March 31, 2018

बतुलियों का देस



एक ठहरी हुई सांस 
बेचैन निग़ाह में उदासी घोलती है.

बारिश नहीं थी मगर थी कि एक आवाज़ ने बुनी बारिश. एक सूखी रात का ये पहला पहर था. बंद आँखों में कहीं दूर हिलते हुए होठ खिले थे कि कोई संगीतकार, साजिंदों को अपनी छड़ी से प्रवाहित कर रहा था. लड़का उसे कहना चाहता था कि सांस लेने में कठिनाई है मगर वह चुप रहा. उसने चाहा कि लड़की बोलती रहे. लड़की की आवाज़ दवा थी. जब वह बोलते हुए ठहर जाती तो ठहर के बाद प्रतिध्वनि गूंजती.

चुप्पी में लगता कि बारिश रुक गयी है? लड़का पूछता- "तुम हो?" दूजी तरफ से जवाब आता. तीन बार दिया गया जवाब. जैसे हाँ हाँ हाँ या ना ना ना.

वह जवाब लड़के को बाहर की ओर खींच ले जाता. बाहर बारिश नहीं हो रही होती. लड़का हैरत से भरकर फिर से आवाज़ को खोजने लगता. लड़की की आवाज़ में बारिशें बुनने का हुनर था.

लड़की ने कहा- "तुम चुप क्यों रहते हो?"

लड़के ने अपने आप को ये कहने से रोक लिया कि तुम्हारी आवाज़ को सुनते हुए बारिश सुनाई पड़ती है. मन एक सूखा रेगिस्तान है इसलिए अनवरत भीगते जाना चाहता है.

लड़की की आवाज़ फिर से आई- "क्या हम पहले कहीं मिले थे? अगर नहीं तो फिर ऐसा क्यों लगता है कि तुम बिन कुछ नहीं."

लड़के ने कहा- "बचपन में पढ़ी प्रेम कहानियों से मुझे ऊब होती थी. ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई दो, एक होकर अंतिम विदा का गीत गाकर चुप हो जाते हैं. बचपन में रूह का नाम न सुना था. तब रूहें सिर्फ प्रेतों के किस्से थीं. शाम के धुंधलके में बाहर जाना निषेध था. ये प्रेतों का समय था. ये भय और जिज्ञासा के मिलन का समय था."

इतना कहकर चुप हुआ लड़का सोचने लगा कि काश, बचपन में ऐसी रूह का कोई किस्सा सुना होता जो प्रेत न होती. उस रूह के मिलने का समय मालूम होता. यकीनन मैं उस समय को अपने भटकने के हिस्से में जमा रखता.

लड़की ने पूछा- "क्या तुम चाहते हो कि कहीं रूह मिले.?"

लड़के ने कहा- "तो क्या तुम रूह हो?"

इस सवाल पर लड़की ने सवाल किया- "क्यों?"

लड़के ने कहा- " बदन तो कहीं पर भी मिल जाता है. किसी न किसी तरह. किसी लम्बे छोटे इंतज़ार के बाद. हम उसका क्या करें कि बदन उदास नज़र के रंग नहीं बदल पाता. अनमने मौसम को विदा नहीं कह सकता. उसे केवल रूह ही बुहार सकती है."

"अच्छा क्या तुमने कभी सोचा है कि रूह अगर होती होगी तो कैसी होती होगी?" लडकी ने पूछा.

लड़के ने कहा- "तुम्हें छूकर, तुम्हें छूने के अहसास से गुज़रकर, तुम्हें बेहिसाब याद करके लगता है कि रेत के बीच पड़े हुए सीपियों के खोल में जो हवा रहती है न उस हवा का गीत रूह जैसा होता होगा. एक ऐसा सुर जो मधुर हो किन्तु जिसे देखा न जा सके. जैसे तुम्हारी साँस."

"अच्छा." ये कहकर लड़की कुछ देर चुप हुई फिर उसने कहा- "तुम्हारी रूह की कल्पना सुन्दर है. मैं कभी सीपी का खोल हुई तो ज़रूर तुम्हारा इंतज़ार करूंगी."

लड़की सीपी का खोल नहीं थी. उसकी आवाज़ बारिश थी मगर बारिश नहीं थी. रेगिस्तान तप रहा था. लडके को लगता कि एक कोड़ा बरसता है. कि कोई बुलाता है, मुझे जाना है. अब न होगा. विदा, विदा, विदा. इस कोड़े की तड़प में याद की बही से रह-रहकर गर्द उड़ती रहती.

लड़का चलते हुए हांफता, अपना पसीना पोंछता आगे बढ़ता जाता. दूर तक रेत ही रेत पसरी थी. 
* * *

सिलसिले में थोड़ी सी कहानी कहता हूँ और फिर चुप हो जाता हूँ. जैसी बात लिखूं मन पर वैसा रंग चढने लगता है. उदासी लिखते ही लगता है कि मैं उनके साथ अच्छा नहीं कर रहा. उनकी बातें लिखता हूँ तो लगता है कि बस वे दोनों मेरे पास आकर बैठ जाएँ और मैं उनको देखूं.

जब कभी लड़के की पीठ पर कोड़ा बरसता है मैं सिहरने लगता हूँ. मुझे लगता है कि वह लड़का मैं ही हूँ. लड़की जब उदासी से कहती है कि मैं तुम्हारा इंतज़ार करुँगी तब लगता है कि मैं ही किसी इंतज़ार में बैठ गया हूँ. 
* * *

March 25, 2018

फेसबुक बनाम बिबलियोफोबिया

फेसबुक आपकी कई बीमारियों को सार्वजनिक कर रही है।

आपके सामने एक किताब रखी है। आप उसके पांच सौ पन्ने देखकर सोचते हैं इतनी बड़ी किताब कौन पढ़ेगा। आपके सामने एक बीस पन्नों की कहानी है और आप उसे पढ़ने की अनिच्छा पाते हैं। आपके सामने अख़बार में छपा एक लेख है और आप सोचते हैं कि लोग लंबे लेख क्यों लिखते हैं। अब कोई बीस पंक्तियों की बात भी आप नज़र अंदाज़ करते हैं। आप अक्सर चाहते हैं कि ब्लॉगर पर फेसबुक पर एक दो पंक्ति की बात ही लिखी जानी चाहिए।

अगर ये बात सच है तो आप बीमार हैं। आपकी बीमारी को मनोविज्ञान की भाषा में बिबलियोफोबिया कहा जाता है।

फेसबुक हमारी पढ़ने की आदत को ख़त्म कर रही है। मुझे भी इस बात से सहमति होती रही है। मैं भी अनेक बार अपने कहानी संग्रह का काम पूरा न होने के लिए फेसबुक को कोस चुका हूँ। मैंने फेसबुक को बंद किया और कहानियों पर काम करना चाहा। मैं लैपटॉप खोलता, वर्ड पैड में झांकता रहता। कभी नींद आती, कभी उठकर बाहर चला जाता। लेकिन काम न हुआ। मेरी फेसबुक एक दो दिन नहीं नशे की लत छूटने की प्राथमिक सीमा यानी तीन महीने बंद रही। काम उसके बाद भी न बना।

ऐसा क्या हो गया है? मैंने स्वयं से प्रश्न किया कि क्या ये राइटर्स ब्लॉक जैसा कहा जाने वाला कुछ है? मैंने पाया कि नहीं। मैं नया तो रोज़ ही लिख रहा हूँ बस पुराने ड्राफ्ट्स पर काम नहीं करना चाहता। ये समस्या कुछ और है। कुछ सोच विचार के बाद मैं इस निर्णय पर आया कि पुराने ड्राफ्ट्स को पूरा करने के बाद आने वाली किताब का फीड बैक आने में बहुत श्रम और समय लगेगा। दूजी बात नया लिखते ही लिखने की चाहना का आंशिक पोषण हो जाता है और तुरंत फीडबैक मिल जाता है। इसलिए मुझे फेसबुक पर लम्बी पोस्ट लिखने का मन है मगर कहानी संग्रह पर काम करने का नहीं है।

हमारे लिए निर्धारित पाठ्यपुस्तकों को पढ़ने का डर और उनका सस्वर पाठ करने का डर बिबलियोफोबिया है। यही बीमारी तब भी है जब हम स्कूल कॉलेज से बाहर हों और अपने काम से सम्बन्धित, अभिरुचि से जुड़ी, साहित्य या इतिहास सम्बन्धी किताबें पढ़ना चाहते भी नहीं पढ़ पाते हैं। हम मन से किताब का ऑर्डर करते हैं या दुकान से खरीदकर लाते हैं। किताबें बढ़ती जाती हैं और पढ़ने का मन गायब रहता है।

अक्सर कविता लिखने की चाह रखने वाला कविता की अच्छी पुस्तकें, कहानी वाला कहानी और उपन्यास वाला उपन्यास पढ़ने से कतराता रहता है। अगर वह शुरू करता है तो भी वह बीस चालीस पन्ने के बाद सदा के लिए छोड़ देता है। असल में उसे अच्छे लेखक के बड़े कद से भी डर लगता है। वह रचना से बाहर लेखक के कद की छाया में घिर जाता है। यही तब भी होता है जब हम किसी इतिहास नायक को पढ़ते हैं और अनिच्छा से भरकर अधूरा छोड़ देते हैं।

फेसबुक को दोष दिया जा सकता है कि उसकी वजह से पढ़ना और बहुत कुछ प्रभावित हो रहा है किंतु मैंने पाया कि फेसबुक यूजर्स से संवाद के दौरान मैंने अच्छी किताबों की जानकारी पाई। उनको पढा और प्रसन्न हुआ। मेरे बहुत सारे मित्रों ने किसी सम्मोहन, आकर्षण या दिखावे में किताबें ऑर्डर करनी शुरू की। उनके साथ अपनी तस्वीरें लगाई। कुछ एक ने उनके बारे में लिखा भी। तो ये पूर्ण सत्य नहीं है कि फेसबुक पढ़ने की राह में खड़ी दीवार है।

जिस तरह लर्निंग डिसएबिलिटी होती है उसी तरह रीडिंग की भी होती है। आपने बारहवीं पास की, स्नातक हुए और अच्छी नौकरी या अच्छा काम करने तक पहुंच गए तो इसका अर्थ ये नहीं है कि आप अच्छे पाठक हैं। आप एक औसत व्यक्ति हैं। आप में समाज और साहित्य के बारे में कुछ औसत सुनी-सुनाई, अपडेट न की हुई जानकारी है। आपके पास तीन सौ शब्द हैं। आप बोलने के सामान्य कौशल तक आ गए हैं और अपने व्यक्तित्व का दिखावा करते हुए जीने का रास्ता खोज लिया है। आप अगर सचमुच इससे अधिक अच्छा बनना चाहते हैं और बन नहीं पा रहे तो आप एक मनोरोग से पीड़ित हैं, जिसका ज़िक्र इस बात में हो रहा है।

इस रोग के लक्षण। जैसे ही पढ़ना शुरू करेंगे कोई काम याद आ जायेगा। मौसम अच्छा न लगेगा। पसीना आएगा या ठंड लगेगी। मानी आप सर्द दिनों में रजाई खोजने लगेंगे और गर्म दिनों में पसीना पौंछने लगेंगे। आप किसी भी कारण से किताब को एक तरफ रख देंगे। अब आप फोन हाथ में लेकर फेसबुक ऑन कर लेंगे तो मौसम सुहाना हो जाएगा। समय कब बीता पता भी न चलेगा। क्योंकि फेसबुक पर जहाँ कोई पढ़ने की बात होगी, उससे आगे बढ़ जाएंगे। आप तस्वीरें लाइक करेंगे। किसकी पोस्ट पर आपकी महबूबा लगातार जा रही है ये खोज करने लगेंगे। आपका महबूब इन दिनों कितनी बार और क्या लिख रहा है का अन्वेषण करने लगेंगे। या आप किसी विषय पर कोसने के अपने प्रिय कार्य में लग जाएंगे। असल में इस सबकी वहज है पढ़ने का भय। तो फेसबुक पर आकर भी नहीं पढ़ते हैं। न पढ़ना चाहते हैं।

बिबलियोफोबिया एक गंभीर रोग है। इसका तुरंत उपचार लेना चाहिए। ये आपकी स्कूल-कॉलेज शिक्षा को प्रभावित करता है। ये कार्य सम्बन्धी योग्यताओं में भी बाधा बनता है। ये आपके निजी जीवन को भी प्रभावित करता है।

सब मनोरोगों का उपचार एक सा ही होता है। जैसे किसी को पानी से डर लगता है तो उसे कम पानी से मित्रता करनी होती है। उसमें थोड़े से पांव डुबो कर बैठना होता है। फिर धीरे-धीरे आप एक छोटे पूल में उतरते हैं। एक रोज़ तैरने लगते हैं। आपको नींद नहीं आती तो अत्यधिक श्रम करने को प्रेरित किया जाता है, थकान से नींद आये। नहीं तो नींद की दवा ही दी जाती है। आपको ऊंचाई से डर है तो आपको ऊंचाई तक जाकर ही इसे मिटाना होता है। किताबें पढ़ने का डर आप में आ गया है तो थोड़ी योजना बनाइये, थोड़ी हिम्मत जुटाइये। किताब के साथ निश्चित दोस्ती गाँठिये। रोज़ पढ़ने का तय समय निकालिये।

फेसबुक को मत कोसिए कि उसने आपका सबकुछ चुरा लिया है। आप स्वयं को याद दिलाइये कि आप जो नहीं कर रहे हैं, उसके प्रति अनिच्छा से भर गए हैं। उसे ठीक कीजिये।
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March 23, 2018

डेटा चोरी से रची गयी दुनिया

कुछ मित्रों ने पूछा है कि फेसबुक से लिए डेटा का कोई कैसे और क्या उपयोग कर सकता है. मेरी प्रवचन करने की बुरी आदत है. प्रवचन की दुर्घटना के बाद सोचता हूँ कि कम शब्दों में बात कहना सीखना चाहिए. इसलिए आज कोशिश करता हूँ.

डेटा से पसंद, व्यवहार और मत का अनुमान निश्चित कर व्यक्तित्व का विश्लेषण किया जाता है. इसके पश्चात् जिसका डेटा है उसे केंद्र में रखकर योजना बनाना. इसके लिए तकनीकी शब्द है मैक्रोटार्गेटिंग. सरल शब्दों में इसका अभिप्राय है कि इस विश्लेषण के आधार पर एक ऐसा संदेश तैयार करना जो कि निश्चित व्यक्ति अथवा समूह को प्रभावित कर सके. व्यक्ति की पसंद का काल्पनिक भविष्य रच सके. एक निश्चित व्यक्ति जब अपनी पसंद और व्यक्तित्व के अनुरूप बातें किसी उत्पाद, विचार या राजनितिक लक्ष्य से सुनता है तो वह अजाने ही उसका एक सक्रिय सम्प्रेषक अथवा कार्यकर्त्ता बन जाता है.

उदाहरण के लिए एक नगर निगम के चुनाव हैं. एक विशेष स्थान से लोग दूजे विशेष स्थान तक कैब से यात्रा अधिक करते हैं. उस स्थान पर मेट्रो जैसी अत्याधुनिक सुविधाएँ चलाने की बात फैला दी जाये. आप अपनी लोकेशन अपडेट करते हैं. इससे पता चलता है कि आप कब कहाँ जा रहे हैं. इसलिए हर एप द्वारा आपकी लोकेशन लगातार मांगी जा रही है. जैसे इससे ये मालूम किया जाता है कि किसी विशेष माल में लोग सबसे अधिक संख्या में जा रहे हैं तो वहां सर्वाधिक विज्ञापन किया जाये. आप किसी पोल में बताते है कि भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं तो एक स्वप्न पेश किया जाये जो भ्रष्टाचार मुक्त होने का विश्वास दिलाये. देश में बेरोज़गारी बढ़ गयी है, इसका आंकलन करके देश से बाहरी लोगों को भगाने का नारा उछाला जाये.

आप कहेंगे कि ये तो अच्छा है न? अपने आप किसी ने हमारी समस्याओं का आंकलन किया और किसी ने उनको दूर करने का वादा कर लिया. लेकिन यही सबसे बड़ी चुनौती है कि इस तरह के विश्लेषणों का उद्धेश्य समस्या दूर करने की जगह फौरी तौर पर लोगों के मन को प्रभावित करना भर होता है. आपकी निजी जानकारी का किसी को हासिल होना आपके लिए इसलिए समस्या है कि अगर आपको घुटनों में दर्द है तो आपकी ये जानकारी दवा कम्पनी को बेच दी जाएगी. आपको फेसबुक जैसी सोशल साइट्स और इंटरनेट ब्राउजर्स पर केवल घुटनों की दर्द निवारक दवाओं के विज्ञापन दिखाई देंगे. आपकी न्यूज फीड में तुरंत ऐसी पोस्ट्स आपको फोलो करने लगेगी. आप घुटनों के दर्द की दुनिया बन कर रह जायेंगे. डरेंगे और पैसा खर्च करेंगे.

डेटा चोरी से रची गयी काल्पनिक समस्याएं और उनके समाधान कोई भौतिक चीज़ नहीं है जिसे आप देख सकें. ये मन को पढने की कोशिश हैं. खुलापन, कर्त्तव्य निष्ठां, बहिर्मुखता, सहमतता, मनोविक्षुब्धता से जुड़ी इंटरनेट पर उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर व्यक्ति को प्रभावित करने के लिए लड़ा जा रहा युद्ध है. इस क्षेत्र के एक महारथी ने इसे "स्टीव बेनोंस सायकोलोजिकल वारफेयर माइंडफक टूल" कहा है.

तो समझिये कि आपके दिमाग के साथ क्या किया गया है कि आपको समझ नहीं आ रहा डेटा चोरी से कैसे और क्या किया जा सकता है?

[Image by Chuck Kerr]

March 21, 2018

चाकू को ही ज़िन्दगी न बना लें

यूजर्स की डेटा चोरी जैसी ख़बरों से हमको क्या फर्क पड़ता है? हम तो फेसबुक और व्हाट्स एप के विडिओ चैट में नंगे भी हो जाते हैं. डेटा हमारा आधार वालों के पास पड़ा ही है और लोग उसे चुरा ही रहे हैं. इसलिए ऐसी बेकार की ख़बरों से क्या सर लगाना.

लेकिन फिर भी अपने लिए टाइम निकालो.

छोटा भाई पुलिस में अधिकारी है. उसने सायबर क्राइम और लॉ की पढाई भी की हुई है. मुझे भाई ने कहा कि आपके इस नए फोन में एक एप डाउनलोड कर लो. व्हाट्स एप. एप के खुलते ही भाई ने मुझे इसके फ़ीचर समझाए. मुझे बड़ा अच्छा एप लगा लेकिन मैं जिनसे बात करना चाहता था उनमें से बहुत कम के पास एंड्राइड फोन थे. यहाँ तक कि आभा भी बेसिक मोबाइल ही उपयोग में ले रही थी. इसलिए उत्साह फीका पड़ गया. फिर मैंने सोचा कि चलो कोई बात नहीं भाई-भाई फोन पर कभी खेला करेंगे. लेकिन दो साल के भीतर ही ऐसे बहुत कम दोस्त और परिचित बचे जिनके पास व्हाट्स एप चलाने लायक न फोन था.

कल व्हाट्स एप के संस्थापक सदस्य ब्रायन एक्शन ने अपने ट्विटर फोलोवर्स से कहा है कि फेसबुक को डिलीट करने का समय आ गया है. इसे डिलीट कर दिया जाये.

ब्रायन एक्शन ने जॉन काम के साथ व्हाट्स एप को बनाया था. साल दो हज़ार नौ में व्हाट्स एप शुरू किया गया था. उसी समय ब्रायन ने फेसबुक में नौकरी के लिए आवेदन किया मगर उनको रिजेक्ट कर दिया गया था. इस रिजेक्शन के बाद उन्होंने फ़रवरी में स्थापित की गयी कम्पनी व्हाट्स एप पर काम करना जारी रखा और मेहनत रंग लाई. व्हाट्स एप ने पूरी दुनिया में पाँव पसार लिए.

फेसबुक का मूल विचार था कि लोग अपनी तस्वीरें एक जगह रखें. उनको अपने मित्रों को दिखा सकें. दूसरे मित्रों के पास रखी तस्वीरों में खुद को खोज सकें. स्कूल और कॉलेज में बिछड़ गए दोस्तों से तस्वीरों के माध्यम से पुनः जुड़ सकें. लेकिन कम्युनिकेशन आदमी का सबसे बड़ा लालच होता है. इसी ने फेसबुक को हर सामाजिक गतिविधि की सूचना और आन्दोलन बना दिया. इसे अंधे के हाथ बटेर लगना कहा जाता है.

व्हाट्स एप जब बना तो उसमें बहुत सारी समस्याएं थी. जैसे कि वह हैंग हो जाता और पूरी तरह बंद हो जाता था. कुछ एक महीने इस पर काम किया लेकिन बात नहीं बनी. ये कम्पनी और प्रोजेक्ट बंद होने को ही था. इससे दोनों मित्रों को कोई आशा नहीं था. एप्पल ने जब पुश नोटिफिकेशन को एप्स के लिए काम लेना शुरू किया तो याहू छोड़कर आये दोनों दोस्तों ने पुश नोटिफिकेशन का इस्तेमाल व्हाट्स एप में किया.

पुश नोटिफिकेशन का अर्थ है हरकारे की आवाज़. आप इसे ऐसे समझिये कि किसी ने ऊँची जगह पर पर चढ़कर ज़ोर से एक आवाज़ लगाई. आपको वह आवाज़ सुनने में रूचि नहीं है लेकिन आवाज़ दीवारों के भीतर तक आ जाती है. एक सूचना निश्चित दायरे तक पहुँच जाती है. आपने अगर दो हज़ार आठ नौ के आस पास वाले नोकिया के स्मार्ट फोन यूज किये हैं तो आपको सहज ही याद आएगा कि वहां पुश नोटिफिकेशन को ऑन और ऑफ़ करने का एक ऑप्शन था. हमें इसकी ज़रूरत न थी इसलिए हमने इसे समझा नहीं.

मैं तकनीक का विद्यार्थी नहीं हूँ. मैं सहज जितना समझ सकता हूँ उतना समझता हूँ और अपने सबक को लिख देता हूँ. तो उस समय मैंने जानना चाहा कि पुश नोटिफिकेशन को ऑन या ऑफ़ करने से कोई मेरे फोन में कोई बदलाव आता है? नहीं आता था. इसलिए कि टेलिकॉम कम्पनियों पर विज्ञापन करने की पाबंदी रही होगी. तब तक ऐसे एप नहीं आये थे जिनको पीछे से कोई सूचना दे और वे फोन के स्क्रीन पर उसे फ़्लैश कर सकें.

व्हाट्स एप कम्पनी एक डूबा हुआ श्रम और धन था. लगभग कुछ दिन में बंद हो जाने वाला कारखाना. अचानक पुश नोटिफिकेशन पर आधारित एक फीचर इंट्रोड्यूस किया गया. व्हाट्स एप का यूजर अपने स्टेट्स में कुछ भी लिखे या बदलाव करे तो उस यूजर से जुड़े हुए सभी यूजर को वह सूचना तुरंत मिल जाये. बस इसी एक बात से बात बन गयी. महीने दो महीने में इसके ढाल लाख यूजर बन गए. इसलिए कि हर किसी को ये जानना था कि उसके प्रिय, पड़ोसी , मित्र, सहकर्मी का स्टेट्स कैसा है. उसके आस-पास नया क्या चल रहा है. ये एक तरह से ख़ुद को ब्रॉडकास्ट करना और दूजों की कही गयी बात को बिना किसी को बताये पढ़ना हो गया.

बस बात बन गयी. व्हाट्स एप बिलियन यूजर कम्पनी हो गयी.

लेकिन फेसबुक को पसीना आ गया. इसलिए कि दोनों संचार का ही काम कर रहे थे. कम्युनिकेशन की एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकती थी. या शेर जिस तरह चीतों को मार देते हैं उसी तरह व्हाट्स एप का शिकार फेसबुक ने कर लिया. साल दो हज़ार चौदह में फेसबुक ने इसका अधिग्रहण कर लिया. अब व्हाट्स एप के दो संस्थापकों में से एक जॉन फेसबुक के बोर्ड में हैं और दूजे ब्रायन फेसबुक डिलीट करने का कह रहे हैं.

मेरे बहुत सारे दोस्त इस बात से परेशान रहते कि व्हाट्स एप का सादा होना कितना अच्छा था. अब स्टोरीज का स्नेपचैट जैसा फीचर, ग्रुप को छोड़े बिना डिलीट न कर पाने का ऑप्शन, पेमेंट के फीचर और भी जाने क्या-क्या बोझ से भर दिया गया है. मैं उनसे कहता कि ये तो दिखने भर वाली चीज़ें हैं. असल में आपके जीवन का सारा हिसाब किताब ही इक्कठा किया जा रहा है. इसे कोड में बदलकर सहेजा जा रहा है. इसका एक रोज़ उपयोग भी किया जायेगा. इसको लाइव ट्रांसमिशन की तरह किसी भी तीसरे व्यक्ति को उपलब्ध कराया जायेगा. आप समझेंगे हम बात कर रहे हैं. लेकिन हो सकता है उसी बातचीत को अनेक लोग किसी उद्धेश्य से सजीव पढ़, सुन और देख रहे होंगे.

ब्रायन का कहना है कि फेसबुक मालिकों ने अपने ही घर में चोर बिठा लिए हैं. उन चोरों से सांठ गांठ कर ली है. केम्ब्रिज एनालिटिक नामक एक कम्पनी ने फेसबुक यूजर्स का डेटा चुराया और उसे राजनितिक काम करने वालों को बेच दिया. ऐसा करके अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव को प्रभावित किया गया. ब्रायन की चिंता ये है कि डेटा चोरी से समाज और राजनीति को गलत ढंग से प्रभावित किया जा रहा है.

जैसे बीमारी से डरने वाले लोगों की सूची बना ली जाये. उन्हीं डरे हुए लोगों को एक मिस्लीड करने वाली अधूरी इन्फोर्मेशन दी जाये. तो वे उसका भयानक प्रचार करेंगे. उसकी रोकथाम के लिए दवाएं खरीदेंगे. उनके लिए एक ख़बर ही ज़िन्दगी होकर रह जाएगी. समाज में एक वर्ग हताश और परेशान होकर अपनी आर्थिक उत्पादकता और मानसिक स्थिरता को गलत जगह इन्वेस्ट करेगा.

आज का सबसे बड़ा नशा हेरोइन एक समय बाज़ार में मेडिकल कम्पनी ने दर्दनिवारक दवा के रूप में लांच किया था. उसके प्रचार ने कुछ दिनों में ही समाज को एक भयानक नशे में धकेल दिया था. इस दवा को बाज़ार से हटा लिया गया. इसका निर्माण कम्पनी ने बंद कर दिया लेकिन दुनिया भर में होने लगा. अफ़ीम की खेती से देश चलने लगे. आतंकवादियों को धन मिलने लगा. आख़िरकार एक ख़ूबसूरत और प्रगतिशील देश अफगानिस्तान को तबाह होकर कीमत चुकानी पड़ी. इसी तरह अफ़्रीकी देशों में नशे की गोलियों ने समाज को गर्त में पहुँच दिया. ये दोनों उदाहरण समाज की भेड़चाल और अज्ञानता के तीव्र प्रसार का परिमाण हैं.

तो फेसबुक की हरकतें अच्छी नहीं है. वह आपको, आपके परिवार को, समाज को और देश को एक दिन छोटे से लालच के कारण किसी ऐसी ही आफत में धकेल देगा. डेटा चोरी से ऐसे समूह बनाये जा सकेंगे जो तेज़ी से जातीय, सांप्रदायिक, क्षेत्रीय और हर तरह के वर्ग के बीच ज़हर बो सकेंगे. ये स्व प्रेरित समूह राजनितिक इशारों पर काम करेंगे और कुर्सी के लिए, प्रभुत्व के लिए और समाज को बाँट देने के लिए कुछ भी कर सकेंगे. ये समूह हमारे बच्चों की पीढ़ी को किसी मनोरोग में धेकेल देंगे.

फेसबुक अब भी अपनी ख़ुद की वैश्विक इंटरनेट सेवा पर काम कर रहा है. इसे बंद किये जाने का समाचार नहीं है. फेसबुक ऐसी तकनीक पर भी काम कर रहा है, जिससे फोन में फेसबुक चलाने के लिए इंटरनेट प्रोवाइड करने वाली कम्पनी पर आश्रित न रहना पड़े. इससे फेसबुक विज्ञापन बाज़ार की प्रतिस्पर्धा को समाप्त करना चाहता है. वह अपने यूजर्स को केवल अपने विज्ञापन दिखायेगा. पैसे लेकर गढ़ी हुई भ्रामक और असत्य सूचनाओं का कारोबार भी होगा. आपसे कहेगा कि फेसबुक यूज करना है तो देखना ही पड़ेगा.

आप कहाँ जायेंगे? आज फेसबुक हेरोइन से भी बड़ा नशा है.

एक दोस्त ने मुझसे पूछा कि अगर फेसबुक और व्हाट्स एप ऐसे गंदे वाले विडियो चैट को पब्लिक कर दे तो? मैंने हसंते हुए कहा- "वे ऐसा नहीं करेंगे." उसने पूछा- "क्यों?" मैंने कहा- "देहिक क्रियाओं से जुड़ी वर्जनाएं रुढ़िवादी समाजों में ही ज़्यादा है. उन लोगों को अभी इस बात का शायद आईडिया नहीं है कि भारत जैसे देशों के नागरिकों को ऐसे विडियो के माध्यम से ब्लैक मेल किया जा सके. इससे भी बड़ी बात है कि अभी उनके पास और बहुत सारे काम हैं. जिस दिन फेसबुक दिवालिया होने लगेगी तब कोई भारतीय ही उनको ये सलाह देगा कि पुरानी बही से वसूली शुरू करो."

आपका व्हाट्स एप कहीं और से भी लॉग इन है और ये कोई चोरी नहीं है, ये कहकर कम्पनी अपना पल्ला झाड़ सकती है. इसलिए कि वेब ब्राउजर से लॉग इन करते समय आपको कंपनी द्वारा मैसेज किया गया था. आपने उसे पढ़ा और डाला तभी ये सम्भव हुआ है. एक एसएमएस तो हम कहीं से भी हैक कर सकते हैं. ये बहुत कठिन नहीं है.

एक तरीका है कुछ रुपयों का भुगतान करके आप किसी भी नम्बर पर किसी भी नम्बर से काल कर सकते हैं. आप जो नम्बर चाहेंगे वही रिसीव करने वाले को दिखेगा.

बच्चू तुम कहाँ-कहाँ फंसे हुए हो अभी जानते नहीं हो.

पोस्ट स्क्रिप्ट :

आपके पास चाकू है तो हाथ कट जाने के डर से या आवेश में किसी की हत्या हो जाने के डर से उसे फेंकिए मत। उसे संभाल कर उपयोग में लेना और सुरक्षित रखना सीखें।

क्या न करें- 
फेसबुक की प्रश्नोत्तरी में भाग न लें। पोल से बचें। छवियों पर भरोसा कर अग्रेषित या प्रकाशित न करें। किसी भी न्यूज़ पोर्टल की ख़बर तो तुरंत सच न मानें। स्वयं को याद दिलाते रहें कि इंटरनेट पर झूठ बहुतायत में उपलब्ध है।

क्या करें- 
सोच समझकर, शांत मन से, बिना किसी आग्रह के अपने आपको अभिव्यक्त करें। अपने जातीय, धार्मिक और वैचारिक मूल्यों को निजी जीवन में महत्व दें दूसरों पर न थोपें। सामाजिक व्याधियों पर सक्रिय विरोध करें। अपने पक्ष को पोस्ट में साफ़-साफ़ लिखने का कष्ट उठायें और असहमति होने पर बहस करने को स्थगित रखें। इसलिए कि बहस करने वाले आपके दोस्त कम और प्रचारक ज़्यादा होते हैं। सामाजिक, राजनितिक चेतना और आर्थिक सुरक्षा के विषयों पर बात करें लेकिन शेयर करने का मन हो तो उसे कई-कई बार जाँच लें कि सत्यता क्या है? समस्याओं के सही समाधान भी सुझाएँ। देश के लोकतांत्रिक ढांचे में चुनाव का अधिकार है, इसलिए राजनेताओं को अपमानित करने वाली पोस्ट लिखने की जगह चुनाव में अपने मत का प्रयोग करें।

सबसे अंत में ख़ुद को कहें कि थोड़ी शर्म रखें, थोड़ा सा तो तमीज़ से बोलें और चाकू से काम लें मगर चाकू को ही ज़िन्दगी न बना लें.

March 16, 2018

तुममें ऐसा था ही क्या

कि तुमको अपने पास बचाने की खातिर
एक पूरी उम्र गंवा डाली.

दोपहर के ढलते ही काम हाथ से छूटने लगते. मन छत की ओर भागने लगता. वहां क्या होता? छत खाली पड़ी रहती. आसमान में कुछ देर पंछी उड़ते हुए कहीं लौटते दीखते. डूबते सूरज की रोशनी से क्षितिज पर नया सा रंग आता और किसी लकीर की तरह फैल जाता. शाम का साया घना हो रहा होता. दीवार से बनती परछाई शाम की रंगत से अधिक घनी होती जाती. रोशनी बुझ ने लगती. चीज़ें अंधेरे में गुम होने को बढ़ जाती.

छत पर खड़े हुए कभी-कभी अतीत की याद आती थी. ख़ुशी से किलकते बच्चे की तरह भाग-भाग कर वहीँ जाने को बेताब मन. सारे काम एक मुलाक़ात को बनाने के आस-पास चलते. दस दिन बीत जायेंगे न तब हम मिलेंगे. इस तरह दस दिन किसी अंधी पोटली में जा गिरते. उन दस दिनों में जीना नहीं होता था. प्रतीक्षा होती थी. प्रतीक्षा का ही रोमांच होता था. आस-पास के लोग क्या करते थे दीखता न था. मन उनके बारे में सब भूल जाता.

कुछ रोज़ की मुलाकात के लिए महीनों खो दिए. साथ रह लेंगे ये सोचकर सोचा कि ज़िन्दगी आसान हो जाएगी. साथ रहेंगे. प्रेम से देखेंगे. पास बैठेंगे. सब कुछ एक साथ करेंगे. कितना अच्छा न? अक्सर देर रात तक यही सोचते हुए बत्ती गुल करने का मन न होता. कभी दोपहर में खिड़की दरवाज़े बंद किये अँधेरा बना कर बैठे रहने को जी चाहता.

और एक रोज़ ज़िन्दगी साथ निबाहने का वादा कर लिया. तीजे महीने वह किसी और के साथ रहने लगा.

ऐसे को कौन याद करता है? ज़रूर कोई और बात थी कि शाम होते-होते छत पर आकर चुप बैठ जाने का मन हो आता था. मन में जैसे कोई झील थी. हर शाम अलोप होने वाली झील. शाम होने के साथ डूबने लगती. उसका पानी किसी सुराख़ से बहता हुआ अँधेरे की ओर जा रहा होता. उसके ठीक बीच मन एक अबोध नन्हे हिरन की तरह फंस जाता. कम होता हुआ पानी दलदल में बदल जाता. केवल गरदन को कीच से बाहर उठाये हुए साँस-साँस गिनता मन सूनी आँखों से स्थिर एक दिशा में देखता रहता.

और कोई बात नहीं दुःख इस बात का होता है कि मुक्ति की ठीक चाहना नहीं हो पाती. अब तक जो था वह खर्च कर दिया. वह सब वापस नहीं चाहिए लेकिन...

पंखों की आवाज़ आई. एक फाख्ता आकर छत पर गिरी. मोबाइल से रोशनी करके देखा तो दीवार के पास चिपके हुए बैठे पाया. परिंदों को छूने में भी अँगुलियाँ डरती हैं. हाथ आगे बढाया तो चुप बैठा परिंदा हिला नहीं. उसे हथेली में उठा लिया. अँगुलियों के बीच कुछ गरम रिसने का अहसास आया. सोचा परिंदा पानी से भीगा होगा लेकिन वो गाढ़ा होता हुआ खून था.

कभी नहीं सोचा था कि इस तरह खून से भरी हथेली को देखा जा सकेगा. लेकिन अचानक लगा कि हथेली में घायल फाख्ता नहीं है. जो मन तुमको दिया था उसे तुमने जीवन के आसमान में उड़ते हुए ही चीर डाला है. वह एक लहुलुहान फाख्ता की शक्ल में फिर से मेरी हथेली में आ गया है.

वाशबेसिन में नल के पानी के साथ एक रंग घुलता हुआ हल्का होता गया. फाख्ता एक कोने में दुबकी बैठ गयी. जैसे कोई लड़की अपने पिता के घर चली आई हो. और सोचती हो कि जीवन में कोई और भी ठिकाना होना चाहिए कि आसमान में उड़ते हुए ज़ख्मी हो जाने पर किसी के घर न लौटना पड़े. कोई अपना घर हो केवल अपना.

आँखों के आगे अंधेरा श्यामपट्ट बना रहा था. सोचा कि इस श्यामपट्ट पर कुछ लिख दूँ मगर क्या? 
* * *

एक और किताब पूरी कर लो. मुझे कई बार लगता है कि नए कवर में नए शब्द हैं. प्रिंटिंग की स्याही की ख़ुशबू आ रही है. किताब को अपने चेहरे पर फैलाकर रख लिया है.

इनबॉक्स में पड़े अनरीड मैसेज और छूटी हुई कॉल्स को देखा. मालूम था कि निम्बू नहीं है फिर भी फ्रीज़ खोला. कुछ तो मिल ही जाएगा. अदरक का छोटा सा टुकड़ा मिल गया. कांच के ग्लास में अदरक की स्लाइस डालते हुए रुक गया कि सवेरे चाय में डालने लायक बहुत थोड़ा सा बचा देता हूँ.

अदरक वाली जिन का स्वाद भी बहुत अच्छा होता है. 
* * *

जब कोई तुमको छोड़कर चला जाये तो समझ आता है कि ज़िन्दगी कितनी लम्बी है. अगर कोई तुमको छोड़कर भी तुम्हारे साथ बना रहे तो समझ आता है कि ज़िन्दगी कितनी भारी है. भौतिकी का ये ज्ञान भौतिक विज्ञान पढने से नहीं जीने से समझ आता है. 
* * *

March 10, 2018

और लिखा कीजिये

मेरे दो तीन कहानी संग्रह आये तो फेसबुक के इनबॉक्स में कहानी लिखने की चाहना रखने वाले आने लगे. चार साल पहले एक कॉलेज का लड़का आया. उसने कुछ कहानियां भेजी. मैंने उसे कहा कि आप लिखते रहिये. जब आपके पास सम्पादित करने लायक कुछ बन जाये तब किसी को अपनी पाण्डुलिपि दिखाना. दूजी बात कि दो हज़ार शब्द पढ़कर आपको कोई कुछ नहीं कह सकता है. आप चालीस-पचास हज़ार शब्द की पाण्डुलिपि देंगे और किसी मित्र के पास समय हुआ तो वह पढ़कर आपको बताएगा कि क्या बना है?

उस लड़के ने मेरा फ़ोन नम्बर मांग लिया. मैंने दे दिया. वह फ़ोन पर बहुत सी बातें करना चाहता था. मैंने दो-तीन बार उससे बात की. वह पूछता- "सर कैसा लिखा है." मैं कहता- "अच्छा लिखा है और लिखा कीजिये." मेरे पास इतना समय न था कि मैं लगातार बातें कर सकता. मैंने एक बार उसे समझाया कि ज़्यादा समय नहीं होता है. उसने समझा नहीं. मैंने दो-तीन बार उसका फोन नहीं उठाया. ऐसा करने पर मेरा प्यारा कहानीकार अचानक अच्छा आलोचक बन गया और उसने मेरे कहानी संग्रह की समीक्षा लिख दी. क्या लिखा होगा? आप समझ सकते हैं. मैंने उसे इग्नोर किया. फिर वह गुस्से में अनफ्रेंड कर गया. उसके साल भर बाद तक वह अपनी वाल पर कहानियां लिखता दीखता था. फिर जाने क्यों उसका कहानी लिखने से मोहभंग हो गया.

फेसबुक पर किसी भी कला, लेखन अथवा संगीत के व्यक्ति का उपस्थित रहना कठिनाइयों को आमंत्रित करना है. आप कुछ थोड़ा सा अच्छा रच रहे हैं तो सहज ही आपको पसंद किया जाने लगेगा. इसके बाद आपके पास इनबॉक्स में संदेशे आयेंगे. आप प्रेम से या शालीनता के कारण अच्छे जवाब देंगे. इसके बाद आपको रोज़ ऐसा करना पड़ेगा. जिस दिन जवाब न दिया उस दिन से रूठने का सिलसिला आरम्भ. आप अपना फ़ोन नम्बर शेयर करेंगे तो एक अनंत पीड़ा में स्वयं को धकेल देंगे. भले और समझदार लोग स्वयं अच्छा काम कर रहे हैं, वे आपके मित्र हो जायेंगे. लेकिन फोन पर पहले-पहल की बातें संकट की बुनियाद बन जाएँगी. आपको उनकी इच्छा से फोन पर उपलब्ध होना होगा. अगर ऐसा न करेंगे तो वे आपके साथ वैसा ही व्यवहार करेंगे जैसा उस लड़के ने मेरे साथ किया था.

हमारा कोमल पक्ष प्रशंसा सुनकर अधिक कोमल हो जाता है. वह लचीला होकर प्रशंसा के भार से झूलने लगता है. स्वयं पर प्रेम उमड़ने लगता है. आत्मविश्वास को तरल संबल मिलने लगता है. इस प्रशंसा के भार से उत्प्लावक बल में वृद्धि होने लगती है. हम प्रसन्नता में डुबकी लगाने लगते हैं. किन्तु इस सबका मोल बहुत बड़ा है. हमसे अनेक अपेक्षाएं बाँध ली जाती है. उनको पूरा न करने पर पहले-पहल की बातें याद दिलाई जाने लगती हैं. "तब तो आप जवाब देते थे. तब तो समय था. तब तो मुझसे कोई तकलीफ न थी" वह तब जो बीत चुका होगा आपके गले का फंदा बन जायेगा.

मैं शराब को बिम्ब बनाकर कुछ न कुछ लिखता रहा हूँ. मेरे लिखने में जिस तरह शराब प्रेम रस का रूपक है, जिस तरह जुए का पासा दिल का रूपक है, उसी तरह अनेक ख़राब चीज़ें और आदतें रूपकों की तरह मेरे लेखन में उपस्थित हैं. इन रूपकों से भरी बेवजह की बातें पढना भी बहुत से लोगों को प्रिय है. अब तक बहुत बार ऐसा हो चुका है कि मेरे पाठक दोस्त जिनके पास मेरा फोन नम्बर है, वे शराब पीते ही मुझसे बात करना चाहते हैं. मैं शाम के बाद फोन को साइलेंट मोड पर कर देता हूँ. रिंग नहीं सुनाई देती. स्क्रीन के चमकने से ध्यान जाता है कि कोई कॉल आ रहा है. अधिकतर इस पर भी ध्यान नहीं जाता. सुबह मैं मैसेज पढता हूँ. "आप जान हो सर. लव यू. ऐसे ही बैठे थे. दो पैग लिए तो आपकी याद आ गयी. सर कभी तो रात को बात करो."

ये बहुत मारक है. इससे भी अधिक मारक है विपरीत लिंग के पाठक अथवा प्रशंसक का दोस्त हो जाना. उसकी क्या बातें लिखूं? अधिकतर लोग मन से टूटे हुए हैं. प्रेम चाहते थे और धोखा खा गए. अब इस तरह जी रहे हैं कि धोखा प्राइमरी चीज़ हो गया है. वह बैल के आगे लटकती मूली है. जीवन रूपी बैल धोखे को खाकर हजम करने की आशा में चुपचाप उसके पीछे चला जा रहा है. धोखा एक कदम आगे बैल एक कदम पीछे. किसी भी उपाय से दूरी समाप्त नहीं हो रही. ऐसे लोगों से कभी बात कर लो और वे अपनी कहानी आपको सुनाने लग जाएँ तो समझिये कि तीसरे दिन वे आपसे कह रहे होंगे. "उसने मेरे साथ क्या-क्या किया अब प्लीज़ आप न करना." इस तरह आप वचनबद्ध हो जायेंगे. जीवन की गाड़ी एक नये भंवर में फंस जाएगी.

कल किसी पाठक ने मैसेज किया कि छोरी कमली नहीं मिल रही. मैं अमेज़न तक गया. छोरी कमली उपलब्ध नहीं थी. मैं वहां से जादू भरी लड़की तक चला गया. वहां देखा कि दो तीन साल में कुछ रिव्यू आये हैं. उनको पढने लगा. जिन्होंने अच्छे रिव्यू लिखे उनके नाम थे. जिनको किताब पसंद न आई उनके नाम न थे. उनमें से दो रिव्यू इस तस्वीर में लगा रहा हूँ. एक में लिखा है- "बे जान कहानी. ना कहानी है न पढने में मजा. उदास मरी मरी सी ज़िन्दगी. अनसुलझी नासमझ. क्या कहानी है क्या पात्र कोई इंट्रेस्टेड नहीं. बीच में ही छोड़ दिया पढने." मैं ऐसी बातों पर ध्यान नहीं देता हूँ. आप किसी भी रिव्यू से असहमत हो जाइए लेकिन उसे गलत मत ठहराइए.

कहानी संग्रह को रिव्यू करने वाला पाठक अपना नाम नहीं बताना चाहता. उसे नाम क्यों छुपाना है? इसके अनेक कारण हो सकते हैं. मुझे उन कारणों में और ऐसा रिव्यू लिखने वालों में दिलचस्पी नहीं है.

लगभग सब प्रकाशक अपने लेखकों को इस बात के लिए प्रेरित करते होंगे कि ऑनलाइन स्टोर्स पर अपनी किताब के रिव्यू लिखवाओ. लेखक या प्रकाशक रिव्यू लिखने के लिए अपनी फेसबुक वाल पर पोस्ट लगाता है. निजी संदेशे भेजता है. ईमेल करता है. इसके लिए किसी समाचार पत्र की प्रसार संख्या बढाने जैसी लकी ड्रा की योजनायें भी चलाई जाती हैं. रिव्यू लिखने वालों को लेखक व्यक्तिगत रूप से आभार व्यक्त करता है. हो सकता है कि वे मित्र भी हो जाते हों.

रिव्यू इसलिए लिखवाये जाते हैं कि बहुत से पाठक जो ऑनलाइन किताबें खरीदते हैं वे रिव्यू पढ़ते हैं. मैं भी कभी-कभी किसी सामान का ऑर्डर करते समय रिव्यू पढता हूँ. लेकिन मैं कीमत और ज़रूरत के हिसाब से अपना निर्णय करता हूँ. किताबों के मामलों में मुझे रिव्यू पढने में इसलिए रूचि नहीं है कि मैं लेखक को पढता हूँ. प्रिय लेखक का नाम देखा और किताब ऑर्डर. इसलिए किताब का रिव्यू क्या कहता है ये केवल समय बिताने का तरीका भर है.

मैंने कभी किसी से कहा होगा कि रिव्यू लिखना तो ये भी किसी और ने मुझसे कहा होगा कि ऐसा करवाओ. मैंने सोचा और सोचकर जवाब दिया कि मेरा इस सारे आयोजन में मन नहीं है. मुझे अपनी किताबों के रिव्यू नहीं लिखवाना. अगर किसी किताब के एक हज़ार पोजिटिव रिव्यू हो तो आप क्या समझते हैं कि कितने लोग खरीद लेंगे. पुस्तकें दाढ़ी बनाने का बिजली वाला रेजर नहीं है. वे हमारे जीवन का आइना हैं. वे सभ्यता और संस्कृति के बारीक बदलावों का लेखा जोखा है. वे मनुष्य के दुखों का, आशाओं का और वास्तविकता का लिखित प्रमाण हैं. ऐसी चीज़ें प्रमोट करने या कोई प्रशंसित करने को नहीं बनी होती.

मेरे लिए लिखना केवल मन को कह देना है. आप भी फीड बैक से गरज न रखना. दुनिया बहुत बड़ी है. इसका बड़ा होना अच्छा है कि किसी गली से बचकर चलिए किसी गली में देर तक बैठे रहिये.

March 8, 2018

बेमन क्या बात कहूँ?

क्या मेरे पास कोई बात सुनने का मन बचा है 
क्या मेरे पास कहने के लिए कोई बात बची है?

क्या मैं सेलफ़ोन का चमकता स्क्रीन देखता रह सकता हूँ. क्या मैं समय पर दफ़्तर पहुँच सकता हूँ. क्या मैं इसी बिस्तर पर देर तक चुप लेटा हुआ महसूस कर सकता हूँ कि थकान बहुत बढ़ गयी है. क्या मैं तय कर सकता हूँ कि इस थकान के कारण आगे के सब काम स्थगित कर दूँ. मैं कितने दिन ऑफिस जाऊँगा? मैं कितने दिन लोगों को सुन सकूंगा. मैं कब तक अपने बारे में क्या बातें बता सकूंगा.

पॉकेट में रखे फ़ोन में रिंग बजने लगती है. मैं स्कूटर चलाते हुए सोचता हूँ कि जेब में रखे फ़ोन पर किसका नाम चमक रहा होगा. इस समय कौन फ़ोन करता है. मैं कुछ नाम याद करता हूँ. हर नाम की याद के साथ बहुत सी बातें याद आती हैं. मैंने उससे आख़िरी बार क्या बात की थी? हमने कब से बात नहीं की.

रेलवे ओवर ब्रिज पर बाईं तरफ मुड़ते हुए देखता हूँ कि लोग गलत तरीके से दायें मुड़ जाने को इंतज़ार में खड़े हैं. मैं अहिंसा चौराहे का चक्कर काट कर फिर उन्हीं लोगों के रास्ते बढ़ जाता हूँ. अस्पताल, विवेकानंद, टाउन हॉल, डाक बंगला, कलेक्ट्रेट, बाड़मेर क्लब, पीएचईडी, पुलिस लाइन, जेल, आरएसईबी और आकाशवाणी तक की गंदे पानी के बहाव, सीवरेज लाइन बिछाने को खोदी हुई सड़क, पीने के पानी के बहने से सड़क पर बने पेच और टूटे गति अवरोधकों पर इस तरह गुजरता हूँ जैसे कंचे के जाने के रास्ता बना हुआ है. कंचा इस गति से लुढका दिया गया है कि सीधे अपने घर में जाकर गिरे.

इस तरह मैं ख़यालों में खोया रहता हूँ और स्कूटर किसी ऊँट की तरह चलता रहता है. जैसे ऊँट जानता है कि मालिक को कहाँ जाना है, उसी तरह मेरा स्कूटर भी समझता है. वह रास्ते के अनुसार अपनी गति कम ज़्यादा करता है. गड्ढों से बचता है. सामने आते लोगों को देखता है लेकिन चलता रहता है.

स्कूटर सवार को फिर से फ़ोन में रिंग सुनाई देती है. वह सोचता है कि किसका फ़ोन होगा? फिर कोई नाम ज़ेहन में आता है लेकिन मिट जाता है. उससे अब क्या बात होगी? कितने ही बरस बीत गए हैं जब हमने लड़ते हुए ऊँची आवाज़ में फ़ोन काट दिया था. फ़ोन काटने के बहुत देर बाद तक कुछ न सूझा कि अब क्या करूँ. अपना थैला लिया और आर्म गार्ड रूम के पास बने शेड के नीचे चला गया. वहां पहरा देने वाले लोगों की चारपाई रखी रहती है. उस पर बैठ गया. कभी देर तक यूं ही बैठा रहा. कभी थैले से कोई किताब निकाली. कभी देखा कि लाइटर रखा है क्या? अँगुलियों को वह न मिला तो आँखें शेड के नीचे लोहे के एंगल पर झाँकने लगी कि पिछली बार यहाँ एक माचिस की डिबिया रखी तो थी.

फ़ोन जब जेब से निकलता तो पाता कि जितने लोगों को सोचा उनमें से किसी का फ़ोन न था. सब अनजान नम्बर थे या उनके नम्बर जिनसे कहा है कि मन अच्छा नहीं है. जब मन ठीक होगा तुमको कॉल करूँगा. बेमन क्या बात कहूँगा. वह कुछ अपने मन की कहे और मैं हाँ - हूँ करता हुआ उड़ती धूल को देखूं, स्टूडियो की घड़ी में बदलते डिजिट्स का पीछा करूँ, कल शाम उद्घोषक ने कौनसे फ़िल्मी गीत प्ले किये वह लिस्ट देखता रहूँ. क्या होगा इस तरह की बात करने से? उसे भी अच्छा न लगेगा और मेरी थकान और बढ़ जाएगी.

तो क्या हो गया है? क्या मैं कहीं चला गया हूँ और फ़ोन किसी दूजे आदमी के पास रह गया है? या मैं यहीं हूँ और ये फ़ोन किसी और का है?

मैं अचानक चौंक जाता हूँ कि फिर से टिंग टिंग...

[ये तस्वीर साल दो हज़ार ग्यारह के जून महीने की है. वो सही आदमी था.]

March 7, 2018

प्रेम की निर्मल नदी का नायक

दुनिया में एक बहुत छोटा सा तबका है जो तोड़फोड़ और हत्याओं में लगा रहता है। बाकी सब तो घर बनाने, बच्चों को लाड़ लड़ाने और प्रेम से जीवन बिताने के प्रयास में जीते हैं।

जिस तरह जड़ें अक्सर नहीं दिखाई देती उसी तरह जोड़ने वाले भी कम दिखते हैं जबकि जोड़ने वालों के उलट तोड़ने वाले अक्सर अधिक दिखते हैं।

मंदिरों-मस्जिदों, मूर्तियों और कलाकृतियों को तोड़ने वाले लोगों के बारे में कभी प्रचार न करो। उनके प्रति दया और उपेक्षा मिश्रित दृष्टि रखते हुए, इस गंदगी से आगे बढ़ जाओ।

हत्यारे और विनाशक भीतर से बेहद कायर हुआ करते हैं।

इन छोटे टुच्चे लोगों की क्या बात करते हो? क्या उस आदमी को भूल गए हो जो अभी दस बारह साल पहले ही मरा। वही कर्नल पॉल टिब्बेट्स। जिसने हिरोशिमा पर एटम बम गिराया था।

कर्नल पॉल जब अमेरिका लौटा तो उसका स्वागत एक महानायक की तरह किया गया था। घृणा से भरे अमेरिकी जापान में मासूमों के संहार का जश्न मना रहे थे। ये अमरीकी ट्विन टॉवर ध्वस्त होने पर डर के कारण मनोरोगी हो गए थे। इनकी नींद उड़ गई। ये अपने देश मे रह रहे सिखों, मुसलमानों और अन्य धर्मावलम्बियों पर अकारण हमले करने लग गए थे। क्यों भाई जापान की तबाही पर ख़ुश हुए और ख़ुद पर आंच आते ही मनोरोगी हो गए। ऐसा दोहरा व्यवहार क्यों?

वो कर्नल पॉल घृणा का नायक बना तो उसकी बीवी ने उसके साथ रहना स्वीकार नहीं किया। वह उसे छोड़ गई। कर्नल ने नया घर बसाया और अपनी करनी पर दम्भ भरता रहा। आख़िरकार वह भी मनोरोगी हो गया था। उसे सपने में दिखाई देता था कि लोग उसकी कब्र पर थूक रहे हैं। उसे इससे भी अधिक बुरा दिखता था।

उसने अपनी मौत के बाद कब्र न बनाये जाने की इच्छा रख दी थी। मृत्यु के बाद अपमानित होते रहने के भय के कारण उसने कहा कि मेरी देह को राख कर देना। मेरी राख भी इंग्लिश चैनल में बहा देना। ऐसा ही हुआ।

घृणा की अग्नि से जन्मा नायक आकाश की ओर उठती शिखा जैसा भव्य और असीमित दिखाई देता है लेकिन अल्पकाल में नाश करके ख़ुद भी नष्ट हो जाता है। इसके उलट प्रेम की निर्मल नदी का नायक नन्हीं रंगीन मछली सा होता है। हमारे हाथों में गुदगुदी करता दिल मे समा जाता है। वह जितना सूक्ष्म होता जाता है उतना ही असीम बनता है।

हत्याएं और तोड़फोड़ विचारधाराओं की लड़ाई नहीं है। हत्यारों ने विचार नाम के मुखौटे से अपना चेहरा ढक रखा है। इनका अंत भी पॉल टिब्बेट्स से भी बुरा होगा इसलिए कि कर्नल पॉल पढा लिखा शातिर और प्रशिक्षित व्यक्ति था। ये लोग उसके आगे क्या हैसियत रखते हैं?

इनको मुँह मत लगाओ, इनकी बात मत करो।
* * *

[Painting image courtesy : Felix Murillo]

March 1, 2018

किसी और के बारे में



धुएं से बनते बेतरतीब रास्तों पर चलते हुए भटक कर नज़र दीवार की ओर जाती थी। कभी उसके आस-पास रहते हुए भी उसकी याद आ जाती थी। कभी छाया भरे अनजान रास्ते पर मन अकेले चल पड़ता। कभी रेत के जंगल में क्षितिज पर कोई लाल रंग डूबता हुआ गाढ़ा हो जाता। इस कभी-कभी से मन सदा डरता रहा। बेचैनी को मिटाने का कोई इरेजर न बनाया जा सका। बस अक्सर यही चाहना रही कि तुम इत्ते करीब रहो कि हम एक दूजे को देख भी न सकें।

इंस्टाग्राम के फेरे में वी के एकाउंट में ये बेवजह की बात मिली. 

दो सूखे पत्ते नम मिट्टी में

एक रोज़ कोई कोंपल खिली जैसे नज़र फेरते ही किसी ने बटुआ पार कर लिया हो। एक रोज़ उससे मिला। फिर उससे ऐसे बिछड़ा जैसे खाली बटुए को किसी ने उदासी ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.