October 9, 2014

घने साये दार पेड़ों का पता

जब पागलपन, मोड़ लेती किसी जवाँ नदी की तरह उफान लेता हो तो इसे हर जुबां में कुछ तो कहा जाता ही होगा. असल में मगर देखो तो धूल उड़ती ही जाये और कच्चे रास्ते से गुज़रते रेवड़ की तरह बेचैनी की पूँछ न दिखाई दे. बिना किसी दुःख के ज़िंदगी बोझ सी हो जाये. न ठहरे न गुज़रे. ज़रा हलके उठे-उठे क़दमों के लिए कोई हलकी शराब, ज़रा खुशी के लिए किसी की नरम नाज़ुक अंगुलियां और गहरे सुख के लिए बिना किसी रिश्ते वाले माशूक के साथ कोई गुनाह, कोई दिलकशी, कोई सुकून...

पागलपन में मुझे कल दोपहर से रंगीन पत्थर सूझ रहे हैं. मैं बेहिसाब रंगीन पत्थरों से भर गया हूँ. मेरी कलाइयों में बंधे, मेरे गले में झूलते पत्थर... पत्थर मौसम का पता देते हैं. सर्द दिनों में ठन्डे गर्म दिनों में तपिश भरे. जैसे किसी नाज़ुक बदन की पसीने से भीगी पीठ, नीम बुझे शोलों जैसे होठ. पागलपन असल में तेज़ रफ़्तार तलाश है. खुद में खुद को खोजो कि किसी और में खुद को खोजो.

पागलपन की नदी में दीवानों की नाव, सुख से तैरती...
* * *

ख़ानाबदोशों के घर उनके लोकगीतों में बसे होते हैं। उनके सफ़र की सुराही अनुभव के तरल से भरी होती है। ठहरा हुआ पानी पीने से पहले वे चखकर इंतज़ार करते हैं। प्रेम में पड़ो तो ख़ानाबदोश भी होना।

* * *

अप्रतिम होती है हर मृत्यु सब बुहार ले जाती है। कोई मकसद उसे बना सकता है अविस्मरणीय। जैसे मेरा जाना दुनिया को दे बहाना, तुम्हारी याद का।
* * *

तुमसे बात करते करते छपरे के आँगन में गिर रही चाँद की रौशनी की लकीर चलकर कहीं और पहुँच गयी। बात मगर कुछ हुई नहीं।
* * *

जबकि लौट कर नहीं आते कैसे भी दिन फिर भी कभी कभी बीते दिनों सा सुख आता है. पूरे दिन बरसता रहता है. मैं अपनी जेबों में टटोलता हूँ कि क्या वे दिन ऐसे ही थे. यकीन के लिए पूछता हूँ बार-बार. कहो क्या सचमुच ऐसे ही? कहीं कहीं बची हुई शिनाख्त से उड़कर गुज़रा मौसम लौटता है. एक चिड़िया हवा में गोता लगाती है. उसे किसी कीड़े को पकड़ लेना है. उसका गोता उसकी फितरत और ज़रूरत है. इसलिए हर कोई वही करता है जो उसमें बसा हुआ है. जिसमें होता है प्यार वह प्यार करता जाता है. और लोग भी वही करते हैं जो उनमें होता है. सिलसिला कैसा भी बन ही नहीं पाता. कहीं कोई राह रुक जाती है. कहानी के बेहद छोटे टुकड़े लिखते हुए दो दिन बाद बदन की हरारत और दर्द सब रोक लेता है. मैं आराम के इंतज़ार में बेआराम फिरता रहता हूँ. कोई प्रयास नहीं करता. इसलिए नहीं कि कई बार लगता है सबकुछ तय है. करने से कुछ न होगा.

एक उम्मीद लिखता हूँ कि
सूखे पत्ते घने साये दार पेड़ों का पता होते हैं.
* * *

सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.