December 26, 2017

ऊधो, मन माने की बात

कच्ची धूप आ गयी है। चारपाई पर बैठ कर आभा कक्षा छठी की हिंदी की उत्तर पुस्तिकाएं जाँचने लगी। पहला वस्तुनिष्ठ प्रश्न था। सूर के पद किस भाषा में हैं। मेरी ओर देखते हुए कहती हैं- "सूर की भाषा"

मुझे लगता है बिना पूछे ही प्रश्न कर लिया है। हिंदी साहित्य का कक्षा से अधिकांश अनुपस्थित रहा विद्यार्थी तुरन्त उत्तर देता है- "ब्रज भाषा" मेरा उत्तर सुनकर सन्तुष्ट हो जाती हैं। उत्तर पुस्तिकाएं जाँचने लगती हैं। इस कार्य के बीच आँख उठाकर मुझे देखती हैं। जैसे कह रही हों कि आपकी यही दुनिया है मोबाइल और सोशल साइट्स।

ये समझकर मैं आरम्भ हो जाता हूँ।

मधुप करत घर कोरि काठ में, बंधत कमल के पात॥
ज्यों पतंग हित जानि आपुनो दीपक सो लपटात।
सूरदास, जाकौ जासों हित, सोई ताहि सुहात॥

पद को उदघोषक की तरह स्पष्ट शब्द स्वर में पढ़ता हूँ। वे मेरी ओर देखती हैं। मैं व्याख्या करने लगता हूँ। भ्रमर सूखी लकड़ी में घर बनाना है किंतु वह कमल की पंखुड़ियों में क़ैद हो जाता है। जैसे पतंगा अपना हित समझकर स्वयं दीपक की लौ से लिपट जाता है। सूर जिसका जिसमें हित अथवा मन होता है उसे वही सुहाता है।

अभी तक सब कुशल मंगल है।

[Picture credit : Parul Pukhraj]

December 24, 2017

भीगे सलवटों भरे बिस्तर

किसी को छू लेने की, चूम लेने की, बाँहों में भर लेने की या साथ रह लेने की इच्छा होने पर लोग झूठ बोलने लगते हैं कि मुझे तुमसे प्रेम हो गया है।

इन झूठ से जितना जल्दी हो सके बाहर आना ताकि अपना समय और मन बरबाद होने से बचा सको। ताकि एक दिन झूठ का कालीन फट जाने पर पश्चाताप से न भर जाओ। ताकि कोई तुम्हारा नाम लेकर रोये नहीं कि तुमने प्यार-प्यार कहकर एक दिन छोड़ दिया।

मैंने ये कब सीखा. 

चाहना और प्रेम की धूमिल पहचान के बीच बनते-बिखरते सम्बन्धों के बीच निराशा, हताशा और अवसाद में कुछ साफ़ समझा न जा सकता था. अगर केवल चाहना भर थी. अगर उसे केवल देह के संसर्ग से पूर्ण हो जाना था तो हम उसे कुछ और कहकर क्यों पुकारते गये. अगर प्रेम था तो कहाँ गया? 

देह के आमंत्रणों और उपभोग के बाद मन उचट जाता है. बस यही सब करना है? तो इसके लिए दुनिया भर की परेशानी नहीं उठानी. ये लम्हा आएगा और बीत जाएगा. जितनी बार आएगा उतना अपना असर खोता जायेगा. एक रोज़ सम्बन्ध और उससे बड़ी बात कि प्रिय को सदा के लिए खो देना. 

तो क्या ये सब नहीं करेंगे?

मैं समझ ही नहीं पाता मगर खुद से कहता हूँ कि जो मन आये करना किन्तु इंतज़ार करना. अपने आप होने देना. वह सबसे अच्छा होता है. हालाँकि वह भी होकर मिट जायेगा. एक पतली रोशनी की लकीर जैसी स्मृति बची रहेगी. उसके साथ चलते हुए तुम उन बीते दिनों तक पहुँच पाओगे जहाँ कभी थे. 

उत्तेजना, मादकता, नीम थकान और पसीने से भीगे सलवटों भरे बिस्तर. 

ज़िन्दगी को साबुत रखकर क्या करोगे. रख भी कैसे पाओगे. वह प्रतिपल नष्ट हुई जाती है. इसे जी लो. कभी याद की गली में फेरा दे सको. कभी मुस्कुरा सको, कभी पा सको वही गंध. प्रेम वस्तुतः स्वप्न है या फिर स्मृति.

[Picture credit : Parul Pukhraj]

December 19, 2017

चाहना की प्रतिध्वनि

उसके होठों के छोर पर दो गोल बिंदियाँ रखीं थीं. उनको देखते हुए मैं एक अँधेरे में फिसलने लगा. 

अचानक किसी ने मेरा हाथ थाम लिया. मैं ही अपने सामने मेरा हाथ पकड़ कर खड़ा था और मुझे ही कह रहा था कि कि ऐसे चेहरे जिनके होठों की मुस्कान दो सुंदर गोल बिन्दुओं में सिमटी हों, वे अपनी चाहना उम्र भर किसी को नहीं कहते. 

मैं ख़ुद को कहते देखकर हैरत से भर जाता हूँ. मैं कहने वाले चेहरे की मुस्कान और होठों के सिरे देख लेना चाहता हूँ कि क्या उन होठों के किनारे दो गोल बिंदियाँ बनती हैं? 

लेकिन मैं अपना हाथ छोड़ देता हूँ. 

अँधेरे के भीतर फिसलने लगा. अपने हाथों की अँगुलियाँ खोल लीं. मुझे लगा कि यहीं-कहीं, भीतर गहरे दुःख और स्याह इच्छाएं ढक कर रखीं होंगी. कुछ पल अनवरत आँखें मूँदें स्याह असीमित अँधेरे के संसार में फिसलने के बाद हल्का उजास चारों ओर दिखाई देता है. दुःख और इच्छाओं को छूने की चाहना विस्मृत होने लगती हैं. 

एक लिहाफ के भीतर नीम उजाला. स्याह कुरते पर कोई सलवट नहीं. वह अपनी चमक और अनछुई छवि के साथ एक करवट लेता है. मौन में कोई कहता है कि इस पेट के भीतर असंख्य जटिलताएं हैं. वहां कोई दर्द रखा है क्या? ये सवाल मैं ख़ुद से करता हूँ. शायद मैं पूछता नहीं हूँ, मैं सोचता हूँ कि इस पेट पर अपनी हथेली रख दूँ. क्या मैं शायद खुद को जादूगर समझता हूँ. कोई शिफा है मेरे हाथ में? 

नहीं! मेरे हाथ में प्रेम की छुअन है. प्रेम दुःख के लिए सबसे बड़ा मरहम है.

दो हाथ सामने थे. ये अचरज था. ऐसा अचरज कि हम अचानक कली का चटकना देख लें. नाज़ुक अनछुई पत्तियों की हलकी छवि देखने लगें. उन दो हाथों की अँगुलियों को अपनी अँगुलियों में भर लिया. सहसा एक लहर सी आई और रेत पर बनी उत्तेजना को मिटा गयी. 

मैं खुली आँख से होठों के किनारे की बिंदियों को याद करे लगा.

दोपहर अनमनी थी. कड़ी धूप, खोया-खोया मन और नष्ट हो चुके जीवन राग का मद्धम प्रवाह.

उल्फत ने कहा- "आपके साथ सब कुछ बेहतर है लेकिन आप भीतर से ठीक नहीं है. कहीं उलझे और परेशां से हैं" मैं हामी भरता हूँ. "हाँ ऐसा ही है. सच! मुझसा जीवन एक निश्चिंतता और आनंद का जीवन कहलाता है. लेकिन... यहाँ बहुत सी बेचैनी रखी हैं. ये कारखाना लगातार चलता रहता है. कोई नयी इच्छा, नई आवाज़ खोज लाता है" 

रात दबे पाँव आती है. अचानक मन बेतहाशा भागता है. उसी मुस्कान को देखने के लिए. उन्हीं दो गोल घेरों की छाया में. उन तक भागते हुए लगता है कि समय की कोई सीमा है. वह समाप्त हो जाये उससे पहले पहुँचो. भय, थकान और प्रतीक्षा. 

मैं गिर जाता हूँ. दो बिंदु चमक रहे हैं. मेरे भीतर से कोई उनको पुकारना चाहता है मगर नहीं पुकारता. मैं आहिस्ता से आँखें बंद कर लेता हूँ. वहाँ आंसू नहीं है मगर कुछ है भारी सा. किसी की चाहना जितना भारी. 
* * * 

खुली और बंद आँखों में एक ख़्वाब सिलसिले से बनता है. 

हम अक्सर ज़मीन के नीचे एक सुरंग खोदने लगते हैं. अजाने, बेमकसद उस ओर बढ़ते रहते हैं. उसके बहुत करीब जहाँ से हमारी चाहना की प्रतिध्वनि सुनाई पड़े, वहाँ तक पहुँचकर चौंक जाते हैं. 

मुझे ज़िन्दगी ने सिखाया है कि कोई सबक आख़िरी नहीं है. इसलिए मैं नए भंवर में कूद जाता हूँ. 
* * *
[Picture courtesy : Hannah Aradia]

December 18, 2017

जो तुम नहीं हो

एक ठिठक निगाह में उतरती है. एक पेड़ से थोड़ा आगे बायीं तरफ़ घर दीखता है. घर से इक पुराना सम्बन्ध है. जैसे कुछ लोग होते हैं. जिनसे हम कभी नहीं मिले होते लेकिन उनको अपने सामने पाकर बहुत पीछे तक सोचने लगते हैं. याद का हर आला, दराज़ खोजने लगते हैं कि इसे कहाँ देखा है. ये हमारा पुराना कुछ है. वैसे ही उस घर का दिखना हुआ. 

उस घर के अन्दर एक कॉफ़ी रंग के दरवाज़े के भीतर झांकते ही छोटा शयनकक्ष दिखाई दिया. बायीं ओर दीवार में ज़मीन को छूती हुई रैक के आगे कांच का पारदर्शी ढक्कन लगा था. बैड खाली था. वहां कोई न था कि ध्यान फिर से रैक की ओर गया. वहाँ पीले रंग की माइका का बना फर्श था. उस पर सफ़ेद चूहे थे. कोई दस बारह चूहे. उन चूहों के पीछे कोई छाया थी या एक गहरे भूरे रंग का चूहा था. 

लड़की ने कुछ कहा. मैंने उसे देखा था मगर वह दिखी नहीं थी. जैसे कई बार हम कोई आवाज़ सुनते हुए महसूस करते हैं कि कोई पास खड़ा है और उसी की आवाज़ है. थोड़ी देर बाद पाते हैं कि वहाँ कोई नहीं है. हम स्वयं को यकीन दिलाते रहते हैं कि यहाँ कोई था. उसी ने कहा है. इसी तरह वह लड़की दिखी नहीं. 

मैं उसे जानता था. उससे बहुत दिनों का परिचय था. हम परिचय के मार्ग में इतनी दूर आ गए थे कि एक ही बिस्तर पर सोये हुए बातें करने का निषेध नष्ट हो चुका था. देह कोई लेकर कोई विशेष आग्रह न बचा था. हमने कभी एक दूजे को छुआ नहीं था लेकिन मन के भीतर छू लेना कब का हो चुका था. वह इतना पुराना हो चुका था कि उसे लेकर कोई लज्जा या पश्चाताप न था. 

उस लड़की की बात सुनकर, मैं जाने क्यों कुछ दूर आगे के एक घर में जाता हूँ. वहाँ मुझे लड़का मिलता है. ये वही लड़का है जिसका लड़की से कोई सम्बन्ध जान पड़ता है. ऐसा सम्बन्ध कि जैसे उसका लड़की पर कोई अधिकार है. वो जो टीनएज का अधिकार हुआ करता है. 

मुझे लगता है कि कुछ गड़बड़ है. मैं कहीं गलत जगह चला आया हूँ. अचानक देखता हूँ कि वे चूहे भी वहाँ हैं. इस बार मुझे सफ़ेद चूहों के बीच गहरे भूरे रंग का चूहा साफ़ दिख जाता है. सफ़ेद चूहे अपनी लय और सोच में खोये होते हैं जबकि वह अकेला चूहा अपना सर उठकर मेरी ओर देखता है. 

मैं कुछ अपराध कर रहा हूँ. 

मुझे अपराध गंध आती है. उन घरों से बाहर गली में चलते हुए कोई साया हिलता है तो चौंकता हूँ. कोई फर्री हिलती है, कोई बोर्ड रोशनी में चमकता है, कहीं कोई दरवाज़ा जरा खुलता है तो हर आहट, हर विचलन मेरे लिए हुआ जान पड़ता है. 

मैं इस लड़की के जीवन के आस-पास भटक रहा हूँ. जिस तरह उसके घर से चार घर आगे गया था, उसी तरह कुछ घर पीछे के एक घर में चला आता हूँ. पानी के हौद में कुछ डूब गया है. मैं जानता हूँ कि वह कहाँ डूबा है और कौन है. 

लोग सवालियां निगाहें लिए जमा हैं. वे असल में जानते ही नहीं कि क्या डूब गया है मगर उनको इस बात की परवाह है. मैं उस भीड़ से बाहर जाने का सोच ही नहीं सकता. इसलिए कि मैं वो व्यक्ति हूँ जिसे मालूम है. मेरा चला जाना ठीक नहीं है. 

लड़की की पीठ पर हाथ रखे उसे ख़ुद की ओर थामे हुए लम्हे की याद आती है. फिर लगता है कि वह चाहना, रुमान और उत्तेजना उसी पल थी. अब उस लड़की के पास उस अहसास की याद भी ठीक से बाकी नहीं है. 

मैं थक जाता हूँ. 

भय मेरी याद के टुकड़े करता जाता है. मैं इन बेढब और बेतरतीब टुकड़ों को जोड़ना चाहता हूँ किन्तु बिना ज़ोर डाले जिस सलीके में याद आते हैं रख देता हूँ. अपना हाथ मुंह के आगे रखकर हवा को बाहर फेंकता हूँ. सूँघ लेना चाहता हूँ कि मेरी साँस में व्हिस्की की कितनी बासी गंध है. मुझे गंध नहीं आती. पार्क एवेन्यू के किसी परफ्यूम का हल्का झोंका याद आता है. 

मैं हिम्मत करके अपनी कलाई को सूँघता हूँ. जैसे हम किसी खोये हुए प्रिय को याद करते हैं. 

मैं रजाई से बाहर आता हूँ. सीढियाँ चढ़कर छत पर खुली हवा में खड़ा होकर देखता हूँ. सामने पहाड़ी के पार काले बादलों के छोटे फाहे सजे हुए हैं. दायीं तरफ बरफ के रंग के बादलों की लम्बी लकीर है. हवा ताज़ा है. 

मैं कहता हूँ केसी ! तुम यकीन मानो इस एक ही दुनिया में असंख्य दुनियाएं हैं. तुम लगातार संक्रमण में हो. तुम अनेक संसारों के अनगिनत अनुभवों से भरते हो. लेकिन ख़ुद को एक भुलावे में रखते हो कि ये सपना है, जागती आँखों का सोच में खो जाना है, ये किसी का सताना या बिछड़ जाना भर है. 

अच्छा ये भी याद करना कि तुम कितने लोगों के साथ जी लिए हो? तब तुमको यकीन होगा कि जीवन असल में एक जन्म से मृत्यु तक का स्थूल देखा जाने वाला सफ़र भर नहीं है. एक ही जीवन में हम कई बार कितने ही लोगों के साथ जीते हैं और मर जाते हैं. कितने ही सम्बन्ध बनाते और मिटा देते हैं. वे सब अलग-अलग जीवन हैं. 

असल में तुम जिस रोज़ उसकी छातियों के बीच सर रखे हुए अचानक जाग गए और वह सम्बन्ध नहीं रहा, उस दिन तुम मर गए थे. वो जो थी, वह भी उसी पल नष्ट हो गयी. तुम दोनों आगे नए जीवन में चले गये. 

मैं कोई और था जो तुम्हारी बाँहों के पसीने में अपनी नाक घुसाए था. तुम वो लड़की नहीं हो जो मेरे बालों को दोनों हाथों की अँगुलियों में भींचकर अपने करीब किये थी. वे लोग चले गए. वे कोई और थे. तुम और मैं चाहें तो भी उनको लौटा नहीं सकते.

एक बार मैंने पिता को याद किया तो पाया कि अनेक स्मृतियों में पिता के आस पास बैठा हुआ मैं बहुत अलग-अलग था और पिता भी अलग थे. उनको अगली बार याद करूँगा तब वे कोई और होंगे मैं कोई और. 

दुर्घटनाओं को न्योता दो, सम्भव है कोई क्षणिक मुक्ति कहीं प्रतीक्षा करती हो. 
* * *

[Painting courtesy;  Rahul Malpani]

December 14, 2017

क्या सचमुच !

ख़यालों के टूटते ही, किसी काम के ख़त्म होते ही, मैं जहाँ होता हूँ वहाँ से बाहर जाना चाहता हूँ. अभी वर्डपैड को खोलते ही लगा कि एक बार बाहर चला जाऊं. मैंने चारपाई के नीचे देखा. वहाँ मेरे जूते नहीं थे. मैं अपने जूते थोड़ी देर पहले फर्स्ट फ्लोर पर रख आया था. वहाँ से पतले गुलाबी चप्पल पहन कर चला आया. चारपाई के पास वे ही रखे हैं. क्या मैं इनको पहन कर बाहर नहीं जा सकता? देखता हूँ कि एक चप्पल में टूटन है. वह अंगूठे के नीचे की जगह से चटक गया है. चप्पल को देखने से बाहर आते ही मुझे लगता है कि कहीं बाहर चले जाना चाहिए. 

मेरे भीतर से कोई मुझे उकसाता है. मेरे ही भीतर से कोई मुझे लिए बैठा रहता है. 

कहाँ जाऊँगा? 

पलंग से चार हाथ की दूरी पर रखे फ़ोन से बीप की आवाज़ आई. मैंने समझा कि संदेशा आया है. उसमें लिखा है 'हाई'. पता नहीं लिखा क्या है पर मैंने यही सोचा. मैं फ़ोन तक नहीं जाना चाहता. मेरी हिम्मत नहीं है. अब से थोड़ी देर बाद फिर बीप की आवाज़ आएगी. शायद लिखा होगा 'बिजी?" मैं क्या सचमुच बिजी हूँ? शायद बहुत ज़्यादा. मेरा मन गुंजलक है. मेरे पास जवाब खत्म हो गए हैं. मैं केवल इस जगह से या जहाँ भी रहूँ वहाँ से कही बाहर चले जाना चाहता हूँ. 

मैं फ़ोन को देखता हूँ. एक छोटी संकेतक बत्ती चमक रही है. मैं उसे देखता रहता हूँ. उसके फिर से चमकने का इंतज़ार करने लगता हूँ. बत्ती काफी देर से चमकती है. उसके चमकते ही लगता है कि इंतज़ार पूरा हुआ. फिर से याद आता है कि मैं यहाँ से बाहर जाना चाहता हूँ. 

मैं अपनी गरदन को एक झटके से बाईं तरफ करता हूँ. एक साथ चार-पाँच कट-कट की आवाज़ आती है. मेरी गरदन अकड़ गयी थी. मैं क्या देख रहा था? मैं दफ़्तर के स्टूडियो में इन दिनों बार-बार बुलाया गया. वहां सीलन नहीं थी. गर्माहट थी. मशीनों की गर्माहट. बाहर की ठंडी हवा से ये जगह अच्छी थी. कुछ लोग काम कर रहे थे. मुझे केवल इतना भर बताना था कि काम बन गया या नहीं? 

वे लोग काम कर रहे थे. मैं उनको देखते हुए सोच रहा था कि क्या सचमुच कोई काम कभी बन जाता है? जैसे अगर मैं किसी से मिलना चाहता हूँ. मैं उससे मिल लूँगा. ये एक काम है. ये एक काम मिल लेने पर बन गया है. क्या सचमुच ऐसा कह सकूँगा? नहीं. पक्का नहीं. वह जो मिल लेना होगा, वह और अधिक अधूरा कर देगा. वह काम और अधिक बाकी हो जायेगा. इसलिए काम बन जाना एक भ्रम है. वह असल में काम का और ख़राब हो जाना है. 

मैं ये सब और नहीं लिखना चाहता. मैं यहाँ से बाहर जाना चाहता हूँ. मैं कहता हूँ कि मेरा फ़ोन ऑटो आंसर मोड़ पर आ जाये. वह सबको जवाब देने लगे कि सर्दी इतनी ज़्यादा है और लिहाफों की छुअन के सम्मोहन खो गए हैं.  

हम क्यों किसी के प्यार में नहीं पड़ जाते. इतने सारे तो लोग हैं? 

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.