November 16, 2010

भूख आदमी को छत तक चढ़ा देती है

नाईजीरिया को लोग भुखमरी के सिवा और किसी कारण से जानते हैं या नहीं लेकिन मैं जानता हूँ कि वहां एक अद्भुत संस्कृति है योरुबा.. योरुबा लोगों का एक लोकगीत बरसों पहले पढ़ा था. उसे एक किताब के पीछे लिख लिया. मेरी किताबें अक्सर खो जाया करती है. खोने का एक मात्र कारण उसे मांग कर ले जाने वालों का लौट कर न आना है.

भाषाएँ दुनिया के किसी कोने में बोली जाती हों या उनका विकास हुआ हो मगर उनकी समझ हतप्रभ कर दिया करती है. मनुष्य के दैनंदिन जीवन के प्रसंग देवों को दी जाने वाली बलि से अधिक महत्वपूर्ण हुआ करते हैं. सामाजिक विकास की कामना और मुश्किलों के गीत कालजयी हो जाया करते हैं. मैं सोचता हूँ कि विद्वानों को और बहुत से अनुवाद करने चाहिए ताकि हम समझ सकें कि मनुष्य मात्र एक है. उसकी खुशियाँ और भय सर्वव्यापी है.

मनुष्य द्वारा किये गए प्रेम का अनगढ़ रूप जितना खूबसूरत लोकगीतों में दिखता और चीरता हुआ हमारे भीतर प्रवेश करता है ऐसा और कोई माध्यम नहीं है. लोकगीतों में हर स्त्री-पुरुष को अपना अक्स दिखाई दे सकता है. मनुष्य का प्रेम रसायन भाषाओं के विकास से पहले का है. इस तथ्य को लोकगीत चिन्हित करते हैं. मेरा रसायन शास्त्र उसी दिन फ़ैल हो गया था जब मैं चुप देखता रहा. जब मैं उसे लिखता रहा था कि तुम बहुत ख़ास हो मगर अफ़सोस कि तब किसी केटेलिस्ट ने काम नहीं किया .

बहुत साल बीत गए हैं और फासला बढ़ता जा रहा है. हम एसएमएस करते हैं. उतनी कीमत में बात हो सकती है लेकिन नहीं होती. समय की पगडण्डी हमें अलग रास्तों पर ले गयी है. इस सफ़र में तुमने बहुत से लोकगीत पढ़े सुने होंगे. आज इसको पढो हालाँकि यह भूख का गीत है. भूख, जिसने हर बार याद दिलाया कि दुनिया में बराबरी होनी चाहिए. यह प्रेम का गीत होता तो भी कुछ ऐसा ही बनता कि प्रेम के लिए आदमी शहतीरों पर उल्टा लटका रह सकता है ...

भूख
भूख आदमी को छत तक चढ़ा देती है
और वह शहतीर से लटका रहता है

जब भूखा नहीं होता मुसलमान, वह कहता है
हमें मना है वानर खाना
पर जब भूखा होता है इब्राहिम
तब खा लेता है बन्दर.

भूख जब सताती है स्त्री को हरम में
वह दिन में ही सडकों पर निकल आती है
भूख पुजारी को उकसाएगी
वह अपने ही देवस्थान में करेगा चोरी.

जब मृत्यु बंद करती है द्वार
भूख खोल देती है उन्हें....
भूख के लिए बेमतलब है ये
कि "मैंने कल ही तो पेट भरा था. "

मेरा डिनर अभी शेष है. मुझे खाने में काफी पोष्टिक चीजें मिलेगी. मेरी भार्या अपने परिवार की बेल के पोषण को प्रतिबद्ध है. वह सुबह पांच बजे जागती है और रात ग्यारह बजे तक सोती है मगर आज उसको मैंने निवेदन किया है कि वह मेरे बगैर खाना खा ले. मैं इस समय एक सस्ते दर्जे कि ज़िन पी रहा हूँ और सोचता हूँ कि अभी शुभरात्रि कह दूं तो कोई हर्जा नहीं होगा शायद...

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हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.