October 14, 2011

चाँदनी रात में


ढ़लान शुरू होने की जगह पर बने घर का हल्की लकड़ी से बना दरवाज़ा टूटा हुआ था. उसकी ढलुवाँ छत पर रौशनी बिखरी थी कि ये डूबते चाँद की रात थी. वह दरवाज़ा थोडा खुला, थोडा बंद ज़मीन और चौखट के बीच अटका हुआ था. जैसे कोई उदासीन प्रेम एक तयशुदा इंतज़ार में दीवार का सहारा लेकर बैठा हो.

घर की दर ओ दीवार को बदलती हुई रुतें चूमती निकलती है. बरबाद हुए कोनों को झाड़ने पौंछने और मटमैली दीवारों को सफ़ेद चूने से रंगने के काम वाले इन्ही दिनों घाटी में मौसम की पहली बर्फ गिरा करती है. रेगिस्तान की रातें भी ठण्ड से भर जाती है और पानी से भरी हवा वाली सुबहें खिला करती है. दो रात के बाद इस बार रुत कायम न रह सकी. चाँद पूरब में हाथ भर ऊंचा खिला हुआ है. मैं अपनी छत के ठीक बीच में चारपाई लगा कर उस घर को याद करता हूँ, जो ढ़लान शुरू होने की जगह पर बना है.

उस घर में कौन रहता था? नहीं मालूम कौन...

* * *

नीचे लॉन में खिले हुए पौधों पर चांदनी गिरती है तब उनको देखना अच्छा लगता है. किन्तु पड़ोस की छतों पर लोग जाग रहे होते हैं. उम्मीदें और अनसुलझे सवाल उनकी नींदें चुराए रखते हैं. वे क्या सोचें कि मैं किसलिए रात को अपनी छत पर भटक रहा हूँ? इसलिए अपना ये इरादा त्याग देता हूँ. चारपाई पर बैठ कर सोचता हूँ कि अच्छा क्या था. कोई बोसा, कोई स्पर्श या फ़िर कोई मदहोशी से भरा जाम....

मैंने कहा. "तुम जाया हो गये हो." थोड़ी देर चुप रहने के बाद इसका मतलब समझ नहीं आया. जाया होना क्या होता है. ये जो सुबह सुबह तिल पर सफ़ेद फूल खिले होते हैं या मोठ की तिकोनी सी पत्तियां मुस्कुराती है ना, सब एक दिन में खो जाते हैं. ऐसे ही उस घर के अंदर की चांदनी चली गयी. अब बस भीगी हुई छत चमकती है, रात भर...

* * *

चाँद ने रात का आधा सफ़र तय कर लिया. मैं सो जाऊं और तुम भी आज की रात के लिए लुढ़का दो, अरमानों की सुराही... इस वक्त मैं एक छतरी तान लेना चाहता हूँ कि रौशनी का लिबास चुभ रहा है. 

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.