और फिर हताशा में घर चले जाएँ
हम गालियाँ दें कि उदास खड़े रहें। हम अपनी अंगुलियों में उपजे तनाव को मुट्ठी बन जानें दें कि इसे रिस कर बह जाने दें और फिर हताशा में घर चले जाएँ। रील देखें, लतीफ़े सुनें, भद्दे नाच को कोसें, कुकरमुत्तों की तरह उग आए इन्फ़्लुएंसर्स के लिए बुरा मुँह बनाकर सो जाएँ। क्या करें कुछ समझ नहीं आता।
शाम ही से बुझा-सा रहता है,
दिल हुआ है चिराग़ मुफ़लिस का।
मीर तक़ी मीर के इस शेर की मानिंद मुफ़लिस के चिराग़ सा दिल लिए, मैं दफ़्तर से निकला और उल्फ़त की दुकान तक पहुँचा था कि इस मुफ़लिसी को दुर्गेश जी ने बढ़ा दिया।
उन्होंने बताया कि एक बच्चे को दोस्तों ने पहले बीस हज़ार रुपये का लोन दिया। उस पैसे को ऑनलाइन गेमिंग में लगवाया। इसके बाद उधार लिए गए बीस हज़ार, पैंसठ लाख के ऋण में रूपांतरित हो चुके हैं। बच्चा घर से ग़ायब है। उसके पिता परेशान हैं।
पिता कहते हैं “मेरी दिन भर की कमाई साढ़े तीन सौ रुपए है। मैंने स्वप्न में भी लाखों रुपये नहीं देखे।” उनके चेहरे का रंग कैसा है। उनके चेहरे पर चिंता की कितनी लकीरें हैं। ये देख सकते हैं मगर नहीं समझ सकते। उनके दिल का क्या हाल है? ये कोई कार्डियोलॉजिस्ट नहीं बता सकता, केवल कोई दूसरा पिता ही थोड़ा बहुत बता सकता होगा।
मैं उदास हुआ। मैं इस घटना को अधिक नहीं सुनना चाहता था कि कैसे एक पत्रकार ख़बर से आगे बढ़कर पुलिस कप्तान साहब को समझाना चाह रहा है कि ये एक सुगठित अपराध तंत्र है। ये कोई भूल या वाणिज्यिक, व्यापारिक गतिविधि नहीं है। इसके बाद किस प्रकार पत्रकार ने प्राथमिक सूचना को लिखवाने में मदद की है। लेकिन दुर्गेश सिंह जो उल्फ़त को बता रहे थे, वह अनसुना नहीं हो सकता था।
ब्याज बट्टे का धंधा पूरे देश में है। अनेकानेक समाचार प्रायः पढ़ने को मिलते हैं। सामूहिक आत्महत्या, हत्या और अपहरण तक पहुँचने वाले इन घटनाक्रमों को पढ़कर हम एक बारगी सदमे में आते हैं किंतु तुरत किसी व्यभिचार, अनैतिक संबंध और भोग-विलास की ख़बर पढ़कर सब भूल जाते हैं।
हमारी चेतना का स्तर यही रह गया है। हमारी सामाजिक प्रतिबद्धता भी इतनी ही बची है कि पढ़ें और भूलकर आगे बढ़ जाएँ।
एडमंड बर्क सत्रहवीं शताब्दी में आयरलैंड में जन्मे एक प्रसिद्ध राजनेता, दार्शनिक और लेखक थे। वे ब्रिटेन की संसद के सदस्य भी रहे और अपने गहरे राजनीतिक विचारों तथा समाज पर लिखे गए लेखों के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी एक प्रसिद्ध उक्ति है कि “बुराई की जीत के लिए इतना ही काफी है कि अच्छे लोग कुछ न करें।”
दुर्ग सिंह राजपुरोहित एक पत्रकार हैं, वे निरंतर कुछ न कुछ कर रहे हैं। इसलिए उनको अच्छा आदमी कहा जा सकता है। उनके बारे में अनेक लोगों के अनगिनत मत हैं। मैं उन सब पर कभी ध्यान नहीं देता। उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता के उलट मेरे विचार हो सकते हैं। किंतु इस व्यक्ति ने कुछ ऐसी लड़ाइयाँ लड़ी हैं, जिनसे लोकतंत्र के अस्तित्व का बोध होता है। हम उन लड़ाइयों को समझ कर समझ सकते हैं कि अंधेरा केवल उजाले की अनुपस्थिति का बिम्ब है।
मैंने कहा दुर्ग साहब, एक पत्रकार है कालू माली। वे अंतरराष्ट्रीय पत्रकार होने का दंभ भरने वालों पत्रकारों से अधिक अच्छे हैं। जिस प्रकार से आर्थिक अभावों में जी रहे परिवारों की मदद करते हैं, वह अलभ्य है। एक आप हैं जो किसी व्यक्ति की मदद के लिए पुलिस कप्तान साहब को समझा रहे हैं। प्राथमिकी लिखवा कर आ रहे हैं। बाकी बाड़मेर में सैंकड़ों सोशल मीडिया वाले पत्रकार एक स्पॉन्सर ढूँढ रहे हैं। जिनका वे प्रचार कर सकें।
ऐसे मिलियन फॉलोवर्स वाले पत्रकारों का ये समाज क्या करेगा? उनसे क्या पाएगा?
तीन सौ साल पहले एडमंड बर्क ने जो बात कही थी, वह बात मेरे बचपन तक जीवित थी। किसी का बच्चा कहीं बेवजह घूमता दिखता तो उसके पिता तक समाचार पहुँच जाता था। बच्चे इस डर से ग़लत रास्ते पर नहीं जाते थे कि हर किसी से उनको डर था। जाने कौन पिता की पहचान वाला हमें देख ले।
आज किसी को किसी के बच्चे की फ़िक्र नहीं है। ये कहना ग़लत न होगा कि अभिभावक अपने उन बच्चों के साथ भी खड़े हैं जो ग़लत जाते हुए दिख रहे हैं। ये सबसे अधिक ख़राब बात हुई है। हमने अपना समझने का अधिकार खो दिया है। अब बच्चे फ़लाँ आदमी के हैं, समाज के नहीं हैं।
कुछ माह पहले रतन दवे ने एक स्टोरी की थी। वह बच्चों के बारे में थी। इसी प्रकार से नष्ट होते भविष्य के बारे में थी लेकिन उसमें कोई प्रमाणिक बाईट न थी। कथा थी, किंतु तथ्य न थे। आपने आज वह तथ्य बताया।
मुझे प्रसन्नता है कि दुर्ग सिंह राजपुरोहित में समाज की चिंता शेष है। लेकिन सामाजिक चेतना युक्त हस्तक्षेप कोमा में जा चुका है। अब व्यक्तिगत प्रयास ही बचे हैं। ये हमारा नया समाज है।
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