June 30, 2011

दोपहर के वक़्त का टुकड़ा...

उमस भरे मौसम में बायाँ हाथ ट्राउज़र के पाकेट पर रखे हुए और दूसरे हाथ की अंगुलियाँ उसके बालों में फिराते हुए जाने क्यों लगता है कि वक्त खोता नहीं, हमारे भीतर बचा रहता है.

जो चीज़ें घेरे हुए थी, उन्हें बिना किसी खास शिकायत के ख़ुद ही चुना था. सलेटी रंग की जींस, पूरी आस्तीन के शर्ट, सफ़ेद जोगर्स, बच्चों के रंगीन कपड़े, चैक प्रिंट वाले बैड कवर, कफ़ और कॉलर से आती खुशबू, दीवारों के रंग, तकियों से भरा डबल बैड और शराब पीने का बेढब अंदाज़. लेकिन इन सालों में जो छूट गया था, उस पर पसंद काम नहीं करती थी. अक्सर वही याद आता. एक खाली दोपहर के वक़्त का टुकड़ा, छिटका हुआ उत्तेजना का पल, हवा में बची रह गयी गरम साँस, छूटता हुआ हाथ, दूर जाती हुई आँखें और देह से अलग हुआ जाता आधी रात के राग का आलाप...

साल गिरते रहे. नए मौसमों का शोर झाड़ू-बुहारी, रसोई-दफ़्तर, बच्चों-बूढों और शादियों-शोक के साथ बीतता गया. ज़िन्दगी के पेड़ की कोमल हरियल छाल, कठोर और कत्थई होती गयी मगर याद कभी अचानक आती थी. ऐसा न था कि वह गली से गुज़रे मुसाफ़िर की किसी दोशीजा पर अटकी निगाह वाली मुहब्बत थी. उसे छू कर देखा था. उसकी आवाज़ को अपने बालों में उलझते हुए पाया था. दीवारों का सहारा लेकर खड़े थे मगर थामा हुआ एक दूसरे को ही था. यानि याद के पेड़ पर हर साल नयी कोंपलें फूटते जाने का सब सामान था.

जाने कैसे कभी साँस मद्धम हो जाती. कुछ सूझता नहीं. कोई याद नहीं आती. कुछ चाहिए भी नहीं होता. ज़िन्दगी के अंधे मोड़ एकाएक सामने से गुजरने लगते. जिनके उस पार कुछ न दीखता था. कुछ भारी भारी से वक़्त के साये डोलते रहते. अक्ल फ़रोशों की नसीहतें फ़ैल हो जाती. मन, दुःख के गाँव से विदा हुए बुद्ध को भूल जाता और दौड़ दौड़ कर दुखों को सकेरने लगता. उनको सीने लगाता. बस उसी एक पल सांसे मद्धम, डूबी हुई और निराकार होती जान पड़ती, उस पल मुहब्बत मुस्कुरा रही होती. इस हाल पर नहीं वरन इसके हासिल पर.

जब तुम्हारी सीली आँखें दीवार पर अपनी रूह के महसूस किये को उकेर रही होती है तब गुमशुदा हवा के झोंके की तरह तुम्हारे पहलू में बैठा हुआ, मैं पढ़ रहा होता हूँ.


तुम्हारे जाने के बाद
एक दिन सब रास्ते भूल चुके होंगे मुझे.

मैं उम्रदराज़ तन्हाई से घबरा कर, रोने लगूंगी
चीज़ों को उठा कर रखूंगी, उसी जगह
फ़िर कभी आह और हिचकी के बीच अटक जायेगा कुछ.

जब अपने ही हाथ न उठ सकेंगे पोंछने आंसू
तब ख़ुदा से मांग लूंगी सारी शिकायतें वापस
कि उसने कभी, तुम्हें मेरी बाँहों में लिखा था...

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हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.