August 17, 2012

कुछ बात और है कि...




एक बरसा हुआ बादल था, जैसे दुख से भरी युवती का सफ़ेद पीला चेहरा। एक मिट्टी की खुशबू थी कीचड़ से भरी हुई। एक आदमी की याद थी जो मर कर भी नहीं मरता। एक तुम थे जिसने कभी दिल की बात कही नहीं और एक मैं था कि जाने क्या क्या बकता गया।

साहब क्या खोज रहे हो?

ईमान का एक टुकड़ा बचा था
खो गया है

आचरण के गंद फंद अब कहां मिलेगा.
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मैडम जी, ये कैसी उदासी?

चप्पल की एक जोड़ी अम्मा ने दी थी
जाने कहाँ गयी है
घर परिवार के झूठ झमेले में अब कहां मिलेगी.
* * *

बेटा जी, किसलिए यूं मुंह फुलाए

मेरे वो, सोशल साईट से विदा हो गए
सेल नंबर भी बंद पड़े हैं
मीका जाने कब गायेगा, तूं छुपी है कहां मैं तड़पता यहाँ
* * *

ओ टकले कारीगर, ये कैसी चिंता

दो रुपये का छोटा रिचार्ज करा कर
बच्चे घर से पूछा करते हैं
बापू, सौ रुपये का खाना लेकर कब आओगे.
* * *

डॉक्टर जी ये हैरत है कैसी

पैंसठ साल की ये बुढ़िया
दिन भर में दस रुपये का कपड़ा सी लेती है
सोच रहा हूँ मोतियाबंद के जालों में से दिखता कैसे है?
* * *

गाँधी टोपी वाले ट्रक डिलेवर रूठे क्यों हों

तुम लोगों ने देश की गाड़ी कंडम कर दी
गियर का भी ग्रीस खा गए.

चरखे सारे टूट गए हैं, गंद कमल पर छाई है,
लाल रंग पर उगा घास फूस, ले देकर एक मैं ही बचा हूँ,

मुझको इस गाड़ी का डिलेवर बनाओ.
* * *

बाबू साहब इतनी चुप्पी क्यों है?

जिन लोगों को है शक्कर की बीमारी
वे सिर्फ़ इशारों में बात करेंगे
वे देश की आज़ादी के लिए सबसे बाद मरेंगे.
* * *

ओ शराबी, तुम ये क्या बकते हो?

मैंने थोड़ी ज्यादा पी ली है
मैं कुछ कुछ थोड़ा बहक गया
सुबह होते ही टैम से दफ्तर जाऊँगा, दफ्तर में चुप होकर सो जाऊंगा.
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[Image courtesy : orkutgallery.com ]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.