February 28, 2011

लौट कर मन की हवेली में जाना

कोई खुशबू उसको लाई होगी या फिर उसको कुछ याद आया होगा कि कल रात चार मेहराब की हवेली के आंगन में एक मुसाफिर तनहा घूम रहा था. ये रात भी कुछ काली थी और कुछ उसके चेहरे पर गहरी उदासी भी पसरी थी. किसके सीने से लगने को तड़पता होगा, किसकी याद के हिस्सों को चुनता होगा, किसके लिए यूं फिरता होगा, किस के लिए मुसाफिर बाद बरसों के उस आँगन में आया होगा ?

एक कांपते हुए पत्ते को छू कर बोला
हवेली जगा अपने ख़यालों की जन्नत, बुला जवां साजिंदों को,
हवा में घोल दे संदूकों में रखे पैरहन की खुशबू,
तलवार भोहों से कह दे गिराएँ बिजलियाँ,
रख दे उन रुखसारों पे लरज़िश कि मैं शराब पीते पीते थक गया हूँ.

आधी रात को उदास आवाज़, छोटी सिसकियाँ और लम्बी चुप्पी को सुनने के बाद, आपके पास अपना कुछ नहीं रह जाता. ऐसे में सोचता हूँ ज़िन्दगी की इस गाड़ी का रूट चार्ट बड़ा वायर्ड है. दो पल को धड़कनें सुनने को आदमी ज़िन्दगी भर नाउम्मीदी को हराने में लगा रहता है. ओ मुल्ला नसरुद्दीन के कमअक्ल गधे आँख खोल कि सामने कहवा का प्याला रखा है. जो शराब थी वो उतर गई, जो ख़याल था वो डूब गया...

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सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.