August 10, 2011

अबूझ और उदास सपनों की रातें

एक धुंधलका था. चुप्पी थी और चंद शक्लें थी. कहीं जा रहा था. रास्ते की पहचान को लेकर कोई जिज्ञासा नहीं थी. संभव है कि एक दस साल के लडके का हाथ पकड़े हुए था या उसके साथ चलते हुए ऐसा फील होता था कि हाथ को थामा हुआ है. वह एक अनवरत घेरती हुई शाम थी. जैसे वक़्त के साथ शाम अपना रंग बदलना भूल गयी थी. सफ़र कुछ क़दमों पर रुका हुआ सा था. यानि कहीं जा नहीं पा रहा था और ऐसा भी नहीं था रुक गया हूँ. मन उदास, डूबता हुआ. कौन देस, कौन मुसाफ़िर... जिसे जानते थे, वो खो गया. अचानक प्यास लग आई. देखा दोनों बच्चे छत पर बिछी हुई चारपाई पर सोये हैं. नीचे बिछी हुई एक सफ़ेद रंग की राली पर मैं उठकर बैठ जाता हूँ.

शोर है. रौशनी है. कुत्तों की आवाजें हैं. रेल का इंजन शंटिंग की तैयारी में हल्की विशल देता हुआ घर की ओर बढ़ा आ रहा है.

दूसरी रात
अपने चश्मे को उतारता हूँ और आँखों के आगे धुंधले वृक्षों की कतार खड़ी है. आँखों को मसलते हुए फ़िर से खोलता हूँ मगर पेड़ों की कतार कायम रही. कनपटी से उतरता हुआ पसीना है. गीला और डरावना. एक बार फ़िर आँखें खोलते हुए अपना चश्मा लगा कर देखता हूँ. चश्मा भी ख़राब. उस पर भी गहरा धुंधलका. चश्मे के किनारों से कुछ सूझता है. यानि दुनिया बची हुई है मगर मेरी आँखें जवाब दे गयी है. चेहरा उदास हो जाता है. मन अधीर होने लगता है. बिना आँखों के जीने का ख़याल... चौंक उठता हूँ. बंद कमरे में ऐसी की ठंडक से बच्चे बेडकवर ओढ़े हुए हैं. जया तकिये की गोद में सर रखे सो रही है. मेरी चादर गायब है.

अँधेरा. विंडो ऐसी के फैन की आवाज़ और अचानक चुप हुए झींगुर. उन धुंधले पेड़ों से बिछड़े हुए एक पेड़ की तरह बाएं हाथ से बिजली का स्विच खोजता हुआ सीधा खड़ा होता हूँ. अलमारी के निचले हिस्से में रखी चादर लेकर सो जाता हूँ.

कल की रात
हरी भरी जगह है. एक ढलवां पहाड़ी पर दस पंद्रह कदम चलते ही दो नौजवान बातें कर रहे हैं. वे आधुनिक और एक अविश्वसनीय यन्त्र में लेट कर एक बेहद ऊंचे वाटरफाल से कूदने को तैयार है. सिहरन है. भय है. गिर जाने के असंख्य ख़याल है. पीछे नहीं मुड सकता हूँ. मेरा किसी से कूदने का वादा भी नहीं है. वे दोनों अपनी छलांग लगा देते हैं. मैं कूदने की जगह से नीचे देखता हूँ, एक अतल गहराई. वे टूटी हुए उल्का की गति से ओझल हो जाते हैं. मेरे भीतर की बुनावट के पत्थर आपस में टकरा कर शोर करते हुए टूटने लगते हैं मगर बाहर से उदासीन और साबुत दीखता हूँ.

अगली बारी मेरी है. असहाय और नितांत अकेला पानी की ओर खिंचा चला जाता हूँ. रो नहीं सकता. प्रतिरोध के लिए कोई नहीं है. पानी बुला रहा है. कोई मुझे देख रहा है. मैं गिरना नहीं चाहता...

किसका इंतज़ार है, क्यों बचे रहना है ?

* * *

सरल गायिकी के उस्ताद हैं. आलाप, गिरहें और सरगम को शब्दों में पिरो लिया है. समंदर खां और साथी दुनिया की चाल के साथ चलते हैं. इतना आसान गाते हैं कि मांगणियार गायन शैली से अलग नज़र आते हैं. हिचकी गाते हुए खड़ताल का सुन्दर प्रयोग इन्हें बचाए रखता है. तुम्हें समझ आये इसलिए इतना सरल गीत चुना है.

ओ सजन ये न समझना कि तुमसे बिछड़ कर मुझे चैन है. जल बिन मछली की तरह दिन रात तड़पती हूँ. सजन आये ओ सखी क्या भेंट करूँ, थाल को मोतियों से भर दूँ और उनके ऊपर रखूं अपने दो नयन.

मेरा पिया याद कर रहा है और मुझे हिचकी आ रही है, बाजरी के नन्हे दाने चिड़ियाएँ चुग रही हैं. ओ पिया मैंने तुम्हें मना किया था कि यूं परदेस न जाना वहां की जादूगर स्त्रियाँ तुम्हें अपने सम्मोहन में कैद कर के रख लेगी. तुम बिन मुझे छत सूनी लगती है और गढ़ गिरनार भी सूना लगता है. कुदरत ने पहाड़ के ऊपर सुन्दर पहाड़ रच दिए हैं ओ सुनार तुम तो मेरी पायल के लिए बजने वाले बिछिये घड़ दो. घर के आँगन में एक बेल लगी हुई है और उसमें से काला नाग निकल आया, वह डस ही जाता मगर मैं तुम्हारे भाग्य से बच गयी हूँ... ओ पिया तुम याद कर रहे हो और मुझे हिचकी आ रही है...

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सर्द रात

एक सस्ती सराय के कमरे में रात दूसरा पहर ढल गया था। मेज़ पर मूंगफली और निचुड़े नींबू पड़े थे, वह सो चुका था।  लिफाह बेहद ठंडा था। ओलों के गिरने ...

Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने जितना ही अवैध है.