September 16, 2014

मैं रुकती रही हर बार...

रास्ते की धूल
या धूल के रास्ते पर
तुम्हारी अंगुलियों के बीच
अटकी एक उम्मीद
कितनी उम्र पाएगी ?

तुम्हारी शर्ट के
इक कोने मे
दाग की उम्र ना हो उस लम्हे की......
ज़बान पर जीती रहे स्वाद उन होठों का

धूल की बारिशों में
समेट ली है कमीज की बाहें

मैंने छत पर सूखे बाल खोले......
अभी अभी कोई होंठ भिगो गया

उसने कहा कि रुको कहीं बैठ जाते हैं
मैंने कहा ज़रा दूर और
कि काश वो थक जाए और
उसे उठा सकूँ अपनी बाहों में
धूल से भरे रास्ते में ये सबसे अच्छा होता।

मैं रुकती रही हर बार....
हर बार उसका हाथ छू गया .....
मैं दूर हट कर संभलती रही.....
वो पास आता मचलता रहा.

एक साया है ज़िंदगी. थामा नहीं जाता मगर साथ चले. संजोया न जा सके किन्तु खोए भी नहीं. जैसे दीवार से आती कोई खुशबू, सड़क के भीतर सुनाई पड़ती है कोई धड़क, आसमान में अचानक कोई मचल दिखाई देती हो. ऐसे ही सब कुछ सत्य से परे इसलिए है कि हमारा जाना हुआ सत्य बहुत अल्प है. ऐसे ही बचे हुए शब्द उतने ही हैं जितने हमें बरते थे.


[Painting Image Courtesy : Jim Oberst]


सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.