कमरपेटी में रखे कारतूस

स्मृतियाँ बेहद गुंजलक हो गई हैं। अभी-अभी बीते समय में जो गुज़रा वह एक सघन धुएं में ढका हुआ है। इसमें कुछ ठीक देख पाना संभव नहीं है। स्मृतियों को सलीके से रखते हुए, हर बार एक संदेहात्मक तस्वीर बनती है। कि क्या सब ऐसा ही था?

मन स्वतंत्र और असीमित है। उसकी कल्पना, चाहना और गति सोची जा सकने वाली सभी संभावनो से परे हैं। फिर अचानक एक न बनती हुई तस्वीर के कारण वह क्यों खराब मशीन की तरह अटक जाता है? क्या मन असीम नहीं है? वह एक छोटा सा यंत्र मात्र है?

एक ऐसा यंत्र जिस से प्रसन्नता-उदासी और आशा-निराशा की बेहिसाब रंगीन और श्वेत श्याम रोशनी बिखरती है। इस रोशनी के सम्मोहन में व्यक्ति एक कठपुतली हो जाता है। मन के धागों से बंधी ये गुलाम कठपुतली अचानक मुस्कुराने लगती है। अचानक उदास होकर कहीं खो जाती है।

उस न बन रही तस्वीर के किसी एक छूटे हुए हिस्से में स्वयं को फंसा हुआ पाता हूँ। तस्वीर एक सियाही की भांति घेर लेती है। कद्दावर अंधेरा है। आकाश की ओर जितना देखा जा सकता है। अंधेरा, उससे बड़ा दिखता है। यानी देखने को कुछ नहीं है। गुंजलक स्मृति से सही तस्वीर न चुन पाने की विवशता भाले की नोक है। ये भाला अपने ही हाथों में है। इस पर किसी और का ज़ोर नहीं है। अपनी ही मुट्ठियां सीने की ओर धकेल रही है। अपना ही प्रतिकार है कि इस भाले की नोक से बचा जा सके।

ऐसे में सचेतपना जाने कैसे अधिक हो जाता है। गाड़ी चलाने में, पैदल चलने में और जीने में कोई त्रुटि नहीं होती। मन के विपरीत मस्तिष्क जो कि सभी जुगत लगाता है, वह किसी एक बिंदु पर कैसे नाकाम हो जाता है? वह जो जानता है, उसी को जानने से कैसे मना कर देता है।

जैसे कभी हम भविष्य में घटित होने वाली किसी घटना को लेकर सामान्य क्यों नहीं हो सकते। हमने जिस भविष्य को कभी देखा नहीं, उसी की भयावह तस्वीर कैसे बना लेते हैं। वह भी तस्वीर में छूटे हुए एक ऐसे कोने को लेकर जिसके बारे में हम ठीक कुछ नहीं जानते कि वह ऐसा ही है।

मेरे पास दो एक उपाय हैं। जो मैंने बरसों के स्व-उत्पीड़न के पश्चात किसी प्रकार बच जाने पर समझे हैं। एक उपाय है, लिखना। ये मददगार है। इसका लाभ है कि एक निश्चित समय तक संभव है, आप मन के कोड़ों से बच जाएं। जब तक आपकी अंगुलियां कीबोर्ड पर असंगत, बेमेल और अरूप नृत्य कर रही हैं। तब तक मन की फटकार अनसुनी रह सकती है। पीठ पर झनझनाहट और चाबुक की स्मृति के साथ अल्पविराम लग गया है। 

इसके बाद जब अदृश्य दीवारों से टकराता हुआ, समतल गड्ढों में गिर जाने से संभलता हुआ, एक चलते फिरते शहर के बीच वीराने में लंबी सांस की टोह में थका-हारा हुआ कहीं बैठ जाने लगूं या फिर अचानक चलने लगूं। तब केवल रसायनों की शरण काम आती है।

वैद्य मेरी कमर पर बंधी पेटी में रसायनों के कारतूस भर देता है। मैं उनका आभार जताते हुए बाहर आता हूँ। उस कक्ष से बाहर आते ही जाने कैसे भयावह मन एक कदम पीछे हट जाता है। संभव है मस्तिष्क को भी लगता है कि अब उचित आसव उपलब्ध होने वाला है। मैं एक हल्की आशा से भरने लगता हूँ।

अरसे से गुम हवा का एक झोंका पास से गुज़रता हुआ कहता है। बहुत कारतूस दागने होते हैं, एक बहुत छोटे जीवन के लिए।

मैं खुशी से कहता हूँ। सुनो प्यारे। जब तक कारतूस की नोक अपनी ओर करने का विचार न जन्मे तब तक सब जीवन है। जाने कैसा जीवन मगर जीवन।

धन्यवाद।

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