June 28, 2012

कुछ शामें भूलने लायक नहीं होती

हर शाम ऐसी नहीं होती कि उसे भुलाया जा सके. उस दिन मौसम बेहतर था. वक़्त हुआ होगा कोई सात बजे का और गर्मी के दिन थे. शेख कम्प्यूटर्स के आगे दो कुर्सियों पर लड़कियां बैठी हुई थी. उन कुर्सियों पर अधपके कवि, कथाकार और नाट्यकर्मी मिल जाते थे. मैंने उनके साथ बेहतरीन शामें बितायी थी. हम यकीनन दुनिया की बेहतरी की बातें नहीं करते थे मगर मनुष्य के छोटे-मोटे, सुख- दुःख बातों का हिस्सा जरुर हुआ करते थे. 

उन दो लड़कियों के ठीक सामने की कुर्सी खींच कर बैठते हुए पाया कि आज दोस्तों की गैरहाजिरी है. वे दो लड़कियां छोटी और राज़ भरी बातें बाँट रही होंगी कि बातों के टुकड़े पकड़ कर मुस्कराने लगती और ऐसा लगता कि बात पूरी होने से पहले ही सुनने वाला समझ गया है. दोनों लड़कियों ने सलवार कुरते पहन रखे थे. उनके पांवों में स्पोर्ट्स शू थे. वे कुछ इस बेखयाली में बैठी थी कि उनको देखते हुए लगता था. अब छुई-मुई लड़कियां बीते दिनों की बात है. 

मैं उनसे बात करने लगा. वे एकदम सपाट ज़ुबां वाली थी. ऐसी लड़कियां आपको चौंका देती हैं. वे छोटे और सलीके वाले जवाब दे रही थी. थोड़ी ही देर बाद मालूम हुआ कि वे पुलिस में कांस्टेबल हैं. पडौस वाले रेडियो मेकेनिक के यहाँ अपना टू इन वन ठीक हो जाने का इंतज़ार कर रही थी. मैंने उनसे पूछा कि कितनी कठिन है आपकी नौकरी? जिस लड़की के बाल छोटे कटे हुए थे. उसने कहा "सर, ज़िन्दगी में आसान क्या होता है." मुझे लगा, मैं उससे कहूं कि औरत होने से आदमी होना आसान होता है. मगर मैं चुप रहा. 

एक लड़की अपने सेल फोन पर बात करने लगी. इस बातचीत में उसने किसी बेहूदा आदमी के लिए चार बार गाली दी. कुछ और लोगों की बखिया उधेड़ी. जो गाँव में उसके बारे में कुछ गलत बातें घरवालों को कहते होंगे. फिर उसने आखिर में कहा कि मैं इस बार गाँव आउंगी तब उसे देख लूंगी. उस वार्तालाप को सुनते हुए आप चौंक जाते कि रेगिस्तान के इस हिस्से में लड़कियां ऐसी तो न थी. मैंने स्कूल के दिनों में स्त्री विषयों पर बोलते हुए, अबला तेरी यही कहानी... को जाने कितनी ही बार दोहराया था क्योंकि डिबेट वाले सर ने यही सिखाया था. मगर उस शाम सामने कुर्सी पर न अबला थी ना उसकी वही कहानी थी. 

हम फिर बात करने लगे. गाँव कौनसा है, आपका? दोनों ने अपने गाँव के नाम बताये. इस मरुस्थल में सनावड़ा, हाथी का तला, डुगेरों का तला गाँव के स्कूल की लड़कियां हर साल विभिन्न खेलों में राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया करती है. मैंने पूछा कभी खो खो खेला है. उनमें से एक लड़की मुस्कुराई. सर, नेशनल तक... और मुझे याद आने लगा कि मैं सनावड़ा सीनियर स्कूल की लड़कियों का आकाशवाणी के लिए इंटरव्यू कर रहा हूँ. वे शर्मीली लड़कियां राष्ट्रीय स्तर तक खेलने के बाद पूरी तरह बदल चुकी थी. दसवीं की एक लड़की से पूछा. बड़ी होकर क्या बनोगी? और वह कहती है, अध्यापक. स्कूल का सारा स्टाफ मुस्कुराने लगता है. उस मुस्कान को टेप पर दर्ज नहीं किया जा सकता था मगर वह दिल से कभी मिटाई भी नहीं जा सकती. 

मेरे सामने जो लड़कियाँ बैठी थी, उसके क़दमों के नीचे वैसी ही ज़मीन थी, जैसी मेरे क़दमों के तले थी. उनके पास दो मजबूत पांव थे. उसके पास हौसला था कि बेहतरी से जीवन जीने का सभी को समान रूप से हक़ है. हम फिर बातें करने लगे. वे लड़कियां अपने घरों की देख भाल कर रही थी. उन्होंने अपने छोटे भाइयों के लिए बेहतर शिक्षा के प्लान बना रखे थे. एक चाहती थी कि गाँव के बच्चों को भी सिविल सर्विस परीक्षा के बारे में मालूम होना चाहिए. 

मैंने कहा कि हमारा समाज लड़कियों को पसंद नहीं करता. एक हँसते हुए कहती है. इतना पसंद करते हैं कि पीछे घूमते हैं, लोग. हम थोड़ा मुस्कुराने के बाद फिर उसी बात पर आये कि लड़कियां अक्सर चिंता की तरह आती है. इतने में मेकेनिक ने आवाज़ दी. वे उठ कर चल दी. मैं शाम के नए रंग को देखता रहा. अचानक मेरी बेखयाली को उनमें से एक की आवाज़ ने तोड़ा. सर, हमारे गाँव में लड़कों से ज्यादा लड़कियां नौकरी करती है. वे मुझसे विदा लेने आई थी. एक शिकायत भी कर गयी "आपने फोन इन कार्यक्रम पेश करना क्यों बंद कर दिया? आप वैसे ही बोलते हैं जैसे आज आपने हम से बात की... सर, फिर से फोन इन करना, आपको सुनना अच्छा लगता है." 

वे लड़कियां किसी कॉन्वेंट या मिशनरी स्कूल में पढ़ कर प्रबंधन में स्नातक की डिग्री लिए हुए नहीं थी. उन्होंने दसवीं पास की, पचास नंबर की एक परीक्षा दी, तीन किलोमीटर की दौड़ लगायी और पन्द्रह फीट दूर तक गोला फैंक कर पुलिस में भर्ती हुई थी. उन्होंने मुझमे एक यकीन का बीज रख दिया. गाँव में बेटियों को बोझ नहीं समझा जाता मगर उनके साथ पेश आने वाली तकलीफों के कारण माएं सोचती है कि लड़का हो तो अच्छा. अब वक़्त बदल गया है. ढाणियों में बसे हुए लोग जानने लगे हैं कि बेटियों को पढ़ाया जाये तो वे ज्यादा मजबूत लाठी बनती हैं. कन्या भ्रूण हत्या, एक कुत्सित आपराधिक विचार है, यह हमारे गाँव का तो नहीं हैं... बेहतर है कि इसे "न्यात-बार" ही रखा जाये. सच कुछ शामें भूलने लायक नहीं होती. 
* * *

इस रेगिस्तान के एक गाँव की जाट खांप पंचायत ने हुक्म दे रखा है कि जो भी व्यक्ति बेटी को स्कूल नहीं भेजेगा या स्कूल छुड़वा देगा, दंड का भागी होगा. इसका पालन इतना कड़ाई से हो रहा है कि सौ फीसद लड़कियां दसवीं तक पढ़ी है या पढ़ रही है.

June 27, 2012

शराबी खरगोश...


जादूगर लड़की ने जिस खरगोश को दिल से निकाल कर बैंच पर रख दिया था, उसी खरगोश की कुछ बेवजह की बातें. कुल चार बातें लेकिन दो ही पढ़िए.

भविष्य

पत्री को बांच कर पंडित ने कहा
औरतों की डेट,
कई सालों के एक गेमप्लान का हिस्सा है.

आदमी की डेट
एक रात को क़त्ल करने का इरादा भर.

खरगोश ने कहा
ज़िन्दगी का गेमप्लान, सिम्पल होना चाहिए
और वो पी गया, पंडित के हिस्से की भी शराब.
* * *

बुलबुले

औरतें हर बात में
बेरहमी से घसीट लाती हैं, अपने वर्तमान को
पुरुष रोते रहते हैं, अतीत की लड़कियों का रोना.

खरगोश ने कहा, देखो
आईस क्यूब डालने से फिर उठने लगे हैं, बुलबुले.
* * *

[पेंटिंग सौजन्य : गूगल]
एबस्ट्रेक्ट आर्ट ज़िन्दगी के सबसे करीब है कि इसे समझने को ज़िन्दगी लग जाती है.

June 26, 2012

कुछ इस तरह...


जब मैं नहीं कर रहा होता हूँ बेवजह की बातें तब ख़ुद को ख़ुद से बहुत दूर पाता हूँ. हालाँकि ये बातें कोई असर नहीं जगाती मगर मुझे सुकून हो इसी तरह तो फिर...

नियति

मुझे, इस खेल में होना था
ईश्वर के दूत की पत्नी
तनहा और बिना किसी रोमांच के.
* * *

तुम्हारे बिना 

समय से पहले
सत्य को पा चुके आदमी की
पीठ से उतरती बारीक धूल की तरह.

स्मृतियों से घिरी
तनहा जी रही नायिका के
सूखे आंसू में चमकती बेदिली की तरह.

तुम्हारे बिना, कुछ इस तरह. 
* * *

June 24, 2012

तुझको छू लूं तो फिर ऐ जान ए तमन्ना


मुश्किल, आसानी, प्यार, उदासीनता, खालीपन और ज़िन्दगी से जद्दोज़हद के अट्ठारह साल.
कॉफ़ी, मसाला डोसा और दोपहर की ट्रीट वाले साल जोड़ लें तो कोई बीस साल और क्रश वाले बेहिसाब दिन... एक नज़र में टूट जाता है क्या कुछ मगर एक नज़र बचाए रख सकती है कितना. हेप्पी वाला दिन.

उम्मीद भर से नहीं आता
हौसला बरदाश्त करने का
कि सब कुछ भी दे दें,
तो भी कितना कम है, ज़िन्दगी के लिए.

सीली सी आँखों के पार,
गुज़रे सालों में देखा है बहुत बार
कि ऐसा कुछ नहीं है दुनिया में
जो बांध सके दो लोगों को, मुहब्बत के सिवा.
* * *

June 19, 2012

बारिशें, तुम्हारे लिए


बीते सालों में दरवाज़े के नीचे से सरक कर आये ग्रीटिंग कार्ड और सजावटी अलमारियों में रखे हुए इन्स्पयारल गिफ्ट्स. पुराने न हो सकने वाले जादुई कवर वाली परी कथाओं की किताब जैसी याद.

धुंए से भरी अंगुलियाँ, सिनेमाघरों की जेनेटिक गंध, सफ़ेद चद्दर, क्लोरीन वाला पानी, कॉफ़ी टेबल पर रखे हुए छोटे रंगीन टोवेल्स, फ्लेट की चाबी, मरून वेलेट और टर्मरिक क्रीम जैसी खोयी हुई चीज़ों को खोज लेने की ख्वाहिश.

एक सूना रास्ता है, अँधेरे की चादर ओढ़े हुए. आस पास कोई भारी चीज़ है, डगमगाती, ऊपर गिरने को विवश लेकिन सलेटी रंग गुज़रता रहता है. कुछ होता ही नहीं, ज़िन्दगी चलती रहती है. जैसे कोई चुरा ले जाता है, सारी हेप्निंग्स.

मुसाफ़िर की जेबों में कुछ था ही नहीं मगर उसने सोचा कि क्या रखूं, तुम्हारी खिड़की में. जून के महीने में यहाँ बारिशें भी नहीं होती...
* * *
[Image Courtesy : Daniel Berehulak]

June 17, 2012

तेरे भीगे बदन की खुशबू से


साहेब खम्मा घणी, मेरा ध्यान दरवाज़े की ओर गया. जाने कितनी ही दावतों में मेहदी हसन, ग़ुलाम अली और नुसरत फ़तेह अली खान जैसे साहेबान की ग़ज़लों को बखूबी गाने वाला फ़नकार दरवाज़े पर खड़ा था. सियासत के लोगों के यहाँ महफ़िलें हों या फिर अफसर साहेबान की रंगीन शामें, मुझे इसकी आवाज़ जरुर सुनाई देती थी. लोक गायिकी के रणदे पर घिसा हुआ सुर, ग़ज़ल को भी बड़ी नफ़ासत से गाता.
सौ रुपये चाहिए, बच्चा अस्पताल में भर्ती है.
मैं जब भी अस्पताल जाता हूँ, उसका लड़का नर्सिंग स्टाफ के लिए चाय लाता हुआ मिल जाता है. मुझे देख कर रुक जाता है. कहता है नमस्ते. फिर देर तक मुस्कुराता रहता है. मेरे मन में पहला विचार आता है कि आज इसका लाचार फ़नकार बाप जाने किस आदमी से बच्चे के नाम पर सौ रूपये मांग रहा होगा ताकि एक और दम-ताज़ा दिन को कच्ची शराब में डुबोया जा सके. मैं कभी कभी सोचता हूँ कि पूछूं, मनोहर साहब, फिर जाने कब मिलेगी ज़िन्दगी.
* * *

एक और फ़नकार है. शीशम की लकड़ी से बने खड़ताल को अपनी अँगुलियों में इस तरह घुमाता है जैसे बिजली कड़कने का बिम्ब रच रहा हो. पिछली बार जब रिकार्डिंग पर आया तो हाथ से खड़ताल छूट गई. वह पार्टी लीडर है मगर उसका बेटा सब कुछ अरेंज करता है. बाहर ड्यूटी रूम में कांट्रेक्ट पर साइन हो जाने के बाद कहता है, सर मैं आकर ले जाऊंगा चैक. पिता का हाथ थामता है और आहिस्ता आहिस्ता कच्ची शराब की गंध ड्यूटी रूम से विदा हो जाती है. इस तरह इस फ़नकार के सफ़र का रास्ता थोड़ा और कट जाता है. मैं सोचता हूँ कि नियाज़ साहब, पैंतालीस की उम्र मैं आपकी ज़िन्दगी कैसी हो गई है?
* * *

एक दोपहर धोधे खां मिल गए. उनको कुछ कहना नहीं होता. वे सब कुछ ख़ुद कहते हैं. "किशोर साहब, कलाकार के पास कला होती है, गेंहू की बोरी नहीं होती. इसलिए कलेक्टर साहब से एक पर्ची लिखवा कर लाया हूँ और गेंहू की बोरी लेने जा रहा हूँ. आप भी बुलाया कीजिये, अल्लाह आप पर करम करेगा." दुबला पतला पैंसठ साल का आदमी मेरी आँखों से ओझल होने लगता है. एक कंधे पर अलगोजा की जोड़ी का केस टांगे हुए, दूसरे पर नीले रंग का झोला, जिसमें एशियाड के उद्घाटन समारोह के निमंत्रण पत्र से लेकर असंख्य कला    संस्थाओं और सरकार द्वारा दिए गए सम्मान पत्र. आखिर स्टेशन रोड की ओर जाता हुआ अक्स खो जाता है.
* * *

ऐसे अनेक किस्से हैं. जीते जागते, रूहानी अहसास कराने वाले गायक, भारू राम की दुकान के सामने बैठे चाय पीते हुए मिल जाते हैं. लम्बा कुरता और उस पर हल्की सदरी डाले हुए. रंगीन साफ़ा बांधे, ज़िन्दगी से, सुरों की कुश्ती लड़ते हुए इन जिप्सी गायकों की रूहें एक दिन हार जाती है. ले आओ कुछ जो भुला दे कि अभी ज़िन्दा हैं. एक ख़बर पढ़ी थी कि आखिरी समय में उपेक्षा के साथ जीते हुए चले गए शहनाई के उस्ताद, बिस्मिल्लाह खां साहब. मेहदी साहब के परिवार ने भी बहुत गुहार लगायी कि इमदाद दीजिये. यूं सदा के लिए इस दुनिया में रहने को कौन आता है मगर कलाकारों की रुखसती का ये ढब मुझे रुला देता है.
* * *

अर्जुन सिंह रतनू, रेडियो में प्रजेंटर है. एक रात उन्होंने मेसेज किया. आपके मेल बॉक्स में एक गीत छोड़ा है, सुनियेगा जरुर. लीजिये आप भी सुनिए.
* * *

June 16, 2012

काश, इतना सा हो जाये



बिना बारिशों वाले रेगिस्तान में पेड़ों की पत्तियां काँटों में तब्दील हो जाती है और अपनी ही शाखाओं पर खरोंचें लगाती रहती है. ऐसा ही हाल शैतान का भी हो गया. उसने ख़ुद से पूछा कि तुम को राहत किस करवट आएगी. फ़ौरी तौर पर जो उपाय सूझे, उनको एक कागज पर लिख कर, दीवार पर टांग दिया. वक़्त गुज़रता रहा, अक्षर धुंधले होते गये, एक दो मौसमों ने आते जाते उन पर निगाह डाली लेकिन बदला कुछ नहीं फिर भी शैतान ने सुन रखा है कि दर्द भरे दिन आखिर विदा हो जाते हैं और मुहब्बत का कोई अंज़ाम नहीं होता.

काश कि उसने उठा ली होती
अपनी नज़रें, मेरी ज़िन्दगी की किताब से.

या फिर हुआ होता
एक अच्छा इरेजर,
मिटा लेते कोई चेहरा याद के हिसाब से.

होता कोई लोकल अनेस्थिसिया ईजाद
जो दर्द में देता आराम
जब मुसलसल हो रही हों,
उसे भुलाने की नाकाम, कोशिशें हज़ार.

काश सूरज कर लेता कुछ दिनों को वाइंड अप
और घर लौटते हुए हम, भूल जाते, उसका नाम.

या पड़े होते बियाबान में, तनहा पत्थर की तरह
या फिर हो जाते,
इतने मूढ़ कि समझ न सकते, बोले - सुने बिना.

कोई लुहार भी हुआ होता
जो जानता, काटना बेड़ियाँ अहसास की.

काश लिख सकते कि सब फ़ानी है,
काश सब रास्ते बनाये जा सकें फिर से

काश, वो हो जाये किसी खोयी हुई हवा का झोंका,
मैं अटक जाऊं कंटीली बाड़ में सूखे पत्ते की तरह.

काश, इतना सा हो जाये क्योंकि बेठिकाना, बेवजह आंसू ये रोना रात भर, है ज़िन्दगी तो इस ज़िन्दगी की मुझे गरज नहीं.
* * *

June 11, 2012

मदहोशी में, होश है कम कम


ये ट्राईटन मॉल के हॉयपर सिटी स्टोर के अधबीच का भाग था. मैं वस्तुओं की प्रदर्शनी में अपने लालच और जरुरत का तौल भाव कर रहा था. रौशनी के इस बाज़ार में चीज़ों के आवरण बेहद चुस्त और सम्मोहक थे. अचानक मेरे पीछे से एक नौजवान आवाज़ आई. " मैं, ओलिव आयल के बिना खाना नहीं खा सकता हूँ." मैंने मुड़ कर उस आदमी को देखा. गठीला बदन चुस्त जींस और गोल गले का टी शर्ट पहने हुए था. उसने ये बात अपने साथ चल रही, एक महिला से कही थी. 

नौजवान की कही हुई इस बात पर अनेक तरह की प्रतिक्रियाएं की जा सकती थी. सबसे बेहतर प्रतिक्रिया होती कि इग्नोर कर दिया जाता लेकिन मेरे मन में पहला ख़याल आया कि इस आदमी को शाम का खाना भी मिलेगा या नहीं. अपने छोटे भाई की तरफ देखते हुए. मैंने कहा. "भाई शाम का खाना तय है?" भाई ने कहा कि हम अच्छे खाने की उम्मीद कर सकते हैं. मुझे ख़ुशी हुई कि अभी हम भ्रम में नहीं जी रहे हैं. 

ओलिव आयल के बिना खाना न खा सकने वाले उस आदमी को अभी मालूम नहीं है कि कई बार खाना सामने रखा होता है मगर ज़िन्दगी उसे खाने की इजाज़त नहीं देती. 
* * *

रामनिवास बाग़, जयपुर शहर के बीच स्थित है. अलबर्ट हॉल, जिसे सेंट्रल म्यूजियम कहा जाता है और चिड़ियाघर को मिलाकर कोई पचहत्तर एकड़ में फैली यह ज़मीन सुकून की जगह है. शहर पर ट्रेफिक का दबाव इतना है कि इस बाग़ के बीच से यातायात निर्बाध चलता रहता है. दाना चुगते हुए कबूतरों के झुण्ड को उड़ा कर उनके बीच फोटो खिंचवाने की तवील परम्परा को आगे बढ़ा रहे लोगों को देखता हूँ. क्या सब लोग जानते हैं कि एक दिन कबूतर की तरह उड़ जाना है और कुछ सालों के लिए हमारी तस्वीर यादगार बन कर बची रहेगी. 

मगर ऐसा नहीं है, ये सिर्फ़ रोज़मर्रा की उदास छतरी को भेद कर खुले आसमान में उड़ जाने की चाह है. 
* * *

बाग़ से बाहर जाते हुए रास्ते के दायीं तरफ वाली फुटपाथ के पास ट्राई सायकिल पर एक विकलांग गुटखा और तम्बाकू मिश्रित उत्पाद बेच रहा था. उसकी मुड़ी हुई लकवाग्रस्त टांगों से बेख़बर और शातिराना मुस्कान से रूबरू दो आदमी अचरज भरे चेहरे से जुगलबंदी कर रहे थे. अचानक मेरी नज़र एक और आदमी पर पड़ी जिसने अपनी गोदी के बीच में एक पोलीथिन रखी थी. उसमें कुछ खाने की चीज़ें थी. उसने मुट्ठी भर कर उनको अपने मुंह में ऐसे रखा कि कोई चोरी का काम कर रहा हो. 

हम सब ईमानदार हैं. दूसरों की चोरी पकड़ लेना चाहते हैं. मैंने भी पल भर किसी के इंतजार का ड्रामा किया ताकि देख सकूँ कि वह क्या खा रहा है. उस आदमी के पास खाने को सत्तू जैसा कुछ था. वह इस भोजन को सार्वजनिक स्थान पर पूर्ण निजता के साथ कर रहा था. उसके पास विलासिता का अहंकार नहीं था. उसके पास कमतर खाने की शर्म या फिर ज़िन्दगी की लाचारी को छुपा लेने का इरादा था. 

दुआ कि जीवन भर सुख की रोटी नसीब होती रहे. खाने को भले ही कमतर चीज़ें नसीब हों मगर आदमी के पास भ्रम की दुनिया नहीं होनी चाहिए. याद आया कि किसी ट्रक पर लिखा था "ख़बर नहीं है पल की, बातें करता है कल की." हालाँकि ख़बर में ख के नीचे नुक्ता नहीं था. यूं भी हर एक ज़िन्दगी में कुछ न कुछ अधूरा होता ही है. 
* * *
[Image : Kabir, Tanya and Mahendra at Ramnivas garden, Jaipur.]

June 6, 2012

कठपुतली, मैं काठ की


कुछ दिन सफ़र नए शहर को, कुछ शामें परिंदों से भरी, कुछ फेरे सुकून के... ऐसा ही हो ! दो बेवजह की बातें

कठपुतली

कुछ क़दम सफ़र
डूबता, मन उदास
कौन देस, कौन मुसाफ़िर.

तनहा दरख़्त, सूनी शाख
अबूझ, असीम, अतल प्यास.

वीराना ये तेरी याद का
कठपुतली, मैं काठ की.
* * *

सलामती

भीगी हुई आँखें
सिमटे हुए से पांव
रंग सब बिखरे हुए.

ये ख़यालों की दुनिया नामुराद
और लिपटी धुंए से, अंगुलियाँ.

अचानक बैठी होती है, सामने
वीरान सी एक उदासी शाम की.

बेनूर, ये ज़िन्दगी का आईना !
* * *

[तस्वीर रंगीन और उम्मीदों से भरी हुई कि ज़िन्दगी कैसी भी हो, खूबसूरत होती है. ]

June 2, 2012

अगर आप कभी देख सकें


आह ! बीस दिन पुरानी लू. दर्द से भरा बदन और हरारत. कुछ बातें, बेवजह की बातें...

नाकामी से दुखी होकर
ज़िन्दगी देखती है, नयी ज़मीन
और सोचती है कोई नया रास्ता
जहाँ से आगे शुरू किया जा सके, सफ़र.

नाकामी को नहीं दिया जा सकता तलाक
कि नाकामी से हुआ नहीं था कभी निक़ाह .
* * *

लकड़ी के पलंग पड़े रहते हैं वहीं
जहाँ उनको रख दिया जाता है
जैसे ठहरे हुए इंतजार में, कोई महबूब.

बैंक के लोकर में रखी होती हैं कुछ चीज़ें
जैसे वीरान जगहों पर
किसी के साथ बितायी हुई शामों की याद.

अगर आप कभी देख सकें मुड़ कर, ख़ुद को
तो यही तस्वीर पाएंगे
कि आपने बीते लम्हों को कर लिया हैं पलंग
और समाये हुए हैं, उसकी गोद में.
देख रहे हैं, उन्हीं लम्हों का ख़्वाब
जो रखे हैं याद के खाते में सावधि जमा की तरह.
* * *

[Painting Image courtesy : Lynne Taetzsch ]

दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.