May 7, 2016

दिल उदास तो नहीं मगर



मैं दफ्तर की कुर्सी पर बैठा हुआ उकता गया था। मैंने कुछ काम किया, कुछ फोन देखा और फिर स्टूडियो से बाहर इस घने पेड़ की छाँव में चला आया। ये पेड़ जाल का है मगर बोगनवेलिया भी इसके साथ-साथ बढ़ा था। अब दोनों प्रेमपाश में इस तरह गुंथे है कि दोनों को अलग करके नहीं देखा जा सकता। अब गहरा हरा और गुलाबी रंग एक साथ मुस्कुराते हैं।

दीवार के पास रेडियो कॉलोनी का रास्ता है वहीँ छोटी लड़कियों की चहचाहट सुनाई देने लगी। बारह बज रहे होंगे और स्कूल जा रही होंगी। एक ने शिकायत की- "तुम आई नहीं" दूसरी ने उसकी शिकायत को काटते हुए कहा- "मैं सबके लिए करती हूँ, मेरे लिए कोई कुछ नहीं करता" वे तीनों एक साथ चुप हो गयीं। शायद तीनों इस बात से सहमत थीं।

मैंने किसी के लिए कुछ नहीं किया इसलिए असहमति में फोन खोजने लगा कि वह किस जेब में रखा है। सामने दफ्तर के लोग दिखाई दिए। इस साफ़ धूप में वे अच्छे दिख रहे थे। सोचा तस्वीर उतार लूँ। तस्वीर को देखा तो ख़याल आया कि इस रेगिस्तान में भी इंसान का जीवट कैसी हरियाली बना लेता है।

वैसे बात ये थी कि आज धूप के साथ उमस भी है। दिल उदास तो नहीं मगर ऊब से भरा है। कुछ याद आते ही लगता है कि

जाने दो।

छीजने की आहट

मन एक तमाशा है  जो अपने प्रिय जादूगर का इंतज़ार करता है। शाम से बालकनी में बैठे हुए सुनाई पड़ता है। तुम कितने कोमल हो सकते हो? खुद से पूछने पर...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.