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खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद

मैं टूटे हुये तीर-कमां देख रहा हूँ।

होने को फसल ए गुल भी है, दावत ए ऐश भी है

रेगिस्तान के एक कोने के पुस्तकालय में प्रेमचंद

एक चोर दांतों वाली लड़की की याद

वो भी हम जैसे हो जाएंगे

रंग, राख़, पानी और धूप जैसी चीज़ें

कितना सूखा है, देखो ना

काल और क्षय से परे

ये सिस्टम किसका सिस्टम है?

मैं उस रोशनी में जाकर क्या करूंगा