June 12, 2010

कुछ बीती हुई शामों का हिसाब और एक अफ़सोस ?

अक्सर दीवारों पर उनके पते लिखे होते हैं जिनके मिलने की आस बाकी नहीं होती. महीनों और सालों तक मुड़ा-तुड़ा, पता लिखा बदरंग पन्ना किसी उम्मीद की तरह जेब में छुपाये घूमते रहते हैं मगर एक दिन कहीं खो जाया करता है. मेरी उलझनें, तुमसे हुई मुहोब्बत जैसी हो जाती है. यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि उसका होना जरूरी था या फ़िर ज़िन्दगी का गुज़ारा इस बे-पर की लगावट के बिना भी सम्भव होता.

पिछले सप्ताह एक विवाह में शामिल होना था. एक रात बनोला जीमने के लिये और दूसरी रात प्रीतिभोज के नाम हो गई यानि अपनी कही जाने वाली शाम को कुछ और लोगों के साथ बांटना पड़ा. इधर एनडीए में पासिंग आउट परेड में शामिल हो कर बच्चे अपने भाई को ग्रेजुएट होने की डिग्री दिला लाये तो मेरी कुछ और शामें बच्चों के नाम हो गई. मेरे फ़ौजी को चालीस दिन की छुट्टी मिली है और वह इन दिनों को भरपूर एन्जोय करना चाहता है. आज शाम की गाड़ी से वह अपने दोस्तों के पास जोधाणें चला जायेगा.


मेरी इन शामों में मदिरा का सुकून भरा सुख नहीं बरसा है. अभी फ्रीजर की आईस ट्रे को पानी से भर कर आया हूँ. सुबह एक दोस्त से बात की, वैसे हर रोज़ ही होती है मगर लगती नयी और जरूरी सी है. बात करने के साथ वाशिंग मशीन में कपड़ों पर भी ध्यान था फिर थोड़ी देर में धुल रहे कपड़ों के साथ अपनी पहनी हुई जींस भी डाल दी. वाश टब में कुछ टकराने की आवाजें आने लगी तो हाथ घुमा कर देखा, सोचा पांच रुपये का सिक्का होगा मगर निकला मेरा सेल फोन.


महीने भर पहले खरीदा था, पांच एमपी का केमरा और शानदार म्यूजिक सपोर्ट वाला ये फोन दम तोड़ चुका था और उसके साथ फोनबुक में सेव किये गए नंबर भी. इस सोच में उलझा हूँ कि कितने ऐसे लोगों के नंबर थे जो मुझे प्यार करते थे और कितने ऐसे नम्बर थे जो किसी अनवांटेड कुकी की तरह घुसे बैठे थे ? मुझे कौन फोन करता है ये ख्याल आते ही खुद को एक ऐसी तनहा शाम की तरह पाता हूँ जिसमे कभी - कभी कोई एक परिंदा उड़ता दिखता है.


अब कोई उतना ख़ास अफ़सोस भी नहीं
कि मेरे पास अपने ही बनाये हुए कई बड़े अफ़सोस पहले से ही हैं.

मैंने जाने कितनी प्रतीक्षा भरी आँखों में नीरवता को बने रहने दिया है, मैं कई - कई बार वादे कर के भी मिलने नहीं गया, मैंने कई सौ बार झूठ बोला है कुछ मुहोब्बतों के बचाने के लिए और कई हज़ार बार अपनी सुविधा की ज़िन्दगी जीने के लिए... मुझ से इन्सान से उस सेल फोन को अधिक उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. मेरा अफ़सोस जाने कैसा है कि मैं कुछ रिश्तों के लिए आंसू बहाता हूँ और कुछ को बिखरने देता हूँ समय की थाप पर.

ओ मेरे सेल फोन ! मैंने रात - रात भर तेरे जरिये सुने थे लोकगीत.

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सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.