October 9, 2012

तुम भी कब तक




रात के ग्यारह बजे हैं
और आखिर उसने छोड़ दिया है
इरादा एक और करवट लेने का।

एक टुक देखे जाती है छत के पार
आसमान के सितारों को
उसके पहलू में सोया है बेटा
हरे बिस्तर पर खिले, रुई के कच्चे फूल की तरह।

मैंने अभी अभी, कुर्सी पर बैठे बैठे
फैला ली है अपनी टाँगे कुछ इस तरह
जैसे फैली हो किसी याद की परछाई।

आखिर जाम में घोल लेना चाहता हूँ
रात की नमी में भीगे किसी पेड़ की ताज़ा खुशबू
मगर कुछ दिहाड़ी के मजदूरों ने
बुझा दी है, सोने से पहले की आखिरी बीड़ी।

तुम भी कब तक लेटी रहोगी, बिना करवट लिए हुए
मैं भी कब तक फैलाये रख सकूँगा याद की परछाई।
* * *
[Image courtesy : Manvika]

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.