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मेरी मुट्ठी में सूखे हुए फूल हैं

देखा तो पाया कि शाम है

मिटा तो न दोगे ?

जबकि न था, कभी कोई वादा

रीत रहा है, फूटा प्याला

कुछ शामें भूलने लायक नहीं होती

तुझको छू लूं तो फिर ऐ जान ए तमन्ना

बारिशें, तुम्हारे लिए

तेरे भीगे बदन की खुशबू से

काश, इतना सा हो जाये

मदहोशी में, होश है कम कम