2013

ज़ाहिदों को किसी का खौफ़ नहीं

पिछले कुछ दिनों से बादलों की शक्ल में फरिश्ते रेगिस्तान पर मेहरबान हो गए थे। उन्होने आसमान में अपना कारोबार जमाया और सूखी प्यासी रेत के दामन को भिगोने लगे। हम सदियों से प्यासे हैं। हमारी रगों में प्यास दौड़ती है। हमने पानी की एक एक बूंद को बचाने के लिए अनेक जतन किए है। हमारे पुरखे छप्पन तौला स्नान करते आए हैं। छप्पन तौला सोना होना अब बड़ी बात नहीं रही। लेकिन छप्पन तौला पानी से  रेगिस्तान के एक लंबे चौड़े आदमी का नहा लेना, कला का श्रेष्ठ रूप ही है। वे लोग इतने से पानी को कटोरी में रखते और बेहद मुलायम सूती कपड़े को उसमें भिगोते। उस भीगे हुये कपड़े से बदन को पौंछ कर नहाना पानी के प्रति बेहिसाब सम्मान और पानी की बेहिसाब कमी का रूपक है। 
 
बादल लगातार बरसते जाते हैं और मैं सोचता हूँ कि काश कोई धूप का टुकड़ा दिखाई दे। मेरी ये ख़्वाहिश चार दिन बाद जाकर पूरी होती है। चार दिन बरसते हुये पानी की रिमझिम का तराना चलता रहा। इससे पानी के प्यासे लोग डर गए। उनका जीना मुहाल हो गया। गांवों में मिट्टी के बने कच्चे घर हैं। उनमें सीलन बैठती जा रही थी। कुछ क़स्बों में हवेलियाँ हैं। पुराने वक़्त की निशानियाँ। सदियों पुरानी पेढ़ियाँ हैं। भूल भुलैया जैसी तंग घुमावदार गलियों में बने हुये घर हैं। इन सब में लोग रहते हैं। वे सब लोग इस तरह के सीले मौसम के बने रहने से डरते जाते हैं। गाँव के किसान अपनी खेती से डरते हैं। रेगिस्तान जो पानी का प्यासा है पानी से डर जाता है।

रेगिस्तान के लोगों का ये डर अमेरिका में बजट को लेकर राजनीतिक गतिरोध के चलते करीब अट्ठारह साल बाद पहली बार सरकारी विभागों में कामकाज ठप हो जाने से बड़ा डर था। जबकि वह दुनिया का सबसे ताकतवर देश है। हम सब बड़े घर के संकट को देखकर खुद को दिलासा देते हैं कि उनका भी ये हाल हुआ तो हम लोगों की बिसात क्या है। मैं देखता हूँ कि मीडिया खबरों के ऐसे शीर्षक देता है जैसे अमेरिका दिवालिया हो गया है। वह साफ बात बताता ही नहीं है। वह पाठक और दर्शक को कभी समझाता नहीं कि ये माजरा क्या है। मैं कुछ बातें टटोलता हूँ तो मालूम होता है कि यह संकट मुख्यरूप से राष्ट्रपति बराक ओबामा के महत्वाकांक्षी स्वास्थ्य सुरक्षा कार्यक्रम पर खर्च को लेकर विपक्षी रिपब्लिकन एवं सत्तारूढ डैमोक्रेट सांसदों के बीच घरेलू मतभेद के चलते खड़ा हुआ है। इस बार दोनों ओर से किसी पक्ष के अपने रूख से न झुकने का फैसला किया हुआ है। इसके कारण राष्ट्रपति भवन को आदेश जारी करना पड़ा कि संघीय सरकार की एजेंसियों का कामकाज बंद किया जाता है। इस आदेश से हजारों सरकारी कर्मचारियों को फिलहाल अवकाश पर जाना पड़ा है और कई सेवाओं में कटौती कर दी गई है। 
 
इससे पहले, इस तरह की स्थिति उन्नीस सौ पिचानवें छियानवें में पैदा हुई थी। अमेरिका में कामकाज बंद रहने का मतलब है कि सरकारी कार्यालयों में कागजी कार्रवाई धीमी पड़ जाएगी और संघीय सरकार के लाखों कर्मचारियों को घर बैठा दिया जाएगा। उन्हें इस दौरान वेतन नहीं मिलेगा। केवल आपात सेवाएं हीं जारी रखी जाएंगी। इस तरह अमेरिका पर जो संकट है वह उनके अंदरखाने का मामला है। ऐसा मामला कि कभी भी संसद बजट पास कर सकती है और कभी भी अमेरिका फिर से दुनिया के देशों में शांति बहाल करने के अपने प्रिय काम पर निकाल सकता है। लेकिन हम रेगिस्तान के लोगों के पास इस लगातार होती बारिश से बचने का कोई उपाय हैं। ये बेहिसाब बरसात एक रूठे हुये सेठ द्वारा बार बार मांग रहे भिखारी के मुंह में जबरन रोटियाँ ठूँसते जाने जैसा है। साँवरिया गिरधारी कोई होता नहीं है कुदरत अपना काम करती है। वरना रेगिस्तान से जब कोई प्यासी पुकार उठी होती तभी उतना ही पानी बरसा होता।

इधर एक नयी बात पर चर्चा चल पड़ी है कि अब हमको वोट देते हुये ये बताने का अधिकार भी मिल सकता है कि हमें हमारे नेता पसंद नहीं है। अगले माह होने वाले विधानसभा चुनाव के दौरान जो मतदाता चुनाव मैदान में उतरे किसी भी उम्मीदवार को वोट नहीं देना चाहेंगे, उनके लिए इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में एक अलग बटन होगा। इस बटन को दबाकर मतदाता किसी को भी वोट नहीं देने के विकल्प का उपयोग पूरी गोपनीयता कायम रखते हुए कर सकेंगे। इस बटन का नाम ‘‘नोटा’’ रखा गया है। ये नेताओं को किसी सोटे की तरह भी लग सकता है। उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में अपने एक निर्णय में भारत निर्वाचन आयोग को ईवीएम के मतदान-पत्र ‘नोटा बटन’ उपलब्ध कराने की व्यवस्था करने के निर्देश दिए थे। इस तरह की खबरों को पढ़ते हुये मुझे उन खास तरह के लोगों की याद आती है कि दुनिया में हर चीज़ की कीमत होती है। इसलिए किसी भी चीज़ को खराब नहीं करना चाहिए। हमारे यहाँ मतदान के के समय बहुत सारे मतदाता आखिरी समय में अपना मन बदल लेते हैं। इसलिए कि उनको लगता है वे जिसको वोट देने जा रहे हैं वह जीतेगा नहीं और वोट खराब हो जाएगा। अब को नोटा आएगा वह तो पक्के हिसाब से वोट की खराबी जैसा लग सकता है। लेकिन इस तरह के प्रावधान उन मतदाताओं के लिए हरहस का विषय हो सकते हैं जिनको नेताओं से प्रेम न होने का कारण वोट करने में रुचि न थी। 
 
एक दिन हो सकता है भ्रष्टाचार में डूबे हुये उम्मीदवारों के मुक़ाबले नोटा को ज्यादा वोट पड़ जाएँ। वह भारतीय मतदाता के विवेक और बुद्धिमत्ता का उदाहरण होगा। हम खराब चीजों से बचकर चलने के आदि हैं उनको बदलने की जहमत नहीं उठाते हैं। ये एक नयी शुरुआत है। हमें अपने मत का मोल पहचान कर स्वच्छ, निर्भीक और समाजसेवी उम्मीदवार को चुनना चाहिए अगर कोई ऐसा उम्मीदवार नहीं है तो हमारे पास एक नोटा है। ज्ञान और धर्म वाले को उर्दू ज़ुबान में ज़ाहिद कहते हैं। ऐसे ही लोगों के बारे में शकील बदायूँनी साहब ने कहा है। ज़ाहिदों को किसी का खौफ़ नहीं/सिर्फ काली घटा से डरते हैं।

September 29, 2013

कमर पर बंधी है कारतूसपेटी

दो कवितायें -
तुम्हारी याद की
जबकि तुम इतनी ही दूर हो कि हाथ बढ़ा कर छू लूँ तुम्हें।
















तुम्हारे जाने का वक़्त था
या फसाने की उम्र इतनी ही थी
कि बाद तब से अंधेरा है।

वक़्त की
जिस दीवार के साये में
सर झुकाये चल रहा हूँ,
वो दीवार दूर तक फैली है।

धूप नहीं, याद नहीं,
और ज़िंदगी कुछ नहीं
कि आवाज़
जो लांघ सकती है दीवारें
वह भी गायब है।

कमर पर बंधी है कारतूसपेटी
हर खाने में एक तेरा नाम रखा है।

इस तंग हाल में
बढ्ने देता हूँ
उदासी के भेड़ियों को करीब
जाने कौनसा कारतूस आखिरी निकले।

काश एक तेरा नाम हुआ होता बेहिसाब
और एक मौत का कोई तय वक़्त होता। 
* * *


अश्वमेध यज्ञ के 
घोड़े की तरह मन
निषिद्ध फ़ासलों पर लिखता है, जीत।

आखिर कोई अपना ही
उसे टांग देता हैं हवा के बीच कहीं
जैसे कोई जादूगर
हवा में लटका देता है
एक सम्मोहित लड़की को।

हमें यकीन नहीं होता
कि हवा में तैर रही है एक लड़की
मगर हम मान लेते हैं।

इसी तरह
ये सोचना मुमकिन नहीं
कि तुम इस तरह ठुकरा दोगे,
फिर भी है तो...

शाम उतर रही है
रात की सीढ़ियों से उदास
और मेरी याद में समाये हो तुम।

[Painting Courtesy : Pawel Kuczynski]

September 27, 2013

रेगिस्तान में रिफायनरी की आधारशिला

सुबह अच्छी हवा थी लेकिन बारह बजते ही उमस ने घेर लिया। पचपदरा के नमक के मैदानों पर तने हुये आसमान में हल्के बादल आने लगे। मैं सवेरे छह बजे घर से निकला था। रेत के मैदान से नमक भरी जगह पर आ गया था। विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा के लिए तैनात जांच दल और प्रवेश पास बनाने वाली एजेंसी के पास जाते ही मालूम हुआ कि हमारे पास जिला मुख्यालय पर पीआरओ के पास हैं। ये बेहद उदास करने वाली बात थी। तीन दिन पूर्व पास बनाने के लिए किए गए निवेदन के बावजूद वे समय पर मिल नहीं पाये। मैं कार में अनमना बैठा था कि इंतज़ार करने के सिवा दूजा कोई रास्ता न था। इस तरह के वीआईपी दौरों के समय कई तरह की असुविधाएं होती हैं इससे मैं वाकिफ हूँ। लेकिन लापरवाही भरे तरीके से प्रवेश पास का गैरजिम्मेदार लोगों के पास होना और समय पर पहुँचकर भी सभा स्थल पर रिकार्डिंग के लिए अपने उपस्करणों को स्थापित न कर पाना अफसोस की बात थी।

सुबह जब हमारी टीम वहाँ पहुंची तब तक सब खाली था। कुछ देर पहले लगाए गए होर्डिंग्स और बैनर रस्तों को नया लुक दे रहे थे। ज़्यादातर होर्डिंग अपने नेता के प्रति वफादारी या अपनी सक्रिय उपस्थिती दिखाये जाने के लिए लगे थे। मैं इन सब से बेपरवाह बैठा रहा। अचानक मैंने देखा कि कुरजां का एक झुंड ऊपर से गुज़रने लगा। ये दृश्य मनोहारी था। मैंने कुरजां को संबोधित लोकगीत अनगिनत बार सुना है। सुना कहना ठीक न होगा वरन ये लोकगीत रेगिस्तान के हर बाशिंदे के मन में रचा बसा है। किसी विरहन की आर्द्र पुकार है कुरजां ऐ म्हारों भंवर मिलाय दो। उनके सलेटी रंग के डेने हवा में तैर रहे थे। वे नीचे से कुछ कम सलेटी दिख रही थी, जैसे काली स्याही पर खूब सारा पानी गिर जाने से रंग हल्का होकर छितरा गया है। एक विशेष ज्यामिती में उनके उड़ने का सलीका सम्मोहन से भरा था। मेरी उदासी को इन प्रवासी पंछियों ने एक बार भुला दिया।

लोगों के काफिले आने लगे और मेरी बेचैनी बढ़ने लगी। दो घंटे के इंतज़ार के बाद जिला मुख्यालय से आए पत्रकार साथी के साथ हमारा प्रवेश पत्र भी आया। सुरक्षा के कई चक्रों के पार एचपीसीएल कंपनी के अधिकारी ने मीडिया को प्रवेश दिये जाने वाले गेट पर हमें रोक लिया। उन्होने कहा कि आप ये पास अपनी जेब में रखिए और लौट जाईए। हम आपको प्रवेश नहीं दे सकते हैं। मैंने पूछा कि क्या इसकी कोई वजह है। वे कहते हैं कि इतने सारे लोगों को बैठने की जगह नहीं है। मैं कहता हूँ कि हम आकाशवाणी से आए हैं और इस कार्यक्रम को रिकर्ड करना एक ऐतिहासिक काम है। वे कुछ नहीं सुनते। पुलिस वाले कहते हैं वापस जाईए। वहाँ न तो कोई स्थानीय प्रशासन का अधिकारी होता है और न ही कोई पुलिस का अधिकारी जिनसे ये निवेदन किया जा सके कि आकाशवाणी जनता का सरकारी माध्यम है और इस अवसर की रिकार्डिंग करना लोक प्रसारण का दायित्व है। मैं पीआरओ को फोन लगाता हूँ लेकिन सुबह दो बार नो आनस्वर हुआ फोन इस बार लगता ही नहीं है। जाने क्या सोच कर एचपीसीएल का हठी और दंभी अधिकारी मुझे कहता है- तुम अंदर चले जाओ।

एक बड़े भूभाग में तने हुये लोहे के विशाल तम्बू के नीचे लोग जुट रहे थे। बारह बजे तक कोई सत्तर अस्सी हज़ार के आस पास लोग थे। लेकिन असल कारवां का आना तभी शुरू हुआ था। भव्य मंच के आस पास सत्तासीन जनप्रतिनिधि बेचैन कदमों से जायजा ले रहे थे। समय आहिस्ता गुज़र रहा था और कोलाहल बढ़ता जा रहा था। मुझे खुशी थी कि सौंपे गए काम के आधे अधूरे पूरे हो जाने का जुगाड़ हो गया था। हमें वहाँ तक नहीं जाने दिया गया, जहां से पत्रकार ऑडियो का आउटपुट ले सकते थे। जन प्रसारण की बात अब पीछे छूट गयी थी। हमें जनता को सुनने के लिए लगे हुये स्पीकर्स से ही कुछ रिकर्ड करना था। अचानक एक हल्की फुहार आई। नमक के मैदान पर तैर रहे बादल बरसने लगे थे। एक हल्की घरघराहट की आवाज़ आई और बादलों के बीच एक सफ़ेद और केसरिया रंग का चॉपर उतरता हुआ दिखने लगा। हेलिकॉप्टर के रंग को देखकर मेरे चहरे पर हल्की मुस्कान आई। मैंने खुद को याद दिलाया कि इस उड़ने वाले यान से पक्का संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी ही उतरने वाली हैं। वे बाड़मेर के पचपदरा में देश की एक बड़ी रिफायनरी और पेट्रो केमिकल कॉम्प्लेक्स के शिलान्यास का अनावरण करने आई थी। पेट्रोलियम मंत्री, राजस्थान के मुख्य मंत्री सहित कई ऊंचे नेता और मंत्री इस काफिले में शामिल थे। भाषणों के दौरान समय की कीमत रेखांकित थी। अपार जनसमूह में सबसे अधिक उत्सुकता सोनिया गांधी को देखने की थी।

केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं के बारे में बात करने से पहले मुख्य वक्ता ने इस रिफायनरी से होने वाले विकास के बारे में लंबी बात की। और आधे भाषण के बाद वही बात आई कि आज़ादी के इतने बरसों बाद भी जो सपना हमने देखा था वह अभी अधूरा है। लेकिन इस उद्बोधन में पुनः विश्वास दिलाया गया कि ये काम हम ज़रूर पूरा करेंगे। नेता और जन प्रतिनिधियों का काम डेढ़ घंटे में पूरा हो गया। केसरिया पीठ वाला चॉपर फिर से हवा में उड़ गया। भीड़ अपने घरों की ओर लौटने लगी। मैंने सोचा कि जिन अधिकारियों के कारण आकाशवाणी की रिकार्डिंग टीम को बेशुमार व्यवधान उठाने पड़े उनके बारे में उचित जगह पर एक शिकायत दर्ज़ करवाऊँगा लेकिन मैं भी लगभग भारतीय ही हूँ। मैंने दो दिन बाद इस तकलीफ को भुला दिया। हम सब अपनी मुश्किलों को कुछ ही देर याद रख पाते हैं और अक्सर हालत को बेहतर बनाने के लिए अपना योगदान देने की जगह खुद को हालत के अनुकूल ढालते हुये चुप रहना पसंद करते हैं। लौटते समय भी मुझे बहुत सारे प्रवासी पक्षी दिखे। उनका कलरव भेड़ों की आवाज़ों से अलग एक समूह गान सा प्रतीत हो रहा था। मैंने खुद को यकीन दिलाया कि एक दिन हम भी समूह स्वर में कोई गान गाते हुये जाग जाने का अहसास कर सकेंगे।

September 26, 2013

जो अपना नहीं है उसे भूल जाएँ।

ये परसों रात की बात है। शाम ठीक से बीती थी और दफ़अतन ऐसा लगा कि कोई ठहरा हुआ स्याह साया था और गुज़र गया। मेरे आस पास कोई खालीपन खुला जिसमें से ताज़ा सांस आई। काम वे ही अधूरे, बेढब और बेसलीका मगर दोपहर बाद का वक़्त पुरसुकून। 

कहीं कोई उदास था शायद, वहीं कोई शाद बात बिखरी हो शायद।
* * *
ऊंट की पीठ पर रखी उम्र की पखाल से, गिरता रहा पानी 
और रेगिस्तान के रास्तों चलता रहा मुसाफ़िर ज़िंदगी का। 

बस इसी तरह बसर हुई। 

कम फूलों और ज्यादा काँटों वाले दरख्तों, धूप से तपते रेत के धोरों और अकूत प्यास से भरी धरती वाले ओ प्यारे रेगिस्तान, तैयालीस साल असीम प्रेम देने का बहुत शुक्रिया। 

तुम्हारे प्रेम में आज फिर एक नए बरस की शुरुआत होती है।
जन्मदिन शुभ हो, प्यारे केसी।
* * *

शाम ढले घर में पाव के सिकने की खुशबू थी। 

पेशावर से मैं कभी जुड़ नहीं पाता। मुझे मीरपुर खास ही हमेशा करीब लगता है। देश जब बंटा तो सिंध से आए रिफ़्यूजियों के हर झोले में गोल ब्रेड थी। जिसे वे पाव कहते थे। कोई तीस हज़ार साल पहले किसी कवक के गेंहू के आटे में पड़ जाने के बाद जो फूली हुई रोटी बनी, ये उसी का सबसे अच्छा रूप है। जिस तरह तंदूर के बारे में हमें थोड़ी सी मालूमात है कि ये पहाड़ों से सरकता हुआ रेगिस्तान के देशों तक आया, उसके उलट किसी को ये मालूम नहीं है कि पाव ने किस रास्ते को तय किया है। योरोप के लोग जिंहोने हमारे जैसी पतली कागज़ी रोटी खाना अब तक नहीं सीखा, वे इस पाव पर बड़ा हक़ जमा सकते हैं अगर इटली वाले कोई आपत्ति न करें तो। असल में फ्रांस की क्रांति के बारे में बात करते हुये लोग रोटी की गंध से भर जाते हैं। 

पिछले दफ़े जब जयपुर में था तब आधी रात हो चुकी थी और खाने का वक़्त जा चुका था। बच्चे सो रहे थे और मैं रोटी सेक रहा था तभी मनोज ने कहा- दुनिया की सबसे अच्छी खुशबू सिकती हुई रोटी की होती है। फ्रांस के, वे केफ़ेटेरिया में बहसें करने वाले लोग जब भूख से बेहाल हुये तो ब्रेड के लिए राज महल को लूटने चल पड़े थे। अफ्रीका वाले लंबे और काले लोग ब्रेड के बाद ही हर धरम का उदय मानते हैं। वे अपनी इस अनमोल चीज़ से वेदिक लोगों की तरह ही भोग लगाते हैं। मैंने देखा है कि देवताओं के लिए ब्रेड एक ज़रूरी चीज़ है। रिफ़्यूजियों के आने से पहले ही हमारे यहाँ खूब ब्रेड बना करती थी। भारत आए गोरों ने ब्रेड बनाने की भट्टियाँ सबसे पहले लगवाई थी। उन भट्टियों ने हमें बताया कि भूख मिटाने के लिए पेट भरने की जगह विलासिता के कई तरीके ईजाद किए जा सकते हैं। औध्योगिक क्रांति के समय तपेदिक से मर जाने वाले अनगिनत नौजवानों की असल मौत ब्रेड के खत्म होने के बाद हुई थी। 

हम केक नहीं काटते। हम जन्मदिन पर मुंह मीठा करते हैं। गुड़ हो या रस-मलाई। फिलहाल आभा ब्रेड सेक रही है। जिसे हम पाव कहते हैं। इसकी खुशबू बेहद प्यारी लग रही है। ब्रेड हमेशा बची रहे कि बेहिसाब दुआएं दोस्तों ने दी है। दोस्तों का भला हो कि आज प्याला सिर्फ दुआओं से भरा है।

चलो आज का दिन कुछ यूं मनाए, कि जो अपना नहीं है उसे भूल जाएँ।
वैसे तो कुछ न भूला जाएगा हमसे, इसलिए भूल जाने की अफवाह उड़ाएँ।

September 23, 2013

रेगिस्तान का आसमान अक्सर



रेगिस्तान के बीच
एक पथरीले बंजर टुकड़े पर
कई लोगों को कल देखा था, मैंने।

कोलाहल के अप्रिय रेशे
छू न सके मेरे कानों को
कि कुछ इस तरह भरी भीड़ में
तेरी याद को ओढ़ रखा था, मैंने।

कितने ही रंग की झंडियाँ
लहराती थी हवा में मगर
मैंने देखा कि तुम बैठे हो
वही कुर्ता पहने
कल जो तुमने खरीदा था
याद आया कि कपड़ों की उस दुकान में
जाने कितने ही रंगों को चखा था हमने।

सुगन चिड़ी बैठी थी
जिस तार पर
वहीं मैं टाँगता रहा
कुछ बीती हुई बातें
कोई भटकी हुई बदली
उन बातों को भिगोती रही
लोगों ने ये सब देखा या नहीं, मगर देखा मैंने।

बाजरा के पीले हरे सिट्टों पर
घास के हरे भूरे चेहरे पर
शाम होने से पहले गिरती रही बूंदें
जैसे तुम गुलाब के फूल सिरहाने रखे
झांक रहे हो मेरी आँखों में
याद के माइल स्टोन बिछड़ते रहे
कार के शीशे के पार खींची बादलों की रेखा मैंने।

मैं कहीं भी जाऊँ
और छोड़ दूँ कुछ भी
तो भी तुम मेरे साथ चलते हो।

बीत गया
वो जो कल का दिन था
और उसके ऊपर से
गुज़र गयी है एक रात पूरी।

मगर अब भी
तुम टपकने को हो भीगी आँख से मेरे।

[बस इसी तरह बरसता है रेगिस्तान का आसमान अक्सर।]
















तस्वीर साभार : अली अब्बास सैयद

September 17, 2013

सबकी पेशानी पर है प्रेम की थोड़ी सी राख़

दो दिन की डायरी के तीन टुकड़े। 

रेत के बीहड़ में लोहे के फंदे में फंसी एक टूटी हुई टांग के साथ असहनीय दर्द की मूर्छा लिए हुये तीन सामर्थ्यहीन टांगों से छटपटाता है हिरण। हिरण, जो कि एक प्रेम है। अर्धचेतना में डूबा अपने महबूब शिकारी की प्रतीक्षा में रत। मृत्यु और भोर के बीच एक निश्चेष्ट होड़। 

उसके होठों जितनी दूर और उतनी ही प्यासी, बुझती हुई हिरण के आँखों की रोशनी। इस तड़प के वक़्त बेखबर शिकारी सो रहा है जाने किस अंधेरे की छांव। हिरण के डूबते दिल की आवाज़ समा रही है धरती की पीठ में। वह तड़पता है फंदे में बेबस और लाचार। 

सबकी पेशानी पर है प्रेम के अतीत की थोड़ी सी राख़। 

मैं एक अघोरी हूँ। जो बैठा हुआ हुआ है छत पर और रेत उड़ उड़ कर गिर रही है सूखे प्याले में।

15 Sept 2013 8 PM

वक़्त में नमी रही होगी। दीवार के बीच कहीं एक पत्थर के आस पास से झड़ गया था सारा सौदा जिसके साथ रहा होगा वादा थाम कर रखने का। ऊपर खुला आसमान था लेकिन बाकी तीन तरफ खाली छूटी हुई लकीरों को किसी तत्व का नाम नहीं दिया जा सकता था। उस जगह को दरारें ही कहना एक मजबूरी थी। 

पत्थर मगर अटल था किसी नियम से बंधा हुआ। न उसे कोई हवा गिरा पाती थी। न उस तरफ से कोई दीवार चढ़ने की कोशिश करता था। जैसे किसी ने सुन लिया हो प्रेम का हाल और और उसे छोड़ दिया हो उसी के हाल पर। 

भरी पूरी दीवार पर एक तन्हा पत्थर कैसा दिखता है? 

जैसे कोई केसी जैसा आदमी शाम ढले छत पर बैठा शराब पी रहा हो। एकदम तन्हा। और कोई हवा, कोई नशा न गिरा पा रहा हो उसे।

* * *

15 Sept 2013 10.30 AM

कल रात औंधा पड़ा रहा प्याला, रेगिस्तान की हवा उलट भी न सकी उसमें क़ैद दोपहर उदासी। मैंने रात का या रात ने थाम रखा था मेरा हाथ और उस उदासी को खींच लाया हूँ इस सुबह तक। नीम की टहनियाँ झुक रही हैं दक्षिण से उत्तर की ओर आक के पत्ते उड़ने लगे हैं आहिस्ता। मैं वक़्त का मुंह देख रहा हूँ इस उम्मीद में कि वह जल्दी जल्दी पौंछे तुम्हारी चीया के आँसू, बेटे की हतप्रभ आँखें और तुम्हारी संगिनी के दिल में रख दे वेदना को पीने का सामर्थ्य। 

ओ रेगिस्तान की आँधी मिटा दो कल के दिवस का निशान कि हम यूं भी जानते हैं स्मृति से बुनना दुखों को। आई लव यू दीपक अरोड़ा। मैंने उस दिन सच कहा था कि प्यार है। सुबह सुबह रोना बड़ी मामूली चीज़ है तुम्हारे न होने के सामने...

September 13, 2013

हसरतों का बाग़

कभी कहा न किसी से तेरे फसाने को न जाने कैसे खबर हो गयी ज़माने को। सिटी बस में यही ग़ज़ल बज रही थी। सवारियाँ इस सोच में डूबी थी कि डायवर्टेड रूट में किस जगह उतरा जाए तो अपने ठिकाने लग सकते हैं। हर कोई इसी कोशिश में है कि वह ठिकाने लग जाए। मेरे पास कोई काम न था। मैं छुट्टी लेकर राजधानी में घूम था और दिन की गर्मी सख्त थी। सिटी बस में कभी कभी हवा का झौंका आता लेकिन उसे अधिक ट्रेफ़िक कंट्रोल कर रही विशल की आवाज़ आती। शहर में बड़ा सियासी जलसा था। जलसे वाली जगह के बारे में मैंने पूछा कि यहाँ कितने लोग आ सकते हैं। मेरे पूछने का आशय था कि इस सभा स्थल की केपेसिटी कितनी है। जवाब मिला कि कोई तीन लाख के आस पास। विधानसभा का भवन जिस ओर मुंह किए खड़ा है उसी के आगे ये जगह है। अमरूदों का बाग़। खुला मैदान है। पहले यहाँ पुलिस का मुख्यालय बनना था लेकिन किन्हीं कारणों से इस जगह को खाली ही रहने दिया गया। मैं इस खाली जगह को देखकर खुश होता हूँ। खाली जगहें हमारी मत भिन्नता और असहमतियों के प्रदर्शन के लिए काम आ सकती है। अंबेडकर सर्कल से देखो तो विधान सभा के आगे कोने में दायें हाथ की तरफ एक छुपी हुए जगह है। यही अमरूदों का बाग़ है। मेरे ससुराल में एक अमरूद का पेड़ लगा हुआ है। वो पेड़ रहेगा कब तक ये नहीं मालूम मगर हमने बेसब्र होकर खूब कच्चे अमरूद खाये हैं। कच्चे अमरूद और पके अमरूद के खाने में सिवा इसके कोई अंतर नहीं है कि एक खट्टा लगता है मगर मुंह को पानी से भर देता है। दूसरा पका हुआ मीठा होता है और जल्दी खत्म हो जाता है। ऐसे ही लोग नए स्वाद के लिए उमड़ पड़े थे। जयपुर शहर की सड़कों पर भारी भीड़ थी। जिस तरह हमारी आबादी बढ़ी है उसके अनुपात में देखें तो सांख्यिकी का कोई जानकार इसे सामान्य भीड़ भी कह सकता है। लेकिन ये एक राजनैतिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जुटी हुई भीड़ थी। इसलिए समर्थन वाले अपने दोनों हाथ खड़े किए हुये थे और वे इसे दो दो लोगों के हाथ गिनवाना चाहते थे।

मैंने एक साहब से पूछा कि क्या आपने इससे पहले कभी इतनी भीड़ देखी है। उनका जवाब था कि अमरूदों का बाग़ में अलबत्ता इतना हुजूम कभी नहीं जुटा। हाँ मगर आरक्षण की माग को लेकर जब जाट एकजुट हुये थे तब ये जगह छोटी पड़ रही थी इसलिए उन्होने विध्याधर नगर के स्टेडियम में सभा की थी। यानी ये जयपुर की नहीं अमरूदों का बाग़ की अब तक की एक बड़ी सभा थी। जलसे में जो भाषण हुये उनमें देश का विकास किस तरह किया जाएगा इस पर बात नहीं हुई। एक ही बात हुई कि राज अक्षम लोगों के हाथ में है। नेतृत्व और नैतिकता का अभाव है। इसी जलसे के बाहर कुछ युवा काले झंडे लिए लिए हुये विरोध प्रदर्शन भी कर रहे थे। उनके विरोध को आयोजकों के कार्यकर्ताओं ने कठोर सबक सिखाया। सरे राह, बीच भीड़ के उनको इस कदर पीटा कि सारा विरोध नंगा हो गया, विरोध के कपड़े फट गए। मैं सोच रहा था कि विरोध करने की ये सज़ा कौन दे रहा है। उनके समर्थक जो नैतिकता का पाठ अभी अभी पढ़ा रहे हैं। सभा में खिल्ली उड़ाने की खूब बातों के बीच पसीना और गर्मी थी। लोकतन्त्र की खुशबू शायद इसी को कहते हैं कि जनता, शासन के दरवाजे पर खड़े होकर बदलाव की चुनौती दे रही है। असीम उत्साह से भरे हुये कार्यकर्ताओं ने इतने नारे लगाए कि जिनके नाम से नारे लग रहे थे वे खुद विचलित हो उठे। ये उन्माद अपूर्व था। केसरिया रंग के परचम और माथे पर वैसी ही पट्टियाँ बांधे हुये। गले में अपने प्रिय नेता के पोस्टर को पहने हुये। मैंने एक युवा से पूछा कि क्या लगता है? उसने कहा- इस बार ढाह लेंगे। मैं अगला सवाल निश्चित रूप से यही पूछता कि आप लोग 'ढाह' लेने के बाद क्या करोगे इसके बारे में कुछ बताते क्यों नहीं। लेकिन मैंने ये सवाल स्थगित ही रखा कि आज ही के दिन यहीं पर विरोध करने वालों की सरे राह किस तरह हजामत हुई थी। 

वापसी के वक़्त मैं जिस सिटी बस में बैठा था वह महल के आस पास पूरी खाली हो गयी। उसमें विध्यालय गणवेश में कुछ छात्राएं सवार थी। मेरे आगे बैठी हुई एक लड़की ने सफ़ेद रंग के पीटी शू पहन रखे थे। उन पर हल्की धूल जमा थी। दायें पैर के जूते पर लिखा था, अंजलि। अँग्रेजी में लिखे हुये उस नाम को पढ़ते ही मेरे मन में अपनी लिखी कहानी का स्मरण हो आया। मैंने सोचा कि क्या मैं इसके जूते की एक तस्वीर ले लूँ। अचानक मैं अपने ही इस खयाल से डर गया। सेलफोन से फोटो क्लिक करने की आवाज़ आते ही लड़की शायद नाराज़ हो जाती और उससे पूछ कर फोटो लेना होता तो मैं क्या कहता उससे? आसाराम जैसे कथित बापुओं ने हमसे ऐसे प्रिय सम्बोधन भी छीन लिए हैं जिन्हें हम अपनी बेटियों के लिए उपयोग में लेते आए हैं। मैं अंजली के नाम को पढ़ता हूँ। सिटी बस में कोई गीत नहीं बजता। हम चार लोग हैं जो बिना एक दूजे के सामने देखे आखिरी स्टॉप पर उतर जाते हैं। शाम को बेटे से फोन पर बात करता हूँ। उसने सायकिल चलना सीखा है। मैं कहता हूँ कैसा लग रहा है। वह कहता है सायकिल ढलान में अपने आप चलती रहती है, मुझे तो खूब मजे आ रहे हैं। उसकी बात सुनते ही मुझे खयाल आया की हर कोई ढलान में आते ही सायकिल की सीट को कब्ज़ाना चाहता है। अगले दिन सब अखबारों में एक खास वर्ग की महिलाओं के बड़े फोटो छपे होते हैं। वहीं कई लोग मिल कर कुछ लोगों को पीटते हुये दिखते हैं। मीडिया मेनेजमेंट है कि मीडिया किसी को बनाने के मुगालते में ये भूल जाता है कि वह कैसा रसायन बना रहा है। पंचतंत्र की नीति कथाएँ याद आ रही है। इसलिए मैं विष्णु शर्मा का आभार व्यक्त करते हुये चुप हो जाता हूँ।

दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.