कविता कोई रेलगाड़ी है

यह जीवन होने से अधिक छूट जाने के लिए बना है।

अब तक बीता पिछला बरस व्यस्त रहा। सुख से भरा व्यस्त। जिसके बारे में कभी हम सोचते हैं कि ऐसा हो और ठीक वैसा हो जाए।
कुछ घटनाएँ जीवन को पूर्वार्द्ध और उत्तरार्ध में विभाजित करती हैं। हम उस लकीर के निकट आकर ठिठक जाते हैं। प्रायः मन अनमना होने लगता है। प्रतीक्षा ऊब में। ढलने लगती है और फिर अचानक पाते हैं कि वह रेखा पार हो गई है। एक सूनापन पसर गया है।
अब क्या करें के विचार में डूबे, पीठ के बल लेटे चुपचाप विदा हो चुके क्षण को सोचते हैं। जिस ख़ुशी से हज़ारों किलोमीटर कार भागी जाती थी, वही मंथर हो जाती है। दिल सोचता है, अब कहीं जाकर क्या होगा। फिर अचानक मुस्कुराते हैं कि यही तो चाहिए था। मिल गया। शुक्रिया।
किताबें बरस भर छूटी रहीं। कुछ एक मित्रों से कहा “आप किताब मत भेजिए, किसी मेले में या ऑनलाइन ख़रीद की जाएगी” लेकिन काम कुछ और था इसलिए ये बातें भूल के तलछट तक चली गई। उनकी स्मृति लौटी तो सोचा थोड़ा आराम कर लो। कितना सारा पढ़ने को रखा है। पढ़ो।
ऐसे में ख्याति प्रकाशन की पुस्तकें अनवरत आती रहीं। छुट्टी से दफ्तर लौटा तो कभी तीन, कभी एक किताब का पार्सल मिला। जैसे किसी ने असमाप्य तृष्णा पर तरलता उड़ेल दी हो। जैसे रेगिस्तान में शाम ढले ठंडी हवा का झौंका आया हो। जैसे कुछ सोचने के बीहड़ में खोए हुए थे और अचानक बाहर आएँ हो।
कविताएँ पढ़ना लत नहीं है, आवश्यकता है। कविता बंजर मैदानों, कठोर पहाड़ों, सूने इलाकों से होते हुए शहरों तक जाती हैं। उनकी इस यात्रा में प्रेम साथ चलता है। छूटा हुआ प्रेम, आने वाला प्रेम, भुला देने के मुग़ालते में अटका प्रेम और हर तरह का प्रेम कहीं साथ नहीं छोड़ता।
मनीष यादव की कविताएँ कुछ रोज़ से साथ हैं। मैं लेखक की कल्पना नहीं कर पाता। केवल अपने बारे में पढ़ता हूँ। अपने बारे में पढ़ने से मेरा आशय है कि कविता कोई रेलगाड़ी है, जिस में यात्रा कर रहा हूँ। यात्रा का जादू बाँध कर रखता है। मनीष की कविताएँ दूर तक ले जाती हैं। मन बहुत देर तक गीला रहने से उकता सकता है किंतु इन कविताओं में गीलापन चाह की तरह उपजता है। मन चाहता है, बना रहे। कभी स्त्रीलिंग-पुल्लिंग के प्रयोग में असुविधा आती है तो भूलकर आगे बढ़ जाता हूँ।
कितने चेहरे, किरदार, भूगोल और कितना सारा जीवन जो सचमुच छूट जाने के लिए बना है।
शुक्रिया मनीष, पढ़ना जारी है। लिखना जारी रहे।



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